Wednesday, February 17, 2016

सोशल मीडिया कैसे है अभिव्यक्ति का नया हथियार


आज के मौजूदा समय में लोगों के लिए अभिव्यक्ति के तमाम विकल्प सामने आ रहे हैं, वहीं इस पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया भी पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में चल रही है। जहां कहीं भी सरकार को आंदोलन का धुआं उठता दिखाई देता है, तुरंत सरकार की नजर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर टिक जाती है और सीधे तौर पर अंकुश लगाने से जरा भी नहीं हिचकती है। क्योंकि सोशल मीडिया के ये प्लेटफार्म सिर्फ व्यक्तिगत जानकारियों के लिए ही प्रयोग में नहीं लाए जाते बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मामलों में लोगों की रुचि का भी काम करते हंैं। तो आइए जानने और समझने का प्रयास करते हैं कि क्या है सोशल मीडिया, क्या है इंटरनेट की उपयोगिता सोशल मीडिया में और क्यों है सरकार इसको लेकर सतर्क और सख्त?


सोशल मीडिया क्या है?
सोशल मीडिया एक तरह से दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे उन लोगों से संवाद है जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है। इसके जरिए ऐसा औजार पूरी दुनिया के हाथ लगा है, जिसके माध्यम से वे न सिर्फ अपनी बातों को दुनिया के सामने रखते हैं, बल्कि वे दूसरी की बातों सहित दुनिया की तमाम घटनाओं से अवगत भी होते हैं। इसके यूजर यह बताने से नहीं चूकते कि वे आज किस से मिले, कहां गए, क्या कर रहे हैं, क्या करने की प्लानिंग कर रहे हैं,आज उनका मूड कैसा है, उनकी जिंदगी में क्या हो रहा है।

यहां तक कि सेल्फी सहित तमाम घटनाओं की तस्वीरें भी लोगों के साथ शेयर करते हैं। इतना ही नहीं, इसके जरिए यूजर हजारों हजार लोगों तक अपनी बात महज एक क्लिक की सहायता से पहुंचा सकता है। अब तो सोशल मीडिया सामान्य संपर्क, संवाद या मनोरंजन से इतर नौकरी आदि ढूंढने, उत्पादों या लेखन के प्रचार-प्रसार में भी सहायता करता है।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मैन्युअल कैसट्ल के मुताबिक सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों फेसबुक, ट्विटर आदि के जरिए जो संवाद करते हैं, वह मास कम्युनिकेशन न होकर मास सेल्फ कम्युनिकेशन है। मतलब हम जनसंचार तो करते हैं लेकिन जन स्व-संचार करते हैं और हमें पता ही नहीं होता कि हम किससे संचार कर रहे हैं। या फिर हम जो बातें लिख रहे हैं, उसे कोई पढ़ रहा या देख रहा भी होता है कि नहीं।

इंटरनेट ने बदली जीवनशैली
पिछले दो दशकों से इंटरनेट ने हमारी जीवनशैली को बदलकर रख दिया है। हमारी जरूरतें, कार्य प्रणालियां, अभिरुचियां और यहां तक कि हमारे सामाजिक मेल-मिलाप और संबंधों का सूत्रधार भी काफी हद तक कंप्यूटर ही है। सोशल नेटवर्किंग या सामाजिक संबंधों के ताने-बाने को रचने में कंप्यूटर की भूमिका आज किस हद तक है, इसे इस बात से जाना जा सकता है कि आप घर बैठे दुनिया भर के अनजान और अपरिचित लोगों से संबंध बना रहे हैं। ऐसे लोगों से आपकी गहरी छन रही है, अंतरंग संवाद हो रहे हैं, जिनसे आपकी वास्तविक जीवन में अभी तक मुलाकात नहीं हुई है।। इतना ही नहीं, यूजर अपने स्कूल और काॅलेज के उन पुराने दोस्तों को भी अचानक खोज निकाल रहे हैं, जो आपके साथ पढे, बड़े हुए और फिर धीरे-धीरे दुनिया की भीड़ में कहीं खो गए।
दरअसल, इंटरनेट पर आधारित संबंध-सूत्रों की यह अवधारणा यानी सोशल मीडिया को संवाद मंचों के तौर पर माना जा सकता है, जहां तमाम ऐसे लोग जिन्होंने वास्तविक रूप से अभी एक-दूसरे को देखा भी नहीं है, एक-दूसरे से बखूबी परिचित हो चले हैं। आपसी सुख-दुख, पढ़ाई-लिखाई, मौज-मस्ती, काम-धंधे की बातें सहित सपनों की भी बातें होती हैं।

