राजनीति, लोकतंत्र और लोकसभा से जुड़े हुए व्यक्ति क्या सोचते हैं? हमारा सीधा संबंध उससे नहीं है। चुनाव की पद्धति कैसी है? इस पर विचार का मुद्दा अलग हो सकता है। वर्तमान प्रश्न है। लोकतंत्रीय पद्धति से जुड़ा चुनाव और चुनाव के समय पेश आने वाली समस्याएं। चुनाव में प्रासंगिक रूप में जो समस्याएं पैदा होती हैं, वे समस्याएं सचमुच विचारणीय हैं और हो सकता है कि उन समस्याओं का समाधान खोजते समय लोकतांत्रिक प्रणाली के कुछ विषयों पर हमें कुछ नया चिंतन करना पड़े।
मैंने बहुत बार कहा है कि प्रतिबिम्ब को सुधारा नहीं जा सकता। बिम्ब को ही पकड़ना होगा। प्रवृत्ति को ही सुधारा जा सकता है, परिणाम को नहीं सुधारा जा सकता। बिम्ब और मूल प्रवृत्ति तक जाना जरूरी है। समाज में अनेक बुराइयां हैं। उनका प्रतिबिम्ब जो चुनकर आते हैं, उन पर भी आता है। कार्य की दृष्टि से तुलना करें तो एक बड़ा दायित्व लेकर जो व्यक्ति आते हैं, इतने बड़े राष्ट्र की डोर हाथ में थामते हैं, वे हाथ कैसे होने चाहिए? यह महत्त्वपूर्ण है।
सबसे पहले उम्मीदवार की योग्यता पर विचार करना चाहिए। उसके लिए एक आचार-संहिता का होना अनिवार्य है। वह लोकसभागत हो सकती है। क्या आने वाले व्यक्ति के लिए नैतिक मूल्यों के प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था है? जो इतना बड़ा दायित्व संभाले, वह नैतिक मूल्यों से कितना ओत-प्रोत होना चाहिए? महामात्य कौटिल्य ने राजनीतिशास्त्रा लिखा। उन्होंने शासक के लिए जो आचार-संहिता दी, उसे देखें तो एक साधु की-सी आचार-संहिता लगती है। उसे संयमी होना चाहिए। जितेन्द्रिय होना चाहिए। जो विशेषण एक मुनि के लिए आते हैं, वे ही विशेषण एक शासक के लिए दिए गए हैं।
एक साधारण व्यक्ति के लाखों-करोड़ों के व्यापार में भी गड़बड़ी की संभावना रहती है। इतने बड़े राष्ट्र का संचालन करने वाले के हाथों में अरबों-खरबों के व्यय का अधिकार रहता है। यदि शासक बहुत त्यागी, जितेन्द्रिय और संयमी नहीं है और इस स्थिति में भी भ्रष्टाचार न हो तो इसे एक आश्चर्य मानना चाहिए।
भारत में अनेक जातियां हैं। जातियां प्रारंभ से ही रहीं हैं किंतु चुनाव के समय जातिवाद का जो उन्माद पैदा होता है, वह हिंसा को उद्दीपन देता है। संप्रदाय होना कोई बुरा नहीं है। संप्रदाय तो गुरु-परंपरा है किंतु चुनाव के समय जो सांप्रदायिक उन्माद आता है, वह हिंसा को उद्दीप्त कर देता है। पैसा आवश्यक है, क्योंकि वह व्यक्ति और समाज की जरूरत है। किंतु पैसा कहां से आता है? यह देखने की बात है। आपने किसी से लिया है तो उसे चुकाना ही होगा। फिर चाहे कोटा देने के रूप में, लाइसेंस देने के रूप में अथवा और कुछ देने के रूप में उसे चुकाया जाए। प्रतिफल, प्रतिदान दिए बिना दान हो नहीं सकता। देने वाले इस बात को अच्छी तरह जानते हैं। देने वाले किसी- न-किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं। वे बकायदा पक्का हिसाब बना कर रखते हैं कि इतना देना है तो इतना वापस लेना है। ये प्रासंगिक समस्याएं हैं, इन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
