Thursday, June 20, 2019

चमकी बुखार का इलाज

बिहार राज्य का मुजफ्फरपुर क्षेत्र चमकी नाम के बुखार के कारण देशभर में सुर्खिया बटोर रहा है लेकिन वजह वहां होने वाली बच्चों और बच्चियों की मौत है। चमकी बुखार के कारण सैकड़ों मासूम अपनी जान गंवा चुके हैं और आलम ये है कि आंकड़ा थमने का नाम नहीं ले रहा है। 'एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम' जिसे हम लोग 'चमकी बुखार' बता रहे हैं वास्तव में एक तरह का मस्तिष्क ज्वर है। यह बीमारी 1 से 8 साल के बीच की उम्र के बच्चों को अधिक प्रभावित करती है क्योंकि उनकी इम्युनिटी बेहद कमजोर होती है, जिस कारण वह उसकी चपेट में आ जाते हैं।

आखिर क्या है 'चमकी' बुखार

एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम को हम भारतीय लोग 'चमकी बुखार' कहते हैं। इस सिंड्रोम के संक्रमण से ग्रस्त मरीज के मस्तिष्क व शरीर में ऐंठन शुरू हो जाती है और उसका शरीर अचानक सख्त होने लगता है। चमकी बुखार एक संक्रामक बीमारी है और इसका वायरस शरीर में पहुंचते ही हमारे रक्त में शामिल होकर प्रजनन शुरू कर देता है। जैसे-जैसे इस वायरस की संख्या बढ़ती है तब ये हमारे खून के साथ ही मस्तिष्क तक पहुंच जाता हैं और कोशिकाओं में सूजन शुरूकर देता है। इस बीमारी के कारण शरीर का 'सेंट्रल नर्वस सिस्टम' भी खराब हो जाता है।


लीची बताई जा रही वजह

हालांकि चिकित्सक इस बुखार का सही अंदाजा नहीं लगा पाए हैं लेकिन इसके पीछे कई तरह के कारण सामने आ रहे हैं। कई डॉक्टर इसे भीषण गर्मी से जोड़कर देख रहे हैं तो कई विशेषज्ञों का मानना है कि गर्मी, उमस, गंदगी और कुपोषण बीमारी को बढ़ावा दे रही है। शुरुआत में बच्चों की मौतें लीची खाने से होने की जानकारी सामने आई थी। दरअसल लीची में पाए जाने वाले तत्व hypoglycin A और methylenecyclopropylglycine (MPCG) शरीर में फैटी ऐसिड मेटाबॉलिज़म को बनाने में बाधा डालते हैं। जिसके कारण ब्लड-शुगर का स्तर कम होना शुरू हो जाता है और व्यक्ति को मस्तिष्क संबंधी समस्याएं होने लगती हैं और मरीज को दौरे पड़ने लगते हैं।

चमकी बुखार के लक्षण

बच्चे को लगातार तेज बुखार, बदन में ऐंठन और बच्चे अपने दांत पर दांत चढ़ाए रहते हैं। 

कमजोरी के कारण बच्चा बार-बार बेहोश होता रहता है। उसका शरीर सुन्न हो जाता है। 


बच्चों को मानसिक भटकाव महसूस होता है। 


बच्चे को घबराहट महसूस होना।


बुखार आने पर माता-पिता क्या करें

तेज बुखार होने पर बच्चे के शरीर को गीले कपड़े से पोछें, जिससे बुखार उसके सिर पर नहीं चढ़ेगा। 

