इससे पहले कि आप कहें, ‘आप क्यों ज्ञान दे रहे हैं?’ मैं सॉरी कहते हुए अपनी बात शुरू करत हूं। दरअसल, आपकी तरह मैं भी खुद को सलाह देने के आकर्षण से मुक्त नहीं कर पाती। और फिलहाल सलाह यह है कि हमें बेवजह सलाह देना बंद कर देना चाहिए। सलाह चीज ही ऐसी है, जिसे हम देना पसंद करते हैं, पर लेना नहीं। सोचकर क्या वाकई हंसी नहीं आती कि हमारी अपनी समस्याएं दूसरों की सलाह का मुंह ताक रही होती हैं, पर दूसरों के लिए हम कहीं से भी हल
खोज लेते हैं। कम से कम सलाह देने के शौकीनों को यही लगता है कि वही करना सही रहेगा, जो वे कह रहे हैं। फिर इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप दूसरे व्यक्ति या उसकी स्थितियों को कितना जानते हैं? ऐसे ज्ञानियों के सामने ओलंपिक में पदक जीतीं पीवी सिंधु या फिर साक्षी मलिक खड़ी हों तो वे उन्हें भी कह सकते हैं कि फलां फलां स्मैश खेला होता या वैसी पटकनी दी होती तो गोल्ड मैडल हम जीत जाते।
रिलेशनशिप एक्सपर्ट कहते हैं, दूसरों के टाइमजोन का ध्यान न रखना, सही सलाह को भी बेकार कर देता है। मतभेद होता ही तभी है जब हमारे अनुभव और योग्यता दूसरों के टाइमजोन में प्रवेश करके उन्हें बदलने की कोशिश करते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर कहते हैं, ‘दूसरों को अपने ज्ञान की सीमाओं मे कैद न करें। वे अलग समय में पैदा हुए हैं।’ यही कारण है कि हम जितनी कोशिश दूसरों की निजी सोच को बदलने की करते हैं, वे उतना ही अपनी आजादी को बचाने में जुट जाते हैं। फिर चाहे बड़े हों या बच्चे।
परेशानी में जब कोई अपना हो
प्रश्न हो सकता है कि जब कोई अपना ही तकलीफ में हो तो कैसे चुप रहे? खासकर जब आपकी सलाह वाकई मदद कर सकती है। लेखक रॉबर्ट बोल्टन अपनी पुस्तक ‘पीपुल स्किल्स’ में लिखते हैं, ‘बहुत कम लोग ये जानते हैं कि ज्यादा सलाह देना, आपसी रिश्तों के बीच रोड़ा बन जाता है। अनजाने ही हम दूसरों को यह संदेश पहुंचा रहे होते हैं कि वे खुद कुछ नहीं कर सकते। या फिर उनकी समस्या इतनी बड़ी नहीं है। अधिकतर मौकों पर जरूरत होती है कि हम अपना मुंह बंद रखें और दिल के कानों को खोल लें।’ यूं भी किसी ने कोई अपना करीबी खोया है या फिर वह बीमार है या उसका सब खत्म हो गया है तो उसको सलाह
भी दें तो क्या? वैसे कुछ सलाह के शौकीनों को यह चिंता भी सताती है कि अगर वह कोई समाधान न दे सके तो उनकी छवि खराब हो जाएगी। लीडरशिप एक्सपर्ट एल्डो सिविको कहते हैं कि अधिकतर समय
समाधान देने की जरूरत ही नहीं होती। खासकर भावनात्मक मामलों में दूसरों को केवल उस जगह की जरूरत होती है, जहां वे खुलकर अपनी बात रख सकें।
यूं सलाह देने में बुराई नहीं है। समस्या तब होती है, जब हम सोचते हैं कि सामने वाले उसे मानें भी। और जब कोई नहीं मानता तो हम दुखी हो जाते हैं। हमारे अहं को ठेस लगती है। पर कर्म सिद्धांत पर विश्वास रखने वाले जानते हैं कि दूसरों की यात्रा में आप सलाह के साथी हो सकते है, उनके कर्म के नहीं।
सलाह का सलीका
- ध्यान से बात सुनें। तुरंत प्रतिक्रिया या समाधान देने की कोशिश न करें। उनकी बात से जुड़े प्रश्न पूछें।
- मुफ्त की चीज की कद्र नहीं होती। सलाह के साथ भी ऐसा ही है। मांगे जाने पर ही सलाह दें।
