असम पिछले पांच दशक से बोडो-गैर बोडो, बांग्लादेशी मुसलमान घुसपैठिये, बांग्लादेशी शरणार्थियों की वजह से जातीय संघर्ष, दंगा और नर संहार के लिए वैश्विक स्तर पर चर्चा का मुददा रहा है। इन दंगात्मक हिंसा में मासूम बच्चों और महिलाओं को क्रूरतापूर्ण तरीके से मौत के घाट उतार दिया गया। लेकिन पिछले कुछ सालों में असम में स्थानीय संथाल आदिवासियों को भी निशाना बनाया गया है। विद्रोहियों या फिर यूं कहें कि दंगाइयों ने इन लोगों को घर में घुसकर गालियों से भून दिया, घरों में आग लगा दी और कहीं कहीं पर घर से बाहर निकाल कर गोली मार दी। इस सब की वजह उघोग-धंधे, नौकरी, शिक्षा नहीं है बल्कि इसके गर्भ में कारण कुछ और हैं।
ऐसा असम, जहां की जमीन हिंसा से रक्तरंजित हो, जहां की आबोहवा बेगुनाहों और मासूमों की चीख पुकार से गुंजायमान रही हो। उस धरती पर अहिंसा के दूत अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण की अहिंसा यात्रा अपने आप में काफी मायने रखती है।
आकड़ों के मुताबिक सन् 2012 से लेकर 2015 तक लगभग 400 गांव के तकरीबन 2 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। रेल यातायात क्षतिग्रस्त कर दिया गया। यहां तक कि प्रशासनिक अघिकारियों को भी नहीं बख्शा गया।
मैं आपको बताना चाहूंगा कि आचार्य श्री की यह अहिंसा यात्रा सन 2014 में 9 नवंबर को दिल्ली के लाल किले से प्रारंभ हुई थी। लगभग 10,000 हजार किलोमीटर की यह पदयात्रा नेपाल, भूटान और हिन्दुस्तान के विभिन्न राज्यों से होते हुए असम पहुंची है। इस अहिंसा यात्रा का एक मात्र उददेश्य असम के निवासियों में शांति और अहिंसा का सूत्रपात करना है। मैं यहां पर भारत के चक्रवर्ती सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध के बाद हृदय परिवर्तन के बाद अहिंसा और शांति को अपनाते हुए एक सशक्त शांतिपूर्ण राष्ट निर्माण का जिक्र करूंगा, और उसमें भगवान बुद्ध के उपदेशों और सिद्धांतों की कितनी बड़ी भूमिका थी। यह किसी से छिपा नहीं है।
यहां असम की हिंसा और रक्तपात को समझने के लिए थोड़ा सा इसके इतिहास में झांकना पड़ेगा। आखिरकार क्यों असम हिंसा और रक्तपात में नहाया हुआ है। क्यों वहां पर शांति के फूल खिलाने की आवश्यकता है।
क्या है वजह हिंसा की
उन्नीसवीं सदी और खासतौर पर आज़ादी बाद यह क्षेत्र खास तरह के राजनीतिक पुनर्जागरण के दौर से गुज़रा, जिसने असम लोगों में अपनी भाषा, संस्कृति, साहित्य, लोक कला और संगीत के प्रति गर्व की भावना पैदा की। राज्य की सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक विविधता को देखते हए यह एक जटिल प्रक्रिया थी। एकीकृत असमिया संस्कृति की तरफ़दारी करने वाले बहुत से लोगों का यह भी मानना रहा है कि आदिवासी इलाकों को अलग से विशेष अधिकार देकर या मेघालय, मिजोरम, नगालैण्ड और अरुणाचल प्रदेश जैसे अलग राज्यों को निर्माण करके केंद्र सरकार ने एक व्यापक असमिया पहचान के निर्माण में रुकावट डालने का काम किया। इसीलिए असम के युवाओं में केंद्र के प्रति एक नकारात्मकता और आक्रोश की भावना रही है।