सबसे पहले उम्मीदवार की योग्यता का निर्धारण और उसके लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था, विशेषतः नैतिक मूल्यों के प्रशिक्षण की व्यवस्था का होना जरूरी है। लोकसभा के केन्द्रीय कक्ष में गुरुदेव तुलसी ने कहा था ‘‘सबके लिए योग्यता का मानदंड है, पुलिस, थानेदार, कलेक्टर, एस.पी., कमिश्नर, इन सबके लिए एक मानदंड है, प्रशिक्षण की व्यवस्था है। किंतु विधानसभा और लोकसभा के सदस्यों के लिए योग्यता और शिक्षा का कोई मानदंड नहीं है।’’ इतना बड़ा काम और इतने बड़े राष्ट्र के संचालन का दायित्व जिनके कंधों पर होता है, उनकी योग्यता वैसी नहीं होती है तो क्या स्थिति बनती है? ऐसी स्थिति में अस्थिरता, उठा-पठक, दल-बदल ये सारी स्थितिया न हों, यह कैसे हो सकता है? बड़ा आश्चर्य होता है कि न तो शिक्षा का व्यापक प्रसार हो सका, न लोकतंत्र को जीवित रखने वाले मूल्यों के प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था हो पाई। लोकतंत्रा क्या है? इसे भी ठीक से समझ सकें, ऐसा प्रयत्न नहीं किया गया। न जनता प्रशिक्षित है, न उम्मीदवार। प्रशिक्षण के अभाव में जनता और उम्मीदवार दोनों को अपने दायित्व का सम्यक् बोध नहीं हो पाता।
मैं अनेक बार सेक्युलरिज्म की बात सुनता हूँ। इस प्रश्न को बहुत उभारा जाता है पर पंथ-निरपेक्षता में विश्वास किसका है? केवल एक मुद्दा प्रस्तुत करने के लिए, दूसरों पर आरोपित करने के लिए तो हो जाता है, किंतु पंथ-निरपेक्षता और जाति-निरपेक्षता में विश्वास किसी का नहीं है। पिछले लोकसभा चुनाव के समय हम बीकानेर में थे। जो लोकसभा चुनाव में खड़े हुए थे, वे परिचित थे। उस समय सब हिसाब किया हुआ था कि यहाँ जैनों के वोट इतने हैं, अमुक जाति के वोट इतने हैं। इसके आधार पर ही सारे दलों ने वैसा निर्धारण किया था। चुनाव के समय खुलकर ऐसा होता है। क्यों होता है ऐसा? इसलिए कि संप्रदाय-निरपेक्षता और जाति-निरपेक्षता में हमारी आस्था नहीं है। क्या यह केवल एक चुनावी मुद्दा है? इस प्रश्न को गहराई से उभारें और चिंतन करें कि समस्या का समाधान कैसे हो? प्रशिक्षण की व्यवस्था कैसी हो? यह महत्त्वपूर्ण मुद्दा हो सकता है, जिसे आगे बढ़ना चाहिए।
अनेक बार अस्थिरता की बात सामने आती है। ऐसा क्यों होता है? क्या ऐसा चिंतन किया जा सकता है। जिस पार्टी का हिन्दुस्तान के आधे से अधिक प्रांतों में कोई अस्तित्व न हो, केवल कुछेक प्रांतों में ही अस्तित्व हो, उसे लोकसभा के चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं होना चाहिए? विधानसभा या क्षेत्राीय चुनावों की बात अलग है। किंतु व्यापक स्तर पर यह होता है तो पार्टियां भी ज्यादा होती हैं। पार्टियां ज्यादा होने का मतलब है एक प्रकार की अस्थिरता की संभावना।
साझा सरकार की योग्यता बहुत बड़ी होती है। जितने दल मिलते हैं, एक सिद्धांत और निष्ठा के साथ मिलते हैं तो साझा सरकार का प्रयोग सबसे बढ़िया प्रयोग है। अनेकांत की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है सबको एक साथ लेकर चलना। गौणता और मुख्यता किसको देनी, यह विवेक होता है। अनेकांत का एक क्रम है। आचार्य अमृतचंद्र ने लिखा ग्वालन बिलौना करती है। बिलौने का क्रम यह है कि एक हाथ आगे आएगा और एक हाथ पीछे जाएगा। फिर पीछे वाला हाथ आगे आएगा और आगे वाला हाथ पीछे जाएगा। यदि दोनों हाथ आगे रहना चाहें तो बिलौना नहीं हो सकता, नवनीत नहीं निकल सकता। गौण और मुख्य का इतना सामंजस्य हो सके, कभी कोई गौण और कभी कोई मुख्य हो जाए तो साझा सरकार चल सकती है। गति का क्रम भी यही है। मैंने ‘चिंतन का परिमल’ का एक गद्य सुनाया।
मैंने आगे बढ़ते पैर से पूछा ‘तुम बड़े हो?’
