Sunday, July 25, 2021

बीजेपी का उत्तर प्रदेश की राजनीति पर असर

उत्तर प्रदेश की राजनीति का असर
कई दिनों से रह-रह कर कुछ लिखने की इच्छा हो रही है, लेकिन पल-पल बदलते हालात के बीच विचार बदल रहे हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति का तापमान चरम पर है। भाजपा नेताओं ने दिल्ली और लखनऊ का रास्ता एक कर रखा है। आखिर यह सब क्यों हो रहा है?

चलिए 7 साल पीछे चलते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को याद कीजिए वर्ष 2013 से लेकर 2014 में लोकसभा चुनाव होने तक वह सर्वमान्य नेता बन चुके थे। प्रधानमंत्री बनने के लिए उत्तर प्रदेश को फतह करना जरूरी था। लिहाजा, उन्होंने वाराणसी से चुनाव जीता और उत्तर प्रदेश के हो गए।

नरेंद्र मोदी की कामयाबी के मेरी नजर में तीन मुख्य फैक्टर हैं। पहला, 10 वर्षों के यूपीए शासनकाल में तमाम तरह के गड़बड़ घोटाले सामने आए। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना और बाबा रामदेव ने दिल्ली में मनमोहन सरकार की नाक में दम कर दिया था।

दूसरा, 10 वर्षों तक कांग्रेस गोधरा कांड को रबर की तरह खींचती रही। नरेंद्र मोदी और उनके करीबियों को खूब परेशान किया गया। जिसकी बदौलत नरेंद्र मोदी की छवि कट्टर हिंदूवादी के रूप में स्थापित हो गई। दूसरी ओर राज्यों में क्षेत्रीय दलों की सरकारों पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप थे।

तीसरा सेक्टर इन दोनों के मुकाबले कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है और इसी फैक्टर का सरोकार मौजूदा राजनीतिक हालात से है। जब नरेंद्र मोदी का अभ्युदय हुआ तो उत्तर प्रदेश के पास पक्ष या विपक्ष में कोई बड़ा नेता नहीं था। मतलब, ना तो भारतीय जनता पार्टी के पास नरेंद्र मोदी की टक्कर का नेता था और ना ही दूसरे राजनीतिक दलों में इतने बड़े कद का नेता था। 

राजनाथ सिंह की छवि लगभग धर्मनिरपेक्ष रही है। वह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं कर पा रहे थे। कल्याण सिंह भाजपा को दो बार छोड़कर जा चुके थे। कलराज मिश्रा भी बढ़ती उम्र के साथ तेज खो रहे थे। लालकृष्ण आडवाणी अयोध्या में श्रीराम मंदिर के सूत्रधार रहे, लेकिन उन्होंने अपना राजनीतिक क्षेत्र हमेशा गुजरात को ही रखा था। अगर लालकृष्ण आडवाणी उत्तर प्रदेश आ जाते तो शायद वह यूपीए-1 को ही हराकर प्रधानमंत्री बन चुके होते। कुल मिलाकर ऐसे में उत्तर प्रदेश आकर नरेंद्र मोदी को खुला मैदान मिल गया।

अब वर्ष 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव पर नजर डालिए। वह चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा गया और किसी भी तरह सही योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चुन लिए गए। पिछले चार-साढ़े चार साल में योगी आदित्यनाथ ने बतौर मुख्यमंत्री कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। मेरा आंकलन है कि राज्य में भ्रष्टाचार और अपराध कम हुआ है। योगी हम उत्तर प्रदेश में स्थापित नेता बन चुके हैं।

और यही परेशानी का सबब है। अगर योगी आदित्यनाथ अपना कार्यकाल पूरा करते हैं तो वर्ष 2022 का विधानसभा चुनाव उनके नाम पर ही लड़ा जाएगा इसमें भी कोई दो राय नहीं कि वह एक बार फिर सत्ता में वापसी कर लेंगे इन परिस्थितियों में योगी आदित्यनाथ नियुक्त नहीं निर्वाचित मुख्यमंत्री होंगे वह उत्तर प्रदेश के निर्विकार और सर्वमान्य नेता बन जाएंगे

यह बात हर कोई जानता है कि यूपी का लीडर कभी भी देश का लीडर बन सकता है। ऐसे में न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि भारतीय जनता पार्टी और देश को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विकल्प मिल जाएगा। पिछले दो सप्ताह से यूपी की राजनीति का चढ़ा तापमान इसी विकल्प को डाइल्यूट करने की कवायद है।