अमेरिका की कठपुतली
दुनिया की दो अहम सोशल नेटवर्किंग साइट्स फेसबुक और ट्विटर जिसका मुख्यालय अमेरिका में है, पूरी दुनिया पर राज कर रहा है। ज्ञात हो कि फेसबुक की स्थापना 2004 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों ने की थी। शुरुआत में इसका नाम फेशमाश था और जुकेरबर्ग ने इसकी स्थापना विश्वविद्यालय के सुरक्षित कंप्यूटर नेटवर्क को हैक करके किया था। हार्वर्ड विवि में उन दिनों छात्रों के बारे में बुनियादी सूचनाएं और फोटो देने वाली अलग से कोई डायरेक्ट्री नहीं थी। कुछ ही घंटों के भीतर जुकेरबर्ग का प्रयोग लोकप्रिय हो गया लेकिन विवि प्रशासन ने इस पर गहरी आपत्ति जताई और जुकेरबर्ग को विवि से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और उसके बाद फेसबुक ने क्या मुकाम हासिल किया, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है।

नेटवर्किंग की प्रसिद्ध कंपनी सिस्को ने दुनिया के 18 देशों में काॅलेज जाने वाले युवाओं में इस बात को लेकर कुछ वर्ष पहले एक अध्ययन किया था कि वे अपने संभावित कार्यालय में क्या-क्या चाहते हैं। भारत में 81 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे लैपटाॅप, टैबलेट या स्मार्टफोन के जरिए ही काम करना पसंद करेंगे। 56 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे ऐसी कंपनी में काम करना पसंद करेंगे, जहां सोशल मीडिया या मोबाइल फोन पर पाबंदी हो।

वहीं, ट्विटर इस दुनिया में 21 मार्च, 2006 को आया और तक से लेकर आज तक यह नित्य नई बुलंदियों को छू रहा है। पहले ट्विटर को केवल कंप्यूटर में प्रयोग किया जा सकता था लेकिन अब यह टैबलेट, स्मार्टफोन आदि में भी डाउनलोड किया जा सकता है। ट्विटर पर अभी तक सिर्फ 140 शब्दों में लिखने की सुविधा थी लेकिन पिछले दिनों इस पर लिखने की शब्दसीमा को बढ़ाया गया है। आपको बताना चाहूंगा कि ट्विटर के लिए अभी तक सत्तर हजार से भी अधिक प्लेटफार्म पर अलग-अलग एप्लीकेशन बन चुकी हैं।

क्या है सोशल मीडिया का क्षेत्र
अरब में 2011 में हुए आंदोलन में मीडिया खासकर इंटरनेट, मोबाइल तकनीक के अलावा फेसबुक और ट्विटर ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी। लीबिया और सीरिया में भी यही हाल देखने के लिए मिला। इन आंदोलनों के बाद इंटरनेट सेंसरशिप की प्रवृति जिस कदर बढ़ी है, वह किसी से छिपा नहीं है। इसके पक्ष में भले ही बहस की जाती रही है लेकिन हकीकत तो यह है कि अलग-अलग देशों में सेंसरशिप अपने विभिन्न कारणों से है। इंटरनेट पर नियंत्रण करने के लिए कहीं इंटरनेट को ब्लाॅक किया गया तो कहीं काॅपीराइट, मानहानि, उत्पीड़न और अवमानना को हथियार बनाया जा रहा है।

