Monday, April 3, 2017

लालू का दर्द



पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों के नतीजों के तुरंत बाद लालू प्रसाद यादव ने कहा कि धर्म निरपेक्ष और सामाजिक न्याय वाले राजनैतिक दलों को एकजुट करेंगे। उन्होंने हिन्दुस्तान अखबार के पटना एडिशन के राजनीतिक संपादक विनोद बंधु से एक साक्षात्कार के दौरान कहा कि मैं फासिस्ट ताकतों को रोकने के लिए सबको एकजुट करने में अपनी भूमिका अदा करूंगा, आज देश के सामने कटटरपंथी ताकतों ने बड़ी चुनौती पेश की है।
लालू का स्टेटमेंट सीधे तौर पर बीजेपी को निशाने पर ले रहा है। बीजेपी को इतना जन समर्थन बाकी अन्य पार्टियों के लिए मंथन का विषय है। आखिरकार इस देश की जनता चाहती क्या है। क्यों ये लोग देश की नब्ज पकड़ने में फेल हो गए।

Wednesday, March 15, 2017

मोदी का जन समर्थन बरकरार

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा की जीत विदेशी मीडिया में भी सुर्खियों में है। विदेशी मीडिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को सराहा है। लिखा कि मोदी ने प्रतिष्ठापूर्ण विधानसभा चुनाव में एकतरफा जीत हासिल की है।
यह 2019 में उनके दोबारा कार्यकाल के लिए चुने जाने का संकेत देती है। यह नोटबंदी के साहसिक फैसले पर मुहर भी है। रॉयटर्स ने यह कहा कि पांच राज्यों में चुनाव पीएम मोदी के तीन साल के शासनकाल का जनमतसंग्रह है। उनकी लोकप्रियता कायम है। खासकर नोटबंदी जैसे विवादास्पद फैसले को लेकर।

अल जजीरा ने लिखा है कि मोदी ने बड़े मूल्य के नोट बंद कर इसे अमीरों के खिलाफ गरीबों और भ्रष्टाचार के विरोध में लड़ाई में बदल दिया। यह जोखिम लेने की उनकी क्षमता को साबित करता है।
अखबार ने लिखा कि यह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज की अग्निपरीक्षा था, जिस पर जनता ने मुहर लगाई। यह जीत उनके सुधार के एजेंडे को मजबूती देगी। यह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों पर मुहर है। लाइन में खड़े होकर नकदी की कमी की परेशानियों के बावजूद मोदी कालेधन के खिलाफ अपनी मुहिम पर जनता का यकीन पाने में कामयाब रहे।

सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा ने अपना दमखम बरकरार रखा है। यह दुनिया की सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था के विकास के एजेंडे को आगे बढ़ाएगा।

यह सिर्फ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे की जीत है और राष्ट्रीय नेता के तौर पर वह दूसरे कार्यकाल की ओर बढ़ रहे हैं। 2019 में उनके दोबारा आने की प्रबल संभावना है। मोदी नोटबंदी को आर्थिक फैसले से राजनीतिक जीत में बदलने में कामयाब रहे। वह भ्रष्टाचार के खिलाफ मसीहा बनकर उभरे हैं। भाजपा के पास ऐसा प्रधानमंत्री है, जो स्थानीय नेता की गैर मौजूदगी की कमी का अहसास नहीं होने देता और सभी सहयोगियों को साथ लेकर एक सूत्र में बांधता है।

रिपोर्ट में कहा कि मोदी की महत्वपूर्ण राज्य जीत से विपक्षी दल हाशिए पर चले गए। यह पांच साल का आधा कार्यकाल पूरा कर चुके पीएम मोदी का मनोबल बढ़ाएगी। मोदी के विजय रथ ने भारत की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के नेतृत्व पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
विधानसभा चुनाव परिणामों पर विदेशी मीडिया ने क्या लिखा-
रॉयटर्स : पीएम के तीन साल के शासनकाल का जनमत संग्रह
अल जजीरा : अमीरों के खिलाफ गरीबों की जंग बनी नोटबंदी
वॉशिंगटन पोस्ट : मोदी का जन समर्थन बरकरार
गार्डियन : पीएम नरेंद्र मोदी की नीतियों पर मुहर
सीएनएन : विकास का एजेंडा आगे बढ़ेगा
टेलीग्राफ : यह सिर्फ भारत के पीएम मोदी की जीत
बीबीसी : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मनोबल बढ़ेगा
न्यूयॉर्क टाइम्स : भ्रष्टाचार के मसीहा बने मोदी

sabhar---live hindustan 

Friday, February 24, 2017

लोकतंत्र की रक्षा - मतदाता की बुद्धिमता से


अजय शर्मा  

लोकतंत्र में प्रभुसत्ता जनता में निहित होती है। प्रतिनिधिक लोकतंत्र में जनता इस बात का निर्णय करती है कि उस पर किस प्रकार से तथा किसके द्वारा शासन हो। जनता अपनी प्रभुसत्ता का सबसे पहला बुनियादी उपयोग मतदान द्वारा करती है।

डा. अम्बेडकर ने कहा था ‘‘मैं महसूस करता हूं, संविधान चाहे कितना ही अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाय, खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान खराब होगा।’’ संविधान केवल विधायका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे राज्य के अंगों का प्रावधान कर सकता हे। परन्तु राज्य के इन अंगों का संचालन लोगों पर तथा राजनीति दलों पर निर्भर करता हैं। राजनीतिक दल यदि अपने पंथ को देश के उपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता एक बार फिर खतरे में पड़ जायेगी।

डा. राजेन्द्र प्रसाद ने भी कहा था ‘‘यदि लोग जो चुनकर आयेंगे योग्य, चरित्रवान और ईमानदार हुए तो दोषपूर्ण संविधान को भी सर्वोत्तम बना देंगे। भारत को ऐसे लोगों की जरूरत हैं जो ईमानदार हों तथा जो देश के हित को सर्वोपरी समझें। हममें साम्प्रदायिक अंतर है, जातिगत अंतर है, भाषागत अंतर है, प्रान्तीय अंतर है।’’ ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो छोटे-छोटे समूहों व क्षेत्रों के लिए देश के व्यापक हितों का बलिदान दें।
पश्चिम के समुन्नत लोकतंत्र में मताधिकार धीरे-धीरे जनता को दिया गया था। संविधान निर्माताओं ने निष्ठापूर्वक कार्य करते हुए सार्वजनिक वयस्क मताधिकार की पद्धति को अपनाने का निर्णय किया जिसमें प्रत्येक वयस्क भारतीय को बिना किसी भेदभाव के मतदान का समान अधिकार तुरंत प्राप्त हुआ। जबकि अधिकांश भारतीय जनता गरीब और अनपढ़ थी। एक व्यक्ति का एक वोट, बंधुत्व तथा एक अखंड राष्ट्र का निर्माण व राजनैतिक न्याय का लक्ष्य रखा गया। राजनीतिक न्याय का अर्थ है जाति, मूलवंश, सम्प्रदाय, धर्म, जन्मस्थान के आधार पर विभेद के बिना सभी नागरिकों को राजनीति प्रक्रिया में भाग लेने के अधिकारों में बराबर का हिस्सा। स्वतंत्रता के बाद वयस्क मताधिकार पद्धति ने जाति प्रथा को जबरदस्त चुनौती दी। परन्तु वयस्क मताधिकार पर आधारित राजनैतिक प्रणाली में जाति की भूमिका महत्वपूर्ण बन गई और अब जातिवाद दूसरे रूप में उभरा है।

देश में चुनाव के समय लगभग 50 प्रतिशत मतदान होता है। यह भी पृथक-पृथक पार्टियों में विभाजित हो जाता है। उम्मीदवार या पार्टी विशेष धर्म, जाति, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक समुदायों का हितैषी बताकर वोट हासिल करते है। तदुपरान्त गठबन्धन का हिस्सा बन जाते है। ऐसी सरकार सिर्फ समुदाय, क्षेत्र या जाति हितैषी होती है, उनके विकास की सोचती है। इससे समाज में विषमता, वैमनष्यता व द्वैष उत्पन्न हो जाता है। इस विभाजनकारी वोट के तरीके से समाज में फूट पड़ती है। दंगा फसाद होते है। जाति व धर्म के आधार पर वोट देना देशहित के विपरीत हैं। मतदाता का कर्तव्य है कि लोकतंत्र को सुरक्षित, शुद्ध एवं कारगर बनाए रखने के लिए विभाजनकारी दलों व व्यक्तियों के पक्ष में मतदान नहीं करें। उम्मीदवार की योग्यता, निष्ठा, कर्तव्यपराणता तथा पार्टियों का चेहरा व चरित्र को ध्यान में रखकर मतदान करें। मतदाताओं का कर्तव्य है लोकतंत्र को धर्मतंत्र या जातितंत्र बनने से रोके। जाति, धर्म, समुदाय, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र के आधार पर वोट नहीं दें।
पढ़े लिखे षिक्षित मतदाता कम संख्या में वोट देते हैं। घर बैठकर अथवा बाजार, गली, नुक्कड पर उम्मीदवरों व पार्टियों के बारे में मात्र निन्दा, प्रशंसा करते है। अपना कर्तव्य ईमानदारी से पूरा नहीं करते। उम्मीदवार के बैकग्राउण्ड, प्रतिभा पर गौर नहीं करते। दागियों को वोट देते हैं। बाहुबल, धनबल से प्रभावित होते हें, तदुपरान्त इन्हीं बातों की बुराई करते हैं। वर्तमान राजनीति में नारों का भी बड़ा महत्व हो गया। अमीर और गरीब के बीच खाई पटने के नारे सुनते कान पक गये परन्तु खाई और चौड़ी होती जा रही है। अमीर अधिक धनवान होता जा रहा है। गरीब की जेब छोटी होती जा रही है। नारे चुनावी मुद्दा बनकर हार जीत की भूमिका बनाते है। बेरोजगारों को रोजगार के सपने, विकास के नये आयाम स्थापित करने के लम्बे चौड़ें वायदों से भ्रमित होकर मतदान होता है। कुछ जाति/वर्ग अपनी पहुंच का फायदा उठाकर तरक्की करते हैं तो दूसरा वर्ग जिन्दगी भी मुश्किल से गुजारता है। समस्या यह है, लोग अन्य व्यक्तियों को कैसे काम करना चाहिए इसमें अपनी पूरी विशेषता बतातें है। परन्तु स्वयं का कर्तव्य भूल जाते है। बढ़ती जनसंख्या से विकराल विभाजन और गहरा होता जा रहा है। हर तबका विकास में भागीदार बन सके, यह सोच नहीं रहा।

चुनाव आयोग दन्तहीन है। कहा बहुत कुछ जाता है परन्तु नतीजा वही ढाक के तीन पात। चुनाव व्यय की सीमा से सैकड़ों गुना खर्चा होता है, बूथ रिगिंग होती है, बूथ कैप्चरिंग होती है, फर्जी मतदान होता है। परन्तु मात्र कागजी खानापूर्ति के अलावा कुछ भी नहीं होता। प्रचार प्रसार में आयोग का करोड़ों रूपया व्यय होता है, उसका कोई असर या नतीजा नहीं। क्या आज तक फर्जी डिग्रियां, सम्पत्ति सम्बन्धी झूंठे आंकड़े, चरित्र व अपराध सम्बन्धी घोषणा पत्र पर कुछ हुआ। चुनाव याचिकाओं पर अगले चुनाव यानि पांच साल तक फैसले नहीं होते। लोगों की श्रृद्धा व विश्वास उठ चुका है। जनप्रतिनिधि कानून का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन करते है। ऐसे में मतदाता की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है।
चुनावों में आज भी सामंती असर मौजूद है। आजादी के पूर्व जनता का खून चूसने वाले सामन्ती उम्मीदवार आज भी वंश व परिवार के बल पर प्राथमिकता प्राप्त करते है। हमने प्रतिनिधि संसदीय लोकतंत्रात्मक प्रणाली व वयस्क मताधिकार को सोच समझकर अपनाया था तथा उत्तरदायित्व को तरजीह दी गई थी। तीन शब्द अर्थात प्रतिनिधिक, संसदीय एवं लोकतंत्र हमारी राजनीति व्यवस्था के मूलतत्व है। लोकतंत्र में लोग अपने स्वामी स्वयं होते हैं।

लोकतंत्र का अर्थ है आत्म निर्णय का लोगों का अधिकार और तर्कसंगतता में आस्था। सच्चे लोकतंत्र का मूल है ‘‘प्रत्येक व्यक्ति चाहे उसकी जाति, धर्म, रंग अथवा लिंग पैदाइश का स्थान कोई भी हो, शिक्षा का स्तर, आर्थिक अथवा व्यवसायक पृष्ठभूमि कुछ भी हो, स्वशासन व अपने कार्यो को करने योग्य है। उद्देशिका में कहा गया है ‘‘हम भारत के लोग दृढ़ संकल्प होकर संविधान को अंगीकृत करते है। इस प्रकार प्रभुसत्ता केवल जनता में निहित है। लोकतंत्र को उपयोगी बनाने, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से चुने गये लोगों द्वारा संभव है। चुने गये लोगों को प्रभुसत्ता की अभिव्यक्ति मिलती है और सर्वोच्च शक्ति जनता के प्रतिनिधियों के निकाय में निहित हो जाती है। ऐसा निकाय राजनैतिक व्यवस्था की नींव व धूरी है। जो मतदाता पर आश्रित है। हमारी व्यवस्था में सभी वयस्क लोग जिन्होंने 18 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है, मतदाता है। वे लोकसभा व विधानसभाओं के सदस्य चुनते है। संसद सभी लोगों के विचारों का प्रतिनिधित्व करती है।

प्रारम्भिक काल में सार्वभौम मताधिकार से चुनी गई संसद में पक्ष विपक्ष दोनों में, गौरवशाली और प्रबुद्ध सांसद चुने जाने लगे थे। जो जाति/वर्ग, धर्म, क्षेत्र के आधार पर नहीं, गुणात्मक स्तर को देखकर चुने गये थे। सांसदों में कुशाग्र बुद्धि और विद्वता थी। विशिष्ट लोग थे, उच्च कोटि के वक्ता थे, नीतियों और कृत्यों की व्याख्या व आलोचना करते थे। धीरे-धीरे जातिवाद, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्रीय आधार पर चुने गये। पैसे व बाहुबल के आधार पर व्यवसायिक वर्ग, माफिया गिरोह के लोग, अपराधी प्रवृति के लोग चुने जाने लगे और विषम परिस्थितियां पैदा होने लगी है। शोरगुल, नारेबाजी, वाकआउट, सदन स्थगन, सब कुछ होने लगा। सदन की स्वस्थ व सशक्त क्रियाशीलता की बलि हो गई। 23-24 दलों की मिली जुली सरकार बनी। विभिन्न दल व सांसद अपनी राजनीतिक रोटिंया सेकने लगे। अव्यवस्था, अनुशासनहीनता, अवहेलना, चरित्र हनन होने लगा। गुणात्मकता समाप्त हो गई।
आज धर्मान्धता व साम्प्रदायिकता की भावना बलवती हो गई। मुस्लिम और हिन्दू समाज व्यवस्था का अस्तित्व निरंतर सामाजिक तनाव तथा संघर्ष का कारण बन रहा है। दो समानान्तर समाज व्यवस्थायें स्थापित हो गईं व्यवहार व दृष्टिकोण में सामाजिक प्रतिबंधों और जातिय नियमों की कठोरता को बहुत सीमा तक बढ़ाया। इस्लामीकरण का उद्भव हुआ। उदारवाद, सहिष्णुता, धर्म निरपेक्षता के उत्साहवर्धक विचार कमजोर पढ़ गये।
हिन्दु बहुसंख्यक जातिवाद से प्रभावित है। मुस्लिम समाज के कट्टरपंथी वर्ग ने पुनः अलगाववाद को बल दिया है। हिन्दु मुसलमानों में व्याप्त पृथकतावादी प्रवृतियों ने अनेक प्रकार के संगठनों को जन्म दिया। योग्यता व सामर्थ्य का ध्यान नहीं रहा। धन बल ने सामन्तवादी समाज को पूंजीवादी समाज में बदल दिया। दलितों में भी कठिनाईयों व अभावों से उनका विश्वास डिगा और यह धारणा बनी कि स्वयं उनके हाथों में राजनैतिक शक्ति तथा सत्ता आनी आवश्यक है।

