Friday, December 9, 2016

जहरीली हवा है जानलेवा, जागरण है आवश्यक



अजय शर्मा

दिवाली के बाद दिल्ली एनसीआर को वायु प्रदूषण ने बुरी तरह से प्रभावित किया। पूरा वातावरण दमघोंटू हो गया। लोगों का सांस लेना भी दूभर हो गया था। जिसके परिणामस्वरूप लोग इसकी शिकायतें लेकर लोग अस्पतालों में भी पहुंचने शुरू हो हुए। दिल्ली की हवा इतनी जहरीली हो गई थी इसका अंदाजा दिल्ली सरकार के स्कूल बंद करने के आदेश से लगाया जा सकता है। एनजीटी ने भी दिल्ली सरकार को वायु प्रदूषण को लेकर फटकार लगाई।

समस्या यह नहीं कि वायु प्रदूषण पर नियंत्रण कैसे किया जाए। बल्कि समस्या यह है कि वायु प्रदूषण की रोकथाम को लेकर या फिर इसे स्वच्छ रखने के लिए अब तक किए गए प्रयास कारगर साबित क्यों नहीं हुए। प्रश्न यह है कि क्यों दिल्ली एनसीआर की हवा दिन पर दिन जहरीली होती जा रही है। क्यों दिल्ली एनसीआर में लंदन जैसे ग्रेट स्मॉग जैसे हालात पैदा किए जा रहे हैं। जब लंदन में स्मॉग से लगभग 4000 लोग मर गए थे। अभी हाल ही में एक राष्टीय प्रतिष्ठित अखबार के हवाले से खबर आई है कि दिल्ली में हर रोज औसतन वायु प्रदूषण से 300 लोग मर रहे हैं।

डॉक्टर्स एवं र्प्यावरणविदों के मुताबिक दिल्ली की आबोहवा रहने लायक नहीं है। यदि आप जिंदा रहना चाहते हैं तो तुरंत दिल्ली एनसीआर छोड़ दें। यहां का वातावरण बच्चों एवं बुजुर्गों को असमय काल के मुंह में और भयंकर जान लेवा बीमारियों की गिरफत में ले रहा है। शिशुओं का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है।
जबकि पिछले कई दशकों से दिल्ली एनसीआर में वायु प्रदूषण को लेकर सैकड़ों जन जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं फिर भी स्थितियां जस की तस हैं। तो ऐसे में सवाल यह उठता है कि कमी कहां है। कौन है जिम्मेदार ? सरकार या फिर हम लोग ?  


पिछले दिनों के हालातों को बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि जब पूरा दिल्ली एनसीआर धुंध और धुएं से हांफ रहा था। सरकार के तमाम ‘उपायों’ के बावजूद सार्वजनिक मॉनिटरों पर शहर की वायु प्रदूषण के स्तर से कहीं ज्यादा जहरीली आबोहवा थी। नतीजतन, राज्य की बिगड़ती सेहत और लोगों की नाराजगी को देखते हुए केंद्रीय पर्यावरण सचिव एएन झा ने बीते तीन नवंबर को एक आपात बैठक बुलाई। इसमें पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान के पर्यावरण सचिव भी शामिल हुए। इस मीटिंग के नतीजे को जानने के लिए पर्यावरण मंत्रालय के बाहर जमा पत्रकारों को बताया गया कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को अपनी गिरफ्त में ले चुके जानलेवा प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार ‘सख्त कदम’ उठाने जा रही है। कई उपायों की घोषणा भी की गई, जैसे कि ईंट भट्ठों को बंद करना, डीजल से चलने वाले जेनरेटरों को नियंत्रित करना और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के खिलाफ कार्रवाई का दिल्ली पुलिस को आदेश देना।

सारी बातें सुनकर जनता भी संतुष्ट हो गई कि चलो, वायु प्रदूषण के खिलाफ कुछ तो हो रहा है।

मगर इसमें जो सच है वो हम नहीं जानते, वो यह कि जिन उपायों की बात उस दिन की गई थी, वे महज सुझाव थे। और यह भी सच है कि इन सुझावों के आगे जाकर कोई दूसरी कार्रवाई भी नहीं की गई। इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण बात यह कि ठीक ऐसे ही सुझाव साल 2015 में उस वक्त जारी किए गए थे, जब पर्यावरण मंत्रालय के मुखिया प्रकाश जावडे़कर थे। यानी पिछले साल की तरह इस बार भी मीटिंग के बाद कोई खास आदेश नहीं दिया गया था, सिर्फ ‘दिशा-निर्देश’ जारी करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली गई थी।
हालांकि अगले 48 घंटों में मौसम का मिजाज कुछ ठीक हुआ, सूर्य देवता मेहरबान हुए और दृश्यता भी बेहतर हुई। वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) भी 900 से घटकर 500 पर आ गया (जो खतरनाक ही माना जाता है), और हम एक बार फिर वायु प्रदूषण को भूल गए। अपना मीडिया भी दूसरी खबरों की तलाश में जुट गया। और उसे खबर मिल भी गई, देश में नोटबंदी की खबर के रूप में और मीडिया इस जानलेवा वायु प्रदूषण को भूल गया।

मगर सच एक हफ्ते के बाद ही सामने आ गया, जब दिल्ली में वायु प्रदूषण के मसले पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में सुनवाई हुई। जजों द्वारा यह सवाल पूछने पर कि किस तरह के खास कदम उठाए गए हैं, अधिकारियों ने स्वीकार किया कि तीन नवंबर की बैठक के बाद जिन उपायों की घोषणा की गई थी, वे सिर्फ दिशा-निर्देश थे। मगर अभी एक बड़ा खुलासा होना बाकी था। एक अखबार के हवाले से पता चला कि,  ‘सभी संबंधित अधिकारियों ने यह स्वीकार किया कि प्रदूषण को नियंत्रित करने के कानूनों, यहां तक कि एनजीटी के आदेशों को भी बमुश्किल लागू किया जा सका।’ ‘किसी ने यह सुझाव शायद ही दिया कि इन आदेशों व कानूनों को आखिर किस तरह लागू करना सुनिश्चित किया जा सकता है।’ यह जानकर बहुत ही हैरानी होती है कि किस तरह लोगों के जीवन से खेला जा रहा है।

