Saturday, January 23, 2016

असहिष्णुता को बढ़ावा ना दें


भारत में असहिष्णुता एक ऐसा विषय बन चुका है, जो कभी-भी जागृत हो जाता है। बीते नवंबर के मास में असहिष्णुता पर जमकर बवाल हुआ था। कलाकार आमिर खान ने असहिष्णुता पर अपनी पत्नी की चिंता व्यक्त की। उसके बाद जो हुआ वह किसी से छिपा नहीं है। इस बार बाॅलीवुड कलाकार करन जौहर ने जयपुर में साहित्य फेस्टिवल के दौरान असहिष्णुता पर सार्वजनिक रूप से अपने विचार रख कर अनजाने में असहिष्णुता के विषय को फिर से जागृत करने का प्रयास किया है। यह उचित नहीं है।

हमारा देश एक परिवार की तरह है। जिसमें नाना प्रकार के भाव और संस्कृति को मानने वाले मनुष्य रहते हैं। परिवार में हम एक दूसरे के विचारों को सम्मान देते हैं और आपस में सहनशीलता का परिचय देते हैं। ठीक उसी भांति  हमें सहिष्णुता के भाव का परिचय अपने देश में भी देना चाहिए। क्योंकि असहिष्णुता पर इस तरह की बयानबाजी देश में अशांति को पैदा करने का ही काम करती है। इससे सहिष्णुता की भावना के खत्म होने का खतरा बढ़ता है। अत देश के ऐसे सम्मानित लोगों को इस तरह की बयानबाजी पर विराम लगाना चाहिए। देश और समाज उनसे उनके व्यवहार और विचारों में परिपक्वता की उम्मीद करता है।
बड़ा दुख होता है कि ऐसे दुख और संताप बढ़ाने वाले बयानों को भी हमारा टीवी मीडिया पूरे दिन टीवी चैनल पर प्रसारित करता है। और साथ ही कुछ चैनल ऐसे विषयों को एक गंभीर मुद्दा बनाने से नहीं चूकते, जोकि गलत है।

ऐसे प्रसारण लोगों को जागरूक करने की बजाय उन्माद और कट्टरता को बढ़ावा ही देते हैं। छोटी-छोटी बातों और अफवाहों पर जाति और धर्म संप्रदाय विशेष के अनुयायी सड़कों पर लाठी, पत्थर और हथियार लेकर निकल पड़ते हैं। ऐसा ही कुछ बंगाल के मालदा में भी हुआ।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ऐसी उग्रता तथा हिंसात्मक अभिव्यक्ति समाज और देश के लिए खतरे की घंटी है। लोग अपने ही भाई बधुंओं के विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी सहन नहीं कर पा रहे हैं। एक दूसरे पर अमर्यादित और अभद्र भाषा की कीचड़ उछालना शुरू कर देते हैं। यह स्वस्थ समाज के लिए बहुत ही गंभीर विषय है।

यदि इसके संभावित कारणों पर गौर करें कि ऐसा क्यों हो रहा है। तो कुछ बातें समझ में आती हैं। लोगों में राष्टीयता की भावना शून्य हो गई है। वे जाति, प्रांत और संप्रदाय में बंट गए हंै। लोग हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, जैन, वैष्णव, सिया-सुन्नी इत्यादि में बंट गए हैं। यहां पर संप्रदाय मुख्य हो गए हैं और राष्टीयता गौण हो गई है। ये कौन कर रहा है? क्यों कर रहा है? मैं यहां पर किसी समुदाय या व्यक्ति विशेष का नाम नहीं लेना चाहता हूं। लेकिन ऐसे लोग अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक फायदों के लिए देश की जनता की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहें हैं। एक तरह से ये लोग मानवता के हत्यारे हैं। मनुष्य की धार्मिक भावनाओं को भड़का कर खूनी खेल खेला जा रहा है। ये लोग देश को आर्थिक और सामाजिक आघात पहंचा रहे हैं।

