Monday, May 18, 2020

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जातियों का समीकरण

वोट बैंक के लिहाज़ से देखें तो सबसे बड़ा ख़तरा सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को है, जिसका मुस्लिम वोट बैंक खतरे में नज़र आ रहा है। यूपी में मुसलमानों की संख्या करीब 17 प्रतिशत है, जिन्होंने बीते 15 सालों से सपा का हाथ थाम रखा है। बीते विधानसभा चुनाव में भी सपा को 60 प्रतिशत से ज़्यादा मुस्लिम वोट मिले थे, लेकिन मुज़फ्फरनगर दंगे व दादरी कांड के बाद मुस्लिम सपा से खफा हैं। सपा प्रमुख मुलायम सिंह व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मुजफ्फरनगर दंगे के 6 माह बाद वहां लोगों से मिलने गए थे, जिसकी मुस्लिम समुदाय ने तीखी आलोचना की थी। यूपी चुनाव को लेकर हुए सभी सर्वे में मायावती की बीएसपी को सबसे आगे बताया गया है। मुस्लिम समुदाय की खासियत यह है कि इनका वोट ज़्यादा बंटता नहीं है।

वहीं, बीजेपी को यूपी में आने से रोकने के लिए मुस्लिम समुदाय उस पार्टी को वोट देगी जो उनको कड़ा मुकाबला दे सके। वर्तमान स्तिथि में बीएसपी सपा से ज़्यादा मज़बूत लग रही है और इस बात के पूरे आसार हैं कि मुस्लिम समुदाय सपा का हाथ छोड़कर बहनजी का दामन थाम लें। अगर ऐसा हुआ तो बीएसपी को 70 सीटों में फ़ायदा होगा, जहां मुस्लिम वोट अहम रोल अदा करता है, जबकि सपा को इन 70 सीटों में नुकसान झेलना पड़ सकता है। यूपी में दलितों की आबादी 20 प्रतिशत हैं, जिनका वोट एकतरफा मायावती को जाता है। दलित वोट के साथ-साथ अगर अधिकांश मुस्लिम वोट भी मायावती को मिला तो बीएसपी को यूपी चुनाव में नंबर एक पार्टी बनने से कोई नहीं रोक सकता है। वहीं, सपा के पास महज़ अपना परंपरागत 9 प्रतिशत यादव वोट है जो किसी और पार्टी  को नहीं जाता है, लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए यह काफी नहीं हैं। अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद सपा से लाखों युवा जुड़े हैं, लेकिन हाल ही में हुई मथुरा हिंसा और बिगड़ती कानून-व्यवस्था के कारण पार्टी को इसका ज़्यादा फ़ायदा मिलना मुश्किल ही नज़र आ रहा है।

इस चुनाव को सबसे दिलचस्प बनाती है बीजेपी... जिसने 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के दम पर 80 में से 71 सीटें जीती थी। हालांकि 1991 में जहां यूपी में बीजेपी को 221 विधानसभा सीटें मिली थीं, वह 2012 में घटकर महज़ 47 ही रह गईं। दिल्ली और बिहार चुनाव में करारी हार के बाद मोदी और पार्टी को मज़बूत बनाने के लिए यूपी का सहारा है, लेकिन सीएम प्रत्याशी व चुनावी एजेंडा जैसे अहम मुद्दों पर एकमत नहीं बना पा रही है। बीजेपी का यूपी चुनाव में हिंदुत्व व व ध्रुवीकरण मुख्य हथियार होगा , जिसका फ़ायदा पार्टी को पश्चिमी यूपी में मिलेगा। पश्चिमी यूपी में 27 ज़िले आते हैं, जहां हिन्दुओं की संख्या 73 प्रतिशत है, जिसमें जाट और गुर्जर भी आते हैं। लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में वोट मिले थे। मुज़फ्फरनगर दंगे, दादरी कांड व मथुरा में हुई हिंसा ने यूपी के इस हिस्से में सपा को बेहद कमज़ोर कर दिया है। जाटों ने भी अजीत सिंह का साथ छोड़कर बीजेपी को अपना हितैषी मान लिया है।

अगर लोकसभा की तरह राज्य चुनाव में भी बीजेपी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोगों का समर्थन मिला तो पार्टी आने वाले चुनाव में बेहद अच्छा प्रदर्शन करेगी। प्रयाग नगरी इलाहाबाद में पार्टी की राष्ट्रीय इकाई की बैठक करके हिन्दुओं को पूरी तरह से अपनी तरफ खींचने की योजना बनाई जा रही है। केशव प्रसाद मौर्या को बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर 31 प्रतिशत ओबीसी जनसंख्या को भी टारगेट किया जा रहा है। यूपी में राजनाथ सिंह को पार्टी प्रदेश के सबसे बड़े नेता के रूप में दिखा रही है, हालांकि उन्हें मुख्यमंत्री उम्मीदवार नहीं घोषित किया गया है। उनके ज़रिए पार्टी 8 प्रतिशत ठाकुर वोट जीतना चाहेगी। ब्राह्मण, कुर्मी व भूमिहार वोट जिनकी संख्या क़रीब तेरह प्रतिशत है भी बीजेपी को अच्छा समर्थन देंगे, क्‍योंकि यह यूपी में परंपरागत इन्हीं के साथ जुड़े रहे हैं।  