उसने उत्तर दिया-‘नहीं’।
‘फिर आगे क्यों?’-उसके गर्व को सहलाते हुए मैंने कहा।
उसने उत्तर दिया-‘गति का यही क्रम है।’
मैंने पीछे रहे पैर से पूछा-‘तुम छोटे हो?’
उसने उत्तर दिया-‘नहीं।’
‘फिर पीछे क्यों?’-उसके गर्व पर हल्की-सी चोट करते हुए मैंने कहा।
उसने उत्तर दिया-‘गति का यही क्रम है।’
मैंने दूसरे ही क्षण देखा-आगे वाला पैर पीछे है और पीछे वाला आगे। मैं मौन नहीं रह सका। मैं कह उठा-‘यह क्यों?’
दोनों ने एक स्वर में उत्तर दिया-‘गति का यही क्रम है।’
मैं विस्मयकारी आँखों से देखता रहा-
वे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते चले जा रहे थे।
गति तभी होती है, जब एक पैर आगे रहता है और दूसरा पीछे। यदि यह आग्रह हो जाए कि दोनों पैर बराबर चलेंगे तो गति नहीं हो सकती।
साझा सरकार का प्रयोग अनेकांत की दृष्टि से बहुत व्यावहारिक और महत्त्वपूर्ण होता है, किंतु समुचित सामंजस्य हो, तभी यह संभव है। जहां अपना-अपना आग्रह होता है, वहां अस्थिरता पैदा होती है। इस संदर्भ में सबसे सुंदर विकल्प है, द्विदलीय प्रणाली। जहां केवल दो बड़े दल होते हैं, वहां न बार-बार चुनाव की स्थिति आती है और न अस्थिरता की स्थिति आती है।
चुनाव-प्रणाली कैसी हो? इस पर चिंतन होना चाहिए। दूसरा प्रश्न है- चुनाव के समय उपजने वाली जो प्रासंगिक समस्याएं हैं, उन्हें कैसे मिटाएं? चुनाव की प्रक्रिया स्वस्थ कैसे बने? क्या यह संभव हो सकता है कि चुनाव प्रचार की बात समाप्त हो जाए। जितने उम्मीदवार खड़े हों, उनका एक मंच हो। उस मंच पर जिसको जो कहना है, कहे। प्रचार उस मंच से ही हो। न सैकड़ों जीपें घुमाने की जरूरत है और न पानी की तरह पैसा बहाने की आवश्यकता। केवल इतना होना चाहिए। प्रत्येक उम्मीदवार ने अपनी बात कह दी, अब जनता जिसे चुनना चाहे, उसे चुन ले। यदि ऐसा संभव हो तो अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है।
एक सांसद का क्या आचरण होना चाहिए? इस संदर्भ में पुराना मत बहुत महत्त्वपूर्ण है। जैसे चाणक्य ने कौटिल्य के अर्थशास्त्रा में लिखा है, वैसे ही जैन आचार्य सोमप्रभ ने ‘नीतिवाक्यामृत’ में लिखा है। उसकी एक सुंदर सूक्ति है।
क्क यः संसदि परदोषं शंसति, स स्वदोषबहुत्वमेव ख्यापयति।
क्क संसदि शत्राुं न परिक्रोशेत्।
स जो संसद में पर-दोष का आख्यान करता है, वह अपने दोष बहुत्व का ख्यापन करता है।
स संसद में शत्रु पर परिक्रोश मत करो।