अब दो ही तरह से योगी पर पार पाया जा सकता है। पहला, योगी आदित्यनाथ को ब्राह्मण विरोध, विधायकों में अलोकप्रिय या कोरोना महामारी से लड़ाई में हारा बताकर हटा दिया जाए। ऐसा करना बेहद टेढ़ी खीर है। इससे भाजपा को आने वाले चुनाव में भारी नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। दूसरा विकल्प उत्तर प्रदेश का विभाजन है। यूपी को कम से कम तीन हिस्सों में बांट कर अलग पश्चिमांचल, पूर्वांचल और बुंदेलखंड राज्यों का गठन कर दिया जाए।

अगर आपको यह लगता है कि ऐसा होना संभव नहीं है तो देश में लागू हुए आपातकाल को याद कर लीजिए। आपातकाल केवल इसलिए लगा था क्योंकि इंदिरा गांधी राज नारायण, जय नारायण और अदालत से हारने को तैयार नहीं थीं। जब कोई नेता अपने दम पर पार्टी और सरकार को खींचता है तो उसके लिए अपनी राजनीतिक सुरक्षा, अपना कद और अपना पद सबसे बड़े होते हैं।

मैं नरेंद्र मोदी और इंदिरा गांधी के हौसले में कोई फर्क महसूस नहीं करता हूं।

Wednesday, January 20, 2021

गाजियाबाद में करणी सेना का आगाज और वंदना सिंह

अजय शर्मा की कलम से 

तांडव फिल्म वेब सीरीज पर करणी सेना ने पूरे देश में अपना विरोध प्रदर्शन किया। राष्टीय अध्यक्ष सूरजपाल अम्मू ने फिल्म को लेकर अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया कि संगठन हिन्दू धर्म और संस्कृति का अपमान सहन नहीं करेगा। 

लेकिन सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात है कि करणी सेना ने उत्तर प्रदेश में जोरदार विरोध प्रदर्शन किया है। काफी जिलों से खबरें आई हैं लेकिन गाजियाबाद में हुआ विरोध प्रदर्शन विमर्श का विषय है। गाजियाबाद में इसकी कमान जिला अध्यक्ष महिला शक्ति वंदना सिंह के हाथ में थी। जिला अध्यक्ष विवेक तोमर शहर से बाहर थे। ऐसे में वंदना सिंह ने संगठनात्मक कार्यकुशलता का जो परिचय दिया है वह काबिले तारिफ है। 

मैं आपको यहां पर एक बार फिर से याद दिलाना चाहता हूं जब दिसंबर के महीने में करणी सेना की कार्यसमिति की बैठक यहां पर हुई थी। तब यह बात मैंने कही थी कि गाजियाबाद में करणी सेना की धमक आने वाले समय में सुनाई देगी। अब उसका आगाज हो चुका है। जिस तरह करणी सेना ने तांडव फिल्म को लेकर विरोध प्रदर्शन किया है वह बताने के लिए काफी है कि सामाजिक परिवर्तन की एक नई बयार शुरू हो चुकी है। आने वाले समय में कुछ ऐसे मुददे गाजियाबाद और यूपी में देखने के लिए मिलेंगे जो राजनीतिक विमर्श का भी मुददा बनेगे। करणी सेना को यूपी में हल्के में लेना या फिर नजरअंदाज करना सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए चूक हो सकती है। इसलिए तैयार हो जाइए करणी सेना के सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर आवाज सुनने के लिए। 

 

Monday, December 28, 2020

गाजियाबाद से करणी सेना की धमक कहां तक ​​सुनी गई

अजय शर्मा की कलम से 

गाजियाबाद में करणी सेना की धमक से कुछ सवाल पैदा हो रहे हैं कि राष्टीय कार्यसमिति की बैठक के लिए गाजियाबाद को क्यों चुना। इसके राजनीतिक मायने क्या हैं। यहां करणी सेना कौन सी जमीन बना रही है। करणी सेना की इस धमक को कहां तक महसूस किया जाएगा।  