मैं इन लोगों के बहकावे में आकर इंसान को इंसान ना समझने वाले मनुष्यों से जानना चाहता हूं कि जब आपका कोई भाई बंधु दूसरे देश में जाता है और उससे पूछा जाता है कि आप किस देश के नागरिक हैं, तो वह बताता है कि मैं हिन्दुस्तान का नागरिक हूं। तो उस वक्त उसे वहां पर हिन्दुस्तानी कहा जाता है। तो फिर यहां संप्रदाय प्रधान कैसे हो गए? धर्म सिर्फ इंसान की ईश्वर में आस्था का प्रतीक है। संप्रदाय इंसान की पहचान नहीं हो सकता, इंसान की पहचान उसके व्यवहार और चरित्र से होती है। मनुष्य के इस पतन के लिए देश की राजनीति में कुछ स्वार्थी लोग जिम्मेदार हैं। जो राजनीति करने के बजाय मानवता के हत्यारे बने हुए हैं। अपनी राजनीतिक पिपासा के लिए किसी भी हद तक गिरने के लिए तैयार हैं क्योंकि वे जानते हैं भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इन्हें राजनीति में बने रहने के लिए जन समर्थन आवश्यक है। इसलिए इन लोगों ने मनुष्य को संप्रदाय के आधार पर बांटना शुरू कर दिया। जिसके परिणाम दंगों और हत्याओं के रूप में सामने आ रहे हैं। मुझे तो लगता है इस तरह के लोगों को संसद में पहुंचने का अधिकार ही नहीं चाहिए। संसद में दिखने वाले चेहरों को पहले प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। जिससे वह व्यक्तिगत स्वार्थ से उपर उठ कर देश हित में सोचें।

अब सवाल यह उठता है कि ऐसे हालातों और असहिष्णुता को पनपने से कैसे रोका जाए? कैसे संप्रदाय से उपर उठकर आपसी सौहार्द और भाई चारे के साथ साथ राष्टीयता की भावना का विकास किया जाए? जिससे प्राणियों में सदभावना हो। इसके लिए मनुष्य को इन जाति, संप्रदाय और प्रांतवाद के छोटे-छोटे समूहों में वर्गीकृत होना छोड़ कर इंसान ही बने रहने का प्रयास करना होगा। जो मानव समाज के लिए बेहतर है।

मैं मानव समाज के साथ-साथ जनता द्वारा चुने गए जन प्रतिनिधियों से भी अनुरोध करता हूं कि वे सिर्फ राजनीति करें। मनुष्य की धार्मिक भावनाओं की रक्षा करें। हमारे संविधान के मुताबिक धर्म निरपेक्षता का अर्थ है कि सभी देशवासी अपनी धार्मिक भावनाओं के अनुसार कहीं भी पूजा पाठ कर सकते हैं और दूसरे धर्म का आदर करें। सरकार से भी अपेक्षित है कि वह राजनीति धर्म का पालन करे। जिससे प्राणियों में सद्भावना हो। धर्म निरपेक्ष राज्य का दायित्व है कि वह धर्म की चिंता करे। मानवीय गुणों के विकास का जो धर्म है उसकी चिंता करे। जिस धर्म का पक्ष केवल नैतिक और चारित्रिक है वही राज्य को मान्य होना चाहिए। इसका तात्पर्य है कि वैदिक, जैन, बौद्ध, ईसाई और इस्लाम आदि राज्य के धर्म नहीं हो सकते।




Thursday, January 21, 2016

दलित छात्र रोहित की आत्महत्या को मत बनाइए सियासत की चाल

हैदराबाद यूनिवर्सिटी में दलित छात्र रोहित वेमुला के द्वारा आत्महत्या के मामले को राजनीतिक रंग देने की मैं घोर निंदा करता हूं। यह सर्वथा अनुचित है कि इस मामले को बढ़ा चढ़ा कर दिखाने की जो कोशिश की जा रही है। यह देशहित में नहीं है। यह समाज को रूग्ण करने का प्रयास है।

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने छात्र की आत्महत्या को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए देश के प्रधानमंत्री  मोदी को निशाना बनाया। दिल्ली मुख्यमंत्री किस तरह की राजनीति कर रहे हैं। उन्हें अपने राज्य के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए। उनसे इतनी परिपक्वता की तो आशा की जा सकती है कि वह एक छात्र की आत्महत्या को मुद्दा नहीं बनाएंगे। अरविंद केजरीवाल अपने राजधर्म का पालन करें और राज्य में अमन चैन कायम रखने की कोशिश करें। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी और वामपंथी नेता सीताराम येचुरी से उम्मीद करता हूं कि वह अपने बयानों पर नियंत्रण रखें। दिग्विजय सिंह का बयान खेदजनक है। बिना किसी ठोस सबूत के इस तरह की बयान बाजी देशहित में तो नहीं हो सकती।