हिन्दुस्तान के गुजरात राज्य में जहां हार्दिक पटेल के आंदोलन ने इंटरनेट की क्षमता का परिचय दिया जिसकी वजह से इंटरनेट को उस वक्त बंद कर दिया गया था, आपको याद होगा कि  मुंबई में बाला साहेब ठाकरे के निधन पर महाराष्ट्र की एक लड़की के कमेंट और उसकी सहेली के द्वारा उस कमेंट को लाइक करने का खामियाजा किस तरह भुगतना पड़ा। इतना ही नहीं, पिछले दिनों सरकार ने व्हाट्सएप के संदेशों को नब्बे दिनों तक सुरक्षित रखने का आदेश दिया लेकिन इस मामले के सामने आ जाने और विरोध के कारण केंद्र सरकार को इस प्रस्ताव को तुरंत वापस लेना पड़ा।

हो रही है निगरानी
अमेरिका में इंटरनेट को सेंसर करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस के सामने कुछ वर्ष पहले ‘सोपा’ और ‘पीपा’ नामक विधेयक लाया गया था और इसके विरोध स्वरूप अंग्रेजी विकिपीडिया कुछ वक्त के लिए गुल की गई थी। इंटरनेट पर निगरानी रख रही संस्थानों का दावा है कि सिर्फ अमेरिका में ही नहीं बल्कि पूर्व एशिया, मध्य एशिया और मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका ऐसे क्षेत्र हैं, जहां सरकार द्वारा इंटरनेट को सख्त किया जा रहा है। 2010 में ओपन नेट इनिशियेटिव ने विश्व के कुल 40 देशों की लिस्ट जारी की थी, जहां की सरकारें इंटरनेट फिल्टिरिंग कर रही हैं। वहीं, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने इंटरनेट स्वतंत्रता संबंधी प्रस्ताव पांच जुलाई 2012 को पारित कर दिया था और परिषद ने सभी देशों से नागरिकों की इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी को समर्थन देने की अपील की थी।

इंटरनेट पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया जारी
सोशल मीडिया की क्षमता और असर को देखते हुए इस पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया भी पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में चल रही है। जहां कहीं भी सरकार को आंदोलन का धुआं उठता दिखाई देता है, तुरंत सरकार की नजर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर टिक जाती है और सीधे तौर पर अंकुश लगाने से नहीं हिचकती है। गौरतलब है कि ये सोशल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ व्यक्तिगत जानकारियों के लिए ही प्रयोग में नहीं लाए जाते बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मामलों में लोगों की रुचि का भी काम करता है। आप याद करें देश की राजधानी दिल्ली में 2012 में हुए गैंग रेप को कि कैसे लोग दोषियों को सजा दिलाने के लिए एकजुट होकर उठ खड़े हुए थे। इन साइटों पर रेप, मर्डर, गर्ल एजुकेशन जैसे पेज प्रमुख थे। हालांकि पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर उठी नफरत की आंधी बेलगाम सोशल मीडिया का नतीजा था और इसका पूरा प्रभाव पूरे देश में देखने को मिला था।

सभी ने माना लोहा
इतना ही नहीं, लोकसभा चुनाव में इसकी पूरी ताकत देखने को मिली। हालांकि अमेरिका में बराक ओबामा सोशल नेटवर्किंग साइट्स की ताकत का लोहा पहले ही दिखा चुके थे। भारत में नरेंद्र मोदी ने इसका भरपूर उपयोग किया और इसका फायदा भाजपा को भी मिला। नरेंद्र मोदी भले ही पूरे चार सौ से अधिक संसदीय क्षेत्र का दौरा किया लेकिन उन्होंने फेसबुक, ट्विटर और यू-ट्यूब के जरिए जिस तरह लोकप्रियता हासिल की, वह एक नया इतिहास है। इसी तरह दो नवयुवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल ने अपने चुनाव और राजनीतिक रणनीति में सोशल मीडिया का जिस तरह से इस्तेमाल किया। वह किसी से छिपा नहीं है।
लोग उनके फेसबुक पर पोस्ट की गई बातों और तस्वीरों को पोस्ट करते, प्रतिक्रिया देते और उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगाते। वहीं, दूसरी ओर, उनके तमाम प्रतिद्वंद्वी उनकी रणनीति की काट पूरे चुनावी समर में सामने नहीं ला पाए और जाहिर सी बात है कि वे चारों खाने चित्त गिरे।