एनजीटी द्वारा की जा रही खिंचाई के दरम्यान केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी कुछ तथ्य पेश किए, जिनके अनुसार उत्तर भारत के शहरों में सभी तरह के निर्माण कार्यों पर तत्काल रोक लगा दी जानी चाहिए। बोर्ड के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के कुछ हिस्सों में सूक्ष्म कणों यानी पीएम-10 का स्तर 1,990 ग्राम प्रति घनमीटर को भी पार कर गया था। मगर वायु गुणवत्ता को बताने के लिए लगाए गए मॉनिटर 500 तक ही आंकड़े दिखा रहे थे। साफ है कि पीएम-10 का स्तर मॉनिटरों में दिखाए जा रहे आंकड़ों से कहीं ज्यादा था।

आखिर यह फर्क क्यों था? इसे जानने से पहले यह समझना होगा कि वायु गुणवत्ता सूचकांक की गणना कैसे की जाती है? आखिर इसी पर तो हम प्रदूषण से जंग की अपनी रणनीति बनाते हैं। मान लीजिए कि वायु गुणवत्ता सूचकांक एक नापने वाला फीता है, जिसकी लंबाई शून्य से 500 मीटर तक है। अब इस फीते में सूचकांक जितना ज्यादा होगा, तय है कि वायु प्रदूषण उतना ही ज्यादा होगा और हमारी सेहत के लिए खतरनाक भी। अपने देश में इस सूचकांक की गणना पांच प्रदूषकों की मात्रा के आधार पर की जाती है- पीएम 10, पीएम 2.5, ओजोन, नाइट्रोजन डाई-ऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड। अब अगर वायु गुणवत्ता का सर्वोच्च सूचकांक 500 तक हो और आंकड़ा इससे पार चला जाए, तो फिर क्या होगा? उसकी गणना कैसे होगी? केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, ठीक इसी स्थिति से इस महीने की शुरुआत में दिल्ली दो-चार हुई थी, जब पीएम-10 का स्तर 1990 ग्राम प्रति घनमीटर को पार कर गया था। जाहिर है, दिल्ली की आबोहवा जहरीली बन गई थी। हालांकि हम यह जानते थे कि स्थिति हाथ से निकल रही है, पर कितनी, मॉनिटर हमें यह नहीं बता रहा था।

सरकार के उठाए गए कदमों से तो यही पता चलता है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों और विज्ञान के बीच कोई व्यावहारिक तालमेल कायम करने में हम अब तक विफल ही रहे हैं।
यह ये बताने के लिए अपने आप में पर्याप्त है कि वायु प्रदूषण से लड़ने को लेकर हम कितने गंभीर हैं। इतना ही नहीं, ट्रिब्यूनल की सुनवाई में जब अधिकारियों से पूछा गया कि दिल्ली सरकार ने सभी स्कूलों को बंद करने का फैसला किस आधार पर लिया था, तो उनका जवाब था, ‘यह आदेश शिक्षा मंत्रालय की तरफ से आया था, हमें नहीं पता कि इसका आधार क्या था?’

खैर, दिल्ली एनसीआर की आबोहवा कितनी खराब हो चुकी है, यह बताने की जरूरत नहीं। अभी हमारा सारा ध्यान काले धन और नोटबंदी पर है, मगर वायु प्रदूषण का खतरा कम नहीं हुआ है। सर्दी और प्रदूषण के लिहाज से सबसे खतरनाक महीने हमारा इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में, क्या हम वायु प्रदूषण के खिलाफ भी उतने ही गंभीर हो सकते हैं, जितने काले धन और भ्रष्टाचार को लेकर हुए हैं? यह सच है कि जब तक कानूनी तौर पर बाध्यकारी कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक हमारी सेहत सुरक्षित नहीं है। लिहाजा, घरों से बाहर निकलिए और वायु प्रदूषण के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए अपने नीति-नियंताओं को बाध्य कीजिए। ऐसा आपको जरूर करना चाहिए। ऐसा मेरा मानना है। कहीं बहुत देर ना हो जाए। जिदंगी है तो सबकुछ है। प्रदूषण से मुक्ति के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो जहरीली हवा मौत के रूप में हमारा इंतजार कर रही है।
   

Friday, December 2, 2016

सफलता की सीढी है समय प्रबंधन


अजय शर्मा
अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी ने कहा है कि टाइम इज मनी। यह वाक्य बहुत सोचने पर मजबूर करता है। इसकी गहराई वही समझ सकता है जो इस पर चिंतन करे, मनन करंे कि समय का मोल क्या है। आखिरकार आचार्य श्री इस पर बल क्यों दिया। वो क्या कहना चाहते हैं। जो मैं समझ पाया वो सिर्फ इतना ही, कि आचार्य श्री महाश्रमण जी समय के प्रबंधन और सदुपयोग को लेकर लोगों को जागरूक करना चाहते हैं। वे बताना चाहते हैं कि टाइम वंस गोन नेवर रिटर्न। जो व्यक्ति समय का मोल नहीं समझता, इसके साथ खिलवाड़ करता है।  जीवन में यह सोच कर चलता है, होता है, चलता है, कर लूंगा, हो जाएगा। अभी बहुत वक्त है। ऐसे लोग अपनी जिदंगी में बहुत पीछे रह जाते हैं। ऐसे लोगों को सफलताएं नहीं मिल पाती हैं। इसलिए जीवन में टाइम मेनेजमेंट बहुत जरूरी है।

प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह जीवन में सफल हो अथवा असफल, सभी को पूरे दिन में सिर्फ चैबीस घंटे ही मिलते हैं। समय के मामले में भगवान और व्यवस्था किसी के साथ भेदभाव नहीं करते। यह व्यक्ति की प्रतिभा और सोच पर निर्भर करता है कि वह समय का समुचित उपयोग करके उसका फायदा कैसे उठाए और अपने आपको सफल बनाए। यदि हम समय का सदुपयोग कर उसे अपने लक्ष्य को पाने में करते हैं तो ऐसा कोई कारण नहीं बनता, जिससे आपको जीवन में सफलता न मिले।

बड़े कामों की सूची बनाएं
अक्सर देखा जाता है कि समय का उन लोगों के लिए कोई महत्व नहीं होता, जिनके जीवन का कोई निर्धारित लक्ष्य होता। इसीलिए वे जो जैसा मिलता है, करते चले जाते हैं और इस तरह से उनका मूल्यवान समय व्यर्थ में व्यतीत होता चला जाता है। इसीलिए अनुभवी लोग कहते हैं कि यदि आप अपने कामों की सूची बना कर काम करते हैं तो आपको व्यर्थ में समय गंवाने का कोई समय ही नहीं मिलेगा।

