Friday, December 2, 2016

मनुष्य का धर्म क्या है ?



अजय शर्मा
आजकल देश में सामाजिक स्तर पर हालात बेहद चिंताजनक हैं। इसे सामाजिक और इंसानियत में संक्रमण का दौर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। पिछले कुछ समय से देशवासियों के अंदर सांप्रदायिक उग्रता और हिंसात्मक प्रदर्शन देखने सुनने में कुछ ज्यादा ही आ रहे हैं। इन घटनाओं के दौरान पूरे दिन टीवी चैनल पर ऐसी घटनाओं की खबरें और बेबुनियादी बहस प्रसारित की जाती रहती हैं। इन प्रसारणों ने लोगों को जागरूक करने की बजाय उन्माद और कट्टरता को बढ़ावा ही दिया है। देशवासियों में आपसी सौहार्द और भाईचारे की भावना दम तोड़ती साफ देखी जा सकती है। छोटी-छोटी बातों और अफवाहों पर जाति और धर्म संप्रदाय विशेष के अनुयायी सड़कों पर लाठी, पत्थर और हथियार लेकर निकल रहे हैं। विगत कुछ महीनों में कुछ घटनाएं ऐसी हैं जिनका यहां पर जिक्र करना जरूरी है। जिससे आप समझ सकते हैं कि लोगों में धार्मिक उन्माद किस कदर बढ़ा है। चाहे वह नोएडा के पास गौ मांस की अफवाह पर अखलाक की निर्मम हत्या हो, चलती टेन में गौ मांस खाने की संभावना पर साथी यात्री को नीेचे फेंकने की घटना हो, बिहार में भी धार्मिक बवाल देखने के लिए मिला और अभी हाल ही में बंगाल के मालदा की घटना। इसके अलावा पंजाब और गुजरात में गौ रक्षक दलों के द्वारा गो कशी के लिए ले जा रहे पशुओं का जीवन बचाने हेतू ड्ाइवर और उसके सहयोगियों की निर्ममता से सरेआम पिटाई। पशुओं के जीवन बचाने की इस मुहिम में हिंसा इतनी बढ़ गई कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने भाषण में कहना पड़ा कि उन्हें मत मारो, मारना है तो मुझे गोली मार दो। प्रधानमंत्री की पीड़ा को समझा जा सकता है।
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ये उग्रता तथा हिंसात्मक अभिव्यक्ति समाज और देश के लिए खतरे की घंटी है। लोग अपने ही भाई बधुंओं के विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी सहन नहीं कर पा रहे हैं। एक दूसरे पर अमर्यादित और अभद्र भाषा की कीचड़ उछाल रहें हैं। यह समाज के लिए बहुत ही गंभीर हालात हैं।
अणुव्रत भी किसी भी प्रकार की हिंसा और हत्या, असहिष्णुता का विरोध करती है। आचार्य श्री तुलसी द्वारा प्रवर्तित अणुव्रत आचार संहिता अपने 11 सूत्रिय नियमों में मानव को इंसानियत को लेकर जागृत करती है। वह उसके नैतिक उत्थान की बात करती है।

यदि इसके संभावित कारणों पर गौर करें कि ऐसा क्यों हो रहा है। तो कुछ बातें समझ में आती हैं। लोगों में राष्टीयता की भावना शून्य हो गई है। वे जाति, प्रांत और संप्रदाय में बंट गए हंै। लोग हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी और इसके बाद संप्रदाय जैसे सनातन, जैन, वैष्णव इत्यादि में बंट गए हैं। यहां पर संप्रदाय मुख्य हो गए हैं और राष्टीयता गौण हो गई है। ये कौन कर रहा है? क्यों कर रहा है? मैं यहां पर किसी समुदाय या व्यक्ति विशेष का नाम नहीं लेना चाहता हूं। लेकिन ऐसे लोग अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक फायदों के लिए देश की जनता की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहें हैं। एक तरह से ये लोग मानवता के हत्यारे हैं। मनुष्य की धार्मिक भावनाओं को भड़का कर खूनी खेल खेला जा रहा है। ये लोग देश को आर्थिक और सामाजिक आघात पहंुचा रहे हैं।

मैं इन लोगों के बहकावे में आकर इंसान को इंसान ना समझने वाले भोले भाले मनुष्यों से जानना चाहता हूं कि जब आपका कोई भाई बंधु दूसरे देश में जाता है और उससे पूछा जाता है कि आप किस देश के नागरिक हो, तो वह बताता है कि मैं हिन्दुस्तान का नागरिक हूं। तो उस वक्त उसे वहां पर हिन्दुस्तानी कहा जाता है ना हिन्दु, मुस्लिम या सिख ईसाई। तो फिर ये संप्रदाय प्रधान कैसे हो गए। धर्म सिर्फ इंसान की ईश्वर में आस्था का प्रतीक है। संप्रदाय इंसान की पहचान नहीं हो सकता, इंसान की पहचान उसके व्यवहार और चरित्र से होती है। मनुष्य के इस पतन के लिए देश की राजनीति में कुछ स्वार्थी लोग जिम्मेदार हैं। जो राजनीति करने के बजाय मानवता के हत्यारे बने हुए हैं। अपनी राजनीतिक पिपासा के लिए किसी भी हद तक गिरने के लिए तैयार हैं क्योंकि वे जानते हैं भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इन्हें राजनीति में बने रहने के लिए जन समर्थन आवश्यक है। इसलिए इन लोगों ने मनुष्य को संप्रदाय के आधार पर बांटना शुरू कर दिया। जिसके परिणाम दंगों और हत्याओं के रूप में सामने आ रहे हैं। मुझे तो लगता है इस तरह के लोगों को संसद में पहुंचने का अधिकार ही नहीं चाहिए। संसद में दिखने वाले चेहरों को पहले प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। जिससे वह व्यक्तिगत स्वार्थ से उपर उठ कर देश हित में सोचें।

अब सवाल यह उठता है कि ऐसे हालातों और असहिष्णुता को पनपने से कैसे रोका जाए। कैसे लोगों में संप्रदाय से उपर उठकर आपसी सौहार्द और भाई चारे के साथ साथ राष्टीयता की भावना का विकास किया जाए। जिससे प्राणियों में सदभावना हो। इसके लिए मनुष्य को इन जाति, संप्रदाय और प्रांतवाद के छोटे-छोटे समूहों में वर्गीकृत होना छोड़ कर इंसान ही बने रहने का प्रयास करना होगा। जो मानव समाज के लिए बेहतर है।

मैं सभी मानव समाज के साथ साथ जनता द्वारा चुने गए जन प्रतिनिधियों से भी अनुरोध करता हूं कि वे सिर्फ राजनीति करें। मनुष्य की धार्मिक भावनाओं की रक्षा करें। हमारे संविधान के मुताबिक धर्म निरपेक्षता का अर्थ है कि सभी देशवासी अपनी धार्मिक भावनाओं के अनुसार कहीं भी पूजा पाठ कर सकते हैं और दूसरे धर्म का आदर करें। तो ऐसे में सरकार भी राजनीति धर्म का पालन करे। जिससे प्राणियों में सद्भावना हो। धर्म निरपेक्ष राज्य का दायित्व है कि वह धर्म की चिंता करे। मानवीय गुणों के विकास का जो धर्म है उसकी चिंता करे। जिस धर्म का पक्ष केवल नैतिक और चारित्रिक है वही राज्य को मान्य होना चाहिए। इसका तात्पर्य है कि वैदिक, जैन, बौद्ध, ईसाई और इस्लाम आदि राज्य के धर्म नहीं हो सकते।


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