गौरतलब है कि पचास के दशक से ही गैर-कानूनी रूप से बाहरी लोगों का असम में आना एक राजनीतिक मुद्दा बनने लगा था, लेकिन 1979 में यह एक प्रमुख मुद्दे के रूप में सामने आया। जब बड़ी संख्या में बांग्लादेश से आने वाले लोगों को राज्य की मतदाता सूची में शामिल कर लिया गया। 1978 में मांगलोडी लोकसभा क्षेत्र के सांसद की मृत्यु के बाद उपचुनाव की घोषणा हुई। चुनाव अधिकारी ने पाया कि मतदाताओं की संख्या में अचानक ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हो गया है। इसने स्थानीय स्तर पर लोगों में आक्रोश पैदा किया। यह माना गया कि बाहरी लोगों, विशेष रूप से बांग्लादेशियों के आने के कारण ही इस क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई है। ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) और क्षेत्रीय राजनीतिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठनों से मिलकर बनी असम गण संग्राम परिषद ने बहिरागतों के खिलाफ़ आंदोलन छेड़ दिया। ध्यान दें कि एक छात्र संगठन के रूप में आसू अंग्रेज़ों के ज़माने से ही अस्तित्व में था। उस समय उसका नाम था अहोम छात्र सम्मिलन। लेकिन 1940 में यह संगठन विभाजित हुआ और 1967 में इन दोनों धड़ों का फिर से विलय हो गया और संगठन का नाम ऑल असम स्टूडेंट्स एसोसिएशन रखा गया। लेकिन फिर इसका नाम बदलकर ऑल असम स्टूडेंट यूनियन या आसू कर दिया गया।
आसू द्वारा चलाये गये आंदोलन को असमिया भाषा बोलने वाले हिंदुओं, मुसलिमों और बहुत से बंगालियों ने भी खुल कर समर्थन दिया। आंदोलन के नेताओं ने यह दावा किया कि राज्य की जनसंख्या का 31 से 34 प्रतिशत भाग बाहर से ग़ैर-कानूनी रूप से आये लोगों का है। उन्होंने केंद्र सरकार से माँग की कि वह बाहरी लोगों को असम आने से रोकने के लिए यहाँ की सीमाओं को सील कर दे, ग़ैर-कानूनी बाहरी लोगों की पहचान करे और उनके नाम को मतदाता सूची से हटाये और जब तक ऐसा न हो असम में कोई चुनाव न कराये। आंदोलन ने यह माँग भी रखी कि 1961 के बाद राज्य में आने वाले लोगों को उनके मूल राज्य में वापस भेजा जाए या कहीं दूसरी जगह बसाया जाए। इस आंदोलन को इतना ज़ोरदार समर्थन मिला कि 1984 में यहाँ के सोलह संसदीय क्षेत्रों से 14 संसदीय क्षेत्रों में चुनाव नहीं हो पाया। 1979 से 1985 के बीच राज्य में राजनीतिक अस्थिरता रही। इसी दौरान राष्ट्रपति शासन भी लागू हुआ। लगातार आन्दोलन होते रहे और कई बार इन आंदोलनों ने हिंसक रूप अख्तियार किया। राज्य में अभूतपूर्व जातीय हिंसा की स्थिति पैदा हो गयी। लम्बे समय तक समझौता-वार्ता चलने के बावजूद आंदोलन के नेताओं और केंद्र सरकार के बीच कोई सहमति नहीं बन सकी, क्योंकि यह बहुत ही जटिल मुद्दा था। यह तय करना आसान नहीं था कि कौन ‘बाहरी’ या विदेशी है और ऐसे लोगों को कहाँ भेजा जाना चाहिए।
केंद्र सरकार ने 1983 में असम में विधानसभा चुनाव कराने का फ़ैसला किया। लेकिन आंदोलन से जुड़े संगठनों ने इसका बहिष्कार किया। इन चुनावों में बहुत कम वोट डाले गये। जिन क्षेत्रों में असमिया भाषी लोगों का बहुमत था, वहाँ तीन प्रतिशत से भी कम वोट पड़े। राज्य में आदिवासी, भाषाई और साम्प्रदायिक पहचानों के नाम पर ज़बरदस्त हिंसा हुई, जिसमें तीन हज़ार से भी ज़्यादा लोग मारे गये। चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी की सरकार ज़रूर बनी, लेकिन इसे कोई लोकतांत्रिक वैधता हासिल नहीं थी। 1983 की हिंसा के बाद दोनों पक्षों में फिर से समझौता-वार्ता शुरू हुई। 