अणुव्रत की चर्चा और ख्याति आज हिन्दुस्तान से लेकर विदेशों तक फैली हुई है। जो आंदोलन आचार्य तुलसी ने 1 मार्च 1949 यानि कि 67 साल पहले शुरू किया था। अब वह नौजवान हो चुका है। सर्वविदित है कि देशी विदेशी मीडिया भी इसकी प्रासंगिकता और सामाजिक सार्थकता को सराह रही है। जिसका श्रेय इसके प्रर्वतक, श्रावकों, संवाहकों और मुनियों को जाता है। जिन्होंने अणुव्रत आचार संहिता की मशाल जन जन तक पहुंचाने का काम किया है।
पिछले 67 सालों में अणुव्रत ने एक बहुत ही संघर्षपूर्ण लंबी यात्रा की है। इस यात्रा के दौरान देश की जनसंख्या के साथ साथ कई पीढ़ियां भी बदल गई। संसार के हालात और समस्याओं में भी बदलाव आया है। अणुव्रत आंदोलन को लेकर जन मानस में एक नई जिज्ञासा उत्पन्न हो रही है। खासकर आज की युवा पीढी में कि वह अणुव्रत आंदोलन के बारे में संपूर्ण जानकारी चाहती है। इसलिए इस विषय पर चिंतन किया गया और इस निष्कर्ष पहुंचा गया कि अपने में संपूर्ण जानकारी समेटे एक बुक प्रकाशित की जाए।
अणुव्रत का नाम सुनते ही कुछ लोगों में एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि आखिरकार अणुव्रत है क्याघ् अणुव्रत के मायने क्या हैंघ् जिज्ञासा का भाव उस वक्त और बढ़ जाता है जब श्अणुव्रत आंदोलनश् शब्द का इस्तेमाल किया जाता है।
सबसे पहले बात करते हैं अणुव्रत के अर्थ के बारे में
अणुव्रत का अर्थ है छोटे-छोटे संकल्प। अणुव्रत स्वस्थ समाज संरचना हेतु 11 सूत्रीय आचार संहिता है। अहिंसा, मानवीय एकता, सांप्रदायिक सौहार्द, प्रामाणिकता, साधन शुद्धि, व्यसन मुक्ति, चुनाव शुद्धि एवं पर्यावरण शुद्धि को केन्द्र में रखकर आचार्य तुलसी ने 11 सूत्रीय अणुव्रत आचार संहिता एवं वर्गीय अणुव्रत बनाये।
इस प्रकार स्पष्ट है कि अणुव्रत चरित्र प्रधान जीवन दर्शन, असाम्प्रदायिक धर्म एवं नैतिकता का राजमार्ग है, जो वर्तमान का मूल्यांकन कर समस्या-समाधान के सूत्र प्रस्तुत करता है। अणुव्रत इच्छाओं के अल्पीकरण और भोग के परिसीमन का संकल्प भी है।
अब प्रश्न यह उठता है कि अणुव्रत की नींव किन परिस्थतियों में और क्यों पड़ी। इसको समझने और जानने के लिए थोड़ा सा इतिहास में झांकना पड़ेगा।
बात उस वक्त की है जब हिन्दुस्तान 15 अगस्त 1947 में अग्रेजों की हुकूमत से आजाद हुआ था। हिन्दुस्तान पाकिस्तान के साथ बंटवारे की आग में जल रहा था। दोनों तरफ नफरत, बर्बरता, हिंसा और कत्लेआम चल रहा था। जमीनें रक्तरंजित थी। महिलाओं का अपहरण और बलात्कार, अबोध बच्चों की हत्या, क्या जवान और क्या बुर्जुग सभी हिंसा की बलिवेदी पर चढ़ रहे थे। यह वह दौर था जब सही को गलत से अलग करने का फर्क मिट चुका था। भाई भाई से लड़ रहे थे, एकता और संघ की भावना कहीं नहीं थी। इस सब की वजह के रूप में भाषा, नस्ल और धर्म की विवधिता को देखा और समझा जा रहा था। लोगों में राजनीतिक और सामाजिक चेतना की पहचान का अभाव था। आजादी से पहले के संघर्ष के दौरान क्रांतिकारी नेताओं गोखले, तिलक और महात्मा गांधी जैसे सरीखे नेताओं ने विभिन्न भाषा भाषी समुदायों, धार्मिक समूहों और जातियों के बीच पुल बनाने पर ज्यादा ध्यान दिया। हालांकि ये कोशिशें कभी पूरी तरफ से कामयाब नहीं हो पाईं। इसीलिए जब 1947 में आजादी मिली तो वह दो देशों हिन्दुस्तान और पाकिस्तान को मिली न की सिर्फ हिन्दुस्तान को।