समय का निर्धारण करें और उसकी समीक्षा करें
समय निर्धारित करने से काम के प्रति एक प्रतिबद्धता और जिम्मेदारी आती है। मुझे याद है जब ऐश्वर्या राय विश्व सुंदरी बनी थीं, तब निर्णायक मंडल के सदस्यों ने उनसे पूछा था-आप अपने सपने को समय के अनुकूल कैसे बनाएंगी। ऐश्वर्या ने अंग्रेजी कवि डब्लू. बी. यीट्स के शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा था, सपनों से उत्तरदायित्व आते हैं और उत्तरदायित्व से समय के मूल्य का पता चलता है।

अनावश्यक कार्यों में अपना समय बर्बाद न करें
आपने सुना होगा कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है। जब आपके पास कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं होती तो आप समय के महत्व को पहचान नहीं पाते। इसलिए आप अपने बहुमूल्य समय को उल्टे-सीधे कामों में लगाते रहते हैं। ऐसे में आप कभी भी किसी को न नहीं कह पाते। जो भी आपको कोई काम करने के लिए बोलता है, आप तुरंत राजी हो जाते हैं, जबकि एक सफल व्यक्ति के पास हमेशा समय की कमी होती है।

अपनी कार्यों को आदत में तब्दील करें
छात्रों के सन्दर्भ में अक्सर देखा जाता है कि साल भर वे गंभीर नहीं होते और जैसे ही परीक्षा नजदीक आने लगती है, वे गंभीर होते चले जाते हैं। कारण कि सालभर तो वे कुछ पढ़ते नहीं और सब काम अंत में पूरा करना चाहते हैं, जो कभी हो नहीं पाता। इससे एक तो उनके दिमाग में अनावश्यक जोर पड़ता है और दूसरा वे तनाव का शिकार हो जाते हैं इसी काम को यदि वे अपनी आदत बना कर रोज दो-तीन घंटे में बांट दें तो एक तो न उन्हें अनावश्यक तनाव का सामना करना पड़ेगा और दूसरा, उन्हें अपने काम में असफलता भी नहीं मिलेगी।


डिजिटल मीडिया का उपयोग सकारात्मक कार्यों के लिए करें
हाल ही में आई एक रिसर्च के अनुसार एक औसत युवा आज की तारीख में दो से तीन घंटे इंटरनेट, मोबाइल और सोशल मीडिया में गुजारता है। इससे एक तो उसका बहुत समय बर्बाद होता है, दूसरा उसे कई प्रकार की शारीरिक और मानसिक बीमारियों का शिकार होना पड़ता है।

ऐसे में यदि वह इन सब का उपयोग सूचना और ज्ञान प्राप्त करने में करे तो एक साथ दो काम हो सकते हैं। और उसे किसी प्रकार की समस्या का सामना भी नहीं करना पड़ेगा।
छोटी-छोटी सफलताओं को सेलिब्रेट करें और उनका आनंद उठाएं
आजकल देखा यह जा रहा है कि हम अपनी खुशियों का इजहार भी सबके सामने नहीं करते और अंदर ही अंदर संकुचित होते चले जा रहे हैं। इससे आपका वही हाल होता चला जाता है कि जंगल में मोर नाचा किसने देखा। ऐसी स्थिति में यदि आप अपनी सफलताओं को सबके साथ साझा करेंगे तो इससे आपको दो फायदे होंगे। पहला तो आपके काम को प्रोत्साहन मिलेगा और लोग आपसे जुड़ते चले जायेंगे। दूसरा आपके भीतर ही भीतर एक ऐसे आत्मविश्वास का संचार होता चला जायेगा कि आप बड़े से बड़ा काम करने में भी नहीं हिचकिचाएंगे।
महत्वपूर्ण काम पहले करें
एक अध्ययन से यह बात सामने आई कि बहुत परिश्रम से किया गया कार्य जरूरी नहीं कि प्रभावी भी हो। प्रभावी वही कार्य होता है, जिसे पूरी तन्मयता और सबसे महत्वपूर्ण कार्य के रूप में किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति अपने कामों की सूची बनाता है तो उसे यह पता होता है कि क्या महत्वपूर्ण है।
यदि आप इन छोटे छोटे टिप्स को अपने जीवन में अपना लें, तो जीवन में सफलता निश्चित है।

बिन मांगे सलाह देना मूर्खता है.............................

इससे पहले कि आप कहें, ‘आप क्यों ज्ञान दे रहे हैं?’ मैं सॉरी कहते हुए अपनी बात शुरू करत हूं। दरअसल, आपकी तरह मैं भी खुद को सलाह देने के आकर्षण से मुक्त नहीं कर पाती। और फिलहाल सलाह यह है कि हमें बेवजह सलाह देना बंद कर देना चाहिए। सलाह चीज ही ऐसी है, जिसे हम देना पसंद करते हैं, पर लेना नहीं। सोचकर क्या वाकई हंसी नहीं आती कि हमारी अपनी समस्याएं दूसरों की सलाह का मुंह ताक रही होती हैं, पर दूसरों के लिए हम कहीं से भी हल

खोज लेते हैं। कम से कम सलाह देने के शौकीनों को यही लगता है कि वही करना सही रहेगा, जो वे कह रहे हैं। फिर इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप दूसरे व्यक्ति या उसकी स्थितियों को कितना जानते हैं? ऐसे ज्ञानियों के सामने ओलंपिक में पदक जीतीं पीवी सिंधु या फिर साक्षी मलिक खड़ी हों तो वे उन्हें भी कह सकते हैं कि फलां फलां स्मैश खेला होता या वैसी पटकनी दी होती तो गोल्ड मैडल हम जीत जाते।
रिलेशनशिप एक्सपर्ट कहते हैं, दूसरों के टाइमजोन का ध्यान न रखना, सही सलाह को भी बेकार कर देता है। मतभेद होता ही तभी है जब हमारे अनुभव और योग्यता दूसरों के टाइमजोन में प्रवेश करके उन्हें बदलने की कोशिश करते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर कहते हैं, ‘दूसरों को अपने ज्ञान की सीमाओं मे कैद न करें। वे अलग समय में पैदा हुए हैं।’ यही कारण है कि हम जितनी कोशिश दूसरों की निजी सोच को बदलने की करते हैं, वे उतना ही अपनी आजादी को बचाने में जुट जाते हैं। फिर चाहे बड़े हों या बच्चे।