डॉक्टर की सलाह लेने के बाद ही पेरासिटामोल की गोली या सिरप बच्चों को दें। 


बच्चे को ORS का घोल पिलाएं, ध्यान रखें की इस घोल का इस्तेमाल 24 घंटे बाद न करें।  


बुखार आने पर बच्चे को अस्पताल ले जाएं और उसे दाएं या बाएं लिटाएं।


 बच्चे को हमेशा छाया वाले स्थान पर ही लिटाएं।  


बुखार आने पर बच्चे की गर्दन सीधी रखें। 


बच्चे को धूप और गर्मी से बचाकर रखें। 


उसे पोषक आहार खिलाएं और पानी की कमी न होने दें।


ऐसी स्थिति में क्या न करें

 बच्चे को खाली पेट लीची भूलकर भी न खिलाएं।

 बच्चे को गर्म कपड़े न पहनाएं।


 जब बच्चा बेहोश हो तो उसके मुंह में कुछ भी न डालें।


 मरीज के साथ उसके बिस्तर पर न बैठें। 


 मरीज के साथ रहने के दौरान उसे बेवजह तंग न करें और न ही शोर मचाएं।


मस्तिष्क रोग में जांच जरूरी

चमकी बुखार के वक्त डॉक्टर एमआरआई या सीटी स्कैन की सलाह देते हैं साथ ही इस बुखार की पहचान के लिए खून या पेशाब की जांच भी कराई जा सकती है। अगर बच्चे में शुरुआती लक्षण दिखाई देते हैं तो रीढ़ की हड्डी से द्रव्य का नमूना लेकर जांच की जाती है।