आजादी तो मिली थी लेकिन इसके साथ ही मुल्क का बंटवारा भी हो गया था। पिछले बारह महीनों से हिन्दुस्तान लगातार हिंदू और मुसलमानों के बीच दंगों का गवाह रहा था। जो हिेसा कलकत्ता में 16 अगस्त 1946 को शुरू हुई और पूरे बंगाल के अदरूनी हिस्सों में मारकाट मची रही। इस दंगे ने बिहार, संयुक्त प्रांत और पंजाब को अपनी चपेट में ले लिया। पंजाब में तो यह हिंसा और नर संहार इतना भीषण रहा कि इसने पुराने सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे। सन् 1946.47 के खून खराबे ने महात्मा गांधी को अंदर तक तोड़ दिया था। वह 77 साल का वृद्ध, कीचड़ और चट्टानों से भरे कठिन इलाकों में दंगा पीड़ितों को सांत्वना देता घूम रहा था। अपनी सात सप्ताह की यात्रा के दौरान गांधी जी ने 116 मील की यात्रा की, जिसमें ज्यादातर वे पैदल चले। उन्होंने करीब सौ जगह गांव वालो को संबोधित किया। इसके बाद उन्होंने बिहार और दिल्ली की यात्रा की। दस्तावेजों के मुताबिक 13 अगस्त 1947 को महात्मा जी कलकत्ता के मुस्लिम बाहुल्य इलाके बेलियाघाट में थे। सेना के दस्तावेजोें के मुताबिक कलकत्ता के दंगों का बदला नोआखली में लिया गया। नोआखली का बदला बिहार में, बिहार का बदला गढ़ मुक्तेश्वर में लिया गया और गढ़ मुक्तेश्वर का बदला
आंकड़ों के मुताबिक बंटवारे में एक करोड़ लोग इधर से उधर हुए। वे लोग कहीं बैलगाड़ी से, कभी टृेन से तो कभी पैदल ही अपना घरबार छोड़कर दूसरी जगह से जा रहे थे। कभी वे सेना की सुरक्षा में सफर करते तो कभी अपनी तकदीर या अपने ईश्वर पर यकीन करते। यह मानवीय इतिहास का सबसे बड़ा मानवीय विस्थापन था। ज्ञात इतिहास में इतने कम दिनों में किसी भी जगह इतने लोगों का शरणार्थियों के काफिलों के रूप में विस्थापन नहीं हुआ। एक प्रत्यक्षदर्शी पत्रकार के मुताबिक ..... उन्होंने गर्मी, बरसात, बाढ़ और पंजाब की कंपकपाने वाली ठंड की परवाह नहीं की। काफिले से उड़नेवाली धूल पूरे इलाके में छा गई और यह धूल लोगों के मन में व्याप्त भय और उनके शरीर से निकलने वाले पसीने से घुलमिल गई। वह धूल मानव मलमूत्र और सड़ती हुई लाशों के साथ मिल गई। जब नफरत का बादल छंटा और लाशों की गिनती की गई तो उसकी तादाद पांच लाख तक पहुंच गई थी, जो बंदूक की गोलियों से, तलवारों से, चाकूओं से, छुरियों से और अन्य महामारियों से मारे गए थे। सैकड़ों की संख्या में ऐसे लोग भी थे जो लूटे पिटे लोग थे जो अपने बर्बाद होते घरों और उजड़ते खेतों को देखकर सदमें में मर गए थे। ऐसी जिदंगी का क्या मतलब था जब जीने की तमाम वजहें खत्म हो जाए और इंसान जंगली बनने पर उतारू हो जाए। अपने सामने मार दिए गए छोटे छोटे बच्चों या कुएं में कूदकर जान दे चुके अपने प्रियजनों को देखने से बेहतर था कि वे खुद भी अपनी जिदंगी खत्म कर लें।