जबकि नवयुवकों के द्वारा आत्महत्या जैसे कमजोर फैसलों पर चिंतन की सख्त आवश्यकता है।आखिरकार क्या वजह है कि नौजवान युवक और युवतियां आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं? ये लोग मानसिक और भावनात्मक स्तर पर इतने क्षीण हैं कि किसी भी परिस्थिति का सामना करने की बजाय  आात्महत्या कर लेते हैं। इसकी स्पष्ट वजह है शिक्षा नीति में अपरिपक्वता। हमारी शिक्षा नीति सिर्फ बाजारवाद पर आधारित शिक्षा प्रदान कर रही है। लेकिन जीवन को जीने की शिक्षा नहीं दे रही है। आजकल की युवा पीढ़ी एक कुशल उद्यमी तो है लेकिन सामाजिक रिश्तों और परिस्थितियों का सामना करने में अक्षम हंै। वह आर्थिक रूप से नये नये आयाम तो खोज सकती है परंतु बात जब समाज और परिवार की विषम परिस्थितियों की आती है तो इससे ज्यादा कमजोर प्राणी इस पृथ्वी पर कोई नहीं है। हमारी शिक्षा नीति में संस्कारों की उपेक्षा की जा रही है। बच्चे प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के लिए मेरा प्रस्ताव है कि आप देश की शिक्षा नीति पर नये सिरे से सोचे। शिक्षा में संस्कारों और मूल्यों के विकास पर चिंतन करें। देश की शिक्षा नीति ऐसी हो कि युवा प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर सकें। वे मानसिक और भावनात्मक स्तर पर मजबूत हों।
जब युवा प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम होगा। तभी देश और समाज के साथ-साथ परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वाह कर पाएगा। अन्यथा असमय ही मृत्यु या फिर कुंठाग्रस्त जीवन जीने के लिए मजबूर होगा।

Monday, January 18, 2016

मनुष्य क्या है ?

आजकल देश में सामाजिक स्तर पर हालात बेहद चिंताजनक हैं। इसे सामाजिक और इंसानियत में संक्रमण का दौर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। पिछले कुछ समय से देशवासियों के अंदर सांप्रदायिक उग्रता और हिंसात्मक प्रदर्शन देखने सुनने में कुछ ज्यादा ही आ रहे हैं। इन घटनाओं के दौरान पूरे दिन टीवी चैनल पर ऐसी घटनाओं की खबरें और बेबुनियादी बहस प्रसारित की जाती रहती हैं। इन प्रसारणों ने लोगों को जागरूक करने की बजाय उन्माद और कट्टरता को बढ़ावा ही दिया है। देशवासियों में आपसी सौहार्द और भाईचारे की भावना दम तोड़ती साफ देखी जा सकती है। छोटी-छोटी बातों और अफवाहों पर जाति और धर्म संप्रदाय विशेष के अनुयायी सड़कों पर लाठी, पत्थर और हथियार लेकर निकल रहे हैं। चाहे वह नोएडा के पास गौ मांस की अफवाह पर अखलाक की निर्मम हत्या हो, चलती टेन में गौ मांस खाने की संभावना पर साथी यात्री को नीेचे फेंकने की घटना हो, बिहार में भी धार्मिक बवाल देखने के लिए मिला और अभी हाल ही में बंगाल के मालदा की घटना। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ये उग्रता तथा हिंसात्मक अभिव्यक्ति समाज और देश के लिए खतरे की घंटी है। लोग अपने ही भाई बधुंओं के विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी सहन नहीं कर पा रहे हैं। एक दूसरे पर अमर्यादित और अभद्र भाषा की कीचड़ उछाल रहें हैं। यह समाज के लिए बहुत ही गंभीर हालात हैं।