15 अगस्त 1985 को केंद्र की राजीव गाँधी सरकार और आंदोलन के नेताओं के बीच समझौता हुआ, जिसे असम समझौते के नाम से जाना गया। इसके तहत 1951 से 1961 के बीच आये सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट देने का अधिकार देने का फ़ैसला किया गया। तय किया कि जो लोग 1971 के बाद असम में आये थे, उन्हें वापस भेज दिया जाएगा। 1961 से 1971 के बीच आने वाले लोगों को वोट का अधिकार नहीं दिया गया, लेकिन उन्हें नागरिकता के अन्य सभी अधिकार दिये गये। असम के आर्थिक विकास के लिए पैकेज की भी घोषणा की गयी और यहाँ ऑयल रिफ़ाइनरी, पेपर मिल और तकनीक संस्थान स्थापित करने का फ़ैसला किया गया। केंद्र सरकार ने यह भी फ़ैसला किया कि वह असमिया-भाषी लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान की सुरक्षा के लिए विशेष कानून और प्रशासनिक उपाय करेगी। इसके बाद, इस समझौते के आधार पर मतदाता-सूची में संशोधन किया गया। विधानसभा को भंग करके 1985 में ही चुनाव कराए गये, जिसमें नवगठित असम गण परिषद को बहुमत मिला। पार्टी के नेता प्रफुल्ल कुमार महंत, जो कि आसू के अध्यक्ष भी थे, मुख्यमंत्री बने। उस समय उनकी उम्र केवल 32 वर्ष की थी। असम-समझौते से वहाँ लम्बे समय से चल रही राजनीतिक अस्थिरता का अंत हुआ। लेकिन 1985 के बाद भी यहाँ एक अलग बोडो राज्य के लिए आंदोलन चलता रहा। इसी तरह भारत से अलग होकर असमिया लोगों के लिए एक अलग राष्ट्र की माँग को लेकर उल्फा का सक्रिय, भूमिगत और हिंसक आंदोलन भी चलता रहा।
असम आंदोलन और असम समझौते के अनुभव से पता चलता है कि बाहरी लोगों को ग़ैर-कानूनी रूप से कहीं बसने से रोकना तो आवश्यक है, लेकिन एक बार जो बस गया उसे हटाना एक बहुत मुश्किल काम है। उल्लेखनीय है कि जिस मुद्दे को लेकर असम आंदोलन शुरू हुआ था, वह मुद्दा और उससे जुड़ी शिकायतें अभी तक पूरी तरह दूर नहीं हो पायी हैं। इसके अलावा असम के समाज में दूसरी पहचानों के प्रति असहिष्णुता की भावना बढ़ी है। ऐसा सिर्फ़ ‘मुसलमान बंगालियों’ के संदर्भ में ही नहीं हुआ है, बल्कि आदिवासी लोगों की मांगों के खिलाफ़ भी एक तरह की कट्टरता पनपी है। असम में हिंसा और हत्याओं के पीछे किसी तरह का कोई आर्थिक कारण नहीं रहा है। यह एक तरह का आतंक फैलाने का काम भर रहा है।
ऐसे हालातों वाले राज्य में पहली बार अहिंसा के दूत आचार्य श्री महाश्रमण अहिंसा यात्रा लेकर असम पहुंचे हैं। मौजूदा वक्त में आचार्यश्री गुवाहाटी में प्रवास कर रहे हैं। वे प्रतिदिन स्थानीय लोगों से मिलते हैं। और अहिंसा का संदेश देते हैं। उन्हें दिशा बोध देते हैं।
मुझे याद है 67वें अणुव्रत अधिवेशन के दौरान असम के पूर्व मुख्यमत्री प्रफुल मेहन्ता भी उनसे मिलने आए थे। और अक्तूबर मास में कांग्रेस के राष्टीय महासचिव राहुल गांधी ने भी आचार्य श्री से मुलाकात की।
इससे पहले असम विधान सभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुले मंच से आचार्य श्री के द्वारा शांति के लिए किए जा रहे प्रयासों की प्रशंसा की थी। ऐसे में असम के स्थानीय निवासियों पर आचार्यश्री महाश्रमण की अहिंसा यात्रा का असर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा है।
स्थानीय निवासी आचार्य श्री का खुले दिल से स्वागत कर रहे हैं। इसके पक्ष में मैं अपना एक संस्मरण आपके साथ साझा करना चाहता हूं।