इतिहास साक्षी है कि 31 अगस्त को नोआखली और बेलियाघाटा में दंगे की दोबारा भड़की आग ने गांधी को फिर से झकझोर दिया। इसने फिर से देश को अपनी चपेट में ले लिया। गांधी फिर से उपवास पर चले गए। एक प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक गांधी ने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि अगर में कलकत्ता में शांति बहाल करवा सकता हूं। तो मुझे विश्वास है कि मैं पंजाब में भी ऐसा कर सकता हूं। लेकिन अगर मैं यहां आत्मविश्वास खो देता हूं तो मुझे मालूम है कि हिंसा की यह आग बहुत तेजी से फैल जाएगी। और फिर दो तीन विदेशी शक्तियां हमारे सिर पर सवार हो जाएगी। और हम हाल ही में मिले आजादी के सपने को खो बैंठेगे। यदि इसमें मेरी जान भी चली जाती है तो कम से कम मैं उस दिन को देखने के लिए जिंदा तो नहीं रहूंगा। लेकिन मैं अपने प्रयास से पीछे नहीं हटूंगा।
गांधी ने 2 सिंतबंर को उपवास शुरू किया और कुछ ही दिनों के अंदर हिंदू और मुसलमान गुंडे और असामाजिक तत्वों ने उनके पास जाकर हथियार जमा कर दिए। शहर में फिर से अमन चैन बहाल होने लगा। लार्ड माउंटबेटन ने कहा कि पंजाब में काम कर रहे 50,000 फौज के जवानों की तुलना में बंगाल में एक निहत्था आदमी ज्यादा प्रभावशाली साबित हुआ।
लेकिन इसके बाद दिल्ली के शरणार्थियों को भयमुक्त करने के लिए गांधी अस्पतालों और शरणार्थी शिवरों का दौरा करते रहे और लोगों को सांत्वना देते रहे। उन्होंने लोगों से अपील की, वे अतीत को भूल जाएं और शांति बहाल करने की दिशा में कदम उठाएं। उन्होंने सभी से दिल्ली में शांति बहाले करने की भीख तक मांगी।
इतिहासज्ञाताओं के मुताबिक 26 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी ने एक प्रार्थना सभा में कहा कि बुरा दौर बीत चुका है और हिंन्दुस्तान के लोग साथ मिलकर सभी वर्गाें और मतों को मानने वालों की समानता के लिए काम करेंगे। उन्होंने यह उम्मीद भी जाहिर भी की कि देश में कभी भी बहुसंख्यक वर्ग का वर्चस्व अल्पसंख्यकों के उपर नहीं होने दिया जाएगा, चाहे वह संख्या और प्रभाव में कितने क्यों न हो। उन्होंने यह भी विश्वास जाहिर किया कि भौगोलिक और राजनीतिक रूप से भले ही हिन्दुस्तान का बंटवारा हो गया, लेकिन दिल से हम दोस्त और भाई ही बने रहेंगे। हम एक दूसरे की मदद और सम्मान करते रहेंगे। साथ ही हम बाहरी दुनिया के सामने हमेशा एक ही रहेंगे। एक आजाद और एकीकृत भारत के लिए उन्होंने ताजिदंगी संघर्ष किया। आखिर में उन्होंने धार्मिक दंगे फसाद, असहिष्णुता, कत्ले आम, नरसंहार और बंटवारा जैसी त्रासदी भी झेली। लेकिन कुछ लोग इससे खासे नाराज थे। आखिरकार 30 जनवरी की एक शाम को एक प्रार्थना सभा में एक पूना के ब्राहमण युवक नाथूराम गोडसे ने उन्हंे तीन गोलियां मार दी। अहिंसा के अग्रदूत और मसीहा का अंत कर दिया गया। उस युवक पर मुकदमा चलाया गया लेकिन उसने अपने कृत्य को सही ठहराया। गांधी की मृत्यु से पूरा देश दुख के अथाह सागर में डूब गया।