यदि इसके संभावित कारणों पर गौर करें कि ऐसा क्यों हो रहा है। तो कुछ बातें समझ में आती हैं। लोगों में राष्टीयता की भावना शून्य हो गई है। वे जाति, प्रांत और संप्रदाय में बंट गए हंै। लोग हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी और इसके बाद संप्रदाय जैसे सनातन, जैन, वैष्णव इत्यादि में बंट गए हैं। यहां पर संप्रदाय मुख्य हो गए हैं और राष्टीयता गौण हो गई है। ये कौन कर रहा है? क्यों कर रहा है? मैं यहां पर किसी समुदाय या व्यक्ति विशेष का नाम नहीं लेना चाहता हूं। लेकिन ऐसे लोग अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक फायदों के लिए देश की जनता की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहें हैं। एक तरह से ये लोग मानवता के हत्यारे हैं। मनुष्य की धार्मिक भावनाओं को भड़का कर खूनी खेल खेला जा रहा है। ये लोग देश को आर्थिक और सामाजिक आघात पहंुचा रहे हैं।
मैं इन लोगों के बहकावे में आकर इंसान को इंसान ना समझने वाले भोले भाले मनुष्यों से जानना चाहता हूं कि जब आपका कोई भाई बंधु दूसरे देश में जाता है और उससे पूछा जाता है कि आप किस देश के नागरिक हो, तो वह बताता है कि मैं हिन्दुस्तान का नागरिक हूं। तो उस वक्त उसे वहां पर हिन्दुस्तानी कहा जाता है ना हिन्दु, मुस्लिम या सिख ईसाई। तो फिर ये संप्रदाय प्रधान कैसे हो गए। धर्म सिर्फ इंसान की ईश्वर में आस्था का प्रतीक है। संप्रदाय इंसान की पहचान नहीं हो सकता, इंसान की पहचान उसके व्यवहार और चरित्र से होती है। मनुष्य के इस पतन के लिए देश की राजनीति में कुछ स्वार्थी लोग जिम्मेदार हैं। जो राजनीति करने के बजाय मानवता के हत्यारे बने हुए हैं। अपनी राजनीतिक पिपासा के लिए किसी भी हद तक गिरने के लिए तैयार हैं क्योंकि वे जानते हैं भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इन्हें राजनीति में बने रहने के लिए जन समर्थन आवश्यक है। इसलिए इन लोगों ने मनुष्य को संप्रदाय के आधार पर बांटना शुरू कर दिया। जिसके परिणाम दंगों और हत्याओं के रूप में सामने आ रहे हैं। मुझे तो लगता है इस तरह के लोगों को संसद में पहुंचने का अधिकार ही नहीं चाहिए। संसद में दिखने वाले चेहरों को पहले प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। जिससे वह व्यक्तिगत स्वार्थ से उपर उठ कर देश हित में सोचें।

अब सवाल यह उठता है कि ऐसे हालातों और असहिष्णुता को पनपने से कैसे रोका जाए। कैसे लोगों में संप्रदाय से उपर उठकर आपसी सौहार्द और भाई चारे के साथ साथ राष्टीयता की भावना का विकास किया जाए। जिससे प्राणियों में सदभावना हो। इसके लिए मनुष्य को इन जाति, संप्रदाय और प्रांतवाद के छोटे-छोटे समूहों में वर्गीकृत होना छोड़ कर इंसान ही बने रहने का प्रयास करना होगा। जो मानव समाज के लिए बेहतर है।

मैं सभी मानव समाज के साथ साथ जनता द्वारा चुने गए जन प्रतिनिधियों से भी अनुरोध करता हूं कि वे सिर्फ राजनीति करें। मनुष्य की धार्मिक भावनाओं की रक्षा करें। हमारे संविधान के मुताबिक धर्म निरपेक्षता का अर्थ है कि सभी देशवासी अपनी धार्मिक भावनाओं के अनुसार कहीं भी पूजा पाठ कर सकते हैं और दूसरे धर्म का आदर करें। तो ऐसे में सरकार भी राजनीति धर्म का पालन करे। जिससे प्राणियों में सद्भावना हो। धर्म निरपेक्ष राज्य का दायित्व है कि वह धर्म की चिंता करे। मानवीय गुणों के विकास का जो धर्म है उसकी चिंता करे। जिस धर्म का पक्ष केवल नैतिक और चारित्रिक है वही राज्य को मान्य होना चाहिए। इसका तात्पर्य है कि वैदिक, जैन, बौद्ध, ईसाई और इस्लाम आदि राज्य के धर्म नहीं हो सकते।