इसलिए सोशल मीडिया का बुद्धिमानी से उपयोग आपको किसी भी बुलंदी पर पहुंचा सकता है, और वहीं लापरवाही भरा इस्तेमाल आपको बदनामी और परेशानी का शिकार बना सकता है। आपको सोशल मीडिया के उपयोग और इंटरनेट की क्षमता का सही आंकलन करना होगा। समझना होगा कि आप क्या और क्यों कर रहे हैं। साथ ही राष्टीय साइबर कानून के साथ- साथ अंतरराष्टीय साइबर कानून की जानकारी भी रखनी होगी।

Sunday, February 7, 2016

हर एक वोट कीमती है, जरा संभल के दोस्तो

एक वोट ने फ्रांस में लोकतांत्रिक सरकार का रास्ता प्रशस्त किया; एक वोट के कारण ही जर्मनी नाजी हिटलर के हवाले हो गया। यह एक वोट ही था, जिसने 13 दिन में ही अटल सरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। एक वोट ने ही कभी अमेरिका की राजभाषा तय की दी थी। यदि एक वोट सरकार बदल सकती है, तो हमारी तकदीर क्यों नहीं? स्पष्ट है कि हमारे एक-एक वोट की कीमत है। अतः हम अपने मत का दान करते वक्त संजीदा हों। हम सोचें कि पांच साल में कोई आकर चुपके से हमारा मत चुरा ले जाता है; कभी जाति-धर्म-वर्ण-वर्ग, तो कभी किसी लोभ, भय या बेईमानी की खिड़की खोलकर और हम जान भी नहीं पाते। यह अक्सर होता है। इन खिड़कियों को कब और कैसे सीलबंद करेंगे हम मतदाता?

यह सच है कि बीते एक दशक में चुनाव को कम खर्चीला बनाने में निर्वाचन आयोग ने निश्चित ही शानदार भूमिका निभाई है; किंतु लोभमुक्त और भयमुक्त मतदान कराने के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अतः निर्वाचन आयोग के चुनाव आयुक्तों को चाहिए कि वे सेवानिवृति के पश्चात् अपने लिए किसी पार्टी के जरिए पद सुनिश्चित करने की बजाय, निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित कराने के लिए संकल्पित हों।

सूचना के अधिकार का सम्मान कर उम्मीदवार व मतदान से जुड़ी ज्यादा से ज्यादा सूचनाओं में शुचिता लाए। मैं समझता हूं कि कम से कम जीते हुए उम्मीदवारों के शपथपत्रों को जांचकर सत्यापित करने का कदम उठाकर निर्वाचन आयोग, शुचिता की दिशा में एक नई शुरुआत कर सकता है। जानकारी गलत अथवा आधी-अधूरी पाई जाने पर पद गंवाने तथा दण्ड के प्रावधानों को और सख्त करने से यह शुचिता सुनिश्चित करने में और मदद मिलेगी।

मतदाता मित्रों! शुचिता सुनिश्चित करने की इस बहस में क्या हमें खुद अपने आप से यह प्रश्न पूछना माकूल नहीं होगा कि यदि भारतीय राजनीति गंदी है, तो इसके दोषी क्या सिर्फ राजनेता हैं? क्या इन्हे चुनने वाले हम मतदाताओं का कोई दोष नहीं? क्या हमारी मतदाता जागरूकता का सारा मतलब, एक वोट डालने तक ही सीमित है? उसके आगे पांच साल कुछ नहीं?हम में से कितने मतदाता हैं, जो पांच साल के दौरान जाकर अपने चुने हुए जनप्रतिनिधी से उसे मिले बजट का हिसाब पूछते हैं? कितने हैं, जो सार्वजनिक हित के वादों को पूरा करने को लेकर जनप्रतिनिधि को समय-समय पर टोकते हैं? सार्वजनिक हित के काम में उसे सहयेाग के लिए खुद आगे आते हैं? हम भूल जाते हैं कि जहां सवाल पूछी होती है, जवाबदेही भी वहीं आती है। यह सवाल पूछी की प्रक्रिया और तेज होनी चाहिए, इसलिए हम यह तो याद रखें कि मतदान हमारा अधिकार है, किंतु कर्तव्य को न भूल जाएं।जाति, धर्म, वर्ग, पार्टी, लोभ अथवा व्यक्तिगत संबंधों की बजाय उम्मीदवार की नीयत, काबिलियत, चिंता, चिंतन, चरित्र तथा उसके द्वारा पेश पांच साल की कार्ययोजना के आधार पर मतदान करना हमारा कर्तव्य है।