करणी सेना ने गाजियाबाद में अपनी कार्यसमिति की बैठक आयोजित की। जिसमें पूरे देश से उसके 22 प्रदेश अध्यक्ष और राष्टीय पदाधिकारी शामिल हुए। करणी सेना के संस्थापक और राष्टीय अध्यक्ष सूरजपाल अम्मू ने अपनी पूरी संगठनात्मक ताकत दिखाई। करणी सेना ने अपने सदस्यों की संख्या 25 लाख बताई। जो दिन रात हिन्दुत्व, सनातन धर्म और संस्कृति की रक्षा की लड़ाई लड़ रहे है। सूरजपाल अम्मू कहते हैं कि हम सिर्फ राजपूतों का संगठन नहीं हैं बल्कि हिन्दुत्व की मशाल जलाए रखने वाला एक उर्जावान संगठन हैं। सूरजपाल अम्मू के संबोधन में भीम आर्मी, मायावती, अखिलेश यादव, औवेसी, ओमप्रकाश राजभर और ममता बनर्जी टारगेट पर रहीं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में प्रधानमंत्री का संबोधन और उसकी खत्म हो चुकी लीज भी करणी सेना के अध्यक्ष के संबोधन का हिस्सा रहे। उन्होंने गाजियाबाद के नाम पर चुटकी लेते हुए कहा कि इसका कोई और नाम रखा जाना चाहिए। श्यामनगर, रामनगर, शिव नगर आदि कुछ भी रख दिया जाना चाहिए। बॉलीवुड में अश्लीलता को आड़े हाथों लिया। महिला शक्ति की राष्टीय अध्यक्ष कीर्ती राठौर ने इस संगठन को महिलाओं के मान सम्मान की रक्षा और रानी लक्ष्मीबाई को एक प्रेरणास्रोत बताया। कीर्ति राठौर कहती हैं कि हम एक सामाजिक संगठन हैं। हमारा राजनीति से कोई सरोकार नहीं हैं। लेकिन पथभ्रष्ट और जातिगत राजनीति का हम विरोध करते हैं। जिला गाजियाबाद महिला शक्ति अध्यक्ष वंदना सिंह मानती हैं कि सनातन संस्कृति की रक्षा सर्वोपरि है। महिलाएं लव जेहादियों के निशाने पर हैं। इसलिए हम सभी की जिम्मेदारी बढ़ गई है। 

कार्यसमिति की बैठक में लव जेहाद कानून को समाज के विकास के लिए उचित बताने वाले सूरजपाल अम्मू ने किसान एक्ट को किसानों के हित में बताया और उसका समर्थन किया। करणी सेना आने वाले समय में मथुरा और बनारस में धर्म और संस्कृति को केन्द्र में रखकर कुछ देशव्यापी आंदोलन शुरू करेगी। 

यह कार्यसमिति की बैठक सामाजिक और राजनीतिक रूप से उत्तर प्रदेश में एक गहरा असर जरूर छोड़ेगी। करणी सेना की वजह से आने वाले कुछ महीने यूपी के लिए अहम होंगे। 

Monday, May 18, 2020

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जातियों का समीकरण

वोट बैंक के लिहाज़ से देखें तो सबसे बड़ा ख़तरा सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को है, जिसका मुस्लिम वोट बैंक खतरे में नज़र आ रहा है। यूपी में मुसलमानों की संख्या करीब 17 प्रतिशत है, जिन्होंने बीते 15 सालों से सपा का हाथ थाम रखा है। बीते विधानसभा चुनाव में भी सपा को 60 प्रतिशत से ज़्यादा मुस्लिम वोट मिले थे, लेकिन मुज़फ्फरनगर दंगे व दादरी कांड के बाद मुस्लिम सपा से खफा हैं। सपा प्रमुख मुलायम सिंह व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मुजफ्फरनगर दंगे के 6 माह बाद वहां लोगों से मिलने गए थे, जिसकी मुस्लिम समुदाय ने तीखी आलोचना की थी। यूपी चुनाव को लेकर हुए सभी सर्वे में मायावती की बीएसपी को सबसे आगे बताया गया है। मुस्लिम समुदाय की खासियत यह है कि इनका वोट ज़्यादा बंटता नहीं है।

वहीं, बीजेपी को यूपी में आने से रोकने के लिए मुस्लिम समुदाय उस पार्टी को वोट देगी जो उनको कड़ा मुकाबला दे सके। वर्तमान स्तिथि में बीएसपी सपा से ज़्यादा मज़बूत लग रही है और इस बात के पूरे आसार हैं कि मुस्लिम समुदाय सपा का हाथ छोड़कर बहनजी का दामन थाम लें। अगर ऐसा हुआ तो बीएसपी को 70 सीटों में फ़ायदा होगा, जहां मुस्लिम वोट अहम रोल अदा करता है, जबकि सपा को इन 70 सीटों में नुकसान झेलना पड़ सकता है। यूपी में दलितों की आबादी 20 प्रतिशत हैं, जिनका वोट एकतरफा मायावती को जाता है। दलित वोट के साथ-साथ अगर अधिकांश मुस्लिम वोट भी मायावती को मिला तो बीएसपी को यूपी चुनाव में नंबर एक पार्टी बनने से कोई नहीं रोक सकता है। वहीं, सपा के पास महज़ अपना परंपरागत 9 प्रतिशत यादव वोट है जो किसी और पार्टी  को नहीं जाता है, लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए यह काफी नहीं हैं। अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद सपा से लाखों युवा जुड़े हैं, लेकिन हाल ही में हुई मथुरा हिंसा और बिगड़ती कानून-व्यवस्था के कारण पार्टी को इसका ज़्यादा फ़ायदा मिलना मुश्किल ही नज़र आ रहा है।