आपको याद दिलाना चाहूंगा कि असम के हिंसाग्रस्त इलाक़े का दौरा करने के बाद राजनाथ सिंह ने कहा था, “हम जानना चाहते हैं कि इन संगठनों के तार किससे जुड़े हुए हैं। हम इसे साधारण चरमपंथी कृत्य नहीं मान सकते। राज्य और केंद्र दोनों ही इससे उसी तरह निपटेंगे जिस तरह चरमपंथ से निपटा जाता है.“उन्होंने भूटान और म्यांमार के साथ भारतीय सीमा को ’सील’ करने की बात कही है लेकिन ये दुर्गम इलाक़ा है और ऐसा करना आसान नहीं होगा।
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार राजनाथ ने कहा था कि यदि ज़रूरी हुआ तो नेशनल डेमोक्रेटिक फ़्रंट ऑफ़ बोडोलैंड से निपटने के लिए सैन्य सहायता मुहैया कराई जाएगी।
गृहमंत्री ने अलगाववादी संगठन से बातचीत की संभावना से इनकार किया है, “इस तरह के संगठनों से कोई बातचीत नहीं होगी। केवल कार्रवाई होगी। समयबद्ध कार्रवा
असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने हमेशा कहा है कि राज्य और केंद्र सरकार ऐसे किसी ग्रुप के आगे नहीं झुकेगी और उग्रवादियों से सख़्ती से निपटेगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर लिखा, “सोनितपुर और कोकराझार में मासूमों को मारना कायरता है।“
तीन मांगें थी पहली बोडो भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित किया जाये। दूसरी बोडो जनजाति बहुल असम के चार जिलों को एक स्वायत्तशासी क्षेत्र बनाकर स्थानीय विकास का अवसर प्रदान करना। तीसरी उन तमाम युवक और युवतियों को मुख्य धारा में वापस लेना जो हथियार उठाकर बोडो आन्दोलन के नाम पर बागी हो गये थे।
असम में अहिंसा यात्रा के दौरान अब तक असम के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल मेहन्ता से लेकर कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी तक उनसे भेंट कर चुके हैं। स्थानीय विधायक और जन प्रतिनिधियों ने भी उनका दिल से स्वागत किया है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि गुरूदेव की अहिंसा यात्रा की मशाल असम में शांति और अहिंसा से समस्त समाज को आलोकित करेगी और प्राणियों में सदभावना का विकास होगा।
ऐसा असम, जहां की जमीन हिंसा से रक्तरंजित हो, जहां की आबोहवा बेगुनाहों और मासूमों की चीख पुकार से गुंजायमान रही हो। उस धरती पर अहिंसा के दूत अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण की अहिंसा यात्रा अपने आप में काफी मायने रखती है।
आकड़ों के मुताबिक सन् 2012 से लेकर 2015 तक लगभग 400 गांव के तकरीबन 2 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। रेल यातायात क्षतिग्रस्त कर दिया गया। यहां तक कि प्रशासनिक अघिकारियों को भी नहीं बख्शा गया।
मैं आपको बताना चाहूंगा कि आचार्य श्री की यह अहिंसा यात्रा सन 2014 में 9 नवंबर को दिल्ली के लाल किले से प्रारंभ हुई थी। लगभग 10,000 हजार किलोमीटर की यह पदयात्रा नेपाल, भूटान और हिन्दुस्तान के विभिन्न राज्यों से होते हुए असम पहुंची है। इस अहिंसा यात्रा का एक मात्र उददेश्य असम के निवासियों में शांति और अहिंसा का सूत्रपात करना है। मैं यहां पर भारत के चक्रवर्ती सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध के बाद हृदय परिवर्तन के बाद अहिंसा और शांति को अपनाते हुए एक सशक्त शांतिपूर्ण राष्ट निर्माण का जिक्र करूंगा, और उसमें भगवान बुद्ध के उपदेशों और सिद्धांतों की कितनी बड़ी भूमिका थी। यह किसी से छिपा नहीं है।
