Tuesday, November 3, 2015

वैशाली अपने पीछे छोड़ गई कई सुलगते सवाल

बीती रात गाजियाबाद में इंजीनियरिंग की स्टूडेंट वैशाली की सड़क हादसे में दर्दनाक मौत ने एकदम से झकझोर कर रख दिया। गाजियाबाद में आटो वालों से लेकर बस ड्राइवर तक बेलगाम और उददंड हैं। अनुशासन नाम की कोई व्यवस्था सड़क पर रह ही नहीं गई है।

इस सड़क हादसे के बाद सारी जिम्मेदारी का सेहरा गाजियाबाद पुलिस के सिर पर बांधा जाएगा। यातायात माह को निशाने पर लिया जाएगा क्योंकि पुलिस को निशाना बनाना आसान है, लेकिन सवाल यह है कि सड़क पर इस तरह के एक्सीडेंट हो क्यों रहे हैं। कौन जिम्मेदार है। ऐसे में कुछ बातें मेरे जेहन में आती हैं। कहीं ना कहीं इसके लिए सड़क पर बढ़ता वाहनों का दबाव और अतिक्रमण हैं। जिसकी वजह से सड़के संकरी होती चली गई हैं। जो सड़कें बनते वक्त चैड़ी नजर आती हैं। वहीं कुछ सालों बाद संकरी नजर आती हैं। अब फिर वही सवाल- कौन है जिम्मेदार सड़कों के संकरे होने के लिए। पुलिस, प्रशासन या हमारी मनमानी ?

Saturday, October 24, 2015

स्त्री की दुर्गति और नवरात्र


अक्तूबर के महीने में दो ऐसी खबरें आई जिन्होंने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। पहली खबर दिल्ली से ढाई साल की मासूम के साथ बलात्कार और दूसरी नोएडा में 11वीं की छात्रा का मनचलों से तंग आकर सुसाइड करना। नवरात्र में ऐसी घटनाएं सुनने के लिए मिलेंगी, शायद ही किसी ने सोचा होगा। तिस पर देश की राजधानी में राज्य सरकार और केंद्र सरकार में इस मुद्दे पर सियासी घमासान।

बहरहाल हम बात कर रहे हैं नवरात्र के दौरान घटी इन दो घटनाओं के बारे में। आधी आबादी की त्रासदी पर बातचीत करने के लिए नवरात्री से बेहतर मौका नहीं हो सकता। इन दिनों हिंदू देवी के नौ रुपों की पूजा करता है। यह वह शक्ति है जो अन्याय का विनाश करती है। जो पापियों और दुष्टों का संहार करती है। जो अपने बच्चों का पालन-पोषण और रक्षा करती है। जो जनती है, जो रचती है, जो सहेजती है।

इतिहास साक्षी है कि भारत में स्त्रियां अंधकार के विरूद्व सतत युद्व का प्रतीक रही हैं। नवरात्र में दुर्गा के नौ रुपों की पूजा यही समझाने की कोशिश करती है। उसी स्त्री शक्ति की हमारे समाज में कितनी दुर्गति हो रही है। अमानवीयता, बलात्कार, घरेलू हिंसा, यौन प्रताड़ना उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। जब वह आत्मसम्मान के लिए कानून की तरफ हाथ बढ़ाती है। तो यहां भी कानून के रखवाले उसे कठपुतली की तरह नचाने से नहीं चूकते। समाज के ठेकेदारों के साथ इनकी सांठ गांठ किसी से छिपी नहीं है। विवाह के दौरान पढ़े जाने वाले मंत्र, रक्षा बंधन पर दिया जाने वाला वायदा सब कितने सतही बनकर रह गए हैं। हमारे ऋषि और विद्वानों ने इन्हें समाज में स्त्रियों के सम्मान व स्थान के लिए बनाया और जीवन का अमूल्य हिस्सा बनाया। लेकिन आज समाज उसी को ठेंगा दिखा रहा है।

प्रश्न यहां पर यह उठता है कि समाज में स्त्रियों की दुर्गति के लिए जिम्मेदार कौन है। समाज में घूम रहे महिषासुरों का वध कौन करेगा ?