इस चुनाव को सबसे दिलचस्प बनाती है बीजेपी... जिसने 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के दम पर 80 में से 71 सीटें जीती थी। हालांकि 1991 में जहां यूपी में बीजेपी को 221 विधानसभा सीटें मिली थीं, वह 2012 में घटकर महज़ 47 ही रह गईं। दिल्ली और बिहार चुनाव में करारी हार के बाद मोदी और पार्टी को मज़बूत बनाने के लिए यूपी का सहारा है, लेकिन सीएम प्रत्याशी व चुनावी एजेंडा जैसे अहम मुद्दों पर एकमत नहीं बना पा रही है। बीजेपी का यूपी चुनाव में हिंदुत्व व व ध्रुवीकरण मुख्य हथियार होगा , जिसका फ़ायदा पार्टी को पश्चिमी यूपी में मिलेगा। पश्चिमी यूपी में 27 ज़िले आते हैं, जहां हिन्दुओं की संख्या 73 प्रतिशत है, जिसमें जाट और गुर्जर भी आते हैं। लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में वोट मिले थे। मुज़फ्फरनगर दंगे, दादरी कांड व मथुरा में हुई हिंसा ने यूपी के इस हिस्से में सपा को बेहद कमज़ोर कर दिया है। जाटों ने भी अजीत सिंह का साथ छोड़कर बीजेपी को अपना हितैषी मान लिया है।

अगर लोकसभा की तरह राज्य चुनाव में भी बीजेपी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोगों का समर्थन मिला तो पार्टी आने वाले चुनाव में बेहद अच्छा प्रदर्शन करेगी। प्रयाग नगरी इलाहाबाद में पार्टी की राष्ट्रीय इकाई की बैठक करके हिन्दुओं को पूरी तरह से अपनी तरफ खींचने की योजना बनाई जा रही है। केशव प्रसाद मौर्या को बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर 31 प्रतिशत ओबीसी जनसंख्या को भी टारगेट किया जा रहा है। यूपी में राजनाथ सिंह को पार्टी प्रदेश के सबसे बड़े नेता के रूप में दिखा रही है, हालांकि उन्हें मुख्यमंत्री उम्मीदवार नहीं घोषित किया गया है। उनके ज़रिए पार्टी 8 प्रतिशत ठाकुर वोट जीतना चाहेगी। ब्राह्मण, कुर्मी व भूमिहार वोट जिनकी संख्या क़रीब तेरह प्रतिशत है भी बीजेपी को अच्छा समर्थन देंगे, क्‍योंकि यह यूपी में परंपरागत इन्हीं के साथ जुड़े रहे हैं।  

यूपी में सबसे बड़ा संकट कांग्रेस के साथ है जो बीते विधानसभा चुनाव में मिली 29 सीटें ही बचा ले तो बड़ी बात होगी। यूपी में कांग्रेस को भी उच्च जातियों के वोट मिलते आए हैं, लेकिन पूरे देश में कांग्रेस की हो रही दुर्गति के चलते बेहद मुश्किल है कि पार्टी पर ज़्यादा लोग भरोसा कर पाएं। कांग्रेस के पास यूपी में कोई भी बड़ा नेता नहीं है जो मायावती व अखिलेश यादव से टक्कर ले सके। कांग्रेस में आपसी मतभेद भी बढ़ रहे हैं और पार्टी को प्रशांत किशोर के अलावा कोई सहारा नज़र नहीं आ रहा है, जिन्होंने बीते लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी व बिहार चुनाव में नीतीश के लिए रणनीति बनाई थीं। राहुल गांधी भी कांग्रेस को दोबारा खड़ा करने में पूरी तरह नाकामयाब साबित हुए हैं।   