बजट से उम्मीदें और संयमित जीवन




अगले महीने एनडीए सरकार का सालाना बजट आने वाला है। देश के करोड़ों लोगों की निगाहें इस पर लगी हुईं हैं। लोगों ने उम्मीदों की एक लंबी लिस्ट वित्त मंत्री अरूण जेटली को सौंप दी हैं। मौजूदा सरकार के लिए इन उम्मीदों को पूरा कर पाना कितना संभव होगा। यह थोड़ा सा मुश्किल नजर आ रहा है क्योंकि वर्ष 2016 में सरकार सातवां वेतन कमीशन भी लागू करने जा रही है।

देश के नागरिकों के लिए बजट से अभिप्राय है कि उन्हें सरकार से क्या सुविधाएं मिलेंगी। जिसमें वेतनभोगी से लेकर व्यापारी और उद्योगपति तक शामिल हैं। सभी की अपनी अपनी आवश्यकताएं हैं। वित्त मंत्री की भी कोशिश रहेगी कि सभी वर्गाें के लोगों की उम्मीदों को पूरा किया जा सके। लेकिन यहां पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि लोगों आवश्यकताएं क्या हैं। अर्थशास्त्र के मुताबिक सभी लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए धन की व्यवस्था की जाए। कोई भी इतना गरीब ना हो कि उसकी मूलभूत आवश्यकताएं ही पूरी ना हो पाएं। इसलिए बजट में इंसान की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति पर ध्यान रखना जरूरी है। इसके बाद उसकी अन्य आवश्यकताएं आती हैं। व्यक्ति की आवश्याकताओं में भोजन, वस्त्र, आवास, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और सुरक्षा की प्राथमिकता सर्वोपरि है।

भगवान महावीर भी ने कहा है कि केवल इच्छा पूर्ति के लिए या विलासिता के लिए सारे प्रयत्न नहीं किए जाने चाहिए। मनुष्य की यह प्रवृत्ति है कि वह इनकी पूर्ति के लिए धन का संग्रह करता है और ज्यादा से ज्यादा अर्थ का उपार्जन करने का प्रयास करता है। उसका एकमात्र उद्देश्य होता है सुविधा।

उसे सुविधाएं चाहिए इसलिए वह वर्तमान समय में हर बार बजट के दौरान सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित करता है। मनुष्य विलास के प्रति आर्कषित है। वह विलासिता की पूर्ति के लिए अधिक प्रयत्न करता है। जिसके लिए अधिक से अधिक धन का उपार्जन और संग्रह करता है। विलासिता इंसान की आवश्यकता है अनिवार्यता नहीं है। इसलिए सुविधाओं के अतिरेक और विलासिता की अनिवार्यता से बचना होगा।

सुविधाओं और आवश्यकताओं की बात करें तो मैं यह तो नहीं कहूंगा कि इंसान को इसकी कामना नहीं करनी चाहिए। कामना करें लेकिन अतिरेक से बचें।

भगवान महावीर ने सुविधाओं, इच्छाओं और आवश्यकताओं को अस्वीकार नहीं किया है बल्कि मनुष्य को संयमित जीवन जीने के लिए प्रेरित किया है। संयम ही सभी प्रकार के दुखों का हल है। इसलिए बजट से सुविधाओं और आवश्यकताओं की इच्छा तो रखो लेकिन जीवन में संयम का पालन करने का भी प्रयास करो। बजट से ऐसी सुविधाओं की इच्छा मत रखो जो वांछनीय नहीं हैं। वहीं वित्त मंत्री भी ऐसा बजट लेकर आए जो सभी वर्गाें के लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करें। मनुष्य की मूल आवश्यकताओं का अवश्य ध्यान रखा जाए। नहीं तो मनुष्य में मानसिक विकृति और भ्रष्टाचार का खतरा पनपने के अवसर बढ़ेंगे। कहीं ऐसा ना हो कि आर्थिक विकास की चाह में हिंसा को बढ़ावा मिलें। वित्त मंत्री अपने बजट में मादक पदार्थ और मांस के सेवन संबधी वस्तुओं के उपभोग पर नियंत्रण लगाने के लिए टैक्स में बढ़ोतरी का सहारा ले सकते हैं। जो स्वास्थय के लिए हितकारी नहीं हैं। ये मनुष्य को प्रिय तो हो सकती हैं लेकिन हितकारी नहीं है।
इसलिए बजट तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान यह याद रखना होगा कि मूल आवश्यकताओं की पूर्ति, राजकोषीय समावेशन और सुधार की राह पर बने रहना अत्यंत अहम है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकारी राजस्व में नई जान डालनी होगी होगी। बजट के निर्धारण में उपाय तात्कालिक प्रभाव और हल के लिए ना होकर त्रैकालिक होने चाहिए। ठीक वैसे जैसे भगवान महावीर की नीतियां त्रैकालिक हैं जो पांच हजार वर्ष पश्चात भी कारगर और उपयोगी हैं।
एक बात निश्चित रूप से जान लीजिए कि जब तक मनुष्य नहीं बदलेगा, तब तक कुछ नहीं होगा। किसी के हाथ में कुछ नहीं है मनुष्य को बदलना है।