भारत में राष्ट्रवाद एक नई परिभाषा के साथ उदय हो रहा है। उनमें सामाजिक, राजनैतिक सुधारक, सत्याग्रही, संत, शिक्षक, शिक्षार्थी नहीं है। सामाजिक गठबंधन के लोग हावी हो रहे है, जिनका कोई मौलिक विचार, आस्था व सिद्धान्त नहीं है। क्रान्तिकारी आन्दोलन लोकप्रिय नहीं बना। कुछ लोग व संगठन भारतीय राजनीति में पूर्णतः हिन्दु प्रभुत्व चाहने लगे। मुस्लिम उनकी प्रधानता से विचलित होने लगे है। स्वदेशी का सिद्धान्त समाप्त होता जा रहा है। धार्मिक उग्रता भी बढ़ रही है। सामाजिक नियतिवाद पनपने लगा है। गांधी ने एक सुसंगठित समाज की रचना के लिए जीवनभर काम किया परन्तु आगे की पीढ़ी भारतीय समाज की रक्त धारा में व्याप्त पृथकतावादी गांठों को समाप्त नहीं कर सकी। मुसलमानों तथा दलितों के विश्वास को प्राप्त करने के लिए अत्यधिक निष्ठावान प्रयत्नों का कोई फल नहीं मिला। उनको भी कौसने का प्रयत्न किया जा रहा है। समाजवाद का नारा भी कमजोर पढ़ गया।

आधुनिकता के असर के नीचे उदारवाद, उपभोक्तावाद, बाजारवाद भी आधुनिक प्रवृतियों को बल मिल रहा है। मानववादियों की पकड़ कमजोर होती जा रही है। दल विहिन जनतंत्र का मूल उद्देश्य, ग्रामराज व रामराज की अवधारणा समाप्त हो रही है। गांधी, नेहरू, अम्बेडकर के व्यापक परिवर्तन का ख्बाब व प्रयास समाप्त हो रहा है।
इस प्रकार लोकतंत्र भीड़तंत्र बनता जा रहा है। प्रत्येक मतदाता अपनी स्वयं की पसन्द व भीडतंत्र से प्रभावित होकर मतदान करता है। मतदान एक पवित्र कर्तव्य की तरह नहीं, प्रतिक्रियाओं, प्रलोभन, दबाब, निजी हित, वर्ग हित के आधार पर हो रहा है। इसीलिए धनबल, भुजबल, जातिबल, रिगिंग, बूथ कैप्चरिंग, हिंसा व गलत तरीके अपनाकर किया जा रहा है। राष्ट्र हित गौण हो गया है। हमारी सत्ता, हमारा स्वार्थ मात्र अपने प्रति जिम्मेदारी की भावना प्रमुख हो रही है। गालियां देकर, आलोचना करते हुए भी अपना कर्तव्य पूर नहीं करते। हिंसा भी होती है, अत्याचार भी होते हें, भाई भतीजावाद भी व्याप्त है। हमारा आत्मबल, हमारा आत्मविश्वास, देश के प्रति जिम्मेदारी की भावना कम होती जा रही है। आलोचनाओं के आगे राष्ट्र और उसके भविष्य का चिन्तन तो कभी आता ही नहीं।

चुनाव आयोग की विश्वसनीयता समाप्त हो चुकी है। भारत जब धर्म निरपेक्ष देश है तो धर्म, जाति, सम्प्रदाय के नाम पर वोट क्यों मांगे जा रहे है। सभी राजनीतिक दलों में वंशवाद का घुन लगा हुआ है। अपने बाद अथवा अपने रहते हर नेता अपने निर्वाचन क्षेत्र को पीढि़यों के लिए सुरक्षित करने लगा है। विशेषज्ञता प्राप्त लोगों को, प्रतिभाशाली लोगों को टिकट नहीं मिल पाते। आज संसद व विधानसभा में हत्या, अपहरण, बलात्कार, रिश्वतखोरी जैसे संगीन अपराधों में आरोपित लोग जनप्रतिनिधि चुने जा रहे है और कानून बना रहे हैं। राजनैतिक दल गन्दगी को साफ करने के ऐलान करते हैं परन्तु धनबल, बाहुबल, जातीय समीकरण में फिट बैठने वाला ही उम्मीदवार होता है। दल बदल कर आने वाले को टिकट देने में प्राथमिकता ही नहीं पूरा आश्वासन दिया जा रहा है।

आम चुनाव भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा स्रोत हे। आज चुनावी चन्दे व चुनाव खर्च, कालेधन से हो रहा है। आज पेड न्यूज व मतदाताओं को रिश्वत देने की प्रणाली खुले रूप से चल रही है। मतदान पूर्व विभिन्न सरकारी घोषणाओं से भी मतदाता को प्रभावित करने का घृणित प्रयास हो रहा है।

राजनैतिक दल व मतदाता जब तक देश को प्राथमिकता देने का साहस नहीं करेंगे, राजनीत को साफ करने की हिम्मत नहीं करेंगे, यह संभव नहीं होगा। राजनैतिक दलों को लोक मर्यादाओं में लाना मतदाता के हाथ में ही है।
अमेरीका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रेकलिन रूश्जलवेल्ट ने कहा था ‘‘लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक मतदाता बुद्धिमता से अपना प्रत्याशी नहीं चुनते। लोकतंत्र की रक्षा करने वाला कोई तत्व है तो शिक्षित व देश के प्रति सोच रखने वाला मतदाता ही है।

भारत के लोग गर्व करते हैं कि 70 वर्षो तक संसदीय लोकतंत्र सफलतापूर्वक चलता रहा है परन्तु हमारे जनप्रतिनिधियों के प्रतिनिधि होने पर ही प्रश्न चिन्ह लगने लगा है। संसदीय जीवन लाभकारी व्यवसाय बन गया हैं समाज को देने की अपेक्षा अधिकाधिक लेने वाला बना दिया। मतदाता यदि चेत जाय तो संसदीय संस्थाओं का गौरव सम्मान लौट सकता है। राजनीति साम्प्रदायिता, अपराधिकरण, भ्रष्टाचार से मुक्ति पायेगी और लोकतंत्र प्रशस्त होगा।



आइए जानें राष्ट के गौरवशाली दिन गणतंत्र दिवस के बारे में


गणतंत्र दिवस गौरवशाली इतिहास की झलक
अजय शर्मा   

गणतंत्र दिवस की परेड आज विश्व भर में भारत की पहचान बनकर उभरी है। गणतंत्र दिवस को भारत की शक्ति का असली परिचय मिलता है। सेना, सशस्त्र बलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से सुसज्जित यह परेड आज भारत का गौरव गान करती है। गणतंत्र दिवस की परेड की खूबसूरती और उसका अहमियत को शब्दों में लिख पाना बेहद मुश्किल है। 

गणतंत्र दिवस हर भारतीय के लिए गौरव का दिन है। आज से 68 साल पहले 26 जनवरी के दिन ही हमारा संविधान भी लागू किया गया था। यही वह दिन था जब भारत के प्रथम राष्टपति राजेन्द्र प्रसाद ने राष्टपति पद की शपथ लेने के देश के नाम अपना पहला संदेश दिया और इसके बाद बग्घी में बैठकर पहले गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होने के लिए इरविन स्टेडियम (वर्तमान में मेजर ध्यान चंद नेशनल स्टेडियम), द किंग्सवे, लाल किले और रामलीला मैदान पहुंचे थे। यहीं पर परेड का भी आयोजन किया गया था, लेकिन राजपथ पर पहली परेड 1955 में हुई थी।

15 अगस्त और 26 जनवरी की महत्ता में बहुत अंतर है। 15 अगस्त को देश ब्रिटिश शासन से आजाद हुआ था और 26 जनवरी को देश ने अपनी शासन प्रणाली के लिए संविधान लागू किया था। सही मायने में देश 26 जनवरी को आजाद हुआ था। क्योंकि इस दिन से हमारे उपर संपूर्ण रूप से अंग्रेजों का शासन समाप्त हुआ और भारत में लोकतांत्रिक शासन लागू हुआ।

भारतीय इतिहास में गणतंत्र दिवस का बहुत महत्व है क्योंकि ये हमें भारतीय स्वतंत्रता से जुड़े हर-एक संघर्ष के बारे में बताता है। भारत की पूरी आजादी (पूर्णं स्वराज) की प्राप्ति के लिये लाहौर में रावी नदी के किनारे 1930 में इसी दिन भारत की आजादी के लिये लड़ने वाले लोगों ने प्रतिज्ञा की थी। जो 15 अगस्त 1947 को साकार हुआ।

26 जनवरी 1950 को, हमारा देश भारत संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, और लोकतांत्रिक, गणराज्य के रुप में घोषित हुआ अर्थात भारत पर खुद का राज था उस पर कोई बाहरी शक्ति शासन नहीं करेगी। इस घोषणा के साथ ही दिल्ली के राजपथ पर भारत के राष्ट्रपति के द्वारा झंडा फहराया गया साथ ही परेड तथा राष्ट्रगान से पूरे भारत में जश्न का माहौल शुरु हो गया।

हमारा मजबूत लोकतंत्र है। यह गर्व करने लायक उपलब्धि है। बहुत सारे विदेशी प्रेक्षकों का मानना था कि भारत एक देश के रूप में ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएगा या भाषायी समूह अपने अलग राष्ट्र की मांग करेगा
आज भी हमारे देश के सामने कई समस्याएं हैं। उनमें से बड़ी है बेरोजगारी की समस्या। बेरोजगारी के कारण देश के युवकों-युवतियों में भारी असंतोष और बेचैनी पाई जाती है। देश की आवश्यकताओं के अनुसार व्यव्स्थाओं में सुधार और विकास की जरूरत है। जिस पर काम किया जा रहा है। देश को टेक्नोलॉजी के मामले में उन्नत बनाने की कोशिश की जा रही है। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को डिजीटिल इंडिया के स्वपन के साथ वैश्विक स्तर पर आधुनिक बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन डिजीटिल इंडिया के साथ-साथ उन्हें और भी क्षेत्रों में विकास की कोशिशें करनी होगी।


दोस्तों, तो इस बार हम गणतंत्र दिवस से संबधित ऐसे ही कुछ अनछुए बिदुओं और समय के कालचक्र में धूमिल पड़ चुके महत्वपूर्ण तथ्यों पर से धूल झाड़ने का काम करेंगे। हम जानने की कोशिश करेंगे कि पिछले 68 साल में हमारे गणतंत्र दिवस और देश के हालातों में कितना बदलाव आया है। आइए सबसे पहले जानने की कोशिश करते हैं कि 68 साल पहले गणतंत्र दिवस कैसे मनाया गया था और मौजूदा समय में यानि की 2016 तक कैसे मनाया गया।

68 साल पहले गणतंत्र दिवस 
हमारे पहले गणतंत्र दिवस समारोह का स्वरूप वर्तमान समारोह से काफी जुदा था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्रथम गणतंत्र दिवस समारोह के ठीक पहले राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। उनका शपथ ग्रहण समारोह राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में आयोजित किया गया था। इसके बाद तत्कालीन गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी ने भारत को गणतंत्र घोषित कर दिया। तब राष्ट्रपति को 31 सिपाहियों ने लाइन से खड़े होकर 31 बंदूकों की सलामी दी थी।  राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद शाही घोड़ागाड़ी में एकदम महाराजा स्टाइल में बैठकर आए थे। ध्वजारोहण की परंपरा तब भी थी। जैसा कि आप लोग जानते हैं कि हमारे गणतंत्र दिवस पर कोई न कोई विदेशी हस्ती मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहती है। उस वक्त प्रथम समारोह में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किए गए थे। हालांकि, तब मुख्य अतिथि की सुरक्षा इतना बड़ा मुद्दा नहीं थी। पहली रिपब्लिक डे परेड इरविन स्टेडियम (अब नैशनल स्टेडियम) में हुई थी। इसे देखने के लिए करीब 15,000 लोग आए थे। आपको बताना चाहूंगा कि 1955 में पहली बार राजपथ पर गणतंत्र दिवस की परेड हुई थी, तब इसे किंग्सवे के नाम से जाना जाता था। उसके बाद से हर साल परेड यहीं होने लगी। उस साल पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मुहम्मद हमारे समारोह के मुख्य अतिथि थे।

झांकियां हमेशा से हमारी परेड का हिस्सा रही हैं, लेकिन तब की झांकियां बहुत ही साधारण हुआ करती थीं। इन झांकियों में टैक्टर और बैलगाडि़यों का भी इस्तेमाल होता था। तब हम टेक्नोलॉजी के मामले में इतने विकसित नहीं थे। देश तरक्की के रास्ते पर चल रहा था। आपको जानकर खुशी के साथ हैरानी भी हो सकती है कि  कनॉट प्लेस जिसे आप दिल्ली का दिल कहते हैं इसी कनॉट प्लेस की सड़कों से होकर झांकियां गुजरती थीं, ताकि आम लोग भी इनका नजारा ले सकें। तब समारोह देखने आई भीड़ को नियंत्रित करना इतना मुश्किल नहीं था। लोग काफी अनुशासित थे। लेकिन फिर भी, 1995 के समारोह में अवाम की जनता गणतंत्र दिवस पर अनियंत्रित हो गई थी। जिसकी वजह पुलिस बल को काफी मशक्कत करनी पड़ी। इस अनुशासनहीनता की वजह से टूटी हुई कुर्सियों की तस्वीरें उस वक्त मीडिया ने लोगों को दिखाईं थी।

महापुरुष कथन
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति ने भारतीय गणतंत्र के जन्म के अवसर पर देश के नागरिकों का अपने विशेष संदेश में कहा-
हमें स्वयं को आज के दिन एक शांतिपूर्ण किंतु एक ऐसे सपने को साकार करने के प्रति पुन समर्पित करना चाहिए, जिसने हमारे राष्ट्रपिता और स्वतंत्रता संग्राम के अनेक नेताओं और सैनिकों को अपने देश में एक वर्गहीन, सहकारी, मुक्त और प्रसन्नचित्त समाज की स्थापना के सपने को साकार करने की प्रेरणा दी। हमें इस दिन यह याद रखना चाहिए कि आज का दिन आनन्द मनाने की तुलना में समर्पण का दिन है श्रमिकों और कामगारों परिश्रमियों और विचारकों को पूरी तरह से स्वतंत्र, प्रसन्न और सांस्कृतिक बनाने के भव्य कार्य के प्रति समर्पण करने का दिन है।

सी. राजगोपालाचारी, महामहिम, महाराज्यपाल ने 26 जनवरी, 1950 को ऑल इंडिया रेडियो के दिल्ली स्टेशन से प्रसारित एक वार्ता में कहा अपने कार्यालय में जाने की संध्या पर गणतंत्र के उद्घाटन के साथ मैं भारत के पुरुषों और महिलाओं को अपनी शुभकामनाएं और बधाई देता हूँ जो अब से एक गणतंत्र के नागरिक है। मैं समाज के सभी वर्गों से मुझ पर बरसाए गए इस स्नेह के लिए हार्दिक धन्यवाद देता हूँ, जिससे मुझे कार्यालय में अपने कर्त्तव्यों और परम्पराओं का निर्वाह करने की क्षमता मिली है, अन्यथा मैं इससे सर्वथा अपरिचित था।

गणतंत्र दिवस कैसे मनाया जाता है 
गणतंत्र दिवस की परेड के दौरान राष्ट्रपति को 21 तोपों की सलामी दिए जाने की प्रथा है। दरअसल, 21 तोपों की यह सलामी 21 बंदूकों से नहीं, बल्कि भारतीय सेना की 7 तोपों (जिन्हें श्25 पाउंडर्सश् कहा जाता है) से दी जाती है। जैसे ही राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड के सीओ राष्ट्रपति को सलामी देते हैं, उसी समय ये तोपें फायर की जाती हैं। राष्ट्रगान शुरू होते ही पहली सलामी दी जाती है और ठीक 52 सेकंड बाद आखिरी सलामी दी जाती है। ये तोपें 1941 में बनी थीं, और आर्मी के हर समारोह में इनका प्रयोग किया जाता है।

26 जनवरी को मार्च पास्ट करने वाली टुकडि़यों का दिन सुबह 2 बजे ही शुरू हो जाता है, और 3 बजते-बजते ये टुकडि़यां राजपथ पर होती हैं। इसकी तैयारी एक साल पहले जुलाई से ही शुरू हो जाती हैं। फाइनल इवेंट से पहले ये टुकडि़यां 600 घंटे की हार्ड ड्रिल प्रैक्टिस कर चुकी होती हैं।

गणतंत्र दिवस समारोह के पहले सेकंड से लेकर आखिरी सेकंड तक का कार्यक्रम काफी अनुशासित ढंग से तय होता है। मतलब, अगर समारोह 1 मिनट की देरी से शुरू हुआ तो 1 मिनट की देरी से ही खत्म होगा।
राजपथ पर हर झांकी 5 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है, ताकि अतिथि उन्हें अच्छी तरह देख सकें। झांकी के आगे-आगे चलने वाला सिपाही देखा है? वह संगीत की ताल पर मार्च करता है और झांकी का ड्राइवर छोटी सी खिड़की से उसे देखता रहता है। है न अच्छा तरीका ताल से ताल मिलाने का!