परेशानी में जब कोई अपना हो
प्रश्न हो सकता है कि जब कोई अपना ही तकलीफ में हो तो कैसे चुप रहे? खासकर जब आपकी सलाह वाकई मदद कर सकती है। लेखक रॉबर्ट बोल्टन अपनी पुस्तक ‘पीपुल स्किल्स’ में लिखते हैं, ‘बहुत कम लोग ये जानते हैं कि ज्यादा सलाह देना, आपसी रिश्तों के बीच रोड़ा बन जाता है। अनजाने ही हम दूसरों को यह संदेश पहुंचा रहे होते हैं कि वे खुद कुछ नहीं कर सकते। या फिर उनकी समस्या इतनी बड़ी नहीं है। अधिकतर मौकों पर जरूरत होती है कि हम अपना मुंह बंद रखें और दिल के कानों को खोल लें।’ यूं भी किसी ने कोई अपना करीबी खोया है या फिर वह बीमार है या उसका सब खत्म हो गया है तो उसको सलाह
भी दें तो क्या? वैसे कुछ सलाह के शौकीनों को यह चिंता भी सताती है कि अगर वह कोई समाधान न दे सके तो उनकी छवि खराब हो जाएगी। लीडरशिप एक्सपर्ट एल्डो सिविको कहते हैं कि अधिकतर समय

समाधान देने की जरूरत ही नहीं होती। खासकर भावनात्मक मामलों में दूसरों को केवल उस जगह की जरूरत होती है, जहां वे खुलकर अपनी बात रख सकें।
यूं सलाह देने में बुराई नहीं है। समस्या तब होती है, जब हम सोचते हैं कि सामने वाले उसे मानें भी। और जब कोई नहीं मानता तो हम दुखी हो जाते हैं। हमारे अहं को ठेस लगती है। पर कर्म सिद्धांत पर विश्वास रखने वाले जानते हैं कि दूसरों की यात्रा में आप सलाह के साथी हो सकते है, उनके कर्म के नहीं।

सलाह का सलीका
- ध्यान से बात सुनें। तुरंत प्रतिक्रिया या समाधान देने की कोशिश न करें। उनकी बात से जुड़े प्रश्न पूछें।
- मुफ्त की चीज की कद्र नहीं होती। सलाह के साथ भी ऐसा ही है। मांगे जाने पर ही सलाह दें।
- सलाह देने से पहले पूछ लें।
- यह अपेक्षा न रखें कि सलाह मानी ही जाए।
- अपनी सीमाओं का ध्यान रखें। हालात और मौके को देखकर बात करें। बातचीत में ईमानदार रहें।

जीवन में विचारशील बनें


विचारशील होने से मतलब है कि दूसरों के बारे में सोचने का समय निकालें। विचारशील होना, दयालु होना, दूसरों की देखभाल करना कुछ ऐसे गुण हैं। जिनके जरिये आप दूसरों की काफी मदद कर सकते हैं। विचारशील होना आपको जिंदगी में इतना आगे ले जा सकता है कि काॅलेज की पढ़ाई या कोई प्रोफेशनल डिग्री भी शायद ही दे पाये।

स्किल डिवेलपमेंट
कौशल विकास अर्थात् व्यवहार कुशलता। आप दूसरों से कैसा व्यवहार करते हैं और उनके बारे में क्या सोचते हैं, इससे पता चलता है कि आप कैसे हैं। दयालु होना और दूसरों की मदद करना आपकी जिंदगी में बड़ा फर्क ला सकता है। दूसरों के साथ असभ्य व्यवहार करने वाले कई लोग हैं। कई लोगों को इसका अहसास भी नहीं होता है, वे दूसरों को होने वाली भावनात्मक तकलीफ के बारे में सोचते भी नहीं हंै। हम कुछ ऐसी बातें बता रहे हैं, जो आपको दूसरों के प्रति विचारशील बनने में मदद करेंगी।

दूसरों की जरूरतों का अनुमान लगाये
विचारशील होने का एक मतलब यह भी है कि आप लोगों की जरूरतों का पूर्वानुमान लगायें कि उन्हंे किस तरह की मदद की जरूरत होगी। यदि आप अपने सहयोगियों के साथ लंच के लिए बाहर जा रहे हैं तो पर्याप्त मात्रा में नैपकिन साथ में रख लें, इसकी सभी को जरूरत होगी। यदि आप जानती हैं कि आपके पति देव रात में आॅफिस से देर से आने वाले हैं तो उनके लिए फ्रिज में खाना रख दें। इस तरह लोगों की जरूरतों पर नजर रखें, बल्कि तब जबकि उन्हें खुद इन जरूरतों का अह्सास न हो, तो ये चीजें आपको सही रूप में विचारशील बनाएंगी।

सावधानी से बोलें
यदि आप विचारशील होना चाहते हैं तो हमेशा अपने शब्दों पर ध्यान दें। आपको यह पता होना चाहिये कि आप अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने के लिए किन शब्दों का प्रयोग करें। यदि आप चाहते हंै कि लोग आपकी बातें सुनें और आपके बारे में अच्छा महसूस करें, तो बोलने से पहले सावधानी से अपने शब्दों के बारे में सोचें, फिर अपनी बात कहें। इस तरह आप कोई नकारात्मक बात भी नरम लहजे में कह सकते हैं और किसी की तारीफ भी अच्छे तरीके से कर सकते हैं। अतः यह बात याद रखना जरूरी है कि शब्द बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं तथा उनके प्रयोग की शैली भी।

विनम्र बनें
विचारशील बनने के लिये विनम्र होना बहुत जरूरी है। विनम्र होने से मतलब है कि अपने आस पास के लोगों को ठेस पहुंचाये बिना अपनी बात कहना। इससे यह मतलब नहीं है कि आप झूठ बोलें, बल्कि चतुराई से विनम्र शब्दों में आलोचना किये बिना अपनी राय प्रकट कर सकते हैं। अपना संदेश बिना किसी को ठेस पहुंचाये, सब लोगों तक पहुंचाना ही विचारशील है। इसके लिए आपको एक अच्छा श्रोता होना भी जरूरी है, ताकि आप आस पास के लोगों के बारे में जागरूक रहें और समय आने पर सही तरह से जवाब दे सकें।

दयालुता वाले काम करें
विचारशील व्यक्ति को दयालुता से ही पेश आना है। केवल लोगों के बारे में जानना और सोचना या सहानुभूति प्रकट करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जरूरत के वक्त उनकी मदद करना भी बेहद जरूरी है। इसके लिए आप एस.ओ.एस जैसी संस्थाओं को आर्थिक सहयोग भेज सकते हैं, या मुसीबत में फंसे इंसान की मदद कर सकते हैं।