लोकतंत्र के निर्माण में हमारी एकमेव भूमिका नहीं है। महज् मतदान कर देने मात्र से हम अपने सपनों का भारत नहीं बना सकते। एक मतदाता के रूप में लोकतंत्र के निर्माण में सहभागिता के लिए जागने की अवधि सिर्फ वोट का एक दिन नहीं, पूरी पांच साल है; एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक।

जैसे चुनाव संपन्न होता है, मतदाता का असल काम शुरू हो जाता है। चुने गये उम्मीदवार को लगातार संवाद के लिए जनमत के अनुरूप दायित्व-निर्वाह को विवश करना। राष्ट्र स्तर पर नीतिगत निर्णयों के लिए सांसद को और हितकारी विधान निर्माण के लिए विधायक को प्रेरित करना व शक्ति देना। एक निगम पार्षद को विवश करना कि वह इलाके का विकास नागरिकों की योजना व जरूरत के मुताबिक करे। ग्रामपंचायत के निर्णयों में ग्रामसभा का साझा सपना झलकना ही चाहिए।

ये हम मतदाता ही हैं, जो कि उम्मीदवार को इस सच्चाई से वाकिफ करा सकते हैं कि चुनाव न हार-जीत का मौका होता है और न ही यह कोई युद्ध है। चुनाव मौका होता है, पिछले पांच साल हमारे जनप्रतिनिधि द्वारा किए गये कार्य व व्यवहार के आकलन का। चुनाव मौका होता है, अगले पांच साल के लिए अपने विकास व विधान की दिशा तय करने का। यह तभी हो सकता है, जबकि मतदाता मतदान के बाद सो न जाये।

हम बीते पांच साल में लोकप्रतिनिधि के कार्य का आकलन भी तभी कर सकते हैं, जब हमारे लिए बनी योजनाओं की हम खुद जानकारी रखें। उनमें लोकप्रतिनिधि, अधिकारी और खुद की भूमिका को हम जानें। उनका सफल क्रियान्वयन सुनिश्चित करें और करायें। उनके उपयोग-दुरुपयोग व प्रभावों की खुद कड़ी निगरानी रखें।
सरकारी योजनाओं के जरिए हमारे ऊपर खर्च होने वाली हर पाई का हिसाब मांगे। लोक अंकेक्षण यानी पब्लिक ऑडिट करें। ’’मनरेगा में काम क्या होगा ? कहां होगा ? यह जिम्मेदारी किसकी है ? - ग्रामसभा की।’’ रेडियो-टीवी पर दिन में कई-कई बार एक विज्ञापन यही बात बार-बार याद दिलाता है। बावजूद इसके यदि ग्रामवासी हर निर्णय की चाबी ग्रामप्रधान को सौंपकर सो जायें, तो वह हर पांच साल में एक गाड़ी बनाएगा ही। तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफिर जाग जरा! क्या करें? कैसे जागें?

अच्छा है कि हमने जागना शुरू कर दिया है। थोड़ा और जागें! वोट से और आगे बढ़ें। राजनेता चुनना बंद करें। लोकनेता चुनना शुरू करें। हम मतदाता खुद अपनी लोकसभा का घोषणा-पत्र बनायें। सभी उम्मीदवार व पार्टियों को बुलाकर उनके समक्ष पेश करें। उनसे संकल्प लें और जीतकर आये जनप्रतिनीधि को उसके संकल्प पर खरे उतरने को न सिर्फ विवश करें, बल्कि सहयोग भी करें।