यहां असम की हिंसा और रक्तपात को समझने के लिए थोड़ा सा इसके इतिहास में झांकना पड़ेगा। आखिरकार क्यों असम हिंसा और रक्तपात में नहाया हुआ है। क्यों वहां पर शांति के फूल खिलाने की आवश्यकता है।
क्या है वजह हिंसा की
उन्नीसवीं सदी और खासतौर पर आज़ादी बाद यह क्षेत्र खास तरह के राजनीतिक पुनर्जागरण के दौर से गुज़रा, जिसने असम लोगों में अपनी भाषा, संस्कृति, साहित्य, लोक कला और संगीत के प्रति गर्व की भावना पैदा की। राज्य की सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक विविधता को देखते हए यह एक जटिल प्रक्रिया थी। एकीकृत असमिया संस्कृति की तरफ़दारी करने वाले बहुत से लोगों का यह भी मानना रहा है कि आदिवासी इलाकों को अलग से विशेष अधिकार देकर या मेघालय, मिजोरम, नगालैण्ड और अरुणाचल प्रदेश जैसे अलग राज्यों को निर्माण करके केंद्र सरकार ने एक व्यापक असमिया पहचान के निर्माण में रुकावट डालने का काम किया। इसीलिए असम के युवाओं में केंद्र के प्रति एक नकारात्मकता और आक्रोश की भावना रही है।
गौरतलब है कि पचास के दशक से ही गैर-कानूनी रूप से बाहरी लोगों का असम में आना एक राजनीतिक मुद्दा बनने लगा था, लेकिन 1979 में यह एक प्रमुख मुद्दे के रूप में सामने आया। जब बड़ी संख्या में बांग्लादेश से आने वाले लोगों को राज्य की मतदाता सूची में शामिल कर लिया गया। 1978 में मांगलोडी लोकसभा क्षेत्र के सांसद की मृत्यु के बाद उपचुनाव की घोषणा हुई। चुनाव अधिकारी ने पाया कि मतदाताओं की संख्या में अचानक ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हो गया है। इसने स्थानीय स्तर पर लोगों में आक्रोश पैदा किया। यह माना गया कि बाहरी लोगों, विशेष रूप से बांग्लादेशियों के आने के कारण ही इस क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई है। ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) और क्षेत्रीय राजनीतिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठनों से मिलकर बनी असम गण संग्राम परिषद ने बहिरागतों के खिलाफ़ आंदोलन छेड़ दिया। ध्यान दें कि एक छात्र संगठन के रूप में आसू अंग्रेज़ों के ज़माने से ही अस्तित्व में था। उस समय उसका नाम था अहोम छात्र सम्मिलन। लेकिन 1940 में यह संगठन विभाजित हुआ और 1967 में इन दोनों धड़ों का फिर से विलय हो गया और संगठन का नाम ऑल असम स्टूडेंट्स एसोसिएशन रखा गया। लेकिन फिर इसका नाम बदलकर ऑल असम स्टूडेंट यूनियन या आसू कर दिया गया।
आसू द्वारा चलाये गये आंदोलन को असमिया भाषा बोलने वाले हिंदुओं, मुसलिमों और बहुत से बंगालियों ने भी खुल कर समर्थन दिया। आंदोलन के नेताओं ने यह दावा किया कि राज्य की जनसंख्या का 31 से 34 प्रतिशत भाग बाहर से ग़ैर-कानूनी रूप से आये लोगों का है। उन्होंने केंद्र सरकार से माँग की कि वह बाहरी लोगों को असम आने से रोकने के लिए यहाँ की सीमाओं को सील कर दे, ग़ैर-कानूनी बाहरी लोगों की पहचान करे और उनके नाम को मतदाता सूची से हटाये और जब तक ऐसा न हो असम में कोई चुनाव न कराये। आंदोलन ने यह माँग भी रखी कि 1961 के बाद राज्य में आने वाले लोगों को उनके मूल राज्य में वापस भेजा जाए या कहीं दूसरी जगह बसाया जाए। इस आंदोलन को इतना ज़ोरदार समर्थन मिला कि 1984 में यहाँ के सोलह संसदीय क्षेत्रों से 14 संसदीय क्षेत्रों में चुनाव नहीं हो पाया। 1979 से 1985 के बीच राज्य में राजनीतिक अस्थिरता रही। इसी दौरान राष्ट्रपति शासन भी लागू हुआ। लगातार आन्दोलन होते रहे और कई बार इन आंदोलनों ने हिंसक रूप अख्तियार किया। राज्य में अभूतपूर्व जातीय हिंसा की स्थिति पैदा हो गयी। लम्बे समय तक समझौता-वार्ता चलने के बावजूद आंदोलन के नेताओं और केंद्र सरकार के बीच कोई सहमति नहीं बन सकी, क्योंकि यह बहुत ही जटिल मुद्दा था। यह तय करना आसान नहीं था कि कौन ‘बाहरी’ या विदेशी है और ऐसे लोगों को कहाँ भेजा जाना चाहिए।
