Tuesday, January 31, 2017

चुनाव और लोकतंत्र

राजनीति, लोकतंत्र और लोकसभा से जुड़े हुए व्यक्ति क्या सोचते हैं? हमारा सीधा संबंध उससे नहीं है। चुनाव की पद्धति कैसी है? इस पर विचार का मुद्दा अलग हो सकता है। वर्तमान प्रश्न है। लोकतंत्रीय पद्धति से जुड़ा चुनाव और चुनाव के समय पेश आने वाली समस्याएं। चुनाव में प्रासंगिक रूप में जो समस्याएं पैदा होती हैं, वे समस्याएं सचमुच विचारणीय हैं और हो सकता है कि उन समस्याओं का समाधान खोजते समय लोकतांत्रिक प्रणाली के कुछ विषयों पर हमें कुछ नया चिंतन करना पड़े।

मैंने बहुत बार कहा है कि प्रतिबिम्ब को सुधारा नहीं जा सकता। बिम्ब को ही पकड़ना होगा। प्रवृत्ति को ही सुधारा जा सकता है, परिणाम को नहीं सुधारा जा सकता। बिम्ब और मूल प्रवृत्ति तक जाना जरूरी है। समाज में अनेक बुराइयां हैं। उनका प्रतिबिम्ब जो चुनकर आते हैं, उन पर भी आता है। कार्य की दृष्टि से तुलना करें तो एक बड़ा दायित्व लेकर जो व्यक्ति आते हैं, इतने बड़े राष्ट्र की डोर हाथ में थामते हैं, वे हाथ कैसे होने चाहिए? यह महत्त्वपूर्ण है।

सबसे पहले उम्मीदवार की योग्यता पर विचार करना चाहिए। उसके लिए एक आचार-संहिता का होना अनिवार्य है। वह लोकसभागत हो सकती है। क्या आने वाले व्यक्ति के लिए नैतिक मूल्यों के प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था है? जो इतना बड़ा दायित्व संभाले, वह नैतिक मूल्यों से कितना ओत-प्रोत होना चाहिए? महामात्य कौटिल्य ने राजनीतिशास्त्रा लिखा। उन्होंने शासक के लिए जो आचार-संहिता दी, उसे देखें तो एक साधु की-सी आचार-संहिता लगती है। उसे संयमी होना चाहिए। जितेन्द्रिय होना चाहिए। जो विशेषण एक मुनि के लिए आते हैं, वे ही विशेषण एक शासक के लिए दिए गए हैं।

एक साधारण व्यक्ति के लाखों-करोड़ों के व्यापार में भी गड़बड़ी की संभावना रहती है। इतने बड़े राष्ट्र का संचालन करने वाले के हाथों में अरबों-खरबों के व्यय का अधिकार रहता है। यदि शासक बहुत त्यागी, जितेन्द्रिय और संयमी नहीं है और इस स्थिति में भी भ्रष्टाचार न हो तो इसे एक आश्चर्य मानना चाहिए।

भारत में अनेक जातियां हैं। जातियां प्रारंभ से ही रहीं हैं किंतु चुनाव के समय जातिवाद का जो उन्माद पैदा होता है, वह हिंसा को उद्दीपन देता है। संप्रदाय होना कोई बुरा नहीं है। संप्रदाय तो गुरु-परंपरा है किंतु चुनाव के समय जो सांप्रदायिक उन्माद आता है, वह हिंसा को उद्दीप्त कर देता है। पैसा आवश्यक है, क्योंकि वह व्यक्ति और समाज की जरूरत है। किंतु पैसा कहां से आता है? यह देखने की बात है। आपने किसी से लिया है तो उसे चुकाना ही होगा। फिर चाहे कोटा देने के रूप में, लाइसेंस देने के रूप में अथवा और कुछ देने के रूप में उसे चुकाया जाए। प्रतिफल, प्रतिदान दिए बिना दान हो नहीं सकता। देने वाले इस बात को अच्छी तरह जानते हैं। देने वाले किसी- न-किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं। वे बकायदा पक्का हिसाब बना कर रखते हैं कि इतना देना है तो इतना वापस लेना है। ये प्रासंगिक समस्याएं हैं, इन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