परेड का बेस्ट पार्ट है फ्लाईपास्ट, जिसका चार्ज वेस्टर्न एयर कमांड के पास है। इसमें 41 विमान हिस्सा लेंते हैं। आपको पता नहीं होगा, फ्लाईपास्ट के लिए मौसम की रियल टाइम मॉनिटरिंग की जाती है, और तभी यह तय किया जाता है कि हेलिकॉप्टर और विमान उड़ेंगे या नहीं।

पिछले साल 2016 में 26 साल बाद परेड में रिमाउंट ऐंड वेटेरनेरी कॉर्प्स के 36 कैनाइन, 24 लैब्रडॉर और 12 जर्मन शेफर्ड ने हिस्सा लिया। आपको जानकर हैरानी हो सकती है कि आर्मी हेडक्वॉर्टर में हर कुत्ते का अपना प्रोफाइल होता है! इन्हें अलग-अलग जगहों पर तैनात किया जाता है, और इनको भी सिपाही कहा जाता है। ये एंटी-टेररिस्ट ऑपरेशंस में हिस्सा लेते हैं।

सांस्कृतिक कार्यक्रम और आयोजन
गणतंत्र दिवस भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय त्योहार है, इस दिन राष्ट्रपति इंडिया गेट पर भारत के सब राज्यों से आए हुए प्रतिनिधियों तथा भारत की तीनों सेनाओं की सलामी लेते हैं। अनेक प्रकार की सुन्दरदृसुन्दर झाँकियाँ नाच-गाने, बैण्ड-बाजे, हाथी, ऊँट, घोड़ों की सवारियाँ, टैंक, तोप, समुद्री जहाज और हवाई जहाज के नमूने कृषि और उद्योग की झाँकियाँ, स्कूली बच्चों के नाच-गाने करते हुए ग्रुप राष्ट्रपति को सलामी देते हुए चलते हैं। जो कि विजय चौक से शुरू होकर लाल किले तक जाते हैं। इस उत्सव में किसी दूसरे देश का कोई मेहमान बुलाया जाता है। उस दिन दर्शकों की इतनी भीड़ होती है कि इंडिया गेट पर ऐसा मालूम होता है जैसे इन्सानों का समुद्र लहरा रहा हो। रात को इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन, सेंट्रल सेक्रेटेरियट, संसद भवन तथा मुख्य सरकारी इमारतों पर रोशनी की जाती है।

15 अगस्त सन् 1947 को हम आजाद जरूर हो गए थे लेकिन हमारा कोई संविधान लागू नहीं हुआ था और न ही कोई गणराज्य का राष्ट्रपति था।
अंग्रेज भारत को छोड़कर चले गए और 26 जनवरी को जनता का राज्य हुआ, इसलिए 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाते हैं। जो जवान आजादी की लड़ाई में शहीद हुए उनकी याद में इंडिया गेट पर अमर ज्योति जलाई जाती है।

इसके शीघ्र बाद 21 तोपों की सलामी दी जाती है, राष्ट्रपति महोदय द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है और राष्ट्रगान होता है। इस प्रकार परेड आरंभ होती है। महामहिम राष्ट्रपति के साथ एक उल्लेखनीय विदेशी राष्ट्र प्रमुख आते हैं, जिन्हें आयोजन के मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता है।

राष्ट्रपति महोदय के सामने से खुली जीपों में वीर सैनिक गुजरते हैं। भारत के राष्ट्रपति, जो भारतीय सशस्त्र बल, के मुख्य कमांडर हैं, विशाल परेड की सलामी लेते हैं। भारतीय सेना द्वारा इसके नवीनतम हथियारों और बलों का प्रदर्शन किया जाता है जैसे टैंक, मिसाइल, राडार आदि। इसके शीघ्र बाद राष्ट्रपति द्वारा सशस्त्र सेना के सैनिकों को बहादुरी के पुरस्कार और मेडल दिए जाते हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र में अभूतपूर्व साहस दिखाया और ऐसे नागरिकों को भी सम्मानित किया जाता है जिन्होंने विभिन्न परिस्थितियों में वीरता के अलग-अलग कारनामे किए। इसके बाद सशस्त्र सेना के हेलिकॉप्टर दर्शकों पर गुलाब की पंखुडियों की बारिश करते हुए फ्लाई पास्ट करते हैं।
सांस्कृतिक परेड

सेना की परेड के बाद रंगारंग सांस्कृतिक परेड होती है। विभिन्न राज्यों से आई झांकियों के रूप में भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाया जाता है। प्रत्येक राज्य अपने अनोखे त्यौहारों, ऐतिहासिक स्थलों और कला का प्रदर्शन करते हैं। यह प्रदर्शनी भारत की संस्कृति की विविधता और समृद्धि को एक त्यौहार का रंग देती है। विभिन्न सरकारी विभागों और भारत सरकार के मंत्रालयों की झांकियां भी राष्ट्र की प्रगति में अपने योगदान प्रस्तुत करती है। इस परेड का सबसे खुशनुमा हिस्सा तब आता है जब बच्चे, जिन्हें राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार हाथियों पर बैठकर सामने आते हैं। पूरे देश के स्कूली बच्चे परेड में अलग-अलग लोक नृत्य और देश भक्ति की धुनों पर गीत प्रस्तुत करते हैं। परेड में कुशल मोटर साइकिल सवार, जो सशस्त्र सेना कार्मिक होते हैं, अपने प्रदर्शन करते हैं। परेड का सर्वाधिक प्रतीक्षित भाग फ्लाई पास्ट है जो भारतीय वायु सेना द्वारा किया जाता है। फ्लाई पास्ट परेड का अंतिम पड़ाव है, जब भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान राष्ट्रपति का अभिवादन करते हुए मंच पर से गुजरते हैं।

प्रधानमंत्री की रैली
गणतंत्र दिवस का आयोजन कुल मिलाकर तीन दिनों का होता है और 27 जनवरी को इंडिया गेट पर इस आयोजन के बाद प्रधानमंत्री की रैली में एन.सी.सी. केडेट्स द्वारा विभिन्न चौंका देने वाले प्रदर्शन और ड्रिल किए जाते हैं।
लोक तरंग
सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्रों के साथ मिलकर संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा हर वर्ष 24 से 29 जनवरी के बीच ‘’लोक तरंग दृ राष्ट्रीय लोक नृत्य समारोह’’ आयोजित किया जाता है। इस आयोजन में लोगों को देश के विभिन्न भागों से आए रंग बिरंगे और चमकदार और वास्तविक लोक नृत्य देखने का अनोखा अवसर मिलता है।
बीटिंग द रिट्रीट
बीटिंग द रिट्रीट गणतंत्र दिवस आयोजनों का आधिकारिक रूप से समापन घोषित करता है। सभी महत्वपूर्ण सरकारी भवनों को 26 जनवरी से 29 जनवरी के बीच रोशनी से सुंदरता पूर्वक सजाया जाता है। हर वर्ष 29 जनवरी की शाम को अर्थात गणतंत्र दिवस के बाद अर्थात गणतंत्र की तीसरे दिन बीटिंग द रिट्रीट आयोजन किया जाता है। यह आयोजन तीन सेनाओं के एक साथ मिलकर सामूहिक बैंड वादन से आरंभ होता है जो लोकप्रिय मार्चिंग धुनें बजाते हैं। ड्रमर भी एकल प्रदर्शन (जिसे ड्रमर्स कॉल कहते हैं) करते हैं। ड्रमर्स द्वारा एबाइडिड विद मी (यह महात्मा गाँधी की प्रिय धुनों में से एक कहीं जाती है) बजाई जाती है और ट्युबुलर घंटियों द्वारा चाइम्स बजाई जाती हैं, जो काफी दूरी पर रखी होती हैं और इससे एक मनमोहक दृश्य बनता है। इसके बाद रिट्रीट का बिगुल वादन होता है, जब बैंड मास्टर राष्ट्रपति के समीप जाते हैं और बैंड वापिस ले जाने की अनुमति मांगते हैं। तब सूचित किया जाता है कि समापन समारोह पूरा हो गया है। बैंड मार्च वापस जाते समय लोकप्रिय धुन सारे जहाँ से अच्छा बजाते हैं। ठीक शाम 6 बजे बगलर्स रिट्रीट की धुन बजाते हैं और राष्ट्रीय ध्वज को उतार लिया जाता हैं तथा राष्ट्रगान गाया जाता है और इस प्रकार गणतंत्र दिवस के आयोजन का औपचारिक समापन होता हैं।



पिछले 6 दशकों में कितना बदला है यह समारोह
अब बग्घी का स्थान बुलेटप्रूफ कार ले चुकी है। इस फैंसी कार के साथ घुड़सवार और दूसरे सुरक्षाकर्मी चलते हैं। तब हमारे पास फ्लाईपास्ट के लिए जेट फाइटर नहीं थे, लेकिन जो भी था, हमें उसी पर बेइंतहा गर्व था। आज हमारे पास जेट फाइटर हैं, और आज भी हर परेड पर हम अपनी सैन्य ताकत के प्रदर्शन पर गर्व से फूले नहीं समाते।
हमारा मार्च पास्ट तब भी सधा हुआ था और समय के साथ यह और बड़ा और बेहतर ही हो रहा है।




भारत के प्रारम्भ से लेकर आजतक के सारे राष्ट्रपति  के काल क्रमानुसार नाम है
 डा. राजेन्द्र प्रसाद (1884-1963)कार्यकाल 26 जन्वरी 1950 से 13 मई 1962
राजेंद्र प्रसाद, जो कि बिहार से थे, भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने। वे स्वतंत्रता सेनानी भी थे। वे एकमात्र राष्ट्रपति थे जो कि दो बार रष्ट्रपति बने।

डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888-1975)कार्यकाल 13 मई 1962 से 13 मई 1967
राधाकृष्णन मुख्यतः दर्शनशास्त्री और लेखक थे। वे आन्ध्र विश्वविद्यालय और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे।

डा. जाकिर हुसैन (1897-1969)कार्यकालरू 13 मई 1967 से 3 मई 1969
जाकिर हुसैन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति और पद्म विभूषण और भारत रत्न के भी प्राप्तकर्ता थे।


वराहगिरि वेंकट गिरि ३ मई १९६९ २० जुलाई १९६९

वी.वी. गिरि पदस्थ राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद कार्यवाहक राष्ट्रपति बने.

मुहम्मद हिदायतुल्लाह
(१९०५दृ१९९२) २० जुलाई १९६९ २४ अगस्त १९६९
हिदायतुल्लाह भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और आर्डर ऑफ ब्रिटिश इंडिया के प्राप्तकर्ता थे

वराहगिरि वेंकट गिरि
(१८९४दृ१९८०) २४ अगस्त १९६९ २४ अगस्त १९७४
गिरि एकमात्र व्यक्ति थे जो कार्यवाहक राष्ट्रपति और राष्ट्रपति दोनों बने. वे भारत रत्न से सम्मानित हो चुके थे।

डा. फख़रुद्दीन अली अहमद (1905-1977)कार्यकालरू 24 अगस्त 1974 से 11 फरवरी 1977
फख़रुद्दीन अली अहमद राष्ट्रपति बनने से पूर्व मंत्री थे। उनकी पदस्थ रहते हुए मृत्यु हो गयी। वे दूसरे राष्ट्रपति थे जो अपना कार्यकाल पूरा कर सके.


बासप्पा दनप्पा जत्ती ११ फरवरी १९७७ २५ जुलाई १९७७

बी.डी. जत्ती, फख़रुद्दीन अली अहमद की मृत्यु के बाद भारत के कार्यवाहक राष्ट्रपति बने . इससे पहले वह मैसूर राज्य के मुख्यमंत्री थे।



श्री नीलम संजीव रेड्डी (1913-1996)कार्यकाल 25 जुलाइ 1977 से 25 जुलाई 1982

नीलम संजीव रेड्डी आन्ध्र प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री थे। रेड्डी आन्ध्र प्रदेश से चुने गए एकमात्र सांसद थे। वे २६ मार्च १९७७ को लोक सभा के अध्यक्ष चुने गए और १३ जुलाई १९७७ को यह पद छोड़ दिया और भारत के छठे राष्ट्रपति बने.
गेया जेल सिंह (1916-1994)कार्यकाल 25 जुलाइ 1982 से 25 जुलाइ 1987

ज्ञानी जैल सिंह २५ जुलाई १९८२ २५ जुलाई १९८७
जैल सिंह मार्च १९७२ में पंजाब राज्य के मुख्यमंत्री बने और १९८० में गृहमंत्री बने .

रामास्वामी वेंकटरमण २५ जुलाई १९८७ २५ जुलाई १९९२
वेंकटरमण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन में जेल भी गए। जेल से छुटने के बाद वे कांग्रेस पार्टी के सांसद रहे. इसके अलावा वे भारत के वित्त एवं औद्योगिक मंत्री और रक्षा मंत्री भी रहे.

शंकरदयाल शर्मा २५ जुलाई १९९२ २५ जुलाई १९९७
शर्मा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और भारत के संचार मंत्री रह चुके थे। इसके अलावा वे आन्ध्र प्रदेश, पंजाब और महाराष्ट्र के राज्यपाल भी थे।

१० के. आर. नारायणन

२५ जुलाई १९९७ २५ जुलाई २००२
नारायणन चीन,तुर्की,थाईलैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका में भारत के राजदूत रह चुके थे। उन्हें विज्ञान और कानून में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त थी। वे जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके हैं .
११ ऐ. पी. जे. अब्दुल कलाम २५ जुलाई २००२ २५ जुलाई २००७
कलाम मुख्यतः वैज्ञानिक थे जिन्होंने मिसाइल और परमाणु हथियार बनाने मुख्य योगदान दिया. इस कारण उन्हें भारत रत्न भी मिला. उन्हें भारत का मिसाइल मैन भी कहा जाता है।

१२ प्रतिभा पाटिल २५ जुलाई २००७ २५ जुलाई २०१२
प्रतिभा पाटिल भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति बनी. वह राजस्थान की भी प्रथम महिला राज्यपाल थी।

१३ प्रणब मुखर्जी
२५ जुलाई २०१२ पदस्थ

प्रणब मुखर्जी भारत सरकार में वित्त मंत्री, विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके है।

अलग बॉक्स में

गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि
भारत के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि
वर्ष मुख्य अतिथि देश और पद
26 जनवरी 2016, 67वाँ गणतंत्र दिवस फ्रांस्वा ओलांद फ्रांस के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2015, 66वाँ गणतंत्र दिवस बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2014, 65वाँ गणतंत्र दिवस, शिंजो अबे जापान के प्रधानमन्त्री
26 जनवरी 2013, 64वाँ गणतंत्र दिवस जिग्मे खेसर नामग्यल वांग्चुक भूटान नरेश
26 जनवरी 2012, 63वाँ गणतंत्र दिवस, यींगलक शिनावात्रा थाइलैण्ड की प्रथम महिला प्रधानमन्त्री
26 जनवरी 2011, 62वाँ गणतंत्र दिवस सुसिलो बाम्बांग युधोयोनो इंडोनेशिया के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2010, 61वाँ गणतंत्र दिवस ली म्यूंग बाक कोरिया गणराज्य (दक्षिण कोरिया) के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2009, 60वाँ गणतंत्र दिवस नूर सुल्तान नजरबायेब कजाख़िस्तान के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2008, 59वाँ गणतंत्र दिवस निकोलस सर्कोजी फ्रांस के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2007, 58वाँ गणतंत्र दिवस व्लादिमीर पुतिन रूस के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2006, 57वाँ गणतंत्र दिवस अब्दुल्ला बिन अब्दुल अजीज अल-सऊद सउदी अरब के शाह
26 जनवरी 2005, 56वाँ गणतंत्र दिवस वांगचुक भूटान नरेश
26 जनवरी 2004, 55वाँ गणतंत्र दिवस लुईज इनासियो लूला द सिल्वा ब्राजील के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2003, 54वाँ गणतंत्र दिवस मोहम्मद ख़ातमी ईरान के राष्ट्रपति
26 जनवरी 1950, प्रथम गणतंत्र दिवस सुकर्णो इंडोनेशियाई राष्ट्रपति



