अजय शर्मा
दिवाली के बाद दिल्ली एनसीआर को वायु प्रदूषण ने बुरी तरह से प्रभावित किया। पूरा वातावरण दमघोंटू हो गया। लोगों का सांस लेना भी दूभर हो गया था। जिसके परिणामस्वरूप लोग इसकी शिकायतें लेकर लोग अस्पतालों में भी पहुंचने शुरू हो हुए। दिल्ली की हवा इतनी जहरीली हो गई थी इसका अंदाजा दिल्ली सरकार के स्कूल बंद करने के आदेश से लगाया जा सकता है। एनजीटी ने भी दिल्ली सरकार को वायु प्रदूषण को लेकर फटकार लगाई।
समस्या यह नहीं कि वायु प्रदूषण पर नियंत्रण कैसे किया जाए। बल्कि समस्या यह है कि वायु प्रदूषण की रोकथाम को लेकर या फिर इसे स्वच्छ रखने के लिए अब तक किए गए प्रयास कारगर साबित क्यों नहीं हुए। प्रश्न यह है कि क्यों दिल्ली एनसीआर की हवा दिन पर दिन जहरीली होती जा रही है। क्यों दिल्ली एनसीआर में लंदन जैसे ग्रेट स्मॉग जैसे हालात पैदा किए जा रहे हैं। जब लंदन में स्मॉग से लगभग 4000 लोग मर गए थे। अभी हाल ही में एक राष्टीय प्रतिष्ठित अखबार के हवाले से खबर आई है कि दिल्ली में हर रोज औसतन वायु प्रदूषण से 300 लोग मर रहे हैं।
डॉक्टर्स एवं र्प्यावरणविदों के मुताबिक दिल्ली की आबोहवा रहने लायक नहीं है। यदि आप जिंदा रहना चाहते हैं तो तुरंत दिल्ली एनसीआर छोड़ दें। यहां का वातावरण बच्चों एवं बुजुर्गों को असमय काल के मुंह में और भयंकर जान लेवा बीमारियों की गिरफत में ले रहा है। शिशुओं का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है।
जबकि पिछले कई दशकों से दिल्ली एनसीआर में वायु प्रदूषण को लेकर सैकड़ों जन जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं फिर भी स्थितियां जस की तस हैं। तो ऐसे में सवाल यह उठता है कि कमी कहां है। कौन है जिम्मेदार ? सरकार या फिर हम लोग ?
पिछले दिनों के हालातों को बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि जब पूरा दिल्ली एनसीआर धुंध और धुएं से हांफ रहा था। सरकार के तमाम ‘उपायों’ के बावजूद सार्वजनिक मॉनिटरों पर शहर की वायु प्रदूषण के स्तर से कहीं ज्यादा जहरीली आबोहवा थी। नतीजतन, राज्य की बिगड़ती सेहत और लोगों की नाराजगी को देखते हुए केंद्रीय पर्यावरण सचिव एएन झा ने बीते तीन नवंबर को एक आपात बैठक बुलाई। इसमें पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान के पर्यावरण सचिव भी शामिल हुए। इस मीटिंग के नतीजे को जानने के लिए पर्यावरण मंत्रालय के बाहर जमा पत्रकारों को बताया गया कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को अपनी गिरफ्त में ले चुके जानलेवा प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार ‘सख्त कदम’ उठाने जा रही है। कई उपायों की घोषणा भी की गई, जैसे कि ईंट भट्ठों को बंद करना, डीजल से चलने वाले जेनरेटरों को नियंत्रित करना और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के खिलाफ कार्रवाई का दिल्ली पुलिस को आदेश देना।
सारी बातें सुनकर जनता भी संतुष्ट हो गई कि चलो, वायु प्रदूषण के खिलाफ कुछ तो हो रहा है।
मगर इसमें जो सच है वो हम नहीं जानते, वो यह कि जिन उपायों की बात उस दिन की गई थी, वे महज सुझाव थे। और यह भी सच है कि इन सुझावों के आगे जाकर कोई दूसरी कार्रवाई भी नहीं की गई। इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण बात यह कि ठीक ऐसे ही सुझाव साल 2015 में उस वक्त जारी किए गए थे, जब पर्यावरण मंत्रालय के मुखिया प्रकाश जावडे़कर थे। यानी पिछले साल की तरह इस बार भी मीटिंग के बाद कोई खास आदेश नहीं दिया गया था, सिर्फ ‘दिशा-निर्देश’ जारी करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली गई थी।
हालांकि अगले 48 घंटों में मौसम का मिजाज कुछ ठीक हुआ, सूर्य देवता मेहरबान हुए और दृश्यता भी बेहतर हुई। वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) भी 900 से घटकर 500 पर आ गया (जो खतरनाक ही माना जाता है), और हम एक बार फिर वायु प्रदूषण को भूल गए। अपना मीडिया भी दूसरी खबरों की तलाश में जुट गया। और उसे खबर मिल भी गई, देश में नोटबंदी की खबर के रूप में और मीडिया इस जानलेवा वायु प्रदूषण को भूल गया।