इसके बाद फिर से धीरे धीरे हिंसा, सांप्रदायिक तनाव, अराजकता, अनैतिकता और असामाजिक प्रवृतियों ने फिर से सिर उठा लिए। राजनीतिक, सामाजिक, और आर्थिक अधिकारों की आवाज को लेकर विभिन्न संस्थाएं संगठित होने लगी। अधिकारों की तीव्र लालसा में सेवा और त्याग की भावना की आधारशिला ही चरमरा गई। कर्तव्य का स्थान अधिकारों ने ले लिया। गांधी के बाद इस तरफ के वातावरण पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए थे जैन परंपरा के तेरापंथ संप्रदाय के नवमाधिपति आचार्य तुलसी। 1948, अक्टूबर माह की बात है जब कुछ प्रगतिशील युवकों को आचार्य तुलसी ने चर्चा करते हुए सुना कि आज के युग में कोई भी व्यक्ति प्रामाणिकता के सहारे नहीं जी सकता, धार्मिक उपदेश अपने स्थान पर हैं पर आज का उनका जीवन में कोई स्थान नहीं है। युवकों की इस विचारधारा ने आचार्य तुलसी को चिंतन करने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने विचारा कि व्यक्ति से ही समिष्ट का निर्माण होता है। बिना नागरिक विकास के कोई भी सामाजिक व्यवस्था टिक नहीं सकती। आज चारो ओर फैली हुई अधार्मिकता, शोषण, हिंसा, दुराचार, अनैतिकता और अशांति को मिटाने के लिए एक सबल क्र्रांति की आवश्यकता है। यह चुप बैठने का समय नहीं है। धर्म मात्र परंपरा निभाने और परिपाटियों का परिचालन करने के लिए नहीं है। वरन धर्म एक जीवंत शक्ति है। इसका ज्ञान कराना होगा। तब ही हम कुछ कर पाएगे। महात्मा गांधी के बलिदान से धर्म, संप्रदाय एवं धर्माचार्यों पर यह नैतिक जिम्मेदारी आई है। केवल संप्रदाय मात्र को चलाना ही धर्म नहीं है वरन धार्मिक आचार विचार के वास्तविक मूल्यों को जन जन में संचार करने के साथ मानवीय आदर्शों को मूर्त रूप् देना ही धर्म का मूल उददेश्य है। मात्र राजनेताओं के आधार पर सुराज्य की कामना करें, यह मृग मरीचका है। हमें नई दिशा लेनी और देनी होगी। तब ही हम जन जीवन में प्रवेश के अधिकारी होंगे।
किसी को कुछ कहूं उसके पूर्व मुझे ही कमर कसनी होगी। हमारे श्रावक प्रतिदिन धर्म स्थान पर आते हैं, साधुओं की उपासना करते हैं। धर्मचर्चा करते हैं। पर धार्मिक व्यक्ति के जीवन में जितना परिवर्तन होना चाहिए उनता दिखाई नहीं दे रहा है। धर्मोपसना की पृष्ठभूमि में जो नीति निष्ठा अपेक्षित है उसके अभाव में धार्मिकता फलवती नहीं हो सकती। नैतिकता की उधेड़बुन में चिंतन का क्रम आगे बढ़ा और इस सोच के साथ ही अणुव्रत विचार क्रांति का अभ्युदय हुआ। सन 1948 अक्टूबर के प्रात कालीन प्रवचन में आचार्य तुलसी ने सिंह घोषण की कि श्धर्म हमारे जीवन में उतरना चाहिए। हमारा जीवन नैतिक एवं प्रामाणिक बने। आज चहंुओर फैली हुई अधार्मिकता, शोषणवृत्ति, हिंसा, दुराचार एवं अशांति को मिटाने के लिए सबल नैतिक क्रांति की जरूरत है। इस सामाजिक क्राति के लिए प्रारंभ में मात्र ऐसे 25 संवाहकों की आवश्यकता है जो सदाचारपूर्ण जीवन जीने के साथ अपने आचार विचार की मशाल जागृत कर नैतिक क्रांति की ओर कूच करें।श्