यूपी में सबसे बड़ा संकट कांग्रेस के साथ है जो बीते विधानसभा चुनाव में मिली 29 सीटें ही बचा ले तो बड़ी बात होगी। यूपी में कांग्रेस को भी उच्च जातियों के वोट मिलते आए हैं, लेकिन पूरे देश में कांग्रेस की हो रही दुर्गति के चलते बेहद मुश्किल है कि पार्टी पर ज़्यादा लोग भरोसा कर पाएं। कांग्रेस के पास यूपी में कोई भी बड़ा नेता नहीं है जो मायावती व अखिलेश यादव से टक्कर ले सके। कांग्रेस में आपसी मतभेद भी बढ़ रहे हैं और पार्टी को प्रशांत किशोर के अलावा कोई सहारा नज़र नहीं आ रहा है, जिन्होंने बीते लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी व बिहार चुनाव में नीतीश के लिए रणनीति बनाई थीं। राहुल गांधी भी कांग्रेस को दोबारा खड़ा करने में पूरी तरह नाकामयाब साबित हुए हैं।   

जातीय व धार्मिक समीकरण से देखें तो यूपी में बीएसपी और बीजेपी को फ़ायदा मिलता दिख रहा है, जबकि मुस्लिम समुदाय का विश्वास खो रही समाजवादी पार्टी को नुकसान। लोकसभा चुनाव के बाद से सिर्फ बुरे दिन देख रही कांग्रेस की ज़ोरदार वापसी यूपी चुनाव में तो खैर मानों नामुमकिन ही है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जातिगत समीकरण

पश्चिम उत्तर प्रदेश की पहले चरण वाली 8 सीटों में से पांच- मेरठ, मुजफ्फरनगर, कैराना, सहारनपुर और बिजनौर में करीब 33 से लेकर 42% तक मुस्लिम आबादी है. ऐसे में जातिगत समीकरण पर सवार सपा, रालोद और बसपा की काट के लिए भाजपा के पास विकास, राष्ट्रवाद और एचएम फैक्टर यानी हिंदू-मुस्लिम अहम हथियार साबित होता है.

सबसे प्रतिष्ठापूर्ण मुकाबला मुजफ्फरनगर में है, जहां रालोद प्रमुख अजित सिंह चुनाव लड़ रहे हैं. अजीत सिंह पिछली बार बागपत से उतरे थे और तीसरे नंबर पर रहे थे. वे गठबंधन के उम्मीदवार हैं. इस सीट पर करीब 38% मुसलमान और करीब 14% दलित वोटर हैं. इसके साथ ही दो लाख जाट मतदाता हैं. जिसके सहारे अजित सिंह यहां मजबूत हैं.

लेकिन यहां पूर्व केंद्रीय मंत्री और मुजफ्फरनगर के सांसद संजीव बालियान की ताकत क्षेत्र में उनकी सक्रियता है. महावीर चौक स्थित सपा के कार्यालय में बैठे रालोद के जिला अध्यक्ष अजीत राठी कहते हैं कि मुजफ्फरनगर दंगों में जाट और मुस्लिम एकता को तोड़ने काम भाजपा ने किया था. लेकिन भाईचारा सम्मेलन कर चौधरी साहब (अजित सिंह) ने इस खाई को पाट दिया है.

मेरठ की बात करें तो सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. मेजर हिमांशु कहते हैं कि गठबंधन के बसपा उम्मीदवार हाजी याकूब की सभी वर्गों में सहज स्वीकार्यता नहीं है. भाजपा के राजेंद्र अग्रवाल तीसरी बार चुनाव में हैं, क्षेत्र में उनकी सक्रियता कम रही, बावजदू इसके याकूब की कट्‌टर छवि ही राजेंद्र अग्रवाल की सबसे बड़ी ताकत बन गई है.

याकूब वही हैं जिन्होंने मोहम्मद साहब का कार्टून बनाने वाली पत्रिका के कार्टूनिस्ट का सिर कलम करने पर 51 करोड़ का इनाम देने की घोषणा की थी. गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) में केंद्रीय मंत्री और भाजपा उम्मीदवार डाॅ. महेश शर्मा ने मंत्री रहते कई विकास कार्य करवाए हैं, जिनमें जेवर हवाई अड्‌डा भी शामिल है.

लेकिन 3 लाख गुर्जर, 1.5 लाख यादव और दो लाख मुसलमान वोटों वाली इस सीट पर बसपा के सत्यवीर नागर अपनी बढ़त मान रहे हैं. वहीं कांग्रेस ने अरविंद सिंह को उतारा है, वे राजपूत वोट काट सकते हैं, जो कि भाजपा का वोट है.

गाजियाबाद में जनरल वीके सिंह सुरक्षित नजर आ रहे हैं. करीब दो लाख राजपूत वोट और मिडिल क्लास वोटर्स की बड़ी संख्या जनरल के पक्ष में दिखती है. यह पश्चिमी यूपी की सबसे बड़ी सीट है, जहां करीब 27 लाख मतदाता हैं.