सज्जन आदमी वह होता है, जो संसद में किसी का दोष प्रकाशित नहीं करता। किंतु आज क्या हो रहा है? चुनाव के समय क्या होता है? दूसरे दल की कमजोरी का जितना प्रकाशन कर सकें, उसके गुप्त रहस्यों और मर्मों का जितना उद्घाटन कर सकें, उसको जितना नीचा दिखा सकें, उसकी जितनी बुराइयां बता सकें, उतना ही अपने हित में माना जाता है। सोच यह रहती है कि इससे जनता में अच्छा समर्थन मिलेगा, विजय मिलेगी। इस चिंतन के आधार पर आरोप-प्रत्यारोप चलते हैं। जो भारतीय संस्कृति की मौलिक चिंतनधारा थी, उस पर विचार कहां हो रहा है? जो कहना है, उसे एक मंच पर कहा जाए, जिस गाँव में जाना हो, सब एक साथ जाएं। व्यक्तिशः प्रचार न हो तो न बहुत मिथ्या भाषण होगा, न मिथ्या आरोप होगा, न चुनाव में बहुत व्यय की संभावना होगी। कहा जा रहा है कि चुनाव-खर्च की व्यवस्था सरकार करे। सरकार सब उम्मीदवारों को एक मंच पर ले आए, सबको अपनी बात कहने का अवसर मिल जाए तो अन्य कोई झंझट नहीं रहेगा। इन सारे पहलुओं पर विचार करें, सोचें। क्या यह संभव है? यदि यह संभव हो सके तो चुनाव की बहुत सारी समस्याओं और उस समय पनपने वाली बुराइयों का उन्मूलन हो सकता है।
अणुव्रत चुनाव के संदर्भ में नैतिक मूल्यों के विकास की बात करता है। वर्तमान में चुनाव नैतिक मूल्यों को बाधा पहुँचाने वाली प्रक्रिया है। चाहे भ्रष्टाचार का प्रश्न हो, हिंसा को बढ़ावा देने की बात हो, जातिवाद की उग्रता और सांप्रदायिक उन्माद का प्रश्न हो, इन सबको उद्दीपन चुनाव में मिलता है। इसे कैसे रोका जाए? कैसे योग्यता का मानदंड निर्धारित किया जाए? और कैसे उम्मीदवार को प्रशिक्षण मिले? ये ज्वलंत प्रश्न हैं। केवल पुस्तकीय प्रशिक्षण नहीं होना चाहिए। संयम का व्यावहारिक और प्रायोगिक प्रशिक्षण मिलना चाहिए, जिससे चेतना का इतना रूपांतरण हो जाए कि समय आने पर भी मनुष्य गलत काम कभी न करे।
मैंने बहुत बार कहा है कि प्रतिबिम्ब को सुधारा नहीं जा सकता। बिम्ब को ही पकड़ना होगा। प्रवृत्ति को ही सुधारा जा सकता है, परिणाम को नहीं सुधारा जा सकता। बिम्ब और मूल प्रवृत्ति तक जाना जरूरी है। समाज में अनेक बुराइयां हैं। उनका प्रतिबिम्ब जो चुनकर आते हैं, उन पर भी आता है। कार्य की दृष्टि से तुलना करें तो एक बड़ा दायित्व लेकर जो व्यक्ति आते हैं, इतने बड़े राष्ट्र की डोर हाथ में थामते हैं, वे हाथ कैसे होने चाहिए? यह महत्त्वपूर्ण है।
सबसे पहले उम्मीदवार की योग्यता पर विचार करना चाहिए। उसके लिए एक आचार-संहिता का होना अनिवार्य है। वह लोकसभागत हो सकती है। क्या आने वाले व्यक्ति के लिए नैतिक मूल्यों के प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था है? जो इतना बड़ा दायित्व संभाले, वह नैतिक मूल्यों से कितना ओत-प्रोत होना चाहिए? महामात्य कौटिल्य ने राजनीतिशास्त्रा लिखा। उन्होंने शासक के लिए जो आचार-संहिता दी, उसे देखें तो एक साधु की-सी आचार-संहिता लगती है। उसे संयमी होना चाहिए। जितेन्द्रिय होना चाहिए। जो विशेषण एक मुनि के लिए आते हैं, वे ही विशेषण एक शासक के लिए दिए गए हैं।