इस तरह 25 संवाहकों की एक कार्यकत्र्ता वाहिनी का गठन हुआ। दिशा परिवर्तन के लिए एक नई आचार संहिता के निर्धारण की आवश्यकता महसूस हुई। भगवान महावीर द्वारा प्रदत्त श्रावक के व्रतों की आचार संहिता सामने थी। वर्तमान समस्याओं को ध्यान में रख कर एक नई आचार संहिता तैयार की गई। नाम एवं आचार विचारयुक्त एक एक नियम पर विचार करते हुए अणुव्रत नियमावली प्रस्फुटन हुआ। नामकरण, उददेश्य विधान एवं नियमावली पर विचार करने के लिए मुनि श्री नथमल वर्तमान में आचार्य महाप्रज्ञ, मुनि श्री बुद्धमल एवं मुनि श्री नगराज के सानिध्य में एक उपसमिति का गठन किया गया, उसमें श्री देवेन्द्र कुमार कर्णावट, श्री छोगमल चोपड़ा, श्री चंद रामपुरिया एवं श्री मोहन लाल कठौतिया मुख्य थे।
अब बारी थी नई आचार संहिता के नामकरण की, एक लंबे चिंतन के बाद कई सुझाव आए जैसे आदर्श श्रावक संघ, नैतिक मंच, नैतिक आंदोलन, अणुव्रती संघ। मुनि श्री नथमल आचार्य महाप्रज्ञ के सुझाव पर अणुव्रती संघ नाम निर्णीत किया गया।
फाल्गुन शुक्ला द्वितीया वि सं 2005 तदनुसार 1 मार्च 1949 का दिन सरदार शहर चुरू राजस्थान में नई संभावनाओं के साथ उदित हुआ। सूर्योदय के अन्नतर प्रात काल की पुण्यवेला में अणुव्रत आंदोलन का उदघाटन हुआ। अणुव्रत प्रवर्तक आचार्य तुलसी ने नैतिक क्रांति से प्रेरित अपने उदघाटन भाषण में कहा .... धार्मिक मूल्यों में मेरी गहरी आस्था है। मैं उस आस्था को क्रिया काण्ड या उपासना पद्धति में ही सीमित करना नहीं चाहता। मात्र उपासना के धरातल पर टिका हुआ धर्म जीवन को रूपान्तरण की स्थिति में नहीं ला सकता। जहां रूपान्तरण का अवकाश नहीं है। वहां जड़ता अपनी जड़ें जमा लेती है। धर्म का क्रांत और तेजस्वी स्वरूप धार्मिक की चर्या में प्रतिविबिंत हो सकता है। इसके लिए नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा अपेक्षित है। नैतिकता धर्म की पृष्ठभूमि भी है और नियति है।
नैतिकता का वियोग मूच्र्छावस्था का प्रतीक है। इस मूच्र्छा को तोड़कर धर्म के माध्यम से वैयक्तिक और सामाजिक लाभ की अनुभूति करना वर्तमान की सबसे बड़ी अपेक्षा है। जाति, भाषा, प्रांत, संप्रदाय आदि धर्म की व्यापकता में बाधा है। जब तक यह बाधा नहीं टूटती है, धर्म सार्वभौमिक, सार्वजनिक हितों का संवाहक नहीं हो सकता। जाति, भाषा, आदिगत भिन्नता धार्मिक मूल्यों के बीच में दीवार खड़ी न करे तो धर्म प्रसार के साधन विस्तृत हो सकते हैं। किसी भी धर्म के सिद्धांतों को अपनी सहमति देने से पहले मानव धर्म को सहमति देना अपेक्षित है। समाज के लिए भारभूत अर्थहीन रूढ़ परंपराओं को तोड़े बिना धर्म अपने सामाजिक लाभ को अभिव्यक्ति नहीं दे सकती। सादा और सात्विक, प्रामाणिक और निश्चिन्त तथा मानसिक द्वन्द्वों से निर्मुक्त स्वस्थ जीवन जीने के लिए एक नई किन्तु प्राचीन पद्धति का प्रादुर्भाव जन जीवन में नई स्फुरणाओं और संभावनाओं को जन्म देगा, यह मेरा दृढ़ विश्वास है। आचार्य तुलसी ने अपने अभिभाषण में अणुव्रत आंदोलन की भूमिका का महत्व बताते हुए जन जन से अपने कर्तव्य बोध का आह्वन किया। एक ही आह्वन में 73 लोगों ने अपने नाम दिए।