जातीय व धार्मिक समीकरण से देखें तो यूपी में बीएसपी और बीजेपी को फ़ायदा मिलता दिख रहा है, जबकि मुस्लिम समुदाय का विश्वास खो रही समाजवादी पार्टी को नुकसान। लोकसभा चुनाव के बाद से सिर्फ बुरे दिन देख रही कांग्रेस की ज़ोरदार वापसी यूपी चुनाव में तो खैर मानों नामुमकिन ही है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जातिगत समीकरण

पश्चिम उत्तर प्रदेश की पहले चरण वाली 8 सीटों में से पांच- मेरठ, मुजफ्फरनगर, कैराना, सहारनपुर और बिजनौर में करीब 33 से लेकर 42% तक मुस्लिम आबादी है. ऐसे में जातिगत समीकरण पर सवार सपा, रालोद और बसपा की काट के लिए भाजपा के पास विकास, राष्ट्रवाद और एचएम फैक्टर यानी हिंदू-मुस्लिम अहम हथियार साबित होता है.

सबसे प्रतिष्ठापूर्ण मुकाबला मुजफ्फरनगर में है, जहां रालोद प्रमुख अजित सिंह चुनाव लड़ रहे हैं. अजीत सिंह पिछली बार बागपत से उतरे थे और तीसरे नंबर पर रहे थे. वे गठबंधन के उम्मीदवार हैं. इस सीट पर करीब 38% मुसलमान और करीब 14% दलित वोटर हैं. इसके साथ ही दो लाख जाट मतदाता हैं. जिसके सहारे अजित सिंह यहां मजबूत हैं.

लेकिन यहां पूर्व केंद्रीय मंत्री और मुजफ्फरनगर के सांसद संजीव बालियान की ताकत क्षेत्र में उनकी सक्रियता है. महावीर चौक स्थित सपा के कार्यालय में बैठे रालोद के जिला अध्यक्ष अजीत राठी कहते हैं कि मुजफ्फरनगर दंगों में जाट और मुस्लिम एकता को तोड़ने काम भाजपा ने किया था. लेकिन भाईचारा सम्मेलन कर चौधरी साहब (अजित सिंह) ने इस खाई को पाट दिया है.

मेरठ की बात करें तो सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. मेजर हिमांशु कहते हैं कि गठबंधन के बसपा उम्मीदवार हाजी याकूब की सभी वर्गों में सहज स्वीकार्यता नहीं है. भाजपा के राजेंद्र अग्रवाल तीसरी बार चुनाव में हैं, क्षेत्र में उनकी सक्रियता कम रही, बावजदू इसके याकूब की कट्‌टर छवि ही राजेंद्र अग्रवाल की सबसे बड़ी ताकत बन गई है.

याकूब वही हैं जिन्होंने मोहम्मद साहब का कार्टून बनाने वाली पत्रिका के कार्टूनिस्ट का सिर कलम करने पर 51 करोड़ का इनाम देने की घोषणा की थी. गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) में केंद्रीय मंत्री और भाजपा उम्मीदवार डाॅ. महेश शर्मा ने मंत्री रहते कई विकास कार्य करवाए हैं, जिनमें जेवर हवाई अड्‌डा भी शामिल है.

लेकिन 3 लाख गुर्जर, 1.5 लाख यादव और दो लाख मुसलमान वोटों वाली इस सीट पर बसपा के सत्यवीर नागर अपनी बढ़त मान रहे हैं. वहीं कांग्रेस ने अरविंद सिंह को उतारा है, वे राजपूत वोट काट सकते हैं, जो कि भाजपा का वोट है.

गाजियाबाद में जनरल वीके सिंह सुरक्षित नजर आ रहे हैं. करीब दो लाख राजपूत वोट और मिडिल क्लास वोटर्स की बड़ी संख्या जनरल के पक्ष में दिखती है. यह पश्चिमी यूपी की सबसे बड़ी सीट है, जहां करीब 27 लाख मतदाता हैं.

वी.के. सिंह के पक्ष में एक बात और जाती है कि स्थानीय राजनीति में हस्तक्षेप से उन्होंने खुद को दूर रखा. इस कारण सभी भाजपाई प्रचार में लगे हैं. बसपा ने सुरेश बंसल को टिकट दिया है. यहां करीब दो लाख वैश्य वोट हैं, पर बंसल की चुनौती यही होगी कि वे भाजपा के परंपरागत वैश्य वोट को कितना खींच पाएंगे.

बागपत में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की तीसरी पीढ़ी के जयंत चौधरी मैदान में हैं. जयंत 2009 में मथुरा से सांसद रहे हैं, पर पिछला चुनाव वहीं से हारे थे. जयंत रालोद के टिकट पर गठबंधन के उम्मीदवार हैं.  ऐसे में यहां केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह का सीधा मुकाबला जयंत से है. जातीय गणित के कारण सत्यपाल के लिए यह चुनाव मुश्किल हो सकता है.