ये बरतें सावधानियां

बच्चों को किसी भी हाल में झूठे और सड़े फल न खिलाएं। 

बच्चों को गंदगी से बिल्कुल दूर रखें।


खाने से पहले और खाने के बाद हाथ जरूर धुलवाएं।


ध्यान रखें बच्चे साफ पानी पिएं।


उनके नाखून नहीं बढ़ने दें।


गर्मी के मौसम में बच्चों को धूप में खेलने से मना करें। 


रात में बच्चे को कुछ खिलाकर ही सोने के लिए भेजें।


#ajaysharma

चमकी बुखार और बिहार सरकार

एक महीनें दो महीने तीन महीनें के बच्चें मर रहे है उन्होंने क्या लीची खाई होगी? वो क्या शाम को भूखे पेट सोये होंगे? उन्हें क्या ग्लूकोज की कमी हुई होगी जिनके लिये माँ का दूध ही सम्पूर्ण आहार होता है... ? ये लीची और कुपोषण सब सच्चाई कम बहाने ज्यादा है माना बच्चें गरीब के है और गाँव के है तो क्या सब कुपोषण के शिकार है? क्या गरीबी और गाँव से होने के कारण कुछ भी कहकर पल्ला झाड़ा जा रहा है? जबकि कारण कई हो सकते है और मीडिया की नजर सिर्फ मुजफ्फरपुर में है जबकि लगभग कई जिलों के निजी से लेकर सरकारी अस्पतालों में बच्चें इस भयावह बीमारी से तड़प रहे है... क्योंकि मुज में लीची होता है इसीलिये इसे ही केवल कारण बता देना महज एक भाड़ टालने वाली बात है... रही बात रात में नहीं खाने की तो गाँव में बच्चें तो क्या बड़े बूढ़े सभी ज्यादातर शाम होते होते खाना वाना खा कर लगभग सात आठ बजे तक सो जाते है यह कोई नई बात नहीं है.. पानी की किल्लत और गंदगी से लगभग जूझता है बिहार का सभी गाँव और शहर.. शहर में तो लोग आरओ लगा लेते है पानी पीने के लिये पर गाँव में ऐसा नहीं होता ज्यादातर जगह के पानी अब ऐसे निकलते है कि पूरे बर्तन को मिनटों में पीला कर दे.. स्वाद भी बड़ा अजीब टाइप का.. और क्योंकि पानी की किल्लत ही किल्लत हर ओर चल रही है महीनों से तो पता न वह कैसे पानी का सेवन करते हो पीने के लिये... नहाने के लिये..
एक बात और कहना चाहूंगी जो आपको थोड़ा अजीब लगे पर क्योकि बात बच्चो के जीवन की है तो बोलना लाजमी है मैंने देखा मरते हुए बच्चे को और बहुत लोगों से पता करने की भी कोशिश की बहुत से लोग मुसहर प्रजाति के है दोस्तों इनका जीवन आम जीवन से बहुत भिन्न होता है और ये अपने आहार में मूसा यानी चूहा जरूर मार कर पका कर खाते है..बात सिर्फ मुसहर प्रजाति की ही नहीं गाँव में गर्मी के दिनों में तालाब तो भले सुख जाय नाले गड्ढे इत्यादि से भी बच्चे नहाते है यह तक कि घोंघा मछली सब पकड़ कर लाते है खाने के लिये.... उनके घर या छत वैसे नहीं होते जो उन्हें छाया दे ठीक से गर्मी के दिनों में गर्मी माहौल में तड़प कर ऐसे भी कौन सा ग्लूकोज़ राह जाता है बॉडी में? अब शहर के बच्चें तो है नहीं जो इंडोर गेम में लगे रहे.. गाँव में सिर्फ आउट डोर गेम होता है चाहे वो कितनी धूप की दोपहरी हो बच्चें पेड़ों पर या नदी नालों में ज्यादा पाय जाते है खेलते हुए.... और हा गाँव से मेरा मतलब उनलोगों से नहीं है जिनके बाबू दादा का महल बना हुआ है और गाछ बगीचे जहाँ उनको उनका नौकड़ चक्र लेकर जाएगा खेत खलिखान घुमाने, गाछी दिखाने... या फिर जो रहते तो है गाँव में पर शहर से भी रईसी जी रहे.... बात उनकी यहाँ नहीं कि गयी है यहाँ बात ऐसे गाँव ऐसे तबके और ऐसे लोगों की है जो बहुत ही निम्न जीवन जीते है,जिनका पेशा अलग है,रहन सहन अलग है केवल गरीबी के कारण नहीं माफ कीजियेगा जाति भी एक विशेष वजह है.... #स्वक्षता चाहे वो शरीर का हो पानी का हो या वातावरण का इन सब चीजों में कमियां बेशक होती है भले कारण इनके हालात हो... क्योकि इनका जीवन नाहा धोकर खाने और काम करने टाइप बस नहीं होती बल्कि इनको दिन भर खेतों में आधा पानी लगे घुटने के बल तक खलिहानों में रोज काम करना पड़ता है तब जाकर अपने बच्चों का पेट पालते है... महिलाये मवेशियों के खाने के लिये भी भारी दोपहरी में भी घास इत्यादि के प्रबंध करती है ,धूप में और जलना न पड़े इसलिये सुबह होते होते खाना पका कर तैयार,रात की अंधेरी डसनी न पड़े इसलिये  डूबते सूरज की सांझ में ही रात का खाना बनकर तैयार... फिर खाकर ऐसे सोएंगे कि नींद बस सूरज के उठने से पहले ही टूटेगी.... जी मैं बात कर रही हूँ उन्हीं भाई बहनों के जीवन की जिनके बच्चें उनकी बाहों में दम तोड़ रहे है.... कारण तो स्पष्ट तब दिखेगी न जब मीडिया उनके घर जाय उनकी स्थितियों को भी बताए.... तब मालूम होगा न असली जीवन और गाँव और विकास व सच्चाई क्या है... हम आप शहरी है थोड़ा बहुत गाँव देखकर बस फेंक देते है कि गाँव अब गाँव नहीं रहा बिजली है स्कूल है तो न जाने क्या क्या बात सच भी है पर अभी भी ऐसे लोग है जिनका बिजली,स्कूल,चौक दुकान से कोई लेना देना नहीं वो जीते भी है,पोखर,गाछ वृक्ष से और शायद मरते भी है... इन्ही के कारण😔... वाकई चमकी बीमारी कुछ नहीं मेन कारण है गरीबी जिससे लोग मर रहे है... और गरीब ही मर रहे है इसलिये जाँच टीम बस पल्ला झाड़ रही वो फेल है सही कारणों का पता लगाने में... और हमारा डिजिटल भारत कितना अशिक्षित है इस बात से ही समझा जा सकता है..

Sunday, June 16, 2019

उत्तर प्रदेश में अपराध चरम पर

आपराधिक वारदातों से उबल रहा है यूपी, पुलिस हुई बेबस  

अजय शर्मा 
संपादक, लेखक, साहित्यकार, एंकर 

उत्तर प्रदेश में मई-जून के महीने में घटी आपराधिक वारदातों ने पूरे प्रदेश को झुलसा दिया है। इन वारदातों में 90 प्रतिशत घटनाएं आधी आबादी के साथ हुई हैं, जिसमें अपराधियों ने बच्चियों से लेकर महिलाओं तक को सामूहिक बलात्कार और नृशंस हत्या कर अपना निशाना बनाया है। वहीं कुछ हत्याओं की वारदातों को चुनावी रंजिश के चश्मे से देखा गया है, ये 6 हत्याएं चर्चा का बड़ा मुददा रहीं। आरोप व प्रत्यारोप का खूब दौर चला। स्मृति ईरानी से लेकर अखिलेश यादव तक ने सवाल उठाए। मरने वालों में एक भाजपा कार्यकर्ता, दो बसपा कार्यकर्ता, तीन सपा कार्यकर्ता थे। इन सभी हत्याओं में एक ही तरीका अपनाया गया, बाइक सवार आए, पिस्तौल निकाली, और सरेआम गोली मारकर फरार हो गए। ये वारदातें हिन्दुस्तान के सामाजिक ढांचे, इंसानियत, चारि़त्रक गुण और कानून व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाते हुए कटघरे में खड़ा करती हैं।