केंद्र सरकार ने 1983 में असम में विधानसभा चुनाव कराने का फ़ैसला किया। लेकिन आंदोलन से जुड़े संगठनों ने इसका बहिष्कार किया। इन चुनावों में बहुत कम वोट डाले गये। जिन क्षेत्रों में असमिया भाषी लोगों का बहुमत था, वहाँ तीन प्रतिशत से भी कम वोट पड़े। राज्य में आदिवासी, भाषाई और साम्प्रदायिक पहचानों के नाम पर ज़बरदस्त हिंसा हुई, जिसमें तीन हज़ार से भी ज़्यादा लोग मारे गये। चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी की सरकार ज़रूर बनी, लेकिन इसे कोई लोकतांत्रिक वैधता हासिल नहीं थी। 1983 की हिंसा के बाद दोनों पक्षों में फिर से समझौता-वार्ता शुरू हुई। 15 अगस्त 1985 को केंद्र की राजीव गाँधी सरकार और आंदोलन के नेताओं के बीच समझौता हुआ, जिसे असम समझौते के नाम से जाना गया। इसके तहत 1951 से 1961 के बीच आये सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट देने का अधिकार देने का फ़ैसला किया गया। तय किया कि जो लोग 1971 के बाद असम में आये थे, उन्हें वापस भेज दिया जाएगा। 1961 से 1971 के बीच आने वाले लोगों को वोट का अधिकार नहीं दिया गया, लेकिन उन्हें नागरिकता के अन्य सभी अधिकार दिये गये। असम के आर्थिक विकास के लिए पैकेज की भी घोषणा की गयी और यहाँ ऑयल रिफ़ाइनरी, पेपर मिल और तकनीक संस्थान स्थापित करने का फ़ैसला किया गया। केंद्र सरकार ने यह भी फ़ैसला किया कि वह असमिया-भाषी लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान की सुरक्षा के लिए विशेष कानून और प्रशासनिक उपाय करेगी। इसके बाद, इस समझौते के आधार पर मतदाता-सूची में संशोधन किया गया। विधानसभा को भंग करके 1985 में ही चुनाव कराए गये, जिसमें नवगठित असम गण परिषद को बहुमत मिला। पार्टी के नेता प्रफुल्ल कुमार महंत, जो कि आसू के अध्यक्ष भी थे, मुख्यमंत्री बने। उस समय उनकी उम्र केवल 32 वर्ष की थी। असम-समझौते से वहाँ लम्बे समय से चल रही राजनीतिक अस्थिरता का अंत हुआ। लेकिन 1985 के बाद भी यहाँ एक अलग बोडो राज्य के लिए आंदोलन चलता रहा। इसी तरह भारत से अलग होकर असमिया लोगों के लिए एक अलग राष्ट्र की माँग को लेकर उल्फा का सक्रिय, भूमिगत और हिंसक आंदोलन भी चलता रहा।
असम आंदोलन और असम समझौते के अनुभव से पता चलता है कि बाहरी लोगों को ग़ैर-कानूनी रूप से कहीं बसने से रोकना तो आवश्यक है, लेकिन एक बार जो बस गया उसे हटाना एक बहुत मुश्किल काम है। उल्लेखनीय है कि जिस मुद्दे को लेकर असम आंदोलन शुरू हुआ था, वह मुद्दा और उससे जुड़ी शिकायतें अभी तक पूरी तरह दूर नहीं हो पायी हैं। इसके अलावा असम के समाज में दूसरी पहचानों के प्रति असहिष्णुता की भावना बढ़ी है। ऐसा सिर्फ़ ‘मुसलमान बंगालियों’ के संदर्भ में ही नहीं हुआ है, बल्कि आदिवासी लोगों की मांगों के खिलाफ़ भी एक तरह की कट्टरता पनपी है। असम में हिंसा और हत्याओं के पीछे किसी तरह का कोई आर्थिक कारण नहीं रहा है। यह एक तरह का आतंक फैलाने का काम भर रहा है।