गणतंत्र दिवस इतिहास के आइने में 
गणतंत्र दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है। क्यों यह वैश्विक स्तर पर प्रत्येक भारतीय के लिए गौरव का विषय है। इस दिन के समारोह पर समूचे विश्व की निगाह होती है। 26 जनवरी की महत्ता को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। आइए जानने की कोशिश करते हैं
जब अंग्रेज सरकार की मंशा भारत को एक स्वतंत्र उपनिवेश बनाने की नजर नही आ रही थी, तभी 26 जनवरी 1929 के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरु  की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पूर्णस्वराज्य की शपथ ली। पूर्ण स्वराज के अभियान को पूरा करने के लिये सभी आंदोलन तेज कर दिये गये थे। सभी देशभक्तों ने अपने-अपने तरीके से आजादी के लिये कमर कस ली। एकता में बल है, की भावना को चरितार्थ करती विचारधारा में अंग्रेजों को पीछे हटना पङा। अंतोगत्वा 1947 को भारत आजाद हुआ, तभी यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1929 की निर्णनायक तिथी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनायेंगे।

हम अपने घर में चैन से इसीलिए रह पाते हैं क्यूंकि हमारे घर में हमारी मर्जी चलती है. हम जो चाहते हैं अपने घर में कर पाते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि हमारे घर में हमारे अपने कानून और नियम होते हैं. इसी तरह एक देश की आजादी उसका संविधान नियंत्रित करता है. देश तभी जाकर पूर्ण आजाद माना जाता है जब वह गणतांत्रिक होता है. आज भारत की संप्रभुता, गर्व, नागरिक उन्नयन व लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण दिवस मनाया जा रहा है. 26 जनवरी, 1950 को ही देश के संविधान को लागू किया गया था. तब से आज तक इस दिन को देश गणतंत्र दिवस के तौर पर मनाता है.

26 जनवरी आजादी से पहले भी देश के लिए एक अहम दिन था. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1930 के लाहौर अधिवेशन में पहली बार तिरंगे झंडे को फहराया गया था परंतु साथ-साथ एक और महत्वपूर्ण फैसला इस अधिवेशन के दौरान लिया गया. इस दिन सर्वसम्मति से यह फैसला लिया गया था कि प्रतिवर्ष 26 जनवरी का दिन “पूर्ण स्वराज दिवस” के रूप में मनाया जाएगा. इस दिन सभी स्वतंत्रता सेनानी पूर्ण स्वराज का प्रचार करेंगे. इस तरह 26 जनवरी अघोषित रूप से भारत का स्वतंत्रता दिवस बन गया था.

डा. भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में बनाया गया भारतीय संविधान 395 अनुच्छेदों और 8 अनुसूचियों के साथ दुनिया में सबसे बड़ा लिखित संविधान था जो और भी विस्तृत हो चुका है. 26 जनवरी, 1950 को संविधान के लागू होने के साथ सबसे पहले डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने गवर्नमेंट हाउस के दरबार हाल में भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली और इसके बाद राष्ट्रपति का काफिला 5 मील की दूरी पर स्थित इर्विन स्टेडियम पहुंचा जहां उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज फहराया. और तब से ही इस दिन को राष्ट्रीय पर्व की तरह मनाया जाता है. किसी भी देश के नागरिक के लिए उसका संविधान उसे जीने और समाज में रहने की आजादी देता है. इस तरह गणतंत्र दिवस और संविधान की उपलब्धता काफी अधिक है.
 
26 जनवरी एक ऐसा दिन है जब प्रत्येक भारतीय के मन में देश भक्ति की लहर और मातृभूमि के प्रति अपार स्नेह भर उठता है। ऐसी अनेक महत्त्वपूर्ण स्मृतियां हैं जो इस दिन के साथ जुड़ी हुई है। 26 जनवरी, 1950 को देश का संविधान लागू हुआ और इस प्रकार यह सरकार के संसदीय रूप के साथ एक संप्रभुताशाली समाजवादी लोकतांत्रिक गणतंत्र के रूप में भारत देश सामने आया। भारतीय संविधान, जिसे देश की सरकार की रूपरेखा का प्रतिनिधित्व करने वाले पर्याप्त विचार विमर्श के बाद विधान मंडल द्वारा अपनाया गया, तब से 26 जनवरी को भारत के गणतंत्र दिवस के रूप में भारी उत्साह के साथ मनाया जाता है और इसे राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया जाता है। यह आयोजन हमें देश के सभी शहीदों के निरूस्वार्थ बलिदान की याद दिलाता है, जिन्होंने आजादी के संघर्ष में अपने जीवन बलिदान कर दिए और विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध अनेक लड़ाइयाँ जीती।

भारतीय संविधान सभा
उसी समय भारतीय संविधान सभा की बैठकें होती रहीं, जिसकी पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को हुई, जिसमें भारतीय नेताओं और अंग्रेज कैबिनेट मिशन ने भाग लिया। भारत को एक संविधान देने के विषय में कई चर्चाएँ, सिफारिशें और वाद - विवाद किया गया। कई बार संशोधन करने के पश्चात भारतीय संविधान को अंतिम रूप दिया गया जो 3 वर्ष बाद यानी 26 नवंबर, 1949 को आधिकारिक रूप से अपनाया गया। 15 अगस्त, 1947 में अंग्रेजों ने भारत की सत्ता की बागडोर जवाहरलाल नेहरू के हाथों में दे दी, लेकिन भारत का ब्रिटेन के साथ नाता या अंग्रेजों का अधिपत्य समाप्त नहीं हुआ। भारत अभी भी एक ब्रिटिश कॉलोनी की तरह था, जहाँ की मुद्रा पर जॉर्ज 6 की तस्वीरें थी। आजादी मिलने के बाद तत्कालीन सरकार ने देश के संविधान को फिर से परिभाषित करने की जरूरत महसूस की और संविधान सभा का गठन किया जिसकी अध्यक्षता डॉ. भीमराव अम्बेडकर को मिली, 25 नवम्बर, 1949 को 211 विद्वानों द्वारा 2 महीने और 11 दिन में तैयार देश के संविधान को मंजूरी मिली।

सन 1950, प्रथम गणतंत्र दिवस में जवाहरलाल नेहरू
24 जनवरी, 1950 को सभी सांसदों और विधायकों ने इस पर हस्ताक्षर किए। और इसके दो दिन बाद यानी 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू कर दिया गया। इस अवसर पर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली तथा 21 तोपों की सलामी के बाद श्इर्विन स्टेडियमश् में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज श्तिरंगाश् को फहराकर भारतीय गणतंत्र के ऐतिहासिक जन्म की घोषणा की थी। 26 जनवरी का महत्त्व बनाए रखने के लिए विधान निर्मात्री सभा (कांस्टीट्यूएंट असेंबली) द्वारा स्वीकृत संविधान में भारत के गणतंत्र स्वरूप को मान्यता प्रदान की गई। इस तरह से 26 जनवरी एक बार फिर सुर्खियों में आ गया। यह एक संयोग ही था कि श्कभी भारत का पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाया जाने वाला दिन अब भारत का गणतंत्र दिवसश् बन गया था। अंग्रेजों के शासनकाल से छुटकारा पाने के 894 दिन बाद हमारा देश स्वतंत्र राष्ट्र बना। तब से आज तक हर वर्ष राष्ट्रभर में बड़े गर्व और हर्षोल्लास के साथ गणतंत्र दिवस मनाया जाता है। तदनंतर स्वतंत्रता प्राप्ति के वास्तविक दिन 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। यही वह दिन था जब 1965 में हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किया गया।

संविधान पारित
इस प्रकार संसद भारत की मुकम्मल प्रतिनिधि सभा बन गई। 29 अगस्त सन् 1947 के प्रस्ताव के अनुसार एक प्रारूप समिति कायम की गई, जिसके सात सदस्य थे और डॉ. बी. आर. अम्बेडकर उसके अध्यक्ष थे। इस समिति ने 21 फरवरी सन् 1948 को अपना निर्णय प्रस्तुत कर दिया, जो 4 नवम्बर, सन् 1948 को संसद के सामने रखा गया। इस पर 9 नवम्बर सन् 1948 से 17 अक्टूबर सन् 1949 तक दूसरी खुवांदगी (वाचन) चलती रही जिसमें 7635 धाराएँ पेश की गईं। 14 नवम्बर सन् 1949 से 26 नवम्बर सन् 1949 तक तीसरी खुवांदगी हुई और 26 नवम्बर, 1949 को संविधान पर संविधान सभा हस्ताक्षर होकर संविधान पारित हो गया। 24 जनवरी सन् 1950 को संविधान सभा का अन्तिम अधिवेशन हुआ और इसमें नये संविधान के अनुसार डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को भारतीय गणराज्य का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया। 26 जनवरी सन् 1950 से नया संविधान लागू किया गया। उसी दिन से हर साल 26 जनवरी को भारत में गणतंत्रता दिवस मनाया जाता है।

तेरापंथ है मर्यादा और अनुशासन का बेजोड़ संगम


अजय शर्मा  
जब भी मर्यादा और अनुशासन का जिक्र होता है। तो एक प्रबुद्धजीवियों के बीच एक अंतहीन चर्चा शुरू हो जाती है। सभी के नजरों में इसके मायने अलग अलग हैं। यदि यही चर्चा धर्म संघ को लेकर हो तो चर्चा और भी ज्यादा संवेदनशील और गंभीर हो जाती है। किसी भी धर्म संघ में मर्यादा और अनुशासन का पालन सर्वोपरि माना गया है। जब बात इसकी चली है तो आपको बताना चाहूंगा कि जैन श्वेतांबर में तेरापंथ ऐसा धर्मसंघ है जिसमें मर्यादा और अनुशासन को सर्वोच्च मान्यता प्राप्त है और इसके साथ साथ यह अपने आप में ऐसा पहला धर्मसंघ है जो मर्यादा महोत्सव मनाता है।
आपको बताना चाहूंगा कि मर्यादा महोत्सव विश्व का विलक्षण पर्व है। संभवत किसी भी धर्मसंघ में मर्यादा का उत्सव मनाने की परम्परा नहीं है। तेरापंथ के चतुर्थ आचार्य जयचार्य के द्वारा बालोतरा की पावन धरा पर इस महोत्सव का शुभारंभ हुआ था। मर्यादा श्रद्धा,समर्पण और अनुशासन का गुलदस्ता है। जीवन के विकास में मर्यादा का सर्वोपरि स्थान है। संगठन का मूल आचार मर्यादा है। एक आचार, एक विचार एवं एक आचार्य की त्रिवेणी का संगम है मर्यादा।
मर्यादा से संघ परिवार संगठित रहता है। तेरापंथ धर्म संघ के चौथे आचार्य जयाचार्य ने मौलिक मर्यादा बनाई उसी पर आज यह संघ टिका हुआ है। जिस संघ में, जिस घर में मर्यादा हो वहां सुख, शान्ति होती है। एक घर में विनय की नींव हो, अनुशासन की खिड़की हो, प्रेम की छत हो संगठन का दरवाजा हो। उस घर मे शांति ही शांति होती है।
मैं मानता हूं कि संविधान, संघ, संस्था या राष्ट्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्राण तत्व होता है विधान। विधान या मर्यादा का अर्थ होता है अनुशासन। अनुशासित मर्यादित जीवन विकास के शिखरों को छूता है। तेरापंथ के सर्वोन्मुखी विकास की वजह अनुशासन और मर्यादा है। संघीय मर्यादाएं लक्ष्मण रेखा की तरह संयमित जीवन की रक्षा करती हैं।
तेरापंथ धर्म को जितना मैंने समझा और जाना है उसके आधार पर कह सकता हूं कि तेरापंथ शासन में आज्ञा का सर्वोच्च स्थान है। जैन धर्म भगवान महावीर से जुड़ा है। इनका एक संप्रदाय तेरापंथ धर्म भी है। जैन समाज में सबसे छोटा संप्रदाय है तेरापंथ। पर यह सबसे ज्यादा मर्यादित संगठन है। एक गुरु, एक आचार्य, एक विचार के आधार पर तेरापंथ कार्य करता है। देश में बहुत सी अव्यवस्थाएं हैं जो नियमों के उल्लंघन से उपजी हैं। नियमों का पालन डंडे के जोर पर नहीं, हृदय परिवर्तन व समर्पण से हो सकता है। तेरापंथ समाज मर्यादाओं का निर्वाह करता है इसलिए हर साल मर्यादा महोत्सव मनाया जाता है। मर्यादा महोत्सव तेरापंथ धर्मसंघ का
महत्वपूर्ण पर्व है। यह विश्व का एकमात्र ऐसा संघ है, जिसमें मर्यादा का उत्सव मनाया जाता है।
मर्यादा महोत्सव सारणा वारणा का प्रतीक है। मर्यादा और अनुशासन की जो व्यवस्था आचार्य भिक्षु ने दी आज वह तेरापंथ का प्राण है। उनके विराट, भव्य विशाल व्यक्तित्व को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता है। मैं अब तक जितने भी मुनियों से मिला हूं उसके आधार पर यह समझ पाया कि आचार्य भिक्षु का श्रद्धाबल, आगम ज्ञान बल एवं समता सहिष्णुता बल बेजोड़ था। संघ कभी नहीं बदलता, संघपति बदलते रहते हैं। हमारी निष्ठा संघ के प्रति होनी चाहिए। उसके बाद संघपति के प्रति निष्ठा रखें। मर्यादा का महोत्सव क्यों मनाया जाता हैं? इसका जवाब है यदि मर्यादा नहीं होगी तो साधु-श्रावक भटक जाएगा। मर्यादा महोत्सव से मर्यादाओं का निरंतर स्मरण होता रहेगा और उसकी अच्छी तरह पालना हो सकेगी। जिस तरह ओजोन परत के कारण पर्यावरण सुरक्षित है, ठीक उसी तरह मर्यादा के कारण ही जीवन सुरक्षित है।

आचार्य की आज्ञा के अनुरूप श्रावक-श्राविकाएं चलते हैं। गुटबाजी, दलबंदी से दूर रहते हैं। इतने बरसों बाद भी संघ अखण्ड इसीलिए है कि मर्यादाएं हैं। श्रद्धा, समर्पण, विवेक, संघ और संघपति के प्रति अटूट भावना रखने वाला ही सुश्रावक होता है।

आज तेरापंथ जितना आगे है, उसके अतीत में कई संत-मुनियों की मेहनत है। आचार्य भिक्षु की लकीरों पर चलते हुए आज तेरापंथ धर्मसंघ यहां पहुंचा हैं। अगर जीवन में मर्यादा नहीं हो तो सब बेकार है। मर्यादा सिर्फ शक्ति संपन्न के लिए नहीं बल्कि सभी के लिए होती है। मर्यादा पत्र सभी मनुष्यों  का प्राण है। सर्वविदित है कि कोई भी काम होता है तो उसमें मर्यादा अपेक्षित होती है। तेरापंथ धर्मसंघ में ५ मर्यादाएं बनाई गई थीं जिनमें काल, समय और परिस्थिति के कारण परिवर्तन आया है। गुरु आज्ञा में चलना आदि मर्यादाएं ही हैं। इसमें संस्था को नहीं गुण को महत्व दिया जाता है।