लूट के रास्तों की बाड़बंदी तभी होगी, प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्य व अधिकार, दोनों का एकसमान निर्वाह करें; वरना् लगाई बाड़ खेत खाएगी ही। सिटी चार्टर सिर्फ पढ़ें नहीं, उसकी पालना के लिए प्रशासन को विवश भी करें। लेकिन यह तभी संभव है कि जब हम मतदाता सकरात्मक, सजग, समझदार व संगठित हों। देशव्यापी स्तर पर निष्पक्ष मतदाता परिषदों का गठन कर यह किया जा सकता है। लोकतंत्र में राजतंत्र की मानसिकता को बाहर का रास्ता दिखाने का यही तरीका है। लोक उम्मीदवारी का मार्ग भी इसी से प्रशस्त होगा। आइये! प्रशस्त करें।

मेरा मानना है कि मतदाता जागरूकता का असल मतलब सिर्फ मतदान नहीं, लोकतंत्र के निर्माण में हर स्तर पर भागीदारी से है, व्यक्तिगत जिम्मेदारियों के निर्वाह से लेकर पदगत व संस्थागत दायित्वों की पूर्ति तक। मेरे पढ़ने, लिखने, कुछ बनने, करने, अधिक से अधिक कमाने.. किसी भी कार्य के पीछे यदि उद्देश्य राष्ट्र निर्माण है, तो मैं सचमुच लोकतंत्र के निर्माण में सच्चा भागीदार हूं। क्या मैं सच्चा भागीदार हूं ? हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए।

हमें समझना चाहिए कि आज दुनिया का यदि कोई सबसे आसान काम है, तो वह है व्यवस्था और सत्ता को गाली देना। दूसरों को भ्रष्टाचारी कहना, निश्चित ही सबसे आसान काम है और खुद को सदाचारी बनाना, निश्चित ही सबसे कठिन काम। खुद को सदाचारी बनाने के लिए जिस संकल्प की जरूरत है, उसकी बात आने पर हम से ज्यादातर विकल्प तलाशते हैं। आज हम इतने सुविधाभोगी हो गए हैं कि अपनी सुविधा के लिए आज हम खुद शॅार्टकट रास्ते तलाशते हैं।
’आउट ऑफ वे’ हासिल करना हम रुतबे की बात मानते हैं। कहते हैं कि इतना तो चलता है। जब तक यह चित्र नहीं बदलेगा, मतदाता जागरूकता आधी-अधूरी ही रहेगी।

यूपी चुनाव में दलितों को नकारना भारी पड़ सकता है

जनवरी में हैदराबाद में एक छात्र द्वारा आत्महत्या किए जाने और तमाम राजनीतिक दलों द्वारा उस घटना को दलितों के अपमान की संज्ञा देने के बाद से उपजे देशव्यापी असंतोष से एक बार फिर दलितों का चुनावी महत्व बड़ा मुद्दा बनकर उभर रहा है। जिस आक्रामकता के साथ कांग्रेस व आम आदमी पार्टी समेत कई दलों ने इस घटना पर हैदराबाद जाकर, और अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रियाएं दीं, उनसे तो यही संकेत दिए जाने की कोशिश हुई है कि भारतीय जनता पार्टी और विशेषतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विचारधारा दलित-विरोधी है।

लेकिन इस घटना के कुछ दिन बाद ही पीएम उत्तर प्रदेश की यात्रा पर आए और उन्होंने लखनऊ में डॉ भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में दलितों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाने की कोशिश की, और लखनऊ में ही अंबेडकर महासभा में सुरक्षित डॉ अंबेडकर की अस्थियों को श्रद्धांजलि दी। दलितों से अपने को जोड़ने की मुहिम में उत्तर प्रदेश की सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी भी पीछे नहीं रही और वहीं मुख्य मंत्री अखिलेश यादव ने लखनऊ में एक दूसरी जगह डॉ अंबेडकर के लिए एक भव्य स्मारक बनाने की घोषणा की।

ज़ाहिर है, बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं आया और उन्होंने कुछ दिन बाद ही पीएम मोदी द्वारा मृत छात्र के प्रति सहानुभूति को नाटक करार दिया। फिर उन्होंने दलितों को आगाह करते हुए यहां तक कह डाला कि वर्तमान केंद्र सरकार यदि कांशीराम को भारतरत्न देने की घोषणा भी करे, तो उन्हें (दलितों को) भ्रमित नहीं होना चाहिए, और वास्तव में बसपा ही दलितों की सच्ची हमदर्द है।