सार्वजनिक स्थल पर जागरूक रहें
आस-पास के बारे में सजग रहें, विशेषतः पब्लिक प्लेस पर। बाहर आपका व्यवहार कैसा होता है, सोचंे और जाने कि उस पर दूसरों की क्या प्रतिक्रिया होती है। जहां हर कोई पढ़ाई में लगा हो जैसे सार्वजनिक पुस्तकालय अथवा काॅफी हाऊस। जहां आप अपने मित्र के साथ जोर-जोर से बात कर रहे हैं। तो आपका व्यवहार दूसरों को पागलपन लगेगा।

दूसरों की आर्थिक स्थिति के बारे में सोचे
अपने किसी दोस्त को पार्टी देने से पहले उसकी आर्थिक स्थिति के बारे में सोचें। यदि आप अपने सामान्य स्थिति के दोस्त को मंहगे होटल में ट्रीट देते हैं तो वह असहज महसूस करेगा क्योंकि वह इतना महंगा होटल अफोर्ड नहीं कर सकता।

खुद को दूसरों की जगह रखकर देखो
अपने दोस्त, सहयोगी या टीचर पर आरोप मत लगाओ, किसी को भी कुछ अटपटे या अनुचित शब्द कहने से पूर्व यह सोचें कि यदि आप उनकी जगह होते और वे आप पर इस तरह रिएक्ट करते तो आपको कैसा लगता।

विचारशील लोगों की आदतें
1. वे हमेशा दूसरों के प्रति सहानुभूति रखते हैं।
2. मुस्कुराते हुये सबसे मिलते हैं।
3. दूसरों की जरूरतों का हमेशा ध्यान रखते हैं।
4. शिष्टाचारी होते हैं
5. दूसरों को अपने से आगे रखते हैं, सम्मान देते हैं।
6. धैर्यवादी होते हैं, भले ही उन्हें इंतजार करना अच्छा न लगे।
7. अगर उनकी गलती हो तो माफी मांगने में हिचकते नहीं।



महात्मा गांधीजी के अनमोल विचार





1 विश्वास करना एक गुण है, अविश्वास दुर्बलता कि जननी है।

2 अपने प्रयोजन में द्रढ विश्वास रखने वाला एक सूक्ष्म शरीर इतिहास के रुख को बदल सकता है।

3 शांति का कोई रास्ता नहीं है, केवल शांति है।

4 आँख के बदले में आँख पूरे विश्व को अँधा बना देगी।

5 जो समय बचाते हैं, वे धन बचाते हैं और बचाया हुआ धन, कमाएं हुए धन के बराबर है।
 6 केवल प्रसन्नता ही एकमात्र इत्र है, जिसे आप दुसरो पर छिड़के तो उसकी कुछ बुँदे अवश्य ही आप पर भी पड़ती है।

7 विश्वास को हमेशा तर्क से तौलना चाहिए. जब विश्वास अँधा हो जाता है तो मर जाता है।

 8 पहले वो आप पर ध्यान नहीं देंगे, फिर वो आप पर हँसेंगे, फिर वो आप से लड़ेंगे, और तब आप जीत जायेंगे।
 9 व्यक्ति की पहचान उसके कपड़ों से नहीं अपितु उसके चरित्र से आंकी जाती है।
10 खुशी तब मिलेगी जब आप जो सोचते हैं, जो कहते हैं और जो करते हैं, सामंजस्य में हों।
11 मौन सबसे सशक्त भाषण है, धीरे-धीरे दुनिया आपको सुनेगी।
12 सत्य एक विशाल वृक्ष है, उसकी ज्यों-ज्यों सेवा की जाती है, त्यों-त्यों उसमे अनेक फल आते हुए नजर आते है, उनका अंत ही नहीं होता।
13 विश्व के सभी धर्म, भले ही और चीजों में अंतर रखते हों, लेकिन सभी इस बात पर एकमत हैं कि दुनिया में कुछ नहीं बस सत्य जीवित रहता है।

14 कोई त्रुटी तर्क-वितर्क करने से सत्य नहीं बन सकती और ना ही कोई सत्य इसलिए त्रुटी नहीं बन सकता है क्योंकि कोई उसे देख नहीं रहा।

 15  क्रोध और असहिष्णुता सही समझ के दुश्मन हैं।

16 पूंजी अपने-आप में बुरी नहीं है, उसके गलत उपयोग में ही बुराई है। किसी ना किसी रूप में पूंजी की आवश्यकता हमेशा रहेगी।

17 अपनी गलती को स्वीकारना झाड़ू लगाने के सामान है जो धरातल की सतह को चमकदार और साफ कर देती है।
18 निरंतर विकास जीवन का नियम है, और जो व्यक्ति खुद को सही दिखाने  के लिए हमेशा अपनी रूढ़िवादिता को बरकरार रखने की कोशिश करता है वो खुद को गलत स्थिति में पंहुचा देता है।

19 यद्यपि आप अल्पमत में हों, पर सच तो सच है।

20 जो भी चाहे अपनी अंतरात्मा की आवाज सुन सकता है। वह सबके भीतर है।

 21 गर्व लक्ष्य को पाने के लिए किये  गए प्रयत्न में निहित है, ना कि उसे पाने में।

22 मैं मरने के लिए तैयार हूँ, पर ऐसी कोई वजह नहीं है जिसके लिए मैं मारने को तैयार हूँ।

23 मैं सभी की समानता में विश्वास रखता हूँ, सिवाय पत्रकारों और फोटोग्राफरों के।

 24 सत्य बिना जन समर्थन के भी खड़ा रहता है, वह आत्मनिर्भर है।

 25 सत्य कभी ऐसे कारण को क्षति नहीं पहुंचाता जो उचित हो।

 26 मेरा धर्म सत्य और अहिंसा पर आधारित है। सत्य मेरा भगवान है, अहिंसा उसे पाने का साधन।

27 मेरा जीवन मेरा सन्देश है।

 28 जहाँ प्रेम है वहां जीवन है।

29 ऐसे जियो जैसे कि तुम कल मरने वाले हो। ऐसे सीखो की तुम हमेशा के लिए जीने वाले हो।

फनवजम 30रू जब मैं निराश होता हूँ, मैं याद कर लेता हूँ कि समस्त इतिहास के दौरान सत्य और प्रेम के मार्ग की ही हमेशा विजय होती है। कितने ही तानाशाह और हत्यारे हुए हैं, और कुछ समय के लिए वो अजेय लग सकते  हैं, लेकिन अंत में उनका पतन होता है। इसके बारे में सोचो- हमेशा।