दोस्तों, आज मौजूदा समय में राज्य में कानून व्यवस्था और कानूनी दंड के भय को लेकर चर्चाओं के गुब्बारे हवा में तैर रहे हैं। पूरे प्रदेश में लोगों का आक्रोश अपने चरम पर है। कैंडल मार्च निकाले जा रहे हैं और सोशल मीडिया पर आक्रोश ज्वालामुखी की तरह फूट रहा है। 

कुछ घटनाएं तो ऐसी हैं जिन्होंने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। मैं सबसे पहले नोएडा की एक आपराधिक साजिश के खुलासे का जिक्र करूंगा, जिसमें एक चौकी इंचार्ज समेत कुछ सिपाही स्थानीय बदमाशों के साथ मिलकर आम आदमी को हनी टेप के जरिए बलात्कार के केस का डर दिखाते हुए जेल भेजने की धमकी देते हैं। फिर केस को रफा दफा करने के लिए पैसे ऐंठ लेते थे। सब इंस्पेक्टर और उसकी टीम की इस गिरफतारी ने पुलिस व्यवस्था तथा उसके उददेश्य को करारी चोट पहुंचाई है। दूसरी घटना जिला आगरा की दीवानी कचहरी परिसर में यूपी बार कांउसिल की पहली महिला अध्यक्ष दरवेश यादव को साथी अधिवक्ता द्वारा सरेआम गोली मार देने की है। उसके बाद स्वयं भी गोली मार लेना। ये दोनों घटनाएं कानून के रखवाले और पैरोकारी करने वालों के जरिए घटीं। जो सामाजिक परिपेक्ष्य में सोचने के लिए मजबूर करती हैं। आखिर क्या वजह थी समाज में महत्वपूर्ण भागीदार जुर्म के दरिया में कूद पड़े। 

इसके बाद बात करते हैं कि अपने समाज में आधी आबादी को बलात्कार का शिकार क्यों बनाया जा रहा है। चाहे वह दो तीन साल की मासूम बच्चियां हो या फिर परिपक्व स्त्री। इनके साथ बलात्कार आदमी समूह में कर रहा है और उसके बाद मानवता की हदें लांघते हुए नृशंस हत्या कर रहा है। इसके अलावा ये लोग आधी आबादी को बर्बरतापूर्ण तरीके से अधिकतम चोट भी पहुंचाना चाहते हैं। इन शिकार बच्चियों, महिलाओं के क्षत विक्षप्त शरीर कूड़े के ढेर, तालाब, पोखर, नाले, वीरान स्थानों पर पड़े हुए मिल रहे हैं। 

यहां पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात है यह कि ये कोई शातिर सजा याफता बदमाश, कुख्यात अपराधी, गैंगस्टर नहीं हैं। बल्कि ये वे लोग हैं जिनका कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं था। बल्कि ये हमारे समाज का हिस्सा थे, ये हमारे बीच में रह रहे थे। स्थानीय लोगों की नजर में ये आम आदमी थे, लेकिन हवस और बदले की भावना ने ऐसा उन्माद चढ़ाया कि सभी हदें टूट गयीं। फिर क्या बच्ची और क्या जवान। सभी के साथ जानवरों जैसा बर्बरतापूर्ण व्यवहार। क्या आप अलीगढ़ के टप्पल में मासूम टिवकल की नृशंस हत्या और यूपी के विभिन्न जिलों से सामूहिक बलात्कार की वारदातों को भूल सकते हैं। इन सभी वारदातों में यूपी पुलिस की जिम्मेदारी एवं कर्तव्यबोध पुलिस कर्मचारियों की निष्क्रियता की बलि चढ़ गई। इन अधिकारियों ने समय रहते उचित गति से उचित दिशा में कार्रवाई नहीं की। जिसकी वजह से अपराधियों को भरपूर समय मिला इन वारदातों को अंजाम देने के लिए। इन आपराधिक घटनाओं को समय रहते काफी हद तक रोका जा सकता था लेकिन पुलिस की निष्क्रियता आधी आबादी को वहशी जानवरों की शिकार बना गई। 