पिछले लोकसभा चुनाव में जिस तरह दलितों के एक बड़े वर्ग ने मुख्यतः उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य प्रदेशों में बीजेपी के पक्ष में अपना समर्थन दिया था, उससे बीजेपी व समाजवादी पार्टी को इस वर्ग की चुनावी शक्ति का अंदाज़ा तो हो ही गया है, और बसपा को भी यह डर सताने लगा है कि यदि दलित वर्ग का एक हिस्सा उससे छिटक गया तो मायावती के लिए अपने को दलितों का एकमात्र नेता सिद्ध कर पाना मुश्किल होगा।

जहां एक ओर बीजेपी ने तो दलितों को अपने साथ जोड़ने की कवायद शुरू कर दी है, वहीं सपा में एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि सपा का नेतृत्व कुछ भी कर ले, दलित कभी भी पार्टी का साथ नहीं देंगे। इसका एक संकेत आने वाले विधान परिषद चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों की सूची से मिलता है। इस सूची में 31 प्रत्याशियों में 16 यादव, चार मुस्लिम, पांच ठाकुर (क्षत्रिय), और एक-एक प्रत्याशी जैन, ब्राह्मण, पटेल, लोध, जाट और गुर्जर समुदाय से हैं। यही नहीं, इस सूची में तरजीह वर्तमान मंत्रियों और अन्य नेताओं के परिवारजनों को दी गई है। स्पष्ट है कि दलितों को नजरअंदाज किए जाने से होने वाले संभावित नुकसान का आकलन समाजवादी पार्टी में हो चुका है।

इसी के साथ समाजवादी पार्टी के यादव-मुस्लिम गठजोड़ की ताकत को सबसे नई चुनौती ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) के असदुद्दीन ओवैसी की ओर से आती दिख रही है, जिन्होंने स्पष्ट तौर पर मुस्लिम और दलित समुदाय को एक करने का आह्वान किया है। ओवैसी को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रदेश में सभा किए जाने की अनुमति पिछले तीन वर्ष से नहीं मिली थी, लेकिन अंततः अनुमति मिलने के बाद उन्होंने गत गुरुवार को फैजाबाद के पास एक सभा में सीधे-सीधे मुस्लिम समुदाय से आगामी उपचुनाव में स्थानीय दलित प्रत्याशी को समर्थन देने की अपील की और उनसे समाजवादी पार्टी की सरकार को उखाड़ फेंकने की अपील भी की।

उत्तर प्रदेश में मायावती पांच बार मुख्यमंत्री पद पर रहीं, लेकिन कुछ अपवादों को छोड़कर प्रदेश भर में दलित वर्ग के रहन-सहन में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। परन्तु इन जातियों के कम से कम साक्षर वर्ग में अपने चुनावी और सामाजिक-राजनीतिक महत्व की समझ ज़रूर आ गई है। इन्हें यदि अपना हित किसी भी अन्य पार्टी में दिखे तो इनका बहुजन समाज पार्टी के साथ जुड़े रहने का कोई कारण नहीं होगा।

दलित वर्ग के सामाजिक-राजनीतिक समीकरण के अनुसार इस समुदाय में जहां एक विशेष जाति का जुड़ाव उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के साथ हमेशा रहा है, वहीं कुछ अन्य अनुसूचित जातियों में अधिकतर परंपरागत तौर पर बीजेपी के लिए लगाव देखा गया है। अन्य प्रदेशों, जैसे बिहार, में यह वर्ग लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल के बजाए जनता दल (यूनाइटेड) और कुछ सीमित तौर पर राम विलास पासवान के साथ है, वहीं महाराष्ट्र और तमिलनाडु में इनका जुड़ाव मजबूती से क्षेत्रीय दलों के साथ ही है।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के अध्यक्ष और कांग्रेस नेता पीएल पूनिया की बढ़ती सक्रियता और आम आदमी पार्टी की पंजाब में बढ़ती पकड़ के आसार तो यही संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दिनों में दलित हित और उनके प्रति प्रतिबद्धता दिखाने की होड़ और तेज़ होने वाली है।