मनुष्य को पशु से अलग करती है अहिंसा


महात्मा गाँधी कहते हैं कि एकमात्र वस्तु जो हमें पशु से भिन्न करती है वह है अहिंसा। व्यक्ति हिंसक है तो फिर वह पशुवत है। मानव होने या बनने के लिए अहिंसा का भाव होना आवश्यक है।

गाँधी जी कहते हैं कि हमारा समाजवाद अथवा साम्यवाद अहिंसा पर आधारित होना चाहिए जिसमें मालिक-मजदूर एवं जमींदार-किसान के मध्य परस्पर सद्भावपूर्ण सहयोग हो। निरूशस्त्र अहिंसा की शक्ति किसी भी परिस्थिति में सशस्त्र शक्ति से सर्वश्रेष्ठ होगी। सच्ची अहिंसा मृत्युशैया पर भी मुस्कराती रहेगी। बहादुरी, निर्भीकता, स्पष्टता, सत्यनिष्ठा, इस हद तक बढ़ा लेना कि तीर-तलवार उसके आगे तुच्छ जान पड़ें, यही अहिंसा की साधना है। शरीर की नश्वरता को समझते हुए, उसके न रहने का अवसर आने पर विचलित न होना अहिंसा है।

अहिंसा की पहचान
भगवान महावीर, भगवान बुद्ध और महात्मा गाँधी की अहिंसा की धारणाएँ अलग-अलग थी। फिर भी वेद, महावीर और बुद्ध की अहिंसा से महात्मा गाँधी प्रेरित थे। हम जब भी अहिंसा की बात करते हैं तो अक्सर यह खयाल आता है कि किसी को शारीरिक या मानसिक दुख न पहुँचाना अहिंसा है। मन, वचन और कर्म से किसी की हिंसा न करना अहिंसा कहा जाता है। यहाँ तक कि वाणी भी कठोर नहीं होनी चाहिए। फिर भी अहिंसा का इससे कहीं ज्यादा गहरा अर्थ है।

शांति का आधार अहिंसा
योग और जैन दर्शन कहता है कि अहिंसा की साधना से बैर भाव निकल जाता है। बैर भाव के जाने से काम, क्रोध आदि वृत्तियों का निरोध होता है। वृत्तियों के निरोध से शरीर निरोगी बनता है। मन में शांति और आनंद का अनुभव होता है। सभी को मित्रवत समझने की दृष्टि बढ़ती है। सही और गलत में भेद करने की ताकत आती है। यह सब कुछ मन में शांति लाता है।

परपीड़क और स्वपीड़क न बने
खुद के और दूसरे के बारे में हिंसा का विचार भी न लाने से चित्त में स्थिरता आती है। परपीड़क और स्वपीड़क न बने। ऐसा सोचने और करने से सकारात्मक ऊर्जा का जन्म होता है। सकारात्मक उर्जा से आपके आस-पास का माहौल भी खुशनुमा होने लगता है। यह खुशनुमा माहौल ही जीवन में किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं होने देता। यही आपकी सफलता का आधार है। इसी से आपके रिश्ते-नाते कायम रहेंगे। अहिंसा से ही स्वयं को स्वयं की देह, मन और बुद्धि के सारे क्रिया-कलापों से उपजे दुखों से स्वतंत्रता मिलेगी।

अहिंसा यात्रा

असम पिछले पांच दशक से बोडो-गैर बोडो, बांग्लादेशी मुसलमान घुसपैठिये, बांग्लादेशी शरणार्थियों की वजह से जातीय संघर्ष, दंगा और नर संहार के लिए वैश्विक स्तर पर चर्चा का मुददा रहा है। इन दंगात्मक हिंसा में मासूम बच्चों और महिलाओं को क्रूरतापूर्ण तरीके से मौत के घाट उतार दिया गया। लेकिन पिछले कुछ सालों में असम में स्थानीय संथाल आदिवासियों को भी निशाना बनाया गया है। विद्रोहियों या फिर यूं कहें कि दंगाइयों ने इन लोगों को घर में घुसकर गालियों से भून दिया, घरों में आग लगा दी और कहीं कहीं पर घर से बाहर निकाल कर गोली मार दी। इस सब की वजह उघोग-धंधे, नौकरी, शिक्षा नहीं है बल्कि इसके गर्भ में कारण कुछ और हैं।
ऐसा असम, जहां की जमीन हिंसा से रक्तरंजित हो, जहां की आबोहवा बेगुनाहों और मासूमों की चीख पुकार से गुंजायमान रही हो। उस धरती पर अहिंसा के दूत अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण की अहिंसा यात्रा अपने आप में काफी मायने रखती है।

आकड़ों के मुताबिक सन् 2012 से लेकर 2015 तक लगभग 400 गांव के तकरीबन  2 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। रेल यातायात क्षतिग्रस्त कर दिया गया। यहां तक कि प्रशासनिक अघिकारियों को भी नहीं बख्शा गया।

मैं आपको बताना चाहूंगा कि आचार्य श्री की यह अहिंसा यात्रा सन 2014 में 9 नवंबर को दिल्ली के लाल किले से प्रारंभ हुई थी। लगभग 10,000 हजार किलोमीटर की यह पदयात्रा नेपाल, भूटान और हिन्दुस्तान के विभिन्न राज्यों से होते हुए असम पहुंची है। इस अहिंसा यात्रा का एक मात्र उददेश्य असम के निवासियों में शांति और अहिंसा का सूत्रपात करना है। मैं यहां पर भारत के चक्रवर्ती सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध के बाद हृदय परिवर्तन के बाद अहिंसा और शांति को अपनाते हुए एक सशक्त शांतिपूर्ण राष्ट निर्माण का जिक्र करूंगा, और उसमें भगवान बुद्ध के उपदेशों और सिद्धांतों की कितनी बड़ी भूमिका थी। यह किसी से छिपा नहीं है।    
यहां असम की हिंसा और रक्तपात को समझने के लिए थोड़ा सा इसके इतिहास में झांकना पड़ेगा। आखिरकार क्यों असम हिंसा और रक्तपात में नहाया हुआ है। क्यों वहां पर शांति के फूल खिलाने की आवश्यकता है।
क्या है वजह हिंसा की
उन्नीसवीं सदी और खासतौर पर आज़ादी बाद यह क्षेत्र खास तरह के राजनीतिक पुनर्जागरण के दौर से गुज़रा, जिसने असम लोगों में अपनी भाषा, संस्कृति, साहित्य, लोक कला और संगीत के प्रति गर्व की भावना पैदा की। राज्य की सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक विविधता को देखते हए यह एक जटिल प्रक्रिया थी। एकीकृत असमिया संस्कृति की तरफ़दारी करने वाले बहुत से लोगों का यह भी मानना रहा है कि आदिवासी इलाकों को अलग से विशेष अधिकार देकर या मेघालय, मिजोरम, नगालैण्ड और अरुणाचल प्रदेश जैसे अलग राज्यों को निर्माण करके केंद्र सरकार ने एक व्यापक असमिया पहचान के निर्माण में रुकावट डालने का काम किया।  इसीलिए असम के युवाओं में केंद्र के प्रति एक नकारात्मकता और आक्रोश की भावना रही है।