सबसे पहले उम्मीदवार की योग्यता का निर्धारण और उसके लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था, विशेषतः नैतिक मूल्यों के प्रशिक्षण की व्यवस्था का होना जरूरी है। लोकसभा के केन्द्रीय कक्ष में गुरुदेव तुलसी ने कहा था ‘‘सबके लिए योग्यता का मानदंड है, पुलिस, थानेदार, कलेक्टर, एस.पी., कमिश्नर, इन सबके लिए एक मानदंड है, प्रशिक्षण की व्यवस्था है। किंतु विधानसभा और लोकसभा के सदस्यों के लिए योग्यता और शिक्षा का कोई मानदंड नहीं है।’’ इतना बड़ा काम और इतने बड़े राष्ट्र के संचालन का दायित्व जिनके कंधों पर होता है, उनकी योग्यता वैसी नहीं होती है तो क्या स्थिति बनती है? ऐसी स्थिति में अस्थिरता, उठा-पठक, दल-बदल ये सारी स्थितिया न हों, यह कैसे हो सकता है? बड़ा आश्चर्य होता है कि न तो शिक्षा का व्यापक प्रसार हो सका, न लोकतंत्र को जीवित रखने वाले मूल्यों के प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था हो पाई। लोकतंत्रा क्या है? इसे भी ठीक से समझ सकें, ऐसा प्रयत्न नहीं किया गया। न जनता प्रशिक्षित है, न उम्मीदवार। प्रशिक्षण के अभाव में जनता और उम्मीदवार दोनों को अपने दायित्व का सम्यक् बोध नहीं हो पाता।