उदघाटन समारोह में घोषित अणुव्रत आचार संहिता के अनुसार अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह आदि के अनुसार सबकी व्याख्या करते हुए छोटे छोटे 75 नियम थे।
यह नैतिक क्रांति का प्रारंभ था। जिसका लोकव्यापी स्वागत हुआ। सरदारशहर अणुव्रत की संस्थापना का आधारभूत केंद्र बना और यहीं से संयम खलु जीवनम्, संयम ही जीवन है का घोष गूंजा। जो धीरे धीरे जनघोष बन गया और हिमालय से कन्याकुमारी तक चहुंओर फैल उठा।
वर्तमान अणुव्रत अनुशास्ता और अहिंसा यात्रा
विश्व क्षितिज को अध्यात्मिक आलोक प्रदाता लोक महर्षि आचार्यश्री महाश्रमण इक्कीसवीं सदी के महान समाज सुधारक है। ‘संयम ही जीवन है’ उद्घोष को मुखरित करने वाले अणुव्रत आंदोलन को आप अणुव्रत अनुशास्ता के रूप में कुशल नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं।
आपका जन्म 13 मई 1962 को राजस्थान के सरदारशहर कस्बे में हुआ एवं 5 मई 1974 को दीक्षित हुए। एक धर्म संप्रदाय के आचार्य होते हुए भी आपके विचार असम्प्रदायातीत है। अहिंसा और नैतिकता की प्रतिष्ठापना के लिए आप सतत् संलग्न है। मानवीय मूल्यों के पुर्नस्थापना एवं कल्याण के फौलादी संकल्प के साथ 30,000 किलोमीटर की आप द्वारा की गई पद्यात्राएं आपके परम पुरुषार्थ की परिचायक है।
अणुव्रत अनुशास्ता वर्तमान युग के ऐसे अध्यात्मिक अशुं माली है जिनकी अध्यात्म रश्मियां से समग्र विश्व अहिंसा का आलोक पाता है। 9 नवम्बर 2014 को दिल्ली के लालकिले से सद्भावना, नैतिकता एवं नशामुक्ति के विशद् प्रचार-प्रसार के उद्देश्यों के साथ अहिंसा-यात्रा का शंखनाद आपका अद्भुत उपक्रम है। जनमानस को लाभान्वित करने वाली इस ऐतिहासिक अहिंसा-यात्रा के लिए राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी, पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री श्री सुशील कोईराला एवं कांग्रेस कमेटी की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी आदि ने शुभ कामना संदेश प्रेषित किये। विभिन्न विभूतियों के साथ-साथ नेपाल के पूर्व उपराष्ट्रपति श्री परमानंद झा भी अहिंसा यात्रा के शुभारंभ में पैदल दिल्ली की सड़कों पर पूज्यप्रवर के साथ प्रस्थित हुए।
लगभग 10,000 किलोमीटर की प्रस्तावित अहिंसा यात्रा भारत के पड़ौसी देश नेपाल, भूटान आदि के साथ-साथ हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, आसाम, मेघालय, सिक्किम, उड़ीसा, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, तेलांगाना, कर्नाटक आदि भारतीय राज्यों को भी अहिंसा के अमृत से आप्लावित कर रही हैं। अणुव्रत महासमिति भी अहिंसा यात्रा में सहभागी होकर गौरवान्वित है।
अणुव्रत अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण के आध्यात्मिक मार्गदर्शन में अणुव्रत महासमिति और उसकी देश-विदेश में फैली 133 समितियां, अणुव्रत विश्व भारती, अखिल भारतीय अणुव्रत न्यास एवं अणुव्रत शिक्षक संसद संस्थान विभिन्न उपक्रमों द्वारा पूरे विश्व में नैतिकता के संदेश को संप्रसारित करने हेतु प्रयासरत है।
।। जय अणुव्रत।।


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