सहारनपुर में गठबंधन उम्मीदवार बसपा के फजलुर्रहमान ने कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. 2014 की प्रचंड मोदी लहर में भी इमरान 64 हजार वोटों से हारे थे, जो इस क्षेत्र की सबसे छोटी हार थी. लेकिन इस बार बसपा प्रत्याशी के कारण वे परेशानी में है.

39% मुस्लिम मतदाताओं का रुख ही इमरान की हार-जीत तय करेगा. उनका मुकाबला भाजपा के सौम्यछवि के नेता और वर्तमान सांसद राघव लखन पाल से है. इमरान को भीम आर्मी के चंद्रशेखर का भी समर्थन हासिल है. ऐसे में इमरान को दलित वोट की भी आस है.

बिजनौर में राजपूत अपेक्षाकृत अधिक हैं, जाट वोट भी हैं जिन पर चौधरी अजीत सिंह का असर दिखता है. यहां कभी बसपा में रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने इस बार कांग्रेस टिकट पर मुकाबले को रोचक बना दिया है. भाजपा ने वर्तमान सांसद भारतेंद्र सिंह और बसपा ने मलूक नागर को फिर से मैदान में उतारा है.

कैराना में गठबंधन प्रत्याशी तबस्सुम हसन सपा से लड़ रही हैं. उपचुनाव में वे रालोद से जीती थीं. भाजपा ने दिग्गज गुर्जर नेता स्वर्गीय हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को नजरअंदाज कर सहारनपुर जिले के विधायक प्रदीप चौधरी को टिकट दिया है. जिन्हें अपेक्षाकृत कमजोर प्रत्याशी माना जा रहा है. कांग्रेस के हरेंद्र मलिक के कारण भाजपा को जाट वोट कटने का खतरा बढ़ गया है.

मेरठ के सपा जिलाध्यक्ष राजपाल सिंह कहते हैं कि केंद्र जीएसटी, नोटबंदी, रोजगार, मेक इन इंडिया की चर्चा तक नहीं कर रहा है. यहां प्रचार में बात हो रही है हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान, एयरस्ट्राइक की. विकास की बात करें तो एयरपोर्ट और दिल्ली-डासना-मेरठ हाईवे अधूरा ही पड़ा है.

2014 की स्थिति:

सभी 8 सीटों-सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर और बिजनौर में भाजपा जीती थी.

सबसे बड़ा फैक्टर क्या रहेगा?

मुद्दे: सांप्रदायिकता, गन्ने का भुगतान, बेरोजगारी

चीनी मिलों द्वारा गन्ने का भुगतान देरी से दिए जाने से क्षेत्र के 5 लाख से अधिक किसान परेशान हैं. कानून व्यवस्था, सांप्रदायिक तनाव और बेरोजगारी भी असरदार है.  मेरठ में हाईकोर्ट बेंच की मांग, गाजियाबाद-गौतमबुद्ध नगर, नोएडा में बड़े आवासीय प्रोजेक्ट में फंसे लोग मुद्दा है.

जाति: मुस्लिम, जाट, दलित और गुर्जर असरदार रहेंगे

बिजनौर, सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ में मुसलमानों की संख्या 32.6 से लेकर 41.7% है. गाजियाबाद, नोएडा, बागपत में भी मुस्लिम मतदाताओं की संख्या डेढ़ लाख से पांच लाख तक है. जाट, गुर्जर, दलित वोट भी अच्छी खासी तादाद में हैं. त्यागी, सैनी, राजपूत वोट भी बड़ी संख्या में हैं इन्हें भाजपा का परंपरागत वोटर माना जाता है.

गठबंधन: चौधरियों के लिए कांग्रेस ने छोड़ी दो सीटें

सपा बसपा राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन है. रालोद मुजफ्फरनगर, बागपत तो सपा गाजियाबाद, कैराना वहीं बसपा सहारनपुर, मेरठ, गौतमबुद्ध नगर और बिजनौर में लड़ रही है. भाजपा अकेले चुनाव लड़ रही है. कांग्रेस ने चौधरी अजित सिंह और जयंत चौधरी के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है.