मैं अनेक बार सेक्युलरिज्म की बात सुनता हूँ। इस प्रश्न को बहुत उभारा जाता है पर पंथ-निरपेक्षता में विश्वास किसका है? केवल एक मुद्दा प्रस्तुत करने के लिए, दूसरों पर आरोपित करने के लिए तो हो जाता है, किंतु पंथ-निरपेक्षता और जाति-निरपेक्षता में विश्वास किसी का नहीं है। पिछले लोकसभा चुनाव के समय हम बीकानेर में थे। जो लोकसभा चुनाव में खड़े हुए थे, वे परिचित थे। उस समय सब हिसाब किया हुआ था कि यहाँ जैनों के वोट इतने हैं, अमुक जाति के वोट इतने हैं। इसके आधार पर ही सारे दलों ने वैसा निर्धारण किया था। चुनाव के समय खुलकर ऐसा होता है। क्यों होता है ऐसा? इसलिए कि संप्रदाय-निरपेक्षता और जाति-निरपेक्षता में हमारी आस्था नहीं है। क्या यह केवल एक चुनावी मुद्दा है? इस प्रश्न को गहराई से उभारें और चिंतन करें कि समस्या का समाधान कैसे हो? प्रशिक्षण की व्यवस्था कैसी हो? यह महत्त्वपूर्ण मुद्दा हो सकता है, जिसे आगे बढ़ना चाहिए।
अनेक बार अस्थिरता की बात सामने आती है। ऐसा क्यों होता है? क्या ऐसा चिंतन किया जा सकता है। जिस पार्टी का हिन्दुस्तान के आधे से अधिक प्रांतों में कोई अस्तित्व न हो, केवल कुछेक प्रांतों में ही अस्तित्व हो, उसे लोकसभा के चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं होना चाहिए? विधानसभा या क्षेत्राीय चुनावों की बात अलग है। किंतु व्यापक स्तर पर यह होता है तो पार्टियां भी ज्यादा होती हैं। पार्टियां ज्यादा होने का मतलब है एक प्रकार की अस्थिरता की संभावना।
साझा सरकार की योग्यता बहुत बड़ी होती है। जितने दल मिलते हैं, एक सिद्धांत और निष्ठा के साथ मिलते हैं तो साझा सरकार का प्रयोग सबसे बढ़िया प्रयोग है। अनेकांत की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है सबको एक साथ लेकर चलना। गौणता और मुख्यता किसको देनी, यह विवेक होता है। अनेकांत का एक क्रम है। आचार्य अमृतचंद्र ने लिखा ग्वालन बिलौना करती है। बिलौने का क्रम यह है कि एक हाथ आगे आएगा और एक हाथ पीछे जाएगा। फिर पीछे वाला हाथ आगे आएगा और आगे वाला हाथ पीछे जाएगा। यदि दोनों हाथ आगे रहना चाहें तो बिलौना नहीं हो सकता, नवनीत नहीं निकल सकता। गौण और मुख्य का इतना सामंजस्य हो सके, कभी कोई गौण और कभी कोई मुख्य हो जाए तो साझा सरकार चल सकती है। गति का क्रम भी यही है। मैंने ‘चिंतन का परिमल’ का एक गद्य सुनाया।
मैंने आगे बढ़ते पैर से पूछा ‘तुम बड़े हो?’
उसने उत्तर दिया-‘नहीं’।
‘फिर आगे क्यों?’-उसके गर्व को सहलाते हुए मैंने कहा।
उसने उत्तर दिया-‘गति का यही क्रम है।’
मैंने पीछे रहे पैर से पूछा-‘तुम छोटे हो?’
उसने उत्तर दिया-‘नहीं।’
‘फिर पीछे क्यों?’-उसके गर्व पर हल्की-सी चोट करते हुए मैंने कहा।
उसने उत्तर दिया-‘गति का यही क्रम है।’
मैंने दूसरे ही क्षण देखा-आगे वाला पैर पीछे है और पीछे वाला आगे। मैं मौन नहीं रह सका। मैं कह उठा-‘यह क्यों?’
दोनों ने एक स्वर में उत्तर दिया-‘गति का यही क्रम है।’
मैं विस्मयकारी आँखों से देखता रहा-
वे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते चले जा रहे थे।
गति तभी होती है, जब एक पैर आगे रहता है और दूसरा पीछे। यदि यह आग्रह हो जाए कि दोनों पैर बराबर चलेंगे तो गति नहीं हो सकती।
साझा सरकार का प्रयोग अनेकांत की दृष्टि से बहुत व्यावहारिक और महत्त्वपूर्ण होता है, किंतु समुचित सामंजस्य हो, तभी यह संभव है। जहां अपना-अपना आग्रह होता है, वहां अस्थिरता पैदा होती है। इस संदर्भ में सबसे सुंदर विकल्प है, द्विदलीय प्रणाली। जहां केवल दो बड़े दल होते हैं, वहां न बार-बार चुनाव की स्थिति आती है और न अस्थिरता की स्थिति आती है।

चुनाव-प्रणाली कैसी हो? इस पर चिंतन होना चाहिए। दूसरा प्रश्न है- चुनाव के समय उपजने वाली जो प्रासंगिक समस्याएं हैं, उन्हें कैसे मिटाएं? चुनाव की प्रक्रिया स्वस्थ कैसे बने? क्या यह संभव हो सकता है कि चुनाव प्रचार की बात समाप्त हो जाए। जितने उम्मीदवार खड़े हों, उनका एक मंच हो। उस मंच पर जिसको जो कहना है, कहे। प्रचार उस मंच से ही हो। न सैकड़ों जीपें घुमाने की जरूरत है और न पानी की तरह पैसा बहाने की आवश्यकता। केवल इतना होना चाहिए। प्रत्येक उम्मीदवार ने अपनी बात कह दी, अब जनता जिसे चुनना चाहे, उसे चुन ले। यदि ऐसा संभव हो तो अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है।
एक सांसद का क्या आचरण होना चाहिए? इस संदर्भ में पुराना मत बहुत महत्त्वपूर्ण है। जैसे चाणक्य ने कौटिल्य के अर्थशास्त्रा में लिखा है, वैसे ही जैन आचार्य सोमप्रभ ने ‘नीतिवाक्यामृत’ में लिखा है। उसकी एक सुंदर सूक्ति है।