मुझे यह कहने में बिल्कुल भी संकोच नहीं है कि मर्यादा के कारण ही तेरापंथ धर्मसंघ ने सिर्फ हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि देश-विदेशों तक अपनी पहचान बनाई है। तेरापंथ धर्म संघ का अनुशासन बेजोड़ है। एक गुरु के आदेशानुसार साधक सधे कदमों में लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। व्यवस्था से सुसज्जित इस धर्म संघ में आत्मा की पूजा प्रति पल की जाती है। गलतियों का प्रायश्चित कर शुद्ध चेतना में निवास करना इस धर्म संघ की नीति है। तेरापंथ धर्म संघ के प्रथम प्रणेता आचार्य भिक्षु ने ऐसी मर्यादाओं का सूत्रपात किया जो तेरापंथ धर्म संघ के कणकण को आलोकित कर रही है। आत्म साधकों का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। इस धर्म संघी की विचारधारा मानव मात्र के हित में प्रवाहित होती है। पूरे विश्व का पथ प्रदर्शक तेरापंथ धर्म संघ एक गुरु के इंगित पर वर्तमान समस्या को समाहित करने के लिए संकल्पबद्ध है। अणुव्रत, प्रेक्षाध्यान और जीवन विज्ञान जैसे सामाजिक अभियान समाज की दिशा और दशा को बदलने के लिए कटिबद्ध हैं। ज्ञान शालाओं एवं व्रत चेतना की संयोजना अच्छे राष्ट्र के निर्माण के ही उपक्रम हैं। अत मैं कह सकता हूं कि तेरापंथ धर्मसंघ मार्यादा और अनुशासन का बेजोड़ संगम है।





सुरा, सुटटा और सुंदरियां

खूबसूरत अंगुलियों में स्टाइल से फंसी हुई सिगरेट और दूसरे हाथ में जाम या फिर एक बेहद ही खूबसूरत लड़की अपने ही अंदाज में शराब को सिप करके पीते हुए और साथ ही सिगरेट का कश लगाती हुई हॉलीवुड और बॉलीवुड की फिल्मों में नजर आया करती थी। जब भी महिला पियक्कड़ किरदारों का जिक्र चलेगा तब साहेब बीवी और गुलाम की मीना कुमारी का नाम लिया जाएगा। वहीं सिगरेट के धुए के छल्ले बनाने की अदा का जिक्र चलेगा तो दम मारो दम फेम जीनत अमान का नाम याद किया जाएगा। आज यही सुरा- सुट्टा कल्चर मेट्रो और महानगरों की पहचान बनता जा रहा है।

यदि आपने आज से लगभग 10-15 साल पहले किसी युवती को सरेआम सिगरेट का कश लगाते हुए देखा होगा तो आपकी आंखे एक बारगी पथरा गई होंगी। सोच रहे होंगे कि ये क्या मंजर है? लेकिन आज मौजूदा परिदृश्य में एक बहुत ही मामूली सी बात लगती है। आज हर तीसरी लड़की के हाथ में सिगरेट नजर आती है। चाहे वह वर्कप्लेस या कैंटीन हो या फिर पान बीड़ी का खोखा। बस मौका मिलना चाहिए। कभी किटी पार्टियों में चाय चला करती थी और आज शराब व सिगरेट ने उसकी जगह ले ली है। तो आइए आज इसी सुरा सुट्टा और सुंदरियां के कल्चर पर गुफ्तगू करते हैं।

 एक वो वक्त था जब लोग चोरी छिपे शराब पीने के बाद अपने बुजुर्गों के सामने नहीं जाया करते थे। अगर किसी ने घर में शराब का नाम भी ले लिया तो उसे हिकारत की नजर से देखा जाता था और एक लम्बा लेक्चर उसे सुनाया जाता था। शराब और सिगरेट उस वक्त दो तरह के तबके में पी जाती थी। एक तो वो जो बहुत निचले तबके के कामगार लोग या फिर उच्च वर्ग के संभ्रांत लोग। मिडिल क्लास परिवार में इसे बुरी नजर से देखा जाता था। ये वो वक्त था जब सिगरेट भी चोरी छिपे पी जाती थी। मुंह और हाथ से बदबू चली जाए उसके लिए काफी जतन किए जाते थे। मुझे अभी तक याद है फिल्म “मैंने प्यार किया” का वो सीन जिसमें सिगरेट चुराने से लेकर पीने तक का फिल्मांकन और उसके बाद नायिका का नायक और उसके दोस्त को बचाने का प्रयास। उसके द्वारा स्मोकिंग छोड़ने की नसीहत। आज वही नायिका अपने हाथों में सिगरेट लिए है और अपने दोस्तों के साथ सिगरेट शेयर कर रही है। जमाना कितनी तेजी से बदला है दोस्तो।

आज यही सुरा-सुट्टा इस देश की सुंदरियों के सिर चढ़ कर बोल रहा है। ये सुंदरियां बड़े ही अलग अंदाज में कह रही हैं कि हम हैं बिंदास और जीएंगे बिंदास। कॉरपोरेट सेक्टर की वर्किंग वुमेन, बड़े और रईस घराने की महिलाओं के साथ-साथ कॉलेज स्टूडेंट में भी इसके प्रति क्रेज देखा जा रहा है। इन लड़कियों का अपने फ्रेंडस के बीच में ऊंची आवाज में मस्त होकर कहना “ऑन द रॉक्स” एक मामूली सी बात हो गई है। अरे यार! चिल रहा करो! ऐसे शब्दों का सुनाई देना कोई हैरत वाली बात नहीं है।
इस सुरा-सुट्टा कल्चर पर सभी का अपना अपना नजरिया है। कोई मुझ से सहमत होगा और कोई नहीं होगा। फिलहाल हम बात को आगे बढ़ाते हैं और देखते हैं यह कल्चर कितनी तेजी से पनप रहा है और कहां कहां अपनी जड़ें जमा रहा है। किस तरह की महिलाएं और लड़कियां इसकी दीवानी हैं।
बात देश की राजधानी दिल्ली से शुरू करते हैं। आज दिल्ली एनसीआर में ऐसी कामकाजी और कॉलेज युवा छात्राओं की कमी नहीं है जो लगभग हर हफ्ते अपने दोस्तों के साथ वीकेंड पर मनोरंजन के लिए डिस्को, पब और बार में जाना पसंद करती हैं। शनिवार की रात मौजमस्ती के बाद रविवार को आराम और सोमवार से नई ऊर्जा के साथ फिर से जिंदगी की शुरुआत।

इस बारे में मैंने अपनी ही कुछ दोस्तों से बात की तो उन्होंने बताया कि वे सभी फ्रेंडस किस तरह डिं्रक्स का प्लान बनाते हैं। सभी फ्रेंडस पहले यहां के कुछ अच्छे डिस्को, बार और पब के नाम पर डिस्कस करते हैं। उसमें से एक नाम को फाइनल करते हैं और फिर ऑन द रॉक्स और शराब के लम्बे दौर। उसने कहा कि कभी कभी तो हमारे साथ हमारे बॉय फ्रेंड भी होते हैं इस डिं्रक पार्टी में। यदि कभी अचानक से पीने का मूड बन जाए तो किसी सहेली या फिर कार में प्रोग्राम बना लेते हैं। मैंने उससे बड़ी उत्सुकता से पूछा, अरे एक बात तो बताओ क्या तुम्हें इस तरह से शराब और सिगरेट पीना पसंद है। तो उसने तपाक से कहा कि नहीं यार बस आदत पड़ गई और अब अच्छा लगता है। जब मैंने कॉलेज जाना शुरू किया तो वहां के नये दोस्तों ने दबाव डाल कर शौकिया पीने को कहा। उसके बाद फिर ऐसा होने लगा और धीरे-धीरे आदत पड़ गई। अब तो जब भी मन करता है मैं पी लेती हूं। बस यार कभी-कभी आत्मग्लानि होती है। लेकिन आज यह कल्चर बन चुका है। जब भी टेंशन होती है तो सुट्टा लगा लेती हूं।

सुट्टेबाजी पर मुझे अपनी एक दोस्त का अनुभव याद आ रहा है जिसे मैं आपके साथ शेयर करुंगी। उसकी मीडिया में नई-नई नौकरी लगी थी। दूसरे दिन उसके सहकर्मियों ने उससे कहा कि यार लंच के बाद 4 बजे सुट्टेबाजी के लिए चलेंगे। ना-ना करते उसे सुट्टेबाजी की आदत पड़ ही गई। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस तरह महिलाओं के बीच सुटटेबाजी का कल्चर अपनी जड़ें जमा रहा है।

इस सुरा सुट्टा कल्चर पर सभी की अलग-अलग राय है। कुछ महिलाओं का कहना है कि मर्द क्यों पीते हैं? जब मर्द पी सकते हैं तो हम क्यों नहीं।
कुछ लड़कियों का मानना है शादी से पहले जितना एंजॉय कर सकते हैं कर लें। पता नहीं पति कैसा मिले। इसलिए खुलकर जी रहे हैं। चिल यार! एंजॉय करो और मस्त रहो। कल जाने क्या हो। कुछ लड़कियों को सिगरेट और शराब की लत इसलिए पड़ गई क्योंकि उनके पेरेंटस भी पीते हैं और वे उनके साथ पीते भी हैं।

सुरा-सुट्टा कल्चर को लेकर अभी कुछ समय पहले एक रिपोर्ट आई थी जिसके मुताबिक बड़े शहरों की लगभग 30 फीसदी महिलाएं शराब और सिगरेट का सेवन करती हैं। जिसके पीछे एक ही ठोस वजह है और वह है महिलाओं का आर्थिक रुप से मजबूत होना। अच्छी नौकरी, मोटी सेलरी के साथ-साथ मल्टीनेशनल कंपनियों का वीकेंड कल्चर। जिसने यह बदलाव महिलाओं के जीवन में दिए। आज अमेरिकन कल्चर अपने चरम पर है। सुरा- सुटटा कल्चर ने धीरे-धीरे मध्यम वर्गीय महिलाओं को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। कामकाजी महिलाओं का कहना है कि काम का बोझ ज्यादा होने के कारण मानसिक तनाव बहुत ज्यादा होता है। यही वजह है कि सिगरेट और शराब पीने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। इन लोगों का मानना है इससे मानसिक शांति और इसके बाद फ्रेशनेस के साथ नई ऊर्जा महसूस होती है। इन महिलाओं के मुताबिक जमाना बदल चुका है। हम बिंदास होकर जीना चाहते हैं। इसीलिए बिंदास जीते हैं और बिंदास पीते हैं। जिंदगी की हर उलझन को सिगरेट के धुएं में उड़ाते चल रहे हैं।

इस सुरा सुटटा कल्चर का आलम यह है कि कोई भी मौका हो चाहे वह जन्मदिन, वेडिंग एनिवर्सरी, शादी, तरक्की या फिर गम का मौका, बस हो जाए शराब और सिगरेट। इन महिलाओं के मुताबिक सुरा और सुट्टा शरीर और मन को सुख पहुंचाने का तरीका है।
चलिए अब बात करते हैं कि किस तरह की शराब इन महिलाओं को पसंद है। इनको स्वाद में कड़वी व्हिस्की और बीयर पसंद नहीं आती है। इन्हें ज्यादातर वोदका, ब्रीजर, रेड वाइन पसंद है। कुछ ऐसी भी महिलाए हैं जो बीयर और व्हिस्की पीना पसंद करती हैं। टीन एजर्स और कॉलेज स्टूडेंट में टकीला शॉटस काफी पसंद किया जाता है। इसमें उन्हें थ्रिल मिलता है।

यहां पर सोचने वाली बात यह है कि आखिरकार महिलाओं में यह सुरा सुटटा कल्चर कैसे पनपा। वे वजह क्या रहीं जिन्होंने उन्हें इस तरह के कल्चर को अपनाने को मजबूर कर दिया। इसका साफ सीधे तौर पर कारण जो हो सकता है वो है एकाकी जीवन, घर से दूर रहकर नौकरी करना, परिवार का दबाव और बंदिशों का न होना और आर्थिक रुप से मजबूती।

वैश्वीकरण के दौर में शहरों की संस्कृति तेजी के साथ बदल रही है। आधुनिकता की इस अंधी दौड़ ने शहरों की रातों को रंगीन बना दिया है। मुंबई और कलकत्ता के बाद दिल्ली एनसीआर इस तरह के कल्चर के लिए नाम रोशन कर रहा है। दोस्तों इसके साथ साथ सुरा-सुट्टा कल्चर के चलते इन महिलाओं और युवतियों के द्वारा किए जाने वाले एक्सीडेंट को भी माफ कर दें क्योंकि पीने के बाद मर्द भी तो एक्सीडेंट करते हैं।
लेकिन यह एक गंभीर विषय है कि मेटों शहरों में तेजी से पनपा यह कल्चर हमारे समाज और संस्कृति को कहां ले जा रहा है। इसके भविष्य में क्या परिणाम निकलेंगे।

नशे में आज की युवा पीढ़ी


नशे की समस्या ने कुछ वर्षों के अंदर एक विकराल बीमारी के रूप समूची दूनियां में अपनी जड़ें जमा लीं हैं। इस नशे की आग से अपना देश भी नहीं बच सका है। जम्मू कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक नशीले पदार्थों का कारोबार करने वालों का नेटवर्क फैला हुआ है। पूरा देश नशे में डूबा हुआ है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में नशे की लत है। क्या शहर और क्या गांव, हर जगह नशा ही नशा है। आपको हर 100 मीटर की दूरी पर एक शराब की दुकान मिल जाएगी। जिसके बाहर शौकीन से लेकर नशेडि़यों की भीड़ दिखाई देगी। छोटी छोटी चाय और पान की दुकानों, रेहड़ी पटरी वाले, छोटे-बड़े खान-पान के ठेले और ढाबों पर सिगरेट, तंबाकू, खैनी, जर्दा, गुटखा सरेआम बिकते देखे जा सकते हैं। वहीं जब आप बड़े शहरों या मेटों शहर के कल्चर को देखते हैं तो आपको डिस्को, पब और होटल में अफीम,चरस, गांजा, हेरोइन, डूडा पोस्त, इंजेक्शन, नशीली दवाओं जैसे मादक पदार्थों के नशेड़ी मिल जाएंगे। इसका अंदाजा ऐसे शहरों में होने वाली रेव पार्टियों से भी लगाया जा सकता है।
ऐसा नहीं है कि नशे की लत सिर्फ अमीरों या मध्यम वर्ग के लोगों में ही है। इसने गरीबों को भी नहीं छोड़ा है। आप को कूड़े के ढेर में बचपन खो चुके बच्चों से लेकर मजदूरों तक में यह नशा दिखाई दे जाएगा। ये लोग रेलवे स्टेशन, बस स्टेण्ड, पार्क और ऑटो या बस-टक में नशा करते हैं।

वहीं स्कूल कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों की बात करें तो कैंटीन से लेकर हॉस्टल तक नशे का जाल फैला हुआ है। छोटे छोटे बच्चे कोक, पेप्सी जैसे डिक्स में मिलाकर सरेआम पी रहे हैं और खुलेआम सिगरेट के धुएं का छल्ला बनाते देखे जा सकते हैं।
मुझे लगभग 10 साल बाद दिल्ली से अलीगढ़, सहारनपुर, मुरादाबाद की तरफ जाने वाली पैंसेजर टेनों में यात्रा करने का मौका मिला। मैंने दैनिक यात्रियों को टेन में खुलेआम शराब, सिगरेट और ताश खेलने के साथ-साथ और अन्य यात्रियों के साथ बदतमीजी, गाली गलौच और मारपीट करते हुए देखा। इनके लिए बच्चे और महिलाएं कुछ मायने नहीं रखते। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हो सकते हैं।

मैंने कुछ दिन पहले टीवी पर पंजाबी सिंगर गुरदास मान का पंजाब में नशे की स्थिति को बयां करता एक गाना देखा। जो पंजाब में नशे की विकरालता को बयां करने के लिए काफी है। जो पंजाब अपनी खेती और व्यापार में सफलता के लिए जाना जाता था वो आज नशे के लिए कुख्यात हो चुका है।

इस वक्त देश के पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव चल रहे हैं जिसकी वजह से नशे की खपत और तेजी से बढ़ी है। वहीं पंजाब में नशे को कुछ राजनीतिक पार्टियां चुनावी मुद्दा बना चुकी हैं। चुनाव आयोग भी नशे को लेकर चिंता जता चुका है और पुलिस प्रशासन को सख्ती बरतने के निर्देश दिए हैं। पुलिस की ओर से सख्ती बरतने के साथ ही इसका असर मोगा के गांव दौलेवाला में दबिश देने गई पुलिस टीम पर नशा तस्करों का हमला यही बताता है कि उनके के लिए यह कारोबार कितना फायदेमंद है।