Wednesday, April 1, 2020

कोरोना पर कुछ सवाल और उनके जवाब


ये सवाल आज के समय में हर किसी के दिल में चल रहे है इससे डरिए नहीं आइए इसे समझिए

कोरोना का कहर तो दुनिया में चोरों तरफ हैं। इससे दुनिया का कोई देश अछुता नहीं रहा है। तो कोरोना को लेकर जनता में मन में कई ऐसे सवाल है जो एक से है। तो आज हम बात करने जा रहे है कुछ ऐसे ही सवालों के जवाबों की-
1. क्या है कोरोना वायरस ?
कोरोना वायरस एक वायरसों का एक पूरा परिवार है जो इंसानों और जानवरों में गंभीर बीमारी की वजह बन सकता है। बता दें कि इंसानों में यह वायरस सांस लेने में परेशानी जैसी संबंधित तमाम संक्रमण पैदा कर देता है। जिससे मिडिल ईस्ट रेस्पेरटरी सिंड्रोम (MERS) और सीवियर एक्यूट रेस्पिरेट्री सिंड्रोम (SARS) जैसी खतरनाक बीमारियां हो जाती हैं। 
2. कैसे फैलता है कोरोना वायरस (किन-किन कारणों से)
यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। यदि कोई व्यक्ति वायरस से संक्रमित है और कोई अन्य स्वस्थ व्यक्ति इसकी चपेट में आता है तो वो व्यक्ति भी इसका शिकर हो जाता है। जब कोरोना से पीड़ित शख्स खांसता है या सांस लेता है तो नाक या मुंह से कुछ छींटे दूसरे इंसान के शरीर में भी प्रवेश कर जाते है और वो स्वस्थ व्यक्ति संक्रमण का शिकार हो जाता है। इसके अलावा कोई भी वस्तु या सतह को छूकर हाथों को अपने मुंह, नाक या आंखों के पास ले जाने से भी आप कोरोना वायरस का खतरा बढ़ जाता है। इसीलिए कोरोना वायरस से पीड़ित लोगों से करीब 3 फीट या 1 मीटर की दूरी बनाए रखना जरूरी है। 

3. क्या कोरोना हवा के जरिए फैलता है ?
कई लोग ये सवाल भी करते है कि क्या कोरोना वायरस हवा के जरिए भी फैलता है तो आपको बता दें कि अभी तक हुई स्टडीज से ऐसा कुछ पता नहीं चला है। कोविड-19 मुख्यत: सांस या छींकने वक्त निकले छींटों के संपर्क में आने से फैलता है ना कि हवा से।

4. पीड़ित व्यक्ति के मल से भी हो सकता है संक्रमण ?
कोरोना वायरस से पीड़ित व्यक्ति के मल-मूत्र से उस स्वस्थ व्यक्ति के संक्रमित होने का खतरा काफी कम है। इस बात को लेकर कुछ स्टड़ी में बताया गया है कि कुछ मामलों में पीड़ित व्यक्ति के मल में कोरोना वायरस मौजूद होता है। लेकिन इसे महामारी की वजह नहीं कह सकते है। बाथरूम के इस्तेमाल के बाद या खाने से पहले अच्छी तरह से हाथ धो के इस सक्रमण से बचा जा सकता है। 

5. कोरोना से बचने के लिए मास्क कितना फायदेमंद ?
इस बात को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन  WHO के मुताबिक, अगर किसी भी व्यक्ति में कोरोना वायरस के लक्षण नजर आते है या आप बीमार हैं तो ही मास्क पहनें। इसके अलावा अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति का ध्यान रख रहे है देखभाल कर रहे हैं जो कोरोना वायरस से संक्रमित है तो भी आप मास्क पहनिए। लेकिन अगर आप बीमार नहीं है या किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में नहीं है तो आपको मास्क पहनने की जरूरत नहीं है।

6. किन लोगों को होता है कोरोना का सबसे ज्यादा खतरा ?
इस बात को लेकर अभी तक जितनी स्टडी हुई है उसमें पता चला है कि कोरोना वायरस सबसे ज्यादा अपना शिकार बुजुर्गों और पहले से बीमार (हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट डिसीज, लंग डिसीज, कैंसर या डायबिटीज) आदि बीमारी वाले लोगों को अपना ज्यादा शिकार बनता हैं। 

7. क्या पालतू जानवर से भी फैलता है कोरोना वायरस ?
बता दें कि अभी अभी तक हॉन्ग कॉन्ग में एक कुत्ते के कोरोना वायरस से संक्रमित होने का मामला सामने आया है लेकिन अभी इसका कोई सबूत नहीं है कि किसी कुत्ते, बिल्ली या पेट से कोरोना का संक्रमण फैल सकता है।