- सलाह देने से पहले पूछ लें।
- यह अपेक्षा न रखें कि सलाह मानी ही जाए।
- अपनी सीमाओं का ध्यान रखें। हालात और मौके को देखकर बात करें। बातचीत में ईमानदार रहें।
खोज लेते हैं। कम से कम सलाह देने के शौकीनों को यही लगता है कि वही करना सही रहेगा, जो वे कह रहे हैं। फिर इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप दूसरे व्यक्ति या उसकी स्थितियों को कितना जानते हैं? ऐसे ज्ञानियों के सामने ओलंपिक में पदक जीतीं पीवी सिंधु या फिर साक्षी मलिक खड़ी हों तो वे उन्हें भी कह सकते हैं कि फलां फलां स्मैश खेला होता या वैसी पटकनी दी होती तो गोल्ड मैडल हम जीत जाते।
रिलेशनशिप एक्सपर्ट कहते हैं, दूसरों के टाइमजोन का ध्यान न रखना, सही सलाह को भी बेकार कर देता है। मतभेद होता ही तभी है जब हमारे अनुभव और योग्यता दूसरों के टाइमजोन में प्रवेश करके उन्हें बदलने की कोशिश करते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर कहते हैं, ‘दूसरों को अपने ज्ञान की सीमाओं मे कैद न करें। वे अलग समय में पैदा हुए हैं।’ यही कारण है कि हम जितनी कोशिश दूसरों की निजी सोच को बदलने की करते हैं, वे उतना ही अपनी आजादी को बचाने में जुट जाते हैं। फिर चाहे बड़े हों या बच्चे।
परेशानी में जब कोई अपना हो
प्रश्न हो सकता है कि जब कोई अपना ही तकलीफ में हो तो कैसे चुप रहे? खासकर जब आपकी सलाह वाकई मदद कर सकती है। लेखक रॉबर्ट बोल्टन अपनी पुस्तक ‘पीपुल स्किल्स’ में लिखते हैं, ‘बहुत कम लोग ये जानते हैं कि ज्यादा सलाह देना, आपसी रिश्तों के बीच रोड़ा बन जाता है। अनजाने ही हम दूसरों को यह संदेश पहुंचा रहे होते हैं कि वे खुद कुछ नहीं कर सकते। या फिर उनकी समस्या इतनी बड़ी नहीं है। अधिकतर मौकों पर जरूरत होती है कि हम अपना मुंह बंद रखें और दिल के कानों को खोल लें।’ यूं भी किसी ने कोई अपना करीबी खोया है या फिर वह बीमार है या उसका सब खत्म हो गया है तो उसको सलाह
भी दें तो क्या? वैसे कुछ सलाह के शौकीनों को यह चिंता भी सताती है कि अगर वह कोई समाधान न दे सके तो उनकी छवि खराब हो जाएगी। लीडरशिप एक्सपर्ट एल्डो सिविको कहते हैं कि अधिकतर समय
समाधान देने की जरूरत ही नहीं होती। खासकर भावनात्मक मामलों में दूसरों को केवल उस जगह की जरूरत होती है, जहां वे खुलकर अपनी बात रख सकें।
यूं सलाह देने में बुराई नहीं है। समस्या तब होती है, जब हम सोचते हैं कि सामने वाले उसे मानें भी। और जब कोई नहीं मानता तो हम दुखी हो जाते हैं। हमारे अहं को ठेस लगती है। पर कर्म सिद्धांत पर विश्वास रखने वाले जानते हैं कि दूसरों की यात्रा में आप सलाह के साथी हो सकते है, उनके कर्म के नहीं।
सलाह का सलीका
- ध्यान से बात सुनें। तुरंत प्रतिक्रिया या समाधान देने की कोशिश न करें। उनकी बात से जुड़े प्रश्न पूछें।
- मुफ्त की चीज की कद्र नहीं होती। सलाह के साथ भी ऐसा ही है। मांगे जाने पर ही सलाह दें।
- सलाह देने से पहले पूछ लें।
- यह अपेक्षा न रखें कि सलाह मानी ही जाए।
- अपनी सीमाओं का ध्यान रखें। हालात और मौके को देखकर बात करें। बातचीत में ईमानदार रहें।
No comments:
Post a Comment