अब बात करते हैं कि राजनीतिक कार्यकताओं की सरेआम हत्याओं की। इस कड़ी में स्मृति ईरानी के सहयोगी रहे अमेठी के सुरेन्द्र सिंह की हत्या सबसे ज्यादा चर्चा का विषय रही। यहां पर गौरतलब है कि बरौला गांव के पूर्व प्रधान सुरेन्द्र सिंह ने चुनाव के दौरान प्रचार में स्मृति ईरानी का बहुत ज्यादा सहयोग दिया था। दूसरा नाम है विजय यादव। गाजीपुर में 24 मई की रात सपा के जिला पंचायत सदस्य रह चुके विजय यादव की हत्या भी सुर्खियों में रही। गाजीपुर का चुनाव मनोज सिन्हा और अफजाल अंसारी की वजह से बहुत संवेदनशील था। इसी मामले में अंसारी ने धरना दिया। साथ ही अखिलेश यादव ने कानून व्यवस्था पर सवाल उठाए। तीसरा नाम है जौनपुर के सपा नेता लाल जी यादव। लालजी ठेकेदारी के कारोबार से जुड़े थे। चौथा और पांचवा नाम है बिजनौर के हाजी अहसान और मोहम्मद शादाब की। 28 मई को मशहूर बसपा नेता की उनके ऑफिस में गोली मारकर हत्या कर दी गई। छटा नाम है दादरी के सपा नेता रामटेक कटारिया का। कटारिया को 31 मई को सरेराह ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर मार कर दिया गया। इन सभी हत्याओं में अभी जांच चल रही है कुछ गिरफतारियां जरूर हुई हैं लेकिन ठोस नतीजे नहीं आए हैं। 

बागपत में अप्रैल में दो हत्याओं में महिलाओं की संलिप्तता सामने आई जिसने अपराध के विशेषज्ञों को सोचने पर मजबूर किया। जिसमें बीए की छात्रा ने खुशबू ने सतपाल की गोली मारकर हत्या की और दूसरी वारदात में 25 मई को निशा ने अपने प्रेमी को अपने पिता की हत्या की सुपारी देकर मरवा दिया। 

एक ऐसी घटना जिसने मीडिया में आक्रोश भर दिया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले शामली में पत्रकार अमित शर्मा को बुरी तरह से पीटे जाने की घटना ने यूपी पुलिस का चेहरा अंतरराष्टीय स्तर पर शर्मसार कर दिया। इस घटना को पत्रकारों और बौद्धिक जगत ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला करार दिया। किसी पत्रकार को उसकी जिम्मेदारी से रोकते हुए पीटना और उसके बाद उसके मुंह में पेशाब करना लोकतंत्र के लिए खतरनाक कहा गया। चारों तरफ इसकी भर्त्सना की गई। इस घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बोलना पड़ा, यदि पत्रकारों के साथ कोई भी अभ्रदता हुई तो दोषियों को तुरंत जुर्माने के साथ जेल भेज दिया जाएगा।    

कुल मिलाकर यूपी में पिछले कुछ महीनों में अपराध का ग्राफ बहुत तेजी से बढ़ा है। बदमाश खुलेआम हत्या, लूट, छिनैती, दुष्कर्म, छेडखानी, चोरी की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। जुर्म की इन वारदातों से पूरा यूपी धधक रहा है। पुलिस कानून व्यवस्था बहाल रखने में बेबस नजर आ रही है। वहीं कानून का भय लोगों के अंदर से खत्म होता दिखाई दे रहा है। कानून व्यवस्था को लेकर यूपी के हालात बहुत नाजुक स्थिति में हैं। ऐसी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए यूपी पुलिस और मुख्यमंत्री क्या कदम उठाते हैं यह अपने आप में महत्वपूर्ण होगा। इसके अलावा आदमी में चारित्रक पतन को लेकर संस्कारों को कैसे पुष्ट किया जा जाए इसको लेकर समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों, चिंतकों, साहित्यकारों एवं शिक्षकों को मंथन करना होगा। तभी बलात्कार जैसी विकृत बीमारी से निजात मिल पाएगी।