ऐसे हालातों वाले राज्य में पहली बार अहिंसा के दूत आचार्य श्री महाश्रमण अहिंसा यात्रा लेकर असम पहुंचे हैं। मौजूदा वक्त में आचार्यश्री गुवाहाटी में प्रवास कर रहे हैं। वे प्रतिदिन स्थानीय लोगों से मिलते हैं। और अहिंसा का संदेश देते हैं। उन्हें दिशा बोध देते हैं।
मुझे याद है 67वें अणुव्रत अधिवेशन के दौरान असम के पूर्व मुख्यमत्री प्रफुल मेहन्ता भी उनसे मिलने आए थे। और अक्तूबर मास में कांग्रेस के राष्टीय महासचिव राहुल गांधी ने भी आचार्य श्री से मुलाकात की।
इससे पहले असम विधान सभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुले मंच से आचार्य श्री के द्वारा शांति के लिए किए जा रहे प्रयासों की प्रशंसा की थी। ऐसे में असम के स्थानीय निवासियों पर आचार्यश्री महाश्रमण की अहिंसा यात्रा का असर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा है।
स्थानीय निवासी आचार्य श्री का खुले दिल से स्वागत कर रहे हैं। इसके पक्ष में मैं अपना एक संस्मरण आपके साथ साझा करना चाहता हूं।
आपको याद दिलाना चाहूंगा कि असम के हिंसाग्रस्त इलाक़े का दौरा करने के बाद राजनाथ सिंह ने कहा था, “हम जानना चाहते हैं कि इन संगठनों के तार किससे जुड़े हुए हैं। हम इसे साधारण चरमपंथी कृत्य नहीं मान सकते। राज्य और केंद्र दोनों ही इससे उसी तरह निपटेंगे जिस तरह चरमपंथ से निपटा जाता है.“उन्होंने भूटान और म्यांमार के साथ भारतीय सीमा को ’सील’ करने की बात कही है लेकिन ये दुर्गम इलाक़ा है और ऐसा करना आसान नहीं होगा।
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार राजनाथ ने कहा था कि यदि ज़रूरी हुआ तो नेशनल डेमोक्रेटिक फ़्रंट ऑफ़ बोडोलैंड से निपटने के लिए सैन्य सहायता मुहैया कराई जाएगी।
गृहमंत्री ने अलगाववादी संगठन से बातचीत की संभावना से इनकार किया है, “इस तरह के संगठनों से कोई बातचीत नहीं होगी। केवल कार्रवाई होगी। समयबद्ध कार्रवा
असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने हमेशा कहा है कि राज्य और केंद्र सरकार ऐसे किसी ग्रुप के आगे नहीं झुकेगी और उग्रवादियों से सख़्ती से निपटेगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर लिखा, “सोनितपुर और कोकराझार में मासूमों को मारना कायरता है।“
तीन मांगें थी पहली बोडो भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित किया जाये। दूसरी बोडो जनजाति बहुल असम के चार जिलों को एक स्वायत्तशासी क्षेत्र बनाकर स्थानीय विकास का अवसर प्रदान करना। तीसरी उन तमाम युवक और युवतियों को मुख्य धारा में वापस लेना जो हथियार उठाकर बोडो आन्दोलन के नाम पर बागी हो गये थे।
असम में अहिंसा यात्रा के दौरान अब तक असम के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल मेहन्ता से लेकर कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी तक उनसे भेंट कर चुके हैं। स्थानीय विधायक और जन प्रतिनिधियों ने भी उनका दिल से स्वागत किया है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि गुरूदेव की अहिंसा यात्रा की मशाल असम में शांति और अहिंसा से समस्त समाज को आलोकित करेगी और प्राणियों में सदभावना का विकास होगा।


Very informative article. Thanks.
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