मोगा का यह गांव तो नशा तस्करी के लिए बदनाम रहा है। पिछले साल जून 2016 में भी पुलिस टीम पर हमला हुआ था। गांव में लगभग पांच सौ लोगों पर नशा तस्करी के आरोप में मामला दर्ज होना यह बताने के लिए काफी है कि यहां के हालात ज्यादा खराब हो चुके हैं। मोगा के अलावा प्रदेश के अन्य जिलों से भी नशे के धंधे की खबरें आती रहती हैं। जनवरी 2017 में बठिंडा में जहां पुलिस ने 75 लाख का सिंथेटिक ड्रग्स बरामद किया, वहीं जालंधर में चुनावी नशा पकड़ने के लिए चौदह दिन में मारे गए तीस छापों में आठ लाख की ड्रग्स बरामद की गई। आयोग ने इस बार चुनाव में ड्रग्स पर सख्ती के लिए पुलिस, नारकोटिक्स डिपार्टमेंट व सेहत विभाग की ज्वाइंट एक्शन टीमें तैयार करवाई हैं।

इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि प्रदेश में नशा एक बड़ी समस्या बन चुका है। चुनावों में सिर्फ वायदे करने से यह समस्या खत्म होने वाली नहीं है। इसके लिए जमीनी स्तर पर गंभीरता से काम करना होगा। पुलिस ने कुछ माह पहले नशे के खिलाफ अभियान भी चलाया था। मुख्यमंत्री ने भी विशेष तौर पर प्रदेश के कई नशा छुड़ाओ केंद्रों का दौरा किया था और डिप्टी कमिश्नर्स को निर्देश दिए थे। सरकार को यह भी देखना होगा कि उसके निर्देश का कितना पालन हो रहा है। कई बार अधिकारियों की लापरवाही के कारण अपेक्षित नतीजा नहीं निकलता है। प्रदेश में ड्रग्स के बड़े रैकेट का पर्दाफाश होने के बाद इसकी जांच ईडी को सौंपी गई थी। साढ़े पांच हजार करोड़ रुपये के ड्रग्स रैकेट की जांच शुरू किए ईडी को साल से ज्यादा हो गया है लेकिन अभी तक इसका कोई नतीजा नहीं निकला है। कार्रवाई में देरी से नशा तस्करों के हौसले बुलंद हो जाते हैं। यदि समय रहते सख्त कार्रवाई की जाए तो निश्चित रूप में नशे पर नकले कसने में सफलता मिलेगी।



देश में नोटबंदी के बाद मादक पदार्थों की तस्करी में एकाएक बढ़ोतरी होना गहन चिंताजनक है। जम्मू रेलवे स्टेशन पर पूर्व सूचना मिलने पर भी ड्रग्स तस्करों का नशे की भारी खेप को छोड़ कर भाग जाना तथा ठीक एक दिन बाद जम्मू के गंग्याल इलाके से पांच सौ के करीब दस लाख पुराने नोट व हेरोइन की खेप सहित पांच तस्करों को गिरफ्तार किया। यह तस्कर हेरोइन की खेप को घाटी में बेचकर यहां पहुंचे थे। उनका मकसद किसी तरह पुराने नोटों को खपाने का था। इससे पहले कि वे इन नोटों को खपा पाते कि पुलिस नाके पर चेकिंग के दौरान वे पकड़े गए। विडंबना यह है कि मादक पदार्थों की तस्करी में संलिप्त नेटवर्क को ध्वस्त नहीं किया जाता तब तक युवा वर्ग को इस लत से छुटकारा नहीं मिल सकता। दुखद पहलू यह है कि शहरों में हेरोइन का प्रचलन बड़ा है। इसमें समाज के समृद्ध वर्ग के युवा इस नशे का शिकार हो रहे हैं। यह हेरोइन थोड़ी-थोड़ी मात्रा में शहर के पाश इलाकों में छात्रों को बेची जा रही है। पुलिस कभी कभी कुछ लोगों को गिरफतार भी कर लेती है। लेकिन हो कुछ नहीं पाता। पुलिस को चाहिए कि ऐसे अभियानों को लगातार जारी रखें जिससे कि आरोपियों पर दबाव बने। अगर इस नशे के खिलाफ व्यापक अभियान नहीं चलाया गया तो युवा वर्ग नशे की लत में अपना भविष्य बर्बाद कर देगें। यह नशा छूटे नहीं छूटता। ड्रग्स के नशे में समाज का मध्य वर्गीय युवा फंस कर रह गया है। देश में संगठित गिरोह सक्रिय हैं। जो कोरियर की मदद से थोड़ी थोड़ी मात्रा में हेरोइन, कोकीन, गांजा को युवाओं तक पहुंचाते है। इसकी तस्करी में पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध रही है क्योंकि कुछ माह पहले हेरोइन की तस्करी में जम्मू पुलिस कंट्रोल रूम में तैनात कांस्टेबल ही शामिल था। मादक पदार्थों की तस्करी में करोड़ों रुपये दाव पर लगा होता है। ऐसे में कुछ पुलिस वाले भी स्वार्थ की खातिर तस्करों का साथ देते है। इसलिए आला अधिकारियों को चाहिए कि वे समय समय पर नाकों व थानों में तैनात पुलिसकर्मियों का थोड़े थोड़े समय पर तबादला नीति बनाए। पंजाब के रास्ते आने वाले इस मीठे जहर के लिए सीमा की ओर जाने वाले रास्तों पर भी निगरानी बढ़ानी होगी। अभिभावकों भी चाहिए कि अपने बच्चों की दोस्ती पर नजर रखे कि उसका किन लोगों से उठना बैठना है। सबसे ज्यादा नशे की गिरफ्त में आने वो सोलह से चौबीस वर्ष की उम्र के होते है। यह उम्र ऐसी होती है जहां युवा अच्छा और बुरे की पहचान नहीं कर पाता। अगर कोई बच्चा इस नशे की गिरफ्त में है तो उसकी काउंसलिंग के साथ नशामुक्ति केंद्रों में इलाज करवाया जा सकता है। इसमें माता पिता का सहयोग बच्चों को नई जिंदगी दे सकता है।

Tuesday, February 7, 2017

लोकतंत्र की रक्षा - मतदाता की बुद्धिमता से



लोकतंत्र में प्रभुसत्ता जनता में निहित होती है। प्रतिनिधिक लोकतंत्र में जनता इस बात का निर्णय करती है कि उस पर किस प्रकार से तथा किसके द्वारा शासन हो। जनता अपनी प्रभुसत्ता का सबसे पहला बुनियादी उपयोग मतदान द्वारा करती है।

डा. अम्बेडकर ने कहा था ‘‘मैं महसूस करता हूं, संविधान चाहे कितना ही अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाय, खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान खराब होगा।’’ संविधान केवल विधायका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे राज्य के अंगों का प्रावधान कर सकता हे। परन्तु राज्य के इन अंगों का संचालन लोगों पर तथा राजनीति दलों पर निर्भर करता हैं। राजनीतिक दल यदि अपने पंथ को देश के उपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता एक बार फिर खतरे में पड़ जायेगी।

डा. राजेन्द्र प्रसाद ने भी कहा था ‘‘यदि लोग जो चुनकर आयेंगे योग्य, चरित्रवान और ईमानदार हुए तो दोषपूर्ण संविधान को भी सर्वोत्तम बना देंगे। भारत को ऐसे लोगों की जरूरत हैं जो ईमानदार हों तथा जो देश के हित को सर्वोपरी समझें। हममें साम्प्रदायिक अंतर है, जातिगत अंतर है, भाषागत अंतर है, प्रान्तीय अंतर है।’’ ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो छोटे-छोटे समूहों व क्षेत्रों के लिए देश के व्यापक हितों का बलिदान दें।
पश्चिम के समुन्नत लोकतंत्र में मताधिकार धीरे-धीरे जनता को दिया गया था। संविधान निर्माताओं ने निष्ठापूर्वक कार्य करते हुए सार्वजनिक वयस्क मताधिकार की पद्धति को अपनाने का निर्णय किया जिसमें प्रत्येक वयस्क भारतीय को बिना किसी भेदभाव के मतदान का समान अधिकार तुरंत प्राप्त हुआ। जबकि अधिकांश भारतीय जनता गरीब और अनपढ़ थी। एक व्यक्ति का एक वोट, बंधुत्व तथा एक अखंड राष्ट्र का निर्माण व राजनैतिक न्याय का लक्ष्य रखा गया। राजनीतिक न्याय का अर्थ है जाति, मूलवंश, सम्प्रदाय, धर्म, जन्मस्थान के आधार पर विभेद के बिना सभी नागरिकों को राजनीति प्रक्रिया में भाग लेने के अधिकारों में बराबर का हिस्सा। स्वतंत्रता के बाद वयस्क मताधिकार पद्धति ने जाति प्रथा को जबरदस्त चुनौती दी। परन्तु वयस्क मताधिकार पर आधारित राजनैतिक प्रणाली में जाति की भूमिका महत्वपूर्ण बन गई और अब जातिवाद दूसरे रूप में उभरा है।

देश में चुनाव के समय लगभग 50 प्रतिशत मतदान होता है। यह भी पृथक-पृथक पार्टियों में विभाजित हो जाता है। उम्मीदवार या पार्टी विशेष धर्म, जाति, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक समुदायों का हितैषी बताकर वोट हासिल करते है। तदुपरान्त गठबन्धन का हिस्सा बन जाते है। ऐसी सरकार सिर्फ समुदाय, क्षेत्र या जाति हितैषी होती है, उनके विकास की सोचती है। इससे समाज में विषमता, वैमनष्यता व द्वैष उत्पन्न हो जाता है। इस विभाजनकारी वोट के तरीके से समाज में फूट पड़ती है। दंगा फसाद होते है। जाति व धर्म के आधार पर वोट देना देशहित के विपरीत हैं। मतदाता का कर्तव्य है कि लोकतंत्र को सुरक्षित, शुद्ध एवं कारगर बनाए रखने के लिए विभाजनकारी दलों व व्यक्तियों के पक्ष में मतदान नहीं करें। उम्मीदवार की योग्यता, निष्ठा, कर्तव्यपराणता तथा पार्टियों का चेहरा व चरित्र को ध्यान में रखकर मतदान करें। मतदाताओं का कर्तव्य है लोकतंत्र को धर्मतंत्र या जातितंत्र बनने से रोके। जाति, धर्म, समुदाय, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र के आधार पर वोट नहीं दें।
पढ़े लिखे षिक्षित मतदाता कम संख्या में वोट देते हैं। घर बैठकर अथवा बाजार, गली, नुक्कड पर उम्मीदवरों व पार्टियों के बारे में मात्र निन्दा, प्रशंसा करते है। अपना कर्तव्य ईमानदारी से पूरा नहीं करते। उम्मीदवार के बैकग्राउण्ड, प्रतिभा पर गौर नहीं करते। दागियों को वोट देते हैं। बाहुबल, धनबल से प्रभावित होते हें, तदुपरान्त इन्हीं बातों की बुराई करते हैं। वर्तमान राजनीति में नारों का भी बड़ा महत्व हो गया। अमीर और गरीब के बीच खाई पटने के नारे सुनते कान पक गये परन्तु खाई और चैड़ी होती जा रही है। अमीर अधिक धनवान होता जा रहा है। गरीब की जेब छोटी होती जा रही है। नारे चुनावी मुद्दा बनकर हार जीत की भूमिका बनाते है। बेरोजगारों को रोजगार के सपने, विकास के नये आयाम स्थापित करने के लम्बे चैड़ें वायदों से भ्रमित होकर मतदान होता है। कुछ जाति/वर्ग अपनी पहुंच का फायदा उठाकर तरक्की करते हैं तो दूसरा वर्ग जिन्दगी भी मुश्किल से गुजारता है। समस्या यह है, लोग अन्य व्यक्तियों को कैसे काम करना चाहिए इसमें अपनी पूरी विशेषता बतातें है। परन्तु स्वयं का कर्तव्य भूल जाते है। बढ़ती जनसंख्या से विकराल विभाजन और गहरा होता जा रहा है। हर तबका विकास में भागीदार बन सके, यह सोच नहीं रहा।

चुनाव आयोग दन्तहीन है। कहा बहुत कुछ जाता है परन्तु नतीजा वही ढाक के तीन पात। चुनाव व्यय की सीमा से सैकड़ों गुना खर्चा होता है, बूथ रिगिंग होती है, बूथ कैप्चरिंग होती है, फर्जी मतदान होता है। परन्तु मात्र कागजी खानापूर्ति के अलावा कुछ भी नहीं होता। प्रचार प्रसार में आयोग का करोड़ों रूपया व्यय होता है, उसका कोई असर या नतीजा नहीं। क्या आज तक फर्जी डिग्रियां, सम्पत्ति सम्बन्धी झूंठे आंकड़े, चरित्र व अपराध सम्बन्धी घोषणा पत्र पर कुछ हुआ। चुनाव याचिकाओं पर अगले चुनाव यानि पांच साल तक फैसले नहीं होते। लोगों की श्रृद्धा व विश्वास उठ चुका है। जनप्रतिनिधि कानून का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन करते है। ऐसे में मतदाता की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है।

चुनावों में आज भी सामंती असर मौजूद है। आजादी के पूर्व जनता का खून चूसने वाले सामन्ती उम्मीदवार आज भी वंश व परिवार के बल पर प्राथमिकता प्राप्त करते है। हमने प्रतिनिधि संसदीय लोकतंत्रात्मक प्रणाली व वयस्क मताधिकार को सोच समझकर अपनाया था तथा उत्तरदायित्व को तरजीह दी गई थी। तीन शब्द अर्थात प्रतिनिधिक, संसदीय एवं लोकतंत्र हमारी राजनीति व्यवस्था के मूलतत्व है। लोकतंत्र में लोग अपने स्वामी स्वयं होते हैं।

लोकतंत्र का अर्थ है आत्म निर्णय का लोगों का अधिकार और तर्कसंगतता में आस्था। सच्चे लोकतंत्र का मूल है ‘‘प्रत्येक व्यक्ति चाहे उसकी जाति, धर्म, रंग अथवा लिंग पैदाइश का स्थान कोई भी हो, शिक्षा का स्तर, आर्थिक अथवा व्यवसायक पृष्ठभूमि कुछ भी हो, स्वशासन व अपने कार्यो को करने योग्य है। उद्देशिका में कहा गया है ‘‘हम भारत के लोग दृढ़ संकल्प होकर संविधान को अंगीकृत करते है। इस प्रकार प्रभुसत्ता केवल जनता में निहित है। लोकतंत्र को उपयोगी बनाने, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से चुने गये लोगों द्वारा संभव है। चुने गये लोगों को प्रभुसत्ता की अभिव्यक्ति मिलती है और सर्वोच्च शक्ति जनता के प्रतिनिधियों के निकाय में निहित हो जाती है। ऐसा निकाय राजनैतिक व्यवस्था की नींव व धूरी है। जो मतदाता पर आश्रित है। हमारी व्यवस्था में सभी वयस्क लोग जिन्होंने 18 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है, मतदाता है। वे लोकसभा व विधानसभाओं के सदस्य चुनते है। संसद सभी लोगों के विचारों का प्रतिनिधित्व करती है।

प्रारम्भिक काल में सार्वभौम मताधिकार से चुनी गई संसद में पक्ष विपक्ष दोनों में, गौरवशाली और प्रबुद्ध सांसद चुने जाने लगे थे। जो जाति/वर्ग, धर्म, क्षेत्र के आधार पर नहीं, गुणात्मक स्तर को देखकर चुने गये थे। सांसदों में कुशाग्र बुद्धि और विद्वता थी। विशिष्ट लोग थे, उच्च कोटि के वक्ता थे, नीतियों और कृत्यों की व्याख्या व आलोचना करते थे। धीरे-धीरे जातिवाद, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्रीय आधार पर चुने गये। पैसे व बाहुबल के आधार पर व्यवसायिक वर्ग, माफिया गिरोह के लोग, अपराधी प्रवृति के लोग चुने जाने लगे और विषम परिस्थितियां पैदा होने लगी है। शोरगुल, नारेबाजी, वाकआउट, सदन स्थगन, सब कुछ होने लगा। सदन की स्वस्थ व सशक्त क्रियाशीलता की बलि हो गई। 23-24 दलों की मिली जुली सरकार बनी। विभिन्न दल व सांसद अपनी राजनीतिक रोटिंया सेकने लगे। अव्यवस्था, अनुशासनहीनता, अवहेलना, चरित्र हनन होने लगा। गुणात्मकता समाप्त हो गई।