गौरतलब है कि पचास के दशक से ही गैर-कानूनी रूप से बाहरी लोगों का असम में आना एक राजनीतिक मुद्दा बनने लगा था, लेकिन 1979 में यह एक प्रमुख मुद्दे के रूप में सामने आया। जब बड़ी संख्या में बांग्लादेश से आने वाले लोगों को राज्य की मतदाता सूची में शामिल कर लिया गया। 1978 में मांगलोडी लोकसभा क्षेत्र के सांसद की मृत्यु के बाद उपचुनाव की घोषणा हुई। चुनाव अधिकारी ने पाया कि मतदाताओं की संख्या में अचानक ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हो गया है। इसने स्थानीय स्तर पर लोगों में आक्रोश पैदा किया। यह माना गया कि बाहरी लोगों, विशेष रूप से बांग्लादेशियों के आने के कारण ही इस क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई है। ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) और क्षेत्रीय राजनीतिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठनों से मिलकर बनी असम गण संग्राम परिषद ने बहिरागतों के खिलाफ़ आंदोलन छेड़ दिया। ध्यान दें कि एक छात्र संगठन के रूप में आसू अंग्रेज़ों के ज़माने से ही अस्तित्व में था। उस समय उसका नाम था अहोम छात्र सम्मिलन। लेकिन 1940 में यह संगठन विभाजित हुआ और 1967 में इन दोनों धड़ों का फिर से विलय हो गया और संगठन का नाम ऑल असम स्टूडेंट्स एसोसिएशन रखा गया। लेकिन फिर इसका नाम बदलकर ऑल असम स्टूडेंट यूनियन या आसू कर दिया गया।

आसू द्वारा चलाये गये आंदोलन को असमिया भाषा बोलने वाले हिंदुओं, मुसलिमों और बहुत से बंगालियों ने भी खुल कर समर्थन दिया। आंदोलन के नेताओं ने यह दावा किया कि राज्य की जनसंख्या का 31 से 34 प्रतिशत भाग बाहर से ग़ैर-कानूनी रूप से आये लोगों का है। उन्होंने केंद्र सरकार से माँग की कि वह बाहरी लोगों को असम आने से रोकने के लिए यहाँ की सीमाओं को सील कर दे, ग़ैर-कानूनी बाहरी लोगों की पहचान करे और उनके नाम को मतदाता सूची से हटाये और जब तक ऐसा न हो असम में कोई चुनाव न कराये। आंदोलन ने यह माँग भी रखी कि 1961 के बाद राज्य में आने वाले लोगों को उनके मूल राज्य में वापस भेजा जाए या कहीं दूसरी जगह बसाया जाए। इस आंदोलन को इतना ज़ोरदार समर्थन मिला कि 1984 में यहाँ के सोलह संसदीय क्षेत्रों से 14 संसदीय क्षेत्रों में चुनाव नहीं हो पाया। 1979 से 1985 के बीच राज्य में राजनीतिक अस्थिरता रही। इसी दौरान राष्ट्रपति शासन भी लागू हुआ। लगातार आन्दोलन होते रहे और कई बार इन आंदोलनों ने हिंसक रूप अख्तियार किया। राज्य में अभूतपूर्व जातीय हिंसा की स्थिति पैदा हो गयी। लम्बे समय तक समझौता-वार्ता चलने के बावजूद आंदोलन के नेताओं और केंद्र सरकार के बीच कोई सहमति नहीं बन सकी, क्योंकि यह बहुत ही जटिल मुद्दा था। यह तय करना आसान नहीं था कि कौन ‘बाहरी’ या विदेशी है और ऐसे लोगों को कहाँ भेजा जाना चाहिए।

केंद्र सरकार ने 1983 में असम में विधानसभा चुनाव कराने का फ़ैसला किया। लेकिन आंदोलन से जुड़े संगठनों ने इसका बहिष्कार किया। इन चुनावों में बहुत कम वोट डाले गये। जिन क्षेत्रों में असमिया भाषी लोगों का बहुमत था, वहाँ तीन प्रतिशत से भी कम वोट पड़े। राज्य में आदिवासी, भाषाई और साम्प्रदायिक पहचानों के नाम पर ज़बरदस्त हिंसा हुई, जिसमें तीन हज़ार से भी ज़्यादा लोग मारे गये। चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी की सरकार ज़रूर बनी, लेकिन इसे कोई लोकतांत्रिक वैधता हासिल नहीं थी। 1983 की हिंसा के बाद दोनों पक्षों में फिर से समझौता-वार्ता शुरू हुई। 15 अगस्त 1985 को केंद्र की राजीव गाँधी सरकार और आंदोलन के नेताओं के बीच समझौता हुआ, जिसे असम समझौते के नाम से जाना गया। इसके तहत 1951 से 1961 के बीच आये सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट देने का अधिकार देने का फ़ैसला किया गया। तय किया कि जो लोग 1971 के बाद असम में आये थे, उन्हें वापस भेज दिया जाएगा। 1961 से 1971 के बीच आने वाले लोगों को वोट का अधिकार नहीं दिया गया, लेकिन उन्हें नागरिकता के अन्य सभी अधिकार दिये गये। असम के आर्थिक विकास के लिए पैकेज की भी घोषणा की गयी और यहाँ ऑयल रिफ़ाइनरी, पेपर मिल और तकनीक संस्थान स्थापित करने का फ़ैसला किया गया। केंद्र सरकार ने यह भी फ़ैसला किया कि वह असमिया-भाषी लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान की सुरक्षा के लिए विशेष कानून और प्रशासनिक उपाय करेगी। इसके बाद, इस समझौते के आधार पर मतदाता-सूची में संशोधन किया गया। विधानसभा को भंग करके 1985 में ही चुनाव कराए गये, जिसमें नवगठित असम गण परिषद को बहुमत मिला। पार्टी के नेता प्रफुल्ल कुमार महंत, जो कि आसू के अध्यक्ष भी थे, मुख्यमंत्री बने। उस समय उनकी उम्र केवल 32 वर्ष की थी। असम-समझौते से वहाँ लम्बे समय से चल रही राजनीतिक अस्थिरता का अंत हुआ। लेकिन 1985 के बाद भी यहाँ एक अलग बोडो राज्य के लिए आंदोलन चलता रहा। इसी तरह भारत से अलग होकर असमिया लोगों के लिए एक अलग राष्ट्र की माँग को लेकर उल्फा का सक्रिय, भूमिगत और हिंसक आंदोलन भी चलता रहा।