एक साधारण व्यक्ति के लाखों-करोड़ों के व्यापार में भी गड़बड़ी की संभावना रहती है। इतने बड़े राष्ट्र का संचालन करने वाले के हाथों में अरबों-खरबों के व्यय का अधिकार रहता है। यदि शासक बहुत त्यागी, जितेन्द्रिय और संयमी नहीं है और इस स्थिति में भी भ्रष्टाचार न हो तो इसे एक आश्चर्य मानना चाहिए।
भारत में अनेक जातियां हैं। जातियां प्रारंभ से ही रहीं हैं किंतु चुनाव के समय जातिवाद का जो उन्माद पैदा होता है, वह हिंसा को उद्दीपन देता है। संप्रदाय होना कोई बुरा नहीं है। संप्रदाय तो गुरु-परंपरा है किंतु चुनाव के समय जो सांप्रदायिक उन्माद आता है, वह हिंसा को उद्दीप्त कर देता है। पैसा आवश्यक है, क्योंकि वह व्यक्ति और समाज की जरूरत है। किंतु पैसा कहां से आता है? यह देखने की बात है। आपने किसी से लिया है तो उसे चुकाना ही होगा। फिर चाहे कोटा देने के रूप में, लाइसेंस देने के रूप में अथवा और कुछ देने के रूप में उसे चुकाया जाए। प्रतिफल, प्रतिदान दिए बिना दान हो नहीं सकता। देने वाले इस बात को अच्छी तरह जानते हैं। देने वाले किसी- न-किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं। वे बकायदा पक्का हिसाब बना कर रखते हैं कि इतना देना है तो इतना वापस लेना है। ये प्रासंगिक समस्याएं हैं, इन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
सबसे पहले उम्मीदवार की योग्यता का निर्धारण और उसके लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था, विशेषतः नैतिक मूल्यों के प्रशिक्षण की व्यवस्था का होना जरूरी है। लोकसभा के केन्द्रीय कक्ष में गुरुदेव तुलसी ने कहा था ‘‘सबके लिए योग्यता का मानदंड है, पुलिस, थानेदार, कलेक्टर, एस.पी., कमिश्नर, इन सबके लिए एक मानदंड है, प्रशिक्षण की व्यवस्था है। किंतु विधानसभा और लोकसभा के सदस्यों के लिए योग्यता और शिक्षा का कोई मानदंड नहीं है।’’ इतना बड़ा काम और इतने बड़े राष्ट्र के संचालन का दायित्व जिनके कंधों पर होता है, उनकी योग्यता वैसी नहीं होती है तो क्या स्थिति बनती है? ऐसी स्थिति में अस्थिरता, उठा-पठक, दल-बदल ये सारी स्थितिया न हों, यह कैसे हो सकता है? बड़ा आश्चर्य होता है कि न तो शिक्षा का व्यापक प्रसार हो सका, न लोकतंत्र को जीवित रखने वाले मूल्यों के प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था हो पाई। लोकतंत्रा क्या है? इसे भी ठीक से समझ सकें, ऐसा प्रयत्न नहीं किया गया। न जनता प्रशिक्षित है, न उम्मीदवार। प्रशिक्षण के अभाव में जनता और उम्मीदवार दोनों को अपने दायित्व का सम्यक् बोध नहीं हो पाता।