क्क  यः संसदि परदोषं शंसति, स स्वदोषबहुत्वमेव ख्यापयति।
क्क  संसदि शत्राुं न परिक्रोशेत्।
स जो संसद में पर-दोष का आख्यान करता है, वह अपने दोष बहुत्व का ख्यापन करता है।
स संसद में शत्रु पर परिक्रोश मत करो।

सज्जन आदमी वह होता है, जो संसद में किसी का दोष प्रकाशित नहीं करता। किंतु आज क्या हो रहा है? चुनाव के समय क्या होता है? दूसरे दल की कमजोरी का जितना प्रकाशन कर सकें, उसके गुप्त रहस्यों और मर्मों का जितना उद्घाटन कर सकें, उसको जितना नीचा दिखा सकें, उसकी जितनी बुराइयां बता सकें, उतना ही अपने हित में माना जाता है। सोच यह रहती है कि इससे जनता में अच्छा समर्थन मिलेगा, विजय मिलेगी। इस चिंतन के आधार पर आरोप-प्रत्यारोप चलते हैं। जो भारतीय संस्कृति की मौलिक चिंतनधारा थी, उस पर विचार कहां हो रहा है? जो कहना है, उसे एक मंच पर कहा जाए, जिस गाँव में जाना हो, सब एक साथ जाएं। व्यक्तिशः प्रचार न हो तो न बहुत मिथ्या भाषण होगा, न मिथ्या आरोप होगा, न चुनाव में बहुत व्यय की संभावना होगी। कहा जा रहा है कि चुनाव-खर्च की व्यवस्था सरकार करे। सरकार सब उम्मीदवारों को एक मंच पर ले आए, सबको अपनी बात कहने का अवसर मिल जाए तो अन्य कोई झंझट नहीं रहेगा। इन सारे पहलुओं पर विचार करें, सोचें। क्या यह संभव है? यदि यह संभव हो सके तो चुनाव की बहुत सारी समस्याओं और उस समय पनपने वाली बुराइयों का उन्मूलन हो सकता है।

अणुव्रत चुनाव के संदर्भ में नैतिक मूल्यों के विकास की बात करता है। वर्तमान में चुनाव नैतिक मूल्यों को बाधा पहुँचाने वाली प्रक्रिया है। चाहे भ्रष्टाचार का प्रश्न हो, हिंसा को बढ़ावा देने की बात हो, जातिवाद की उग्रता और सांप्रदायिक उन्माद का प्रश्न हो, इन सबको उद्दीपन चुनाव में मिलता है। इसे कैसे रोका जाए? कैसे योग्यता का मानदंड निर्धारित किया जाए? और कैसे उम्मीदवार को प्रशिक्षण मिले? ये ज्वलंत प्रश्न हैं। केवल पुस्तकीय प्रशिक्षण नहीं होना चाहिए। संयम का व्यावहारिक और प्रायोगिक प्रशिक्षण मिलना चाहिए, जिससे चेतना का इतना रूपांतरण हो जाए कि समय आने पर भी मनुष्य गलत काम कभी न करे।

Monday, January 30, 2017

लोकतंत्र को चुनौती


अजय शर्मा
आज भूख की समस्या बड़ी विकट है। पोषक खाद्य की बात दूर है, लाखों लोगों को अपोषक खाद्य भी बड़ी कठिनाई से मिल रहा है। पेट भरा हो तो आदमी और हजार कठिनाइयों को झेल लेता है पर जब वही खाली हो तो आदमी की सारी सहिष्णुता नष्ट हो जाती है। भूखा आदमी वह सब कुछ कर सकता है, जिसकी भरपेट भोजन मिलने पर कल्पना भी नहीं की जा सकती।