असम आंदोलन और असम समझौते के अनुभव से पता चलता है कि बाहरी लोगों को ग़ैर-कानूनी रूप से कहीं बसने से रोकना तो आवश्यक है, लेकिन एक बार जो बस गया उसे हटाना एक बहुत मुश्किल काम है। उल्लेखनीय है कि जिस मुद्दे को लेकर असम आंदोलन शुरू हुआ था, वह मुद्दा और उससे जुड़ी शिकायतें अभी तक पूरी तरह दूर नहीं हो पायी हैं। इसके अलावा असम के समाज में दूसरी पहचानों के प्रति असहिष्णुता की भावना बढ़ी है। ऐसा सिर्फ़ ‘मुसलमान बंगालियों’ के संदर्भ में ही नहीं हुआ है, बल्कि आदिवासी लोगों की मांगों के खिलाफ़ भी एक तरह की कट्टरता पनपी है। असम में हिंसा और हत्याओं के पीछे किसी तरह का कोई आर्थिक कारण नहीं रहा है। यह एक तरह का आतंक फैलाने का काम भर रहा है।

ऐसे हालातों वाले राज्य में पहली बार अहिंसा के दूत आचार्य श्री महाश्रमण अहिंसा यात्रा लेकर असम पहुंचे हैं। मौजूदा वक्त में आचार्यश्री गुवाहाटी में प्रवास कर रहे हैं। वे प्रतिदिन स्थानीय लोगों से मिलते हैं। और अहिंसा का संदेश देते हैं। उन्हें दिशा बोध देते हैं।

मुझे याद है 67वें अणुव्रत अधिवेशन के दौरान असम के पूर्व मुख्यमत्री प्रफुल मेहन्ता भी उनसे मिलने आए थे। और अक्तूबर मास में कांग्रेस के राष्टीय महासचिव राहुल गांधी ने भी आचार्य श्री से मुलाकात की।
इससे पहले असम विधान सभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुले मंच से आचार्य श्री के द्वारा शांति के लिए किए जा रहे प्रयासों की प्रशंसा की थी। ऐसे में असम के स्थानीय निवासियों पर आचार्यश्री महाश्रमण की अहिंसा यात्रा का असर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा है।
स्थानीय निवासी आचार्य श्री का खुले दिल से स्वागत कर रहे हैं। इसके पक्ष में मैं अपना एक संस्मरण आपके साथ साझा करना चाहता हूं।  




आपको याद दिलाना चाहूंगा कि असम के हिंसाग्रस्त इलाक़े का दौरा करने के बाद राजनाथ सिंह ने कहा था, “हम जानना चाहते हैं कि इन संगठनों के तार किससे जुड़े हुए हैं। हम इसे साधारण चरमपंथी कृत्य नहीं मान सकते। राज्य और केंद्र दोनों ही इससे उसी तरह निपटेंगे जिस तरह चरमपंथ से निपटा जाता है.“उन्होंने भूटान और म्यांमार के साथ भारतीय सीमा को ’सील’ करने की बात कही है लेकिन ये दुर्गम इलाक़ा है और ऐसा करना आसान नहीं होगा।

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार राजनाथ ने कहा था कि यदि ज़रूरी हुआ तो नेशनल डेमोक्रेटिक फ़्रंट ऑफ़ बोडोलैंड से निपटने के लिए सैन्य सहायता मुहैया कराई जाएगी।
गृहमंत्री ने अलगाववादी संगठन से बातचीत की संभावना से इनकार किया है, “इस तरह के संगठनों से कोई बातचीत नहीं होगी। केवल कार्रवाई होगी। समयबद्ध कार्रवा

असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने हमेशा कहा है कि राज्य और केंद्र सरकार ऐसे किसी ग्रुप के आगे नहीं झुकेगी और उग्रवादियों से सख़्ती से निपटेगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर लिखा, “सोनितपुर और कोकराझार में मासूमों को मारना कायरता है।“



 तीन मांगें थी पहली बोडो भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित किया जाये। दूसरी बोडो जनजाति बहुल असम के चार जिलों को एक स्वायत्तशासी क्षेत्र बनाकर स्थानीय विकास का अवसर प्रदान करना। तीसरी उन तमाम युवक और युवतियों को मुख्य धारा में वापस लेना जो हथियार उठाकर बोडो आन्दोलन के नाम पर बागी हो गये थे।


असम में अहिंसा यात्रा के दौरान अब तक असम के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल मेहन्ता से लेकर कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी तक उनसे भेंट कर चुके हैं। स्थानीय विधायक और जन प्रतिनिधियों ने भी उनका दिल से स्वागत किया है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि गुरूदेव की अहिंसा यात्रा की मशाल असम में शांति और अहिंसा से समस्त समाज को आलोकित करेगी और प्राणियों में सदभावना का विकास होगा।

अणुव्रत क्या, क्यांे और किसलिए


अणुव्रत की चर्चा और ख्याति आज हिन्दुस्तान से लेकर विदेशों तक फैली हुई है। जो आंदोलन आचार्य तुलसी ने 1 मार्च 1949 यानि कि 67 साल पहले शुरू किया था। अब वह नौजवान हो चुका है। सर्वविदित है कि देशी विदेशी मीडिया भी इसकी प्रासंगिकता और सामाजिक सार्थकता को सराह रही है। जिसका श्रेय इसके प्रर्वतक, श्रावकों, संवाहकों और मुनियों को जाता है। जिन्होंने अणुव्रत आचार संहिता की मशाल जन जन तक पहुंचाने का काम किया है।

पिछले 67 सालों में अणुव्रत ने एक बहुत ही संघर्