मैं अनेक बार सेक्युलरिज्म की बात सुनता हूँ। इस प्रश्न को बहुत उभारा जाता है पर पंथ-निरपेक्षता में विश्वास किसका है? केवल एक मुद्दा प्रस्तुत करने के लिए, दूसरों पर आरोपित करने के लिए तो हो जाता है, किंतु पंथ-निरपेक्षता और जाति-निरपेक्षता में विश्वास किसी का नहीं है। पिछले लोकसभा चुनाव के समय हम बीकानेर में थे। जो लोकसभा चुनाव में खड़े हुए थे, वे परिचित थे। उस समय सब हिसाब किया हुआ था कि यहाँ जैनों के वोट इतने हैं, अमुक जाति के वोट इतने हैं। इसके आधार पर ही सारे दलों ने वैसा निर्धारण किया था। चुनाव के समय खुलकर ऐसा होता है। क्यों होता है ऐसा? इसलिए कि संप्रदाय-निरपेक्षता और जाति-निरपेक्षता में हमारी आस्था नहीं है। क्या यह केवल एक चुनावी मुद्दा है? इस प्रश्न को गहराई से उभारें और चिंतन करें कि समस्या का समाधान कैसे हो? प्रशिक्षण की व्यवस्था कैसी हो? यह महत्त्वपूर्ण मुद्दा हो सकता है, जिसे आगे बढ़ना चाहिए।
अनेक बार अस्थिरता की बात सामने आती है। ऐसा क्यों होता है? क्या ऐसा चिंतन किया जा सकता है। जिस पार्टी का हिन्दुस्तान के आधे से अधिक प्रांतों में कोई अस्तित्व न हो, केवल कुछेक प्रांतों में ही अस्तित्व हो, उसे लोकसभा के चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं होना चाहिए? विधानसभा या क्षेत्राीय चुनावों की बात अलग है। किंतु व्यापक स्तर पर यह होता है तो पार्टियां भी ज्यादा होती हैं। पार्टियां ज्यादा होने का मतलब है एक प्रकार की अस्थिरता की संभावना।
साझा सरकार की योग्यता बहुत बड़ी होती है। जितने दल मिलते हैं, एक सिद्धांत और निष्ठा के साथ मिलते हैं तो साझा सरकार का प्रयोग सबसे बढ़िया प्रयोग है। अनेकांत की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है सबको एक साथ लेकर चलना। गौणता और मुख्यता किसको देनी, यह विवेक होता है। अनेकांत का एक क्रम है। आचार्य अमृतचंद्र ने लिखा ग्वालन बिलौना करती है। बिलौने का क्रम यह है कि एक हाथ आगे आएगा और एक हाथ पीछे जाएगा। फिर पीछे वाला हाथ आगे आएगा और आगे वाला हाथ पीछे जाएगा। यदि दोनों हाथ आगे रहना चाहें तो बिलौना नहीं हो सकता, नवनीत नहीं निकल सकता। गौण और मुख्य का इतना सामंजस्य हो सके, कभी कोई गौण और कभी कोई मुख्य हो जाए तो साझा सरकार चल सकती है। गति का क्रम भी यही है। मैंने ‘चिंतन का परिमल’ का एक गद्य सुनाया।
मैंने आगे बढ़ते पैर से पूछा ‘तुम बड़े हो?’
उसने उत्तर दिया-‘नहीं’।
‘फिर आगे क्यों?’-उसके गर्व को सहलाते हुए मैंने कहा।
उसने उत्तर दिया-‘गति का यही क्रम है।’
मैंने पीछे रहे पैर से पूछा-‘तुम छोटे हो?’
उसने उत्तर दिया-‘नहीं।’
‘फिर पीछे क्यों?’-उसके गर्व पर हल्की-सी चोट करते हुए मैंने कहा।
उसने उत्तर दिया-‘गति का यही क्रम है।’
मैंने दूसरे ही क्षण देखा-आगे वाला पैर पीछे है और पीछे वाला आगे। मैं मौन नहीं रह सका। मैं कह उठा-‘यह क्यों?’