आज धर्मान्धता व साम्प्रदायिकता की भावना बलवती हो गई। मुस्लिम और हिन्दू समाज व्यवस्था का अस्तित्व निरंतर सामाजिक तनाव तथा संघर्ष का कारण बन रहा है। दो समानान्तर समाज व्यवस्थायें स्थापित हो गईं व्यवहार व दृष्टिकोण में सामाजिक प्रतिबंधों और जातिय नियमों की कठोरता को बहुत सीमा तक बढ़ाया। इस्लामीकरण का उद्भव हुआ। उदारवाद, सहिष्णुता, धर्म निरपेक्षता के उत्साहवर्धक विचार कमजोर पढ़ गये।

हिन्दु बहुसंख्यक जातिवाद से प्रभावित है। मुस्लिम समाज के कट्टरपंथी वर्ग ने पुनः अलगाववाद को बल दिया है। हिन्दु मुसलमानों में व्याप्त पृथकतावादी प्रवृतियों ने अनेक प्रकार के संगठनों को जन्म दिया। योग्यता व सामथ्र्य का ध्यान नहीं रहा। धन बल ने सामन्तवादी समाज को पूंजीवादी समाज में बदल दिया। दलितों में भी कठिनाईयों व अभावों से उनका विश्वास डिगा और यह धारणा बनी कि स्वयं उनके हाथों में राजनैतिक शक्ति तथा सत्ता आनी आवश्यक है।

भारत में राष्ट्रवाद एक नई परिभाषा के साथ उदय हो रहा है। उनमें सामाजिक, राजनैतिक सुधारक, सत्याग्रही, संत, शिक्षक, शिक्षार्थी नहीं है। सामाजिक गठबंधन के लोग हावी हो रहे है, जिनका कोई मौलिक विचार, आस्था व सिद्धान्त नहीं है। क्रान्तिकारी आन्दोलन लोकप्रिय नहीं बना। कुछ लोग व संगठन भारतीय राजनीति में पूर्णतः हिन्दु प्रभुत्व चाहने लगे। मुस्लिम उनकी प्रधानता से विचलित होने लगे है। स्वदेशी का सिद्धान्त समाप्त होता जा रहा है। धार्मिक उग्रता भी बढ़ रही है। सामाजिक नियतिवाद पनपने लगा है। गांधी ने एक सुसंगठित समाज की रचना के लिए जीवनभर काम किया परन्तु आगे की पीढ़ी भारतीय समाज की रक्त धारा में व्याप्त पृथकतावादी गांठों को समाप्त नहीं कर सकी। मुसलमानों तथा दलितों के विश्वास को प्राप्त करने के लिए अत्यधिक निष्ठावान प्रयत्नों का कोई फल नहीं मिला। उनको भी कौसने का प्रयत्न किया जा रहा है। समाजवाद का नारा भी कमजोर पढ़ गया।

आधुनिकता के असर के नीचे उदारवाद, उपभोक्तावाद, बाजारवाद भी आधुनिक प्रवृतियों को बल मिल रहा है। मानववादियों की पकड़ कमजोर होती जा रही है। दल विहिन जनतंत्र का मूल उद्देश्य, ग्रामराज व रामराज की अवधारणा समाप्त हो रही है। गांधी, नेहरू, अम्बेडकर के व्यापक परिवर्तन का ख्बाब व प्रयास समाप्त हो रहा है।
इस प्रकार लोकतंत्र भीड़तंत्र बनता जा रहा है। प्रत्येक मतदाता अपनी स्वयं की पसन्द व भीडतंत्र से प्रभावित होकर मतदान करता है। मतदान एक पवित्र कर्तव्य की तरह नहीं, प्रतिक्रियाओं, प्रलोभन, दबाब, निजी हित, वर्ग हित के आधार पर हो रहा है। इसीलिए धनबल, भुजबल, जातिबल, रिगिंग, बूथ कैप्चरिंग, हिंसा व गलत तरीके अपनाकर किया जा रहा है। राष्ट्र हित गौण हो गया है। हमारी सत्ता, हमारा स्वार्थ मात्र अपने प्रति जिम्मेदारी की भावना प्रमुख हो रही है। गालियां देकर, आलोचना करते हुए भी अपना कर्तव्य पूर नहीं करते। हिंसा भी होती है, अत्याचार भी होते हें, भाई भतीजावाद भी व्याप्त है। हमारा आत्मबल, हमारा आत्मविश्वास, देश के प्रति जिम्मेदारी की भावना कम होती जा रही है। आलोचनाओं के आगे राष्ट्र और उसके भविष्य का चिन्तन तो कभी आता ही नहीं।

चुनाव आयोग की विश्वसनीयता समाप्त हो चुकी है। भारत जब धर्म निरपेक्ष देश है तो धर्म, जाति, सम्प्रदाय के नाम पर वोट क्यों मांगे जा रहे है। सभी राजनीतिक दलों में वंशवाद का घुन लगा हुआ है। अपने बाद अथवा अपने रहते हर नेता अपने निर्वाचन क्षेत्र को पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करने लगा है। विशेषज्ञता प्राप्त लोगों को, प्रतिभाशाली लोगों को टिकट नहीं मिल पाते। आज संसद व विधानसभा में हत्या, अपहरण, बलात्कार, रिश्वतखोरी जैसे संगीन अपराधों में आरोपित लोग जनप्रतिनिधि चुने जा रहे है और कानून बना रहे हैं। राजनैतिक दल गन्दगी को साफ करने के ऐलान करते हैं परन्तु धनबल, बाहुबल, जातीय समीकरण में फिट बैठने वाला ही उम्मीदवार होता है। दल बदल कर आने वाले को टिकट देने में प्राथमिकता ही नहीं पूरा आश्वासन दिया जा रहा है।

आम चुनाव भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा स्रोत हे। आज चुनावी चन्दे व चुनाव खर्च, कालेधन से हो रहा है। आज पेड न्यूज व मतदाताओं को रिश्वत देने की प्रणाली खुले रूप से चल रही है। मतदान पूर्व विभिन्न सरकारी घोषणाओं से भी मतदाता को प्रभावित करने का घृणित प्रयास हो रहा है।

राजनैतिक दल व मतदाता जब तक देश को प्राथमिकता देने का साहस नहीं करेंगे, राजनीत को साफ करने की हिम्मत नहीं करेंगे, यह संभव नहीं होगा। राजनैतिक दलों को लोक मर्यादाओं में लाना मतदाता के हाथ में ही है।
अमेरीका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रेकलिन रूश्जलवेल्ट ने कहा था ‘‘लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक मतदाता बुद्धिमता से अपना प्रत्याशी नहीं चुनते। लोकतंत्र की रक्षा करने वाला कोई तत्व है तो शिक्षित व देश के प्रति सोच रखने वाला मतदाता ही है।

भारत के लोग गर्व करते हैं कि 70 वर्षो तक संसदीय लोकतंत्र सफलतापूर्वक चलता रहा है परन्तु हमारे जनप्रतिनिधियों के प्रतिनिधि होने पर ही प्रश्न चिन्ह लगने लगा है। संसदीय जीवन लाभकारी व्यवसाय बन गया हैं समाज को देने की अपेक्षा अधिकाधिक लेने वाला बना दिया। मतदाता यदि चेत जाय तो संसदीय संस्थाओं का गौरव सम्मान लौट सकता है। राजनीति साम्प्रदायिता, अपराधिकरण, भ्रष्टाचार से मुक्ति पायेगी और लोकतंत्र प्रशस्त होगा।



Tuesday, January 31, 2017

चुनाव और लोकतंत्र

राजनीति, लोकतंत्र और लोकसभा से जुड़े हुए व्यक्ति क्या सोचते हैं? हमारा सीधा संबंध उससे नहीं है। चुनाव की पद्धति कैसी है? इस पर विचार का मुद्दा अलग हो सकता है। वर्तमान प्रश्न है। लोकतंत्रीय पद्धति से जुड़ा चुनाव और चुनाव के समय पेश आने वाली समस्याएं। चुनाव में प्रासंगिक रूप में जो समस्याएं पैदा होती हैं, वे समस्याएं सचमुच विचारणीय हैं और हो सकता है कि उन समस्याओं का समाधान खोजते समय लोकतांत्रिक प्रणाली के कुछ विषयों पर हमें कुछ नया चिंतन करना पड़े।

मैंने बहुत बार कहा है कि प्रतिबिम्ब को सुधारा नहीं जा सकता। बिम्ब को ही पकड़ना होगा। प्रवृत्ति को ही सुधारा जा सकता है, परिणाम को नहीं सुधारा जा सकता। बिम्ब और मूल प्रवृत्ति तक जाना जरूरी है। समाज में अनेक बुराइयां हैं। उनका प्रतिबिम्ब जो चुनकर आते हैं, उन पर भी आता है। कार्य की दृष्टि से तुलना करें तो एक बड़ा दायित्व लेकर जो व्यक्ति आते हैं, इतने बड़े राष्ट्र की डोर हाथ में थामते हैं, वे हाथ कैसे होने चाहिए? यह महत्त्वपूर्ण है।

सबसे पहले उम्मीदवार की योग्यता पर विचार करना चाहिए। उसके लिए एक आचार-संहिता का होना अनिवार्य है। वह लोकसभागत हो सकती है। क्या आने वाले व्यक्ति के लिए नैतिक मूल्यों के प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था है? जो इतना बड़ा दायित्व संभाले, वह नैतिक मूल्यों से कितना ओत-प्रोत होना चाहिए? महामात्य कौटिल्य ने राजनीतिशास्त्रा लिखा। उन्होंने शासक के लिए जो आचार-संहिता दी, उसे देखें तो एक साधु की-सी आचार-संहिता लगती है। उसे संयमी होना चाहिए। जितेन्द्रिय होना चाहिए। जो विशेषण एक मुनि के लिए आते हैं, वे ही विशेषण एक शासक के लिए दिए गए हैं।

एक साधारण व्यक्ति के लाखों-करोड़ों के व्यापार में भी गड़बड़ी की संभावना रहती है। इतने बड़े राष्ट्र का संचालन करने वाले के हाथों में अरबों-खरबों के व्यय का अधिकार रहता है। यदि शासक बहुत त्यागी, जितेन्द्रिय और संयमी नहीं है और इस स्थिति में भी भ्रष्टाचार न हो तो इसे एक आश्चर्य मानना चाहिए।

भारत में अनेक जातियां हैं। जातियां प्रारंभ से ही रहीं हैं किंतु चुनाव के समय जातिवाद का जो उन्माद पैदा होता है, वह हिंसा को उद्दीपन देता है। संप्रदाय होना कोई बुरा नहीं है। संप्रदाय तो गुरु-परंपरा है किंतु चुनाव के समय जो सांप्रदायिक उन्माद आता है, वह हिंसा को उद्दीप्त कर देता है। पैसा आवश्यक है, क्योंकि वह व्यक्ति और समाज की जरूरत है। किंतु पैसा कहां से आता है? यह देखने की बात है। आपने किसी से लिया है तो उसे चुकाना ही होगा। फिर चाहे कोटा देने के रूप में, लाइसेंस देने के रूप में अथवा और कुछ देने के रूप में उसे चुकाया जाए। प्रतिफल, प्रतिदान दिए बिना दान हो नहीं सकता। देने वाले इस बात को अच्छी तरह जानते हैं। देने वाले किसी- न-किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं। वे बकायदा पक्का हिसाब बना कर रखते हैं कि इतना देना है तो इतना वापस लेना है। ये प्रासंगिक समस्याएं हैं, इन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

सबसे पहले उम्मीदवार की योग्यता का निर्धारण और उसके लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था, विशेषतः नैतिक मूल्यों के प्रशिक्षण की व्यवस्था का होना जरूरी है। लोकसभा के केन्द्रीय कक्ष में गुरुदेव तुलसी ने कहा था ‘‘सबके लिए योग्यता का मानदंड है, पुलिस, थानेदार, कलेक्टर, एस.पी., कमिश्नर, इन सबके लिए एक मानदंड है, प्रशिक्षण की व्यवस्था है। किंतु विधानसभा और लोकसभा के सदस्यों के लिए योग्यता और शिक्षा का कोई मानदंड नहीं है।’’ इतना बड़ा काम और इतने बड़े राष्ट्र के संचालन का दायित्व जिनके कंधों पर होता है, उनकी योग्यता वैसी नहीं होती है तो क्या स्थिति बनती है? ऐसी स्थिति में अस्थिरता, उठा-पठक, दल-बदल ये सारी स्थितिया न हों, यह कैसे हो सकता है? बड़ा आश्चर्य होता है कि न तो शिक्षा का व्यापक प्रसार हो सका, न लोकतंत्र को जीवित रखने वाले मूल्यों के प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था हो पाई। लोकतंत्रा क्या है? इसे भी ठीक से समझ सकें, ऐसा प्रयत्न नहीं किया गया। न जनता प्रशिक्षित है, न उम्मीदवार। प्रशिक्षण के अभाव में जनता और उम्मीदवार दोनों को अपने दायित्व का सम्यक् बोध नहीं हो पाता।

मैं अनेक बार सेक्युलरिज्म की बात सुनता हूँ। इस प्रश्न को बहुत उभारा जाता है पर पंथ-निरपेक्षता में विश्वास किसका है? केवल एक मुद्दा प्रस्तुत करने के लिए, दूसरों पर आरोपित करने के लिए तो हो जाता है, किंतु पंथ-निरपेक्षता और जाति-निरपेक्षता में विश्वास किसी का नहीं है। पिछले लोकसभा चुनाव के समय हम बीकानेर में थे। जो लोकसभा चुनाव में खड़े हुए थे, वे परिचित थे। उस समय सब हिसाब किया हुआ था कि यहाँ जैनों के वोट इतने हैं, अमुक जाति के वोट इतने हैं। इसके आधार पर ही सारे दलों ने वैसा निर्धारण किया था। चुनाव के समय खुलकर ऐसा होता है। क्यों होता है ऐसा? इसलिए कि संप्रदाय-निरपेक्षता और जाति-निरपेक्षता में हमारी आस्था नहीं है। क्या यह केवल एक चुनावी मुद्दा है? इस प्रश्न को गहराई से उभारें और चिंतन करें कि समस्या का समाधान कैसे हो? प्रशिक्षण की व्यवस्था कैसी हो? यह महत्त्वपूर्ण मुद्दा हो सकता है, जिसे आगे बढ़ना चाहिए।
अनेक बार अस्थिरता की बात सामने आती है। ऐसा क्यों होता है? क्या ऐसा चिंतन किया जा सकता है। जिस पार्टी का हिन्दुस्तान के आधे से अधिक प्रांतों में कोई अस्तित्व न हो, केवल कुछेक प्रांतों में ही अस्तित्व हो, उसे लोकसभा के चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं होना चाहिए? विधानसभा या क्षेत्राीय चुनावों की बात अलग है। किंतु व्यापक स्तर पर यह होता है तो पार्टियां भी ज्यादा होती हैं। पार्टियां ज्यादा होने का मतलब है एक प्रकार की अस्थिरता की संभावना।
साझा सरकार की योग्यता बहुत बड़ी होती है। जितने दल मिलते हैं, एक सिद्धांत और निष्ठा के साथ मिलते हैं तो साझा सरकार का प्रयोग सबसे बढ़िया प्रयोग है। अनेकांत की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है सबको एक साथ लेकर चलना। गौणता और मुख्यता किसको देनी, यह विवेक होता है। अनेकांत का एक क्रम है। आचार्य अमृतचंद्र ने लिखा ग्वालन बिलौना करती है। बिलौने का क्रम यह है कि एक हाथ आगे आएगा और एक हाथ पीछे जाएगा। फिर पीछे वाला हाथ आगे आएगा और आगे वाला हाथ पीछे जाएगा। यदि दोनों हाथ आगे रहना चाहें तो बिलौना नहीं हो सकता, नवनीत नहीं निकल सकता। गौण और मुख्य का इतना सामंजस्य हो सके, कभी कोई गौण और कभी कोई मुख्य हो जाए तो साझा सरकार चल सकती है। गति का क्रम भी यही है। मैंने ‘चिंतन का परिमल’ का एक गद्य सुनाया।
मैंने आगे बढ़ते पैर से पूछा ‘तुम बड़े हो?’
उसने उत्तर दिया-‘नहीं’।
‘फिर आगे क्यों?’-उसके गर्व को सहलाते हुए मैंने कहा।
उसने उत्तर दिया-‘गति का यही क्रम है।’
मैंने पीछे रहे पैर से पूछा-‘तुम छोटे हो?’
उसने उत्तर दिया-‘नहीं।’
‘फिर पीछे क्यों?’-उसके गर्व पर हल्की-सी चोट करते हुए मैंने कहा।
उसने उत्तर दिया-‘गति का यही क्रम है।’
मैंने दूसरे ही क्षण देखा-आगे वाला पैर पीछे है और पीछे वाला आगे। मैं मौन नहीं रह सका। मैं कह उठा-‘यह क्यों?’
दोनों ने एक स्वर में उत्तर दिया-‘गति का यही क्रम है।’
मैं विस्मयकारी आँखों से देखता रहा-
वे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते चले जा रहे थे।
गति तभी होती है, जब एक पैर आगे रहता है और दूसरा पीछे। यदि यह आग्रह हो जाए कि दोनों पैर बराबर चलेंगे तो गति नहीं हो सकती।
साझा सरकार का प्रयोग अनेकांत की दृष्टि से बहुत व्यावहारिक और महत्त्वपूर्ण होता है, किंतु समुचित सामंजस्य हो, तभी यह संभव है। जहां अपना-अपना आग्रह होता है, वहां अस्थिरता पैदा होती है। इस संदर्भ में सबसे सुंदर विकल्प है, द्विदलीय प्रणाली। जहां केवल दो बड़े दल होते हैं, वहां न बार-बार चुनाव की स्थिति आती है और न अस्थिरता की स्थिति आती है।