वी.के. सिंह के पक्ष में एक बात और जाती है कि स्थानीय राजनीति में हस्तक्षेप से उन्होंने खुद को दूर रखा. इस कारण सभी भाजपाई प्रचार में लगे हैं. बसपा ने सुरेश बंसल को टिकट दिया है. यहां करीब दो लाख वैश्य वोट हैं, पर बंसल की चुनौती यही होगी कि वे भाजपा के परंपरागत वैश्य वोट को कितना खींच पाएंगे.

बागपत में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की तीसरी पीढ़ी के जयंत चौधरी मैदान में हैं. जयंत 2009 में मथुरा से सांसद रहे हैं, पर पिछला चुनाव वहीं से हारे थे. जयंत रालोद के टिकट पर गठबंधन के उम्मीदवार हैं.  ऐसे में यहां केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह का सीधा मुकाबला जयंत से है. जातीय गणित के कारण सत्यपाल के लिए यह चुनाव मुश्किल हो सकता है.

सहारनपुर में गठबंधन उम्मीदवार बसपा के फजलुर्रहमान ने कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. 2014 की प्रचंड मोदी लहर में भी इमरान 64 हजार वोटों से हारे थे, जो इस क्षेत्र की सबसे छोटी हार थी. लेकिन इस बार बसपा प्रत्याशी के कारण वे परेशानी में है.

39% मुस्लिम मतदाताओं का रुख ही इमरान की हार-जीत तय करेगा. उनका मुकाबला भाजपा के सौम्यछवि के नेता और वर्तमान सांसद राघव लखन पाल से है. इमरान को भीम आर्मी के चंद्रशेखर का भी समर्थन हासिल है. ऐसे में इमरान को दलित वोट की भी आस है.

बिजनौर में राजपूत अपेक्षाकृत अधिक हैं, जाट वोट भी हैं जिन पर चौधरी अजीत सिंह का असर दिखता है. यहां कभी बसपा में रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने इस बार कांग्रेस टिकट पर मुकाबले को रोचक बना दिया है. भाजपा ने वर्तमान सांसद भारतेंद्र सिंह और बसपा ने मलूक नागर को फिर से मैदान में उतारा है.

कैराना में गठबंधन प्रत्याशी तबस्सुम हसन सपा से लड़ रही हैं. उपचुनाव में वे रालोद से जीती थीं. भाजपा ने दिग्गज गुर्जर नेता स्वर्गीय हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को नजरअंदाज कर सहारनपुर जिले के विधायक प्रदीप चौधरी को टिकट दिया है. जिन्हें अपेक्षाकृत कमजोर प्रत्याशी माना जा रहा है. कांग्रेस के हरेंद्र मलिक के कारण भाजपा को जाट वोट कटने का खतरा बढ़ गया है.

मेरठ के सपा जिलाध्यक्ष राजपाल सिंह कहते हैं कि केंद्र जीएसटी, नोटबंदी, रोजगार, मेक इन इंडिया की चर्चा तक नहीं कर रहा है. यहां प्रचार में बात हो रही है हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान, एयरस्ट्राइक की. विकास की बात करें तो एयरपोर्ट और दिल्ली-डासना-मेरठ हाईवे अधूरा ही पड़ा है.

2014 की स्थिति:

सभी 8 सीटों-सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर और बिजनौर में भाजपा जीती थी.

सबसे बड़ा फैक्टर क्या रहेगा?

मुद्दे: सांप्रदायिकता, गन्ने का भुगतान, बेरोजगारी

चीनी मिलों द्वारा गन्ने का भुगतान देरी से दिए जाने से क्षेत्र के 5 लाख से अधिक किसान परेशान हैं. कानून व्यवस्था, सांप्रदायिक तनाव और बेरोजगारी भी असरदार है.  मेरठ में हाईकोर्ट बेंच की मांग, गाजियाबाद-गौतमबुद्ध नगर, नोएडा में बड़े आवासीय प्रोजेक्ट में फंसे लोग मुद्दा है.

जाति: मुस्लिम, जाट, दलित और गुर्जर असरदार रहेंगे

बिजनौर, सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ में मुसलमानों की संख्या 32.6 से लेकर 41.7% है. गाजियाबाद, नोएडा, बागपत में भी मुस्लिम मतदाताओं की संख्या डेढ़ लाख से पांच लाख तक है. जाट, गुर्जर, दलित वोट भी अच्छी खासी तादाद में हैं. त्यागी, सैनी, राजपूत वोट भी बड़ी संख्या में हैं इन्हें भाजपा का परंपरागत वोटर माना जाता है.

गठबंधन: चौधरियों के लिए कांग्रेस ने छोड़ी दो सीटें

सपा बसपा राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन है. रालोद मुजफ्फरनगर, बागपत तो सपा गाजियाबाद, कैराना वहीं बसपा सहारनपुर, मेरठ, गौतमबुद्ध नगर और बिजनौर में लड़ रही है. भाजपा अकेले चुनाव लड़ रही है. कांग्रेस ने चौधरी अजित सिंह और जयंत चौधरी के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है.