आज हिन्दुस्तान दो धाराओं के बीच में से गुजर रहा है। एक ओर वह जनतंत्रा को विकसित करने का प्रयत्न कर रहा है, दूसरी ओर खाद्य की समस्या उसे तानाशाही की ओर धकेल रही है। राज्य-अधिकारियों और व्यापारियों के लिए यह चुनाव का समय है। अब उन्हें साफ-साफ निर्णय करना है कि वे क्या चाहते हैं। जनतंत्र या तानाशाही? यदि वे जनतंत्र पसंद करते हैं तो उसे कमजोर बनाने का प्रयत्न न करें। रिश्वत लेने, अनाज को जमा रखने व अनुचित लाभ कमाने की प्रवृत्ति से जनतंत्रा कमजोर बनता है। भूखी जनता रिश्वत लेने व अनुचित लाभ कमाने वालों के प्रति क्रांति-बिगुल बजा देती है। फिर कानून का स्थान गोली ले लेती है।
क्या आप चाहते हैं कि आपकी पुण्य-भूमि में ऐसा हो? मैं सोचता हूँ कि आप ऐसा कभी नहीं चाहते। आपको अपनी हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति से प्यार है। आप अपने अवतारों और ऋषियों का सम्मान करते हैं। आप उनके ऊँचे-ऊँचे दार्शनिक विचारों और धार्मिक सिद्धांतों को शिरोधार्य करते हैं। त्याग-तपस्या की परंपरा के सामने अपना सिर झुकाते हैं। अहिंसा और अपरिग्रह को उत्कृष्ट धर्म मानते हैं। आप मानते हैं कि सब जीव समान हैं। आप मानते हैं कि सब जीव एक ही परमात्मा के अंश हैं। इतनी गहरी धर्म-निष्ठा, दार्शनिक आस्था, समानता या एकता की मान्यता को रखते हुए क्या पसंद करेंगे कि आपकी मातृभूमि केवल रोटी के दर्शन की प्रयोग-भूमि बन जाए? मैं अपनी आंतरिक आस्था के साथ कहता हूँ कि आप ऐसा नहीं चाहते। आप अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक व दार्शनिक परंपरा को सुरक्षित रखना चाहते हैं। आप असामाजिक कार्य इसलिए नहीं कर रहे हैं कि आपकी हजारों वर्ष पुरानी परम्पराएं खत्म हो जाएं। किंतु आप ये कार्य इसलिए कर रहे हैं कि आपका मन मोह से भर गया है। आपको अपनी सुविधाओं के लिए दूसरों की सुविधाओं को होम करने में कोई संकोच नहीं है। धन पाने के लिए कत्र्तव्य और अकत्र्तव्य का कोई प्रश्न नहीं है। उस मोह का परिणाम यह हो रहा है कि वे भूखें मर रहे हैं। क्या भूख और विलास का योग बहुत समय तक टिक सकेगा?

शासन-तंत्र के अधिकारियों और व्यापारियों की साझेदारी में आज लोकतंत्रा को खुली चुनौती दी जा रही है। राज्य का अधिकारी-वर्ग भ्रष्ट न हो तो व्यापारी भ्रष्ट हो ही नहीं सकता और यदि व्यापारी-वर्ग भ्रष्ट न हो तो अधिकारी-वर्ग भ्रष्ट नहीं हो सकता। दोनों वर्गों की दुर्बलता भ्रष्टाचार को प्रबल बना रही है। इस साझे के व्यापार में लोकतंत्रा की नींव हिलती जा रही है। जनता में रोष उफनता जा रहा है। इस परिस्थिति में उन दोनों वर्गों का लाभ इसी बात में है कि वे तात्कालिक लाभ के लिए दीर्घकालीन लाभ को और अल्प-लाभ के लिए प्रचुर लाभ को चुनौती न दें।