मगर सच एक हफ्ते के बाद ही सामने आ गया, जब दिल्ली में वायु प्रदूषण के मसले पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में सुनवाई हुई। जजों द्वारा यह सवाल पूछने पर कि किस तरह के खास कदम उठाए गए हैं, अधिकारियों ने स्वीकार किया कि तीन नवंबर की बैठक के बाद जिन उपायों की घोषणा की गई थी, वे सिर्फ दिशा-निर्देश थे। मगर अभी एक बड़ा खुलासा होना बाकी था। एक अखबार के हवाले से पता चला कि, ‘सभी संबंधित अधिकारियों ने यह स्वीकार किया कि प्रदूषण को नियंत्रित करने के कानूनों, यहां तक कि एनजीटी के आदेशों को भी बमुश्किल लागू किया जा सका।’ ‘किसी ने यह सुझाव शायद ही दिया कि इन आदेशों व कानूनों को आखिर किस तरह लागू करना सुनिश्चित किया जा सकता है।’ यह जानकर बहुत ही हैरानी होती है कि किस तरह लोगों के जीवन से खेला जा रहा है।
एनजीटी द्वारा की जा रही खिंचाई के दरम्यान केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी कुछ तथ्य पेश किए, जिनके अनुसार उत्तर भारत के शहरों में सभी तरह के निर्माण कार्यों पर तत्काल रोक लगा दी जानी चाहिए। बोर्ड के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के कुछ हिस्सों में सूक्ष्म कणों यानी पीएम-10 का स्तर 1,990 ग्राम प्रति घनमीटर को भी पार कर गया था। मगर वायु गुणवत्ता को बताने के लिए लगाए गए मॉनिटर 500 तक ही आंकड़े दिखा रहे थे। साफ है कि पीएम-10 का स्तर मॉनिटरों में दिखाए जा रहे आंकड़ों से कहीं ज्यादा था।
आखिर यह फर्क क्यों था? इसे जानने से पहले यह समझना होगा कि वायु गुणवत्ता सूचकांक की गणना कैसे की जाती है? आखिर इसी पर तो हम प्रदूषण से जंग की अपनी रणनीति बनाते हैं। मान लीजिए कि वायु गुणवत्ता सूचकांक एक नापने वाला फीता है, जिसकी लंबाई शून्य से 500 मीटर तक है। अब इस फीते में सूचकांक जितना ज्यादा होगा, तय है कि वायु प्रदूषण उतना ही ज्यादा होगा और हमारी सेहत के लिए खतरनाक भी। अपने देश में इस सूचकांक की गणना पांच प्रदूषकों की मात्रा के आधार पर की जाती है- पीएम 10, पीएम 2.5, ओजोन, नाइट्रोजन डाई-ऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड। अब अगर वायु गुणवत्ता का सर्वोच्च सूचकांक 500 तक हो और आंकड़ा इससे पार चला जाए, तो फिर क्या होगा? उसकी गणना कैसे होगी? केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, ठीक इसी स्थिति से इस महीने की शुरुआत में दिल्ली दो-चार हुई थी, जब पीएम-10 का स्तर 1990 ग्राम प्रति घनमीटर को पार कर गया था। जाहिर है, दिल्ली की आबोहवा जहरीली बन गई थी। हालांकि हम यह जानते थे कि स्थिति हाथ से निकल रही है, पर कितनी, मॉनिटर हमें यह नहीं बता रहा था।
सरकार के उठाए गए कदमों से तो यही पता चलता है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों और विज्ञान के बीच कोई व्यावहारिक तालमेल कायम करने में हम अब तक विफल ही रहे हैं।
यह ये बताने के लिए अपने आप में पर्याप्त है कि वायु प्रदूषण से लड़ने को लेकर हम कितने गंभीर हैं। इतना ही नहीं, ट्रिब्यूनल की सुनवाई में जब अधिकारियों से पूछा गया कि दिल्ली सरकार ने सभी स्कूलों को बंद करने का फैसला किस आधार पर लिया था, तो उनका जवाब था, ‘यह आदेश शिक्षा मंत्रालय की तरफ से आया था, हमें नहीं पता कि इसका आधार क्या था?’
खैर, दिल्ली एनसीआर की आबोहवा कितनी खराब हो चुकी है, यह बताने की जरूरत नहीं। अभी हमारा सारा ध्यान काले धन और नोटबंदी पर है, मगर वायु प्रदूषण का खतरा कम नहीं हुआ है। सर्दी और प्रदूषण के लिहाज से सबसे खतरनाक महीने हमारा इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में, क्या हम वायु प्रदूषण के खिलाफ भी उतने ही गंभीर हो सकते हैं, जितने काले धन और भ्रष्टाचार को लेकर हुए हैं? यह सच है कि जब तक कानूनी तौर पर बाध्यकारी कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक हमारी सेहत सुरक्षित नहीं है। लिहाजा, घरों से बाहर निकलिए और वायु प्रदूषण के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए अपने नीति-नियंताओं को बाध्य कीजिए। ऐसा आपको जरूर करना चाहिए। ऐसा मेरा मानना है। कहीं बहुत देर ना हो जाए। जिदंगी है तो सबकुछ है। प्रदूषण से मुक्ति के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो जहरीली हवा मौत के रूप में हमारा इंतजार कर रही है।

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