दोनों ने एक स्वर में उत्तर दिया-‘गति का यही क्रम है।’
मैं विस्मयकारी आँखों से देखता रहा-
वे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते चले जा रहे थे।
गति तभी होती है, जब एक पैर आगे रहता है और दूसरा पीछे। यदि यह आग्रह हो जाए कि दोनों पैर बराबर चलेंगे तो गति नहीं हो सकती।
साझा सरकार का प्रयोग अनेकांत की दृष्टि से बहुत व्यावहारिक और महत्त्वपूर्ण होता है, किंतु समुचित सामंजस्य हो, तभी यह संभव है। जहां अपना-अपना आग्रह होता है, वहां अस्थिरता पैदा होती है। इस संदर्भ में सबसे सुंदर विकल्प है, द्विदलीय प्रणाली। जहां केवल दो बड़े दल होते हैं, वहां न बार-बार चुनाव की स्थिति आती है और न अस्थिरता की स्थिति आती है।
चुनाव-प्रणाली कैसी हो? इस पर चिंतन होना चाहिए। दूसरा प्रश्न है- चुनाव के समय उपजने वाली जो प्रासंगिक समस्याएं हैं, उन्हें कैसे मिटाएं? चुनाव की प्रक्रिया स्वस्थ कैसे बने? क्या यह संभव हो सकता है कि चुनाव प्रचार की बात समाप्त हो जाए। जितने उम्मीदवार खड़े हों, उनका एक मंच हो। उस मंच पर जिसको जो कहना है, कहे। प्रचार उस मंच से ही हो। न सैकड़ों जीपें घुमाने की जरूरत है और न पानी की तरह पैसा बहाने की आवश्यकता। केवल इतना होना चाहिए। प्रत्येक उम्मीदवार ने अपनी बात कह दी, अब जनता जिसे चुनना चाहे, उसे चुन ले। यदि ऐसा संभव हो तो अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है।
एक सांसद का क्या आचरण होना चाहिए? इस संदर्भ में पुराना मत बहुत महत्त्वपूर्ण है। जैसे चाणक्य ने कौटिल्य के अर्थशास्त्रा में लिखा है, वैसे ही जैन आचार्य सोमप्रभ ने ‘नीतिवाक्यामृत’ में लिखा है। उसकी एक सुंदर सूक्ति है।
क्क यः संसदि परदोषं शंसति, स स्वदोषबहुत्वमेव ख्यापयति।
क्क संसदि शत्राुं न परिक्रोशेत्।
स जो संसद में पर-दोष का आख्यान करता है, वह अपने दोष बहुत्व का ख्यापन करता है।
स संसद में शत्रु पर परिक्रोश मत करो।
सज्जन आदमी वह होता है, जो संसद में किसी का दोष प्रकाशित नहीं करता। किंतु आज क्या हो रहा है? चुनाव के समय क्या होता है? दूसरे दल की कमजोरी का जितना प्रकाशन कर सकें, उसके गुप्त रहस्यों और मर्मों का जितना उद्घाटन कर सकें, उसको जितना नीचा दिखा सकें, उसकी जितनी बुराइयां बता सकें, उतना ही अपने हित में माना जाता है। सोच यह रहती है कि इससे जनता में अच्छा समर्थन मिलेगा, विजय मिलेगी। इस चिंतन के आधार पर आरोप-प्रत्यारोप चलते हैं। जो भारतीय संस्कृति की मौलिक चिंतनधारा थी, उस पर विचार कहां हो रहा है? जो कहना है, उसे एक मंच पर कहा जाए, जिस गाँव में जाना हो, सब एक साथ जाएं। व्यक्तिशः प्रचार न हो तो न बहुत मिथ्या भाषण होगा, न मिथ्या आरोप होगा, न चुनाव में बहुत व्यय की संभावना होगी। कहा जा रहा है कि चुनाव-खर्च की व्यवस्था सरकार करे। सरकार सब उम्मीदवारों को एक मंच पर ले आए, सबको अपनी बात कहने का अवसर मिल जाए तो अन्य कोई झंझट नहीं रहेगा। इन सारे पहलुओं पर विचार करें, सोचें। क्या यह संभव है? यदि यह संभव हो सके तो चुनाव की बहुत सारी समस्याओं और उस समय पनपने वाली बुराइयों का उन्मूलन हो सकता है।
अणुव्रत चुनाव के संदर्भ में नैतिक मूल्यों के विकास की बात करता है। वर्तमान में चुनाव नैतिक मूल्यों को बाधा पहुँचाने वाली प्रक्रिया है। चाहे भ्रष्टाचार का प्रश्न हो, हिंसा को बढ़ावा देने की बात हो, जातिवाद की उग्रता और सांप्रदायिक उन्माद का प्रश्न हो, इन सबको उद्दीपन चुनाव में मिलता है। इसे कैसे रोका जाए? कैसे योग्यता का मानदंड निर्धारित किया जाए? और कैसे उम्मीदवार को प्रशिक्षण मिले? ये ज्वलंत प्रश्न हैं। केवल पुस्तकीय प्रशिक्षण नहीं होना चाहिए। संयम का व्यावहारिक और प्रायोगिक प्रशिक्षण मिलना चाहिए, जिससे चेतना का इतना रूपांतरण हो जाए कि समय आने पर भी मनुष्य गलत काम कभी न करे।