8. क्या नॉनवेज खाने से फैल सकते है कोरोना वायरस ?
कोरोना वायरस ह्यूमन वायरस है। यह एक से दूसरे व्यक्ति के संपर्क में आने से फैलता हैं। दुनिया भर के हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि नॉनवेज और अंडा खाने से ये वायरस नहीं फैलता। साथ ही नॉनवेज और कोरोना वायरस का कोई लेना-देना नहीं है। अगर आपको नॉनवेज खाना है तो उस अच्छे से पकाकर खा सकते हैं. खान-पान में भी हाइजीन का ध्यान रखने की जरूरत है।

कोरोना दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा संकट- UN प्रमुख


कोरोना महामारी को लेकर संयुक्त राष्ट्रीय सचिव एंटोनियो गुटेरस ने दुनिया को चेताया। उन्होंने इसे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सबसे बड़ा संकट बताया है।

संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंटोनियो गुटेरस ने कोरोना को द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अब तक का सबसे बड़ा वैश्विक संकट बताया है। 

गुटेरस ने कहा, "संकट इसलिए भी बड़ा है क्योंकि ये बीमारी दुनिया में हर किसी के लिए खतरा है और.. इसका अर्थव्यवस्था पर ऐसा असर होगा कि पिछले कुछ सालों की सबसे बड़ी मंदी सामने आएगी. दुनिया में अस्थिरता, अशांति और टकराव बढ़ेंगे. इन सबको देखकर हमें यकीन हो जाता है कि यह दूसरे विश्व युद्ध के बाद का सबसे चुनौतीपूर्ण संकट है"।

कोरोना से निपटने के लिए बंद करना होगा राजनीतिक खेल

1945 में दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के खत्म होने होने के बाद राष्ट्र की स्थापना हुई थी इसके 193 सदस्य देश हैं। गुटेरस ने कहा, "इस संकट का मजबूत और असरदार हल तभी संभव है जब हर कोई साथ आए. इसके लिए हमें राजनीतिक खेल बंद करने होंगे और समझना होगा कि मानव प्रजाति दांव पर लगी हुई है"।

गुटेरस ने कहा कोरोना महामारी ने दुनिया भर में कई लोगों को मौत की नींद सुला दिया है। इससे भयंकर आर्थिक तबाही हो रही है। उद्योग धंधे खत्म हो रहे हैं हो रहे हैं। इस स्थिति को देखकर गुटेरस ने कहा की कई विकासशील देशों की बीमारी से लड़ाई में मदद के लिए हम अभी तक एक वैश्विक पैकेज का ऐलान नहीं कर सके हैं।

यूएन प्रमुख ने कहा, "हम धीरे-धीरे सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं लेकिन हमें अपनी रफ्तार तेज करनी होगी और अगर हम वायरस को हराना चाहते हैं तो हमें और भी बहुत कुछ करना होगा"।

बता दें, मंगलवार को यूएन ने विकासशील देशों की मदद के लिए एक नए फंड की घोषणा की। पिछले हफ़्ते उन्होंने वैश्विक समुदाय से गरीबों और संघर्ष से प्रभावित देशों के लिए दान की अपील की थी। गुटेरस ने कहा, "अमीर देशों से पारंपरिक मदद के अलावा हमें अतिरिक्त आर्थिक मदद की भी जरूरत है ताकि विकासशील देश इस संकट का सामना कर सकें"।
 
वापस लौट सकत है कोरोना वायरस

गुटेरस ने कहा, "कोरोना वायरस गरीब देशों खासकर अफ्रीका से अमीर देशों में वापस लौट सकती है और लाखों लोगों की जानें जा सकती हैं।

वर्ल्ड बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कोरोना वायरस को लेकर चेतावनी जारी करते हुए कहा इस महामारी से एशिया में गरीबी बढ़ सकती है। इससे गरीब और गरीब होंगे। यहां तक कि अमीर देशों को भी कई संकटों का सामना करना होगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि समा मारी के कारण चीन की अर्थव्यवस्था रुक जाएगी।

विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, "अगर महामारी बहुत ही भयावह स्थिति में पहुंच गई तो इस साल चीन की आर्थिक वृद्धि दर 0.1% पर पहुंच सकती है. चीन की तरह आसपास के देशों की अर्थव्यवस्था की हालत खराब होगी. इससे पूरे इलाके में गरीबी बढ़ेगी और लोगों के पास कमाई के साधन न के बराबर बचेंगे. वर्ल्ड बैंक ने ये भी कहा है कि कोरोना वायरस की महामारी से अर्थव्यवस्था को जो नुकसान होगा.