लोकतंत्र को थामने वाले हाथ?
उफनते हुए असंतोष ने लोकतंत्रा को चुनौती दी है, ठीक वैसे ही जैसे उफनता हुआ दूध अग्नि को चुनौती देता है। इस उफान का शमन किया जा सके तो दूध भी उबर सकता है और अग्नि भी, अन्यथा दोनों का भला नहीं है।
इस उफान के नीचे एक ताप है। विषमता का ईंधन अब इतना प्रज्ज्वलित हो उठा है कि केवल दूध में जल की दो-चार बूंदें डालना पर्याप्त नहीं है। ईंधन पर जल डालना भी आवश्यक हो गया है।

एक जमाना था, जब कुछेक लोग शिक्षित होते थे। शिक्षित लोग अशिक्षित जनता पर शासन किया करते थे। आज का जमाना उससे भिन्न है। आज हर व्यक्ति को शिक्षित होने की सुविधा है। शिक्षित जनता अशिक्षित जनता की भांति शासन या जीवन-पद्धति को स्वीकार नहीं कर सकती। विषमता प्राचीन काल में थी पर वह असह्य नहीं थी। उस समय का अभिजात वर्ग ऐश्वर्य को अपने कर्म का फल मानता था तो निम्न वर्ग गरीबी को अपने कर्म का फल मानता था। दोनों के अपने-अपने मूल्य थे। इसलिए असंतोष नहीं था। वर्तमान में भी वर्ग हैं पर उनके सामने अपना-अपना निश्चित मूल्य नहीं है। इस मूल्यहीनता की स्थिति में से ही असंतोष उफन रहा है। लोकतंत्रा की आत्मा धूमिल हो रही है।

जिस दिन लोकतंत्रा के मूल्य स्थापित और स्थिर हो जाएंगे, उसी दिन वास्तविक लोकतंत्रा का उदय होगा। अभी हिन्दुस्तान विकल्पसिद्ध (पूर्व- मान्यतासिद्ध) लोकतंत्रा की स्थिति में चल रहा है। केवल हिंदुस्तान ही नहीं, दुनिया के सभी लोकतंत्रा इसी स्थिति में चल रहे हैं। वास्तविक लोकतंत्रा वह हो सकता है, जहां लोकतंत्रा का मूल्य व्यक्ति, व्यक्ति का मूल्य स्वतंत्राता और स्वतंत्राता का मूल्य समानता हो।

अंतर्विरोध
आधुनिक युग का चिंतन लोकतंत्र की दिशा में प्रवाहित नहीं हो रहा है। परिस्थिति के परिवर्तन पर अतिरिक्त बल दिया जा रहा है। व्यक्ति-परिवर्तन का विचार उसके सामने अकिंचन-सा हो गया है। लोकतंत्रा की दिशा यह है कि व्यक्ति के पीछे परिस्थिति बदले, परिस्थिति के पीछे व्यक्ति बदले, यह परतंत्राता अर्थात् अधिनायकतंत्रा की दिशा है। वर्तमान युग इसी दिशा-बोध से प्रवाहित है, इसीलिए आज आदमी उतना नहीं बदला, जितनी परिस्थितियां बदली हैं। आधुनिक मनुष्य जा रहा है अधिनायकतंत्रा की ओर तथा जाने की बात कर रहा है लोकतंत्रा की ओर। यह अंतर्विरोध इस युग की सबसे बड़ी दुर्घटना है।