Thursday, January 14, 2016

बजट की कसौटी पर वित्त मंत्री


अगले महीने एनडीए सरकार का सालाना बजट आने वाला है। देश के करोड़ों लोगों की निगाहें इस पर लगी हुईं हैं। लोगों ने उम्मीदों की एक लंबी लिस्ट वित्त मंत्री अरूण जेटली को सौंप दी हैं। मौजूदा सरकार के लिए इन उम्मीदों को पूरा कर पाना कितना संभव होगा। यह थोड़ा सा मुश्किल नजर आ रहा है क्योंकि वर्ष 2016 में सरकार सातवां वेतन कमीशन भी लागू करने जा रही है। जिसकी वजह से 48000 करोड़ का अतिरिक्त दबाव वित्त मंत्री पर होगा। ऐसे में इसका जवाब वित्त मंत्री का सूटकेस अगले महीने देगा।

इस साल भी सरकार पर सबसे जयादा दबाव आयकर में छूट को लेकर है। वेतनभोगी जनता चाहती है कि उसे आयकर में और छूट दी जाए। पिछले बजट में जो छूट मिली थी, उसका लोगों को खासा फायदा नहीं हुआ।
भाजपा ने सत्ता में आने से पहले कहा था कि उनकी सरकार आयकर में छूट की सीमा बढ़ाकर पांच लाख रूपये कर देगी। पिछले बजट में ऐसी उम्मीद थी, लेकन ऐसा नही हुआ। अगर ऐसा नही हो सकता है, तो सरकार दीर्घावधि की बचत के जरिये मिलने वाली छूट की सीमा डेढ़ लाख रूपये से बढ़कर ढाई लाख रूपये कर दे। इतना ही नहीं वेतनभोगियों के लिए दो लाख रूपये तक के स्टैण्डर्ड डिडक्शन की व्यवस्था को फिर से शुरू किया जाए। इससे उन्हें महंगाई से लड़ने में मदद मिलेगी। सरकार ने कई साल पहले मेडिकल छूट के नाम पर 15,000 रूपये की सीमा बनाई थी, जिसे बढा़ना बेहद आवश्यक है। दवाइयों की बढ़ती कीमतें और मेडिकल खर्च की बढ़ती लागत के कारण इसमंें बेढ़ोतरी आवश्यक हो गई है। बच्चों की शिक्षा के लिए दी जाने वाली फीस पर सरकार टैक्स में छूट की व्यवस्था देती है लेकिन वह काफी कम है उसे बढ़ाया जाना चाहिए। वेतनभोगियों का टांसपोर्ट व्यवस्था पर मिलने वाला भत्ता 1600 रूपए से बढ़ाकर 3000 रूपए तक किया जाना चाहिए।
लोगों के लिए आवास ऋण एक ऐसा मुद्दा है जिस पर सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए। देश में मकानों की कीमतें काफी उंची हैं और उस पर ब्याज दरें भी ज्यादा हैं। मध्यम वर्ग आवास ऋण चुकाते चुकाते थक जाता है। इसलिए टैक्स में मिलने वाली दो लाख रूपए की रियायत को बढ़ाया जाना चाहिए।