चुनाव-प्रणाली कैसी हो? इस पर चिंतन होना चाहिए। दूसरा प्रश्न है- चुनाव के समय उपजने वाली जो प्रासंगिक समस्याएं हैं, उन्हें कैसे मिटाएं? चुनाव की प्रक्रिया स्वस्थ कैसे बने? क्या यह संभव हो सकता है कि चुनाव प्रचार की बात समाप्त हो जाए। जितने उम्मीदवार खड़े हों, उनका एक मंच हो। उस मंच पर जिसको जो कहना है, कहे। प्रचार उस मंच से ही हो। न सैकड़ों जीपें घुमाने की जरूरत है और न पानी की तरह पैसा बहाने की आवश्यकता। केवल इतना होना चाहिए। प्रत्येक उम्मीदवार ने अपनी बात कह दी, अब जनता जिसे चुनना चाहे, उसे चुन ले। यदि ऐसा संभव हो तो अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है।
एक सांसद का क्या आचरण होना चाहिए? इस संदर्भ में पुराना मत बहुत महत्त्वपूर्ण है। जैसे चाणक्य ने कौटिल्य के अर्थशास्त्रा में लिखा है, वैसे ही जैन आचार्य सोमप्रभ ने ‘नीतिवाक्यामृत’ में लिखा है। उसकी एक सुंदर सूक्ति है।

क्क  यः संसदि परदोषं शंसति, स स्वदोषबहुत्वमेव ख्यापयति।
क्क  संसदि शत्राुं न परिक्रोशेत्।
स जो संसद में पर-दोष का आख्यान करता है, वह अपने दोष बहुत्व का ख्यापन करता है।
स संसद में शत्रु पर परिक्रोश मत करो।

सज्जन आदमी वह होता है, जो संसद में किसी का दोष प्रकाशित नहीं करता। किंतु आज क्या हो रहा है? चुनाव के समय क्या होता है? दूसरे दल की कमजोरी का जितना प्रकाशन कर सकें, उसके गुप्त रहस्यों और मर्मों का जितना उद्घाटन कर सकें, उसको जितना नीचा दिखा सकें, उसकी जितनी बुराइयां बता सकें, उतना ही अपने हित में माना जाता है। सोच यह रहती है कि इससे जनता में अच्छा समर्थन मिलेगा, विजय मिलेगी। इस चिंतन के आधार पर आरोप-प्रत्यारोप चलते हैं। जो भारतीय संस्कृति की मौलिक चिंतनधारा थी, उस पर विचार कहां हो रहा है? जो कहना है, उसे एक मंच पर कहा जाए, जिस गाँव में जाना हो, सब एक साथ जाएं। व्यक्तिशः प्रचार न हो तो न बहुत मिथ्या भाषण होगा, न मिथ्या आरोप होगा, न चुनाव में बहुत व्यय की संभावना होगी। कहा जा रहा है कि चुनाव-खर्च की व्यवस्था सरकार करे। सरकार सब उम्मीदवारों को एक मंच पर ले आए, सबको अपनी बात कहने का अवसर मिल जाए तो अन्य कोई झंझट नहीं रहेगा। इन सारे पहलुओं पर विचार करें, सोचें। क्या यह संभव है? यदि यह संभव हो सके तो चुनाव की बहुत सारी समस्याओं और उस समय पनपने वाली बुराइयों का उन्मूलन हो सकता है।

अणुव्रत चुनाव के संदर्भ में नैतिक मूल्यों के विकास की बात करता है। वर्तमान में चुनाव नैतिक मूल्यों को बाधा पहुँचाने वाली प्रक्रिया है। चाहे भ्रष्टाचार का प्रश्न हो, हिंसा को बढ़ावा देने की बात हो, जातिवाद की उग्रता और सांप्रदायिक उन्माद का प्रश्न हो, इन सबको उद्दीपन चुनाव में मिलता है। इसे कैसे रोका जाए? कैसे योग्यता का मानदंड निर्धारित किया जाए? और कैसे उम्मीदवार को प्रशिक्षण मिले? ये ज्वलंत प्रश्न हैं। केवल पुस्तकीय प्रशिक्षण नहीं होना चाहिए। संयम का व्यावहारिक और प्रायोगिक प्रशिक्षण मिलना चाहिए, जिससे चेतना का इतना रूपांतरण हो जाए कि समय आने पर भी मनुष्य गलत काम कभी न करे।

Monday, January 30, 2017

लोकतंत्र को चुनौती


अजय शर्मा
आज भूख की समस्या बड़ी विकट है। पोषक खाद्य की बात दूर है, लाखों लोगों को अपोषक खाद्य भी बड़ी कठिनाई से मिल रहा है। पेट भरा हो तो आदमी और हजार कठिनाइयों को झेल लेता है पर जब वही खाली हो तो आदमी की सारी सहिष्णुता नष्ट हो जाती है। भूखा आदमी वह सब कुछ कर सकता है, जिसकी भरपेट भोजन मिलने पर कल्पना भी नहीं की जा सकती।

आज हिन्दुस्तान दो धाराओं के बीच में से गुजर रहा है। एक ओर वह जनतंत्रा को विकसित करने का प्रयत्न कर रहा है, दूसरी ओर खाद्य की समस्या उसे तानाशाही की ओर धकेल रही है। राज्य-अधिकारियों और व्यापारियों के लिए यह चुनाव का समय है। अब उन्हें साफ-साफ निर्णय करना है कि वे क्या चाहते हैं। जनतंत्र या तानाशाही? यदि वे जनतंत्र पसंद करते हैं तो उसे कमजोर बनाने का प्रयत्न न करें। रिश्वत लेने, अनाज को जमा रखने व अनुचित लाभ कमाने की प्रवृत्ति से जनतंत्रा कमजोर बनता है। भूखी जनता रिश्वत लेने व अनुचित लाभ कमाने वालों के प्रति क्रांति-बिगुल बजा देती है। फिर कानून का स्थान गोली ले लेती है।
क्या आप चाहते हैं कि आपकी पुण्य-भूमि में ऐसा हो? मैं सोचता हूँ कि आप ऐसा कभी नहीं चाहते। आपको अपनी हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति से प्यार है। आप अपने अवतारों और ऋषियों का सम्मान करते हैं। आप उनके ऊँचे-ऊँचे दार्शनिक विचारों और धार्मिक सिद्धांतों को शिरोधार्य करते हैं। त्याग-तपस्या की परंपरा के सामने अपना सिर झुकाते हैं। अहिंसा और अपरिग्रह को उत्कृष्ट धर्म मानते हैं। आप मानते हैं कि सब जीव समान हैं। आप मानते हैं कि सब जीव एक ही परमात्मा के अंश हैं। इतनी गहरी धर्म-निष्ठा, दार्शनिक आस्था, समानता या एकता की मान्यता को रखते हुए क्या पसंद करेंगे कि आपकी मातृभूमि केवल रोटी के दर्शन की प्रयोग-भूमि बन जाए? मैं अपनी आंतरिक आस्था के साथ कहता हूँ कि आप ऐसा नहीं चाहते। आप अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक व दार्शनिक परंपरा को सुरक्षित रखना चाहते हैं। आप असामाजिक कार्य इसलिए नहीं कर रहे हैं कि आपकी हजारों वर्ष पुरानी परम्पराएं खत्म हो जाएं। किंतु आप ये कार्य इसलिए कर रहे हैं कि आपका मन मोह से भर गया है। आपको अपनी सुविधाओं के लिए दूसरों की सुविधाओं को होम करने में कोई संकोच नहीं है। धन पाने के लिए कत्र्तव्य और अकत्र्तव्य का कोई प्रश्न नहीं है। उस मोह का परिणाम यह हो रहा है कि वे भूखें मर रहे हैं। क्या भूख और विलास का योग बहुत समय तक टिक सकेगा?

शासन-तंत्र के अधिकारियों और व्यापारियों की साझेदारी में आज लोकतंत्रा को खुली चुनौती दी जा रही है। राज्य का अधिकारी-वर्ग भ्रष्ट न हो तो व्यापारी भ्रष्ट हो ही नहीं सकता और यदि व्यापारी-वर्ग भ्रष्ट न हो तो अधिकारी-वर्ग भ्रष्ट नहीं हो सकता। दोनों वर्गों की दुर्बलता भ्रष्टाचार को प्रबल बना रही है। इस साझे के व्यापार में लोकतंत्रा की नींव हिलती जा रही है। जनता में रोष उफनता जा रहा है। इस परिस्थिति में उन दोनों वर्गों का लाभ इसी बात में है कि वे तात्कालिक लाभ के लिए दीर्घकालीन लाभ को और अल्प-लाभ के लिए प्रचुर लाभ को चुनौती न दें।

लोकतंत्र को थामने वाले हाथ?
उफनते हुए असंतोष ने लोकतंत्रा को चुनौती दी है, ठीक वैसे ही जैसे उफनता हुआ दूध अग्नि को चुनौती देता है। इस उफान का शमन किया जा सके तो दूध भी उबर सकता है और अग्नि भी, अन्यथा दोनों का भला नहीं है।
इस उफान के नीचे एक ताप है। विषमता का ईंधन अब इतना प्रज्ज्वलित हो उठा है कि केवल दूध में जल की दो-चार बूंदें डालना पर्याप्त नहीं है। ईंधन पर जल डालना भी आवश्यक हो गया है।

एक जमाना था, जब कुछेक लोग शिक्षित होते थे। शिक्षित लोग अशिक्षित जनता पर शासन किया करते थे। आज का जमाना उससे भिन्न है। आज हर व्यक्ति को शिक्षित होने की सुविधा है। शिक्षित जनता अशिक्षित जनता की भांति शासन या जीवन-पद्धति को स्वीकार नहीं कर सकती। विषमता प्राचीन काल में थी पर वह असह्य नहीं थी। उस समय का अभिजात वर्ग ऐश्वर्य को अपने कर्म का फल मानता था तो निम्न वर्ग गरीबी को अपने कर्म का फल मानता था। दोनों के अपने-अपने मूल्य थे। इसलिए असंतोष नहीं था। वर्तमान में भी वर्ग हैं पर उनके सामने अपना-अपना निश्चित मूल्य नहीं है। इस मूल्यहीनता की स्थिति में से ही असंतोष उफन रहा है। लोकतंत्रा की आत्मा धूमिल हो रही है।

जिस दिन लोकतंत्रा के मूल्य स्थापित और स्थिर हो जाएंगे, उसी दिन वास्तविक लोकतंत्रा का उदय होगा। अभी हिन्दुस्तान विकल्पसिद्ध (पूर्व- मान्यतासिद्ध) लोकतंत्रा की स्थिति में चल रहा है। केवल हिंदुस्तान ही नहीं, दुनिया के सभी लोकतंत्रा इसी स्थिति में चल रहे हैं। वास्तविक लोकतंत्रा वह हो सकता है, जहां लोकतंत्रा का मूल्य व्यक्ति, व्यक्ति का मूल्य स्वतंत्राता और स्वतंत्राता का मूल्य समानता हो।

अंतर्विरोध
आधुनिक युग का चिंतन लोकतंत्र की दिशा में प्रवाहित नहीं हो रहा है। परिस्थिति के परिवर्तन पर अतिरिक्त बल दिया जा रहा है। व्यक्ति-परिवर्तन का विचार उसके सामने अकिंचन-सा हो गया है। लोकतंत्रा की दिशा यह है कि व्यक्ति के पीछे परिस्थिति बदले, परिस्थिति के पीछे व्यक्ति बदले, यह परतंत्राता अर्थात् अधिनायकतंत्रा की दिशा है। वर्तमान युग इसी दिशा-बोध से प्रवाहित है, इसीलिए आज आदमी उतना नहीं बदला, जितनी परिस्थितियां बदली हैं। आधुनिक मनुष्य जा रहा है अधिनायकतंत्रा की ओर तथा जाने की बात कर रहा है लोकतंत्रा की ओर। यह अंतर्विरोध इस युग की सबसे बड़ी दुर्घटना है।

केन्द्र है व्यक्ति
मतदान की पद्धति, मतदान और बहुमत प्राप्त दल का सत्तारूढ़ होना। यदि यही लोकतंत्र हो तो इसका अभिनय कहीं भी किया जा सकता है। यह मात्रा उसकी परिधि है। इसका केंद्र है व्यक्ति, जिसे परिस्थिति-परिवर्तन में स्रष्टा की भूमिका प्राप्त है। आज आदमी-आदमी में कितना भेदभाव है। नीग्रो लोगों के प्रति अमेरिकनों के मन में, अफ्रीकियों के प्रति गोरों के मन में तथा हरिजनों के प्रति सवर्ण हिन्दुओं के मन में समानता का भाव नहीं है। अभिजात वर्ग के मन में गरीबों के प्रति सहानुभूति का भाव नहीं है। मानवीय एकता बाहरी आवरणों से आवृत है और उसकी पहचान भी सुलभ नहीं है। इस स्थिति में चुनाव की प्रक्रिया समारोपित प्रक्रिया है। इसे व्यक्ति की स्वतंत्रा चेतना द्वारा स्वीकृत प्रक्रिया नहीं कहा जा सकता।

बुझते दीप में प्राण कौन भरेगा?
जिस व्यक्ति के मन में लोकतंत्रा की पहली किरण फूटी, वह बंधन के परिणामों को भुगतकर मुक्ति पाना चाहता था। जिस व्यक्ति के मन में लोकतंत्रा की पहली धारा बही, वह हिंसा के परिणामों को अनुभव कर अहिंसा की प्रतिष्ठापना करना चाहता था। मुक्ति और अहिंसा इन दो रासायनिक द्रव्यों के घोल का नाम ही लोकतंत्रा है, इसलिए वह स्वतंत्राता और समानता के दर्पण में अपने आपको प्रतिबिम्बित करना चाहता है। इस सच्चाई को हम आज समझें या अगली पीढ़ी के लिए छोड़ दें, कि बंधनों का जाल बिछाकर और विषमता का व्यूह रचकर लोकतंत्रा की स्थापना नहीं की जा सकती और बहुत वर्षों तक चुनाव में सींच-सींचकर उसकी पौध को जीवित नहीं रखा जा सकता।

केवल वे ही हाथ लोकतंत्र के बुझते दीप में प्राण भर सकते हैं, जो अपनी पतंग की डोर अपने-आप थामे हुए हैं और जो स्वतंत्राता की पवित्रा वेदी पर समानता की प्रतिष्ठा करने को प्राणपण से जुटे हुए हैं। क्या चुनाव में बहुमत से विजय की याचना करने वाले हाथ इस शंख-ध्वनि को अपनी पवित्रा अंगुलियों में थामेंगे?

  
Ajay Sharma ( Former  Sr Journalist Hindustan News Paper and Doordarshan, New Delhi) 

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