केन्द्र है व्यक्ति
मतदान की पद्धति, मतदान और बहुमत प्राप्त दल का सत्तारूढ़ होना। यदि यही लोकतंत्र हो तो इसका अभिनय कहीं भी किया जा सकता है। यह मात्रा उसकी परिधि है। इसका केंद्र है व्यक्ति, जिसे परिस्थिति-परिवर्तन में स्रष्टा की भूमिका प्राप्त है। आज आदमी-आदमी में कितना भेदभाव है। नीग्रो लोगों के प्रति अमेरिकनों के मन में, अफ्रीकियों के प्रति गोरों के मन में तथा हरिजनों के प्रति सवर्ण हिन्दुओं के मन में समानता का भाव नहीं है। अभिजात वर्ग के मन में गरीबों के प्रति सहानुभूति का भाव नहीं है। मानवीय एकता बाहरी आवरणों से आवृत है और उसकी पहचान भी सुलभ नहीं है। इस स्थिति में चुनाव की प्रक्रिया समारोपित प्रक्रिया है। इसे व्यक्ति की स्वतंत्रा चेतना द्वारा स्वीकृत प्रक्रिया नहीं कहा जा सकता।

बुझते दीप में प्राण कौन भरेगा?
जिस व्यक्ति के मन में लोकतंत्रा की पहली किरण फूटी, वह बंधन के परिणामों को भुगतकर मुक्ति पाना चाहता था। जिस व्यक्ति के मन में लोकतंत्रा की पहली धारा बही, वह हिंसा के परिणामों को अनुभव कर अहिंसा की प्रतिष्ठापना करना चाहता था। मुक्ति और अहिंसा इन दो रासायनिक द्रव्यों के घोल का नाम ही लोकतंत्रा है, इसलिए वह स्वतंत्राता और समानता के दर्पण में अपने आपको प्रतिबिम्बित करना चाहता है। इस सच्चाई को हम आज समझें या अगली पीढ़ी के लिए छोड़ दें, कि बंधनों का जाल बिछाकर और विषमता का व्यूह रचकर लोकतंत्रा की स्थापना नहीं की जा सकती और बहुत वर्षों तक चुनाव में सींच-सींचकर उसकी पौध को जीवित नहीं रखा जा सकता।

केवल वे ही हाथ लोकतंत्र के बुझते दीप में प्राण भर सकते हैं, जो अपनी पतंग की डोर अपने-आप थामे हुए हैं और जो स्वतंत्राता की पवित्रा वेदी पर समानता की प्रतिष्ठा करने को प्राणपण से जुटे हुए हैं। क्या चुनाव में बहुमत से विजय की याचना करने वाले हाथ इस शंख-ध्वनि को अपनी पवित्रा अंगुलियों में थामेंगे?

  
Ajay Sharma ( Former  Sr Journalist Hindustan News Paper and Doordarshan, New Delhi) 

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Tuesday, January 10, 2017

राजनीतिक दलों के दफ्तरों पर राज्य सम्पत्ति विभाग रखेगा नजर



आदर्श आचार संहिता का पालन कराने के लिए अब राजनीतिक दलों के मुख्यालयों पर भी आयोग की नजर है। किसी भी पार्टी मुख्यालय पर ऐसा कोई होर्डिंग, बैनर या पोस्टर जिससे प्रचार हो रहा हो उसे हटाया जा रहा है।

इसके लिए राज्य सम्पत्ति विभाग, पीब्ल्यूडी समेत अन्य विभागों को जिला प्रशासन से निर्देश जारी कर दिए गए हैं। क्योंकि प्रमुख पार्टियों के मुख्यालय इन्हीं विभागों की इमारतों से संचालित हो रहे हैं। वहीं, प्रशासन की राजनीतिक पार्टियों के साथ बैठक के बाद सपा मुख्यालय के सामने स्थित झंडे, बैनर, पोस्टर की दुकानों को ढक दिया गया है।

पार्टी मुख्यालयों पर सिर्फ ऐसे बोर्ड की अनुमति है जिससे यह पता चलता हो कि फलां पार्टी का दफ्तर इस स्थान पर है। इसके अलावा राज्य या केन्द्र सरकार की किसी योजना का प्रचार, किसी नेता का प्रचार करने वाली होर्डिंगों को तत्काल हटाने का निर्देश है। एक दिन पहले ही भाजपा दफ्तर के बाहर लगी एलईडी को ढकवा दिया गया था।

एडीएम प्रशासन अविनाश सिंह ने बताया कि राज्य सम्पत्ति विभाग, पीडब्ल्यूडी, लेसा, आवास विकास, नगर निगम आदि विभागों को निर्देश दिया गया है। इसमें कहा गया है कि सभी विभाग अपने स्वामित्व वाली इमारतों, सड़कों, फुटपाथ और दीवारों से पोस्टर बैनर हटवा दें। लेसा से कहा गया है कि बिजली के खंभों, ट्रांसफार्मरों से प्रचार सामग्री या पोस्टर आदि तत्काल हटा दें।

आयोग के निर्देश पर निकाला गया आदर्श आचार संहिता रथ

मलिहाबाद में आम लोगों व राजनीतिक दलों को जागरूक करने के लिए रविवार को आदर्श आचार संहिता रथ निकाला गया। एसडीएम मलिहाबाद नीता यादव ने इस रथ को हरी झंडी दिखा कर रवाना किया। इस मौके पर तहसीलदार संतोष कुमार राय समेत अन्य तहसील कर्मचारी भी मौजूद थे।


दलित खुद अपनी ताकत बनें : राज बब्बर





प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर ने राज्य के दलितों का आह्वान करते हुए उन्हें लामबंद होने की सीख देते हुए कहा है कि वह अपनी एकता को इतना मजबूत बनाएं ताकि कोई उन्हें अपना साधन न बना सके। बब्बर मंगलवार को लखनऊ में पार्टी की ओर से शुरू की गई दलित स्वाभिमान यात्रा के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने प्रदेश के दलितों से कहा कि आपके बहुमत के सहारे लोग जीतते हैं अब आपको खुद जीतने की जरूरत है और खुद जीतने की ताकत बनो ताकि दूसरा कोई आपको मोहरा न बना सके। उन्होंने दलित समुदाय का आह्वान किया कि आज बाबा साहब की नीतियों पर चलने का प्रण लेकर जाए और कांग्रेस पार्टी और उत्तर प्रदेश को बेहतर बनाने का काम करें। सांसद पीएल पुनिया ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय के इसी परिसर से बीती 4 दिसम्बर को शिक्षा-सुरक्षा-स्वाभिमान यात्रा शुरू हुई थी।

6 दिसम्बर को बाबा साहब के निर्वाण दिवस पर सभी जिलों में निर्वाण दिवस मनाकर बाबा साहब को याद किया गया। यह यात्रा चालीस दिनों में लगभग साढ़े तीन लाख किलोमीटर की रही और हर जिले में 130 यात्राएं हुईं। इस यात्रा को बड़ी कामयाबी मिली। पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय चेयरमैन के. राजू ने कहा कि राहुल गांधी का सपना है कि देश के हर राज्य में दलित नेतृत्व आगे आए और राजनीति, सरकार हर जगह शामिल हो।

उन्होंने कहा कि यूपी में बसपा सिर्फ पैदा इसलिए हुई क्योंकि कांग्रेस पार्टी से दलित दूर हो गई थी। इस अवसर पर सांसद प्रमोद तिवारी, पूर्व केन्द्रीय मंत्री जे.डी. शीलम, विभाग के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ब्रजलाल खाबरी एवं विभाग के प्रान्तीय चेयरमैन भगवती प्रसाद चौधरी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष डा. संतोष सिंह, पूर्व मंत्री रामकृष्ण द्विवेदी, सत्यदेव त्रिपाठी, राजबहादुर, ए.आई.सी.सी. अनु जाति विभाग के कोआर्डिनेटर शशांक शुक्ला आदि वरष्ठि नेता मौजूद रहे।