इसके अलावा मध्यम वर्ग के लिए सर्विस टैक्स सबसे ज्यादा कष्टदायक है। यह सबसे ज्यादा लोगों को तकलीफ दे रहा है। वित्त मंत्री अरूण जेटली ने इसे बढ़ाकर 14.42 तक कर दिया इस बार वित्त मंत्री को इसे खत्म करने के बारे में सोचना चाहिए। बजट में सरकार को शिक्षा औैर स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए। स्वास्थ्य पर तो सरकार ने खर्चाें में कटौती कर दी है और शिक्षा पर जीडीपी का मात्र 3.3 ही खर्च किया जाता है।
इस लिए बजट तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान यह याद रखना होगा कि राजकोषीय समावेशन और सुधार की राह पर बने रहना अत्यंत अहम है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकारी राजस्व में नई जान डालनी होगी होगी। राजस्व के मोर्चे पर सबसे बड़ा और अहम बदलाव वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) है जो राजनीतिक गतिरोध का शिकार है। इसको लेकर वित्त मंत्री का क्या रूख रहेगा। यह दिलचस्प हो सकता है।
वित्त मंत्री ने इस वर्ष 2015 के बजट भाषण में प्रत्यक्ष कर के मामले पर कहा था कि कॉर्पोरशन कर की दर को अगले चार सालों में क्रमश पांच फीसदी अंक घटाते हुए 25 फीसदी किया जाएगा। साथ ही यह भी कहा था कि उन तमाम रियायतों को खत्म किया जाएगा जिनकी वजह से कंपनियां मौजूदा 30 फीसदी से कम कर चुकाती हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश यह प्रक्रिया इस साल 2015 में शुरू नहीं हो सकी। कर दरों को कम करने का खाका तैयार करना अनिवार्य है और इसमें रियायतों को चरणबद्ध ढंग से खत्म करने की व्यवस्था होनी चाहिए।

निजी आयकर में भी रियायत का का रास्ता खोजना होगा। लोगों से ऐसे सुझाव आए हैं कि करदाताओं के लिए यह सीमा बढ़ाकर 5 लाख रुपये सालाना तक की जाए। फिलहाल ऐसा करना कितना उचित होगा अभी नहीं कहा जा सकता। फिलहाल मांग कम है लेकिन उसमें सुधार करने वाले कई कारक नजर आ रहे हैं। दूसरी ओर, प्रत्यक्ष कर का आधार भी सरकार के लिए अहम है। उसे इस पर नये सिरे से सोचना होगा। वहीं कर दायरा बढ़ाने के लिए यह भी आवश्यक है कि अधिकाधिक लेन देन कर व्यवस्था की नजर से गुजरें। इसके लिए पैन (स्थायी खाता संख्या) नंबर अनिवार्य होना चाहिए। हाल के दिनों में इसे लेकर जो कुछ रियायतें दी गईं वे सही नहीं मानी जा सकतीं।

सर्विस टैक्स के मामले में शायद यह सरकार के लिए आखिरी अवसर है कि वह सेवा करदाताओं को जीएसटी के आगमन के पहले तैयार कर सके। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो तो दरों को बढ़ाकर उस अनुमानित राजस्व निरपेक्ष दर के आसपास ले जाना होगा जो जीएसटी के लागू होने के बाद हो जाएगी। ऐसा करके ही जीएसटी को अपनाने के तात्कालिक मुद्रास्फीतिक प्रभाव से बचा जा सकता है। आखिर में कर आतंक समाप्त करने के बारे में एक स्पष्ट वक्तव्य दिया जाना चाहिए। बजट भाषण में ट्रांसफर प्राइसिंग संबंधी लेनदेन कर की अत्यधिक मांग को भी संबोधित किया जाना चािहए। ऐसा करने से निवेशकों के मन में यह आश्वस्ति आएगी कि भारत कारोबारियों के और अधिक अनुकूल हो रहा है।

बजट में सभी वर्गाें के लोगों का बराबर ध्यान रखा जाना चाहिए। क्योंकि इस बार बजट से सभी लोगों को काफी उम्मीदें हैं। ऐसे में वित्त मंत्री के बजट पेश करने से पहले इस पर गंभीर विचार विमर्श की सख्त आवश्यकता है। मध्यम वर्ग के लिए सर्विस टैक्स और आवास ऋण एक बड़ा मुद्दा है तो कारोबारियों के लिए जीएसटी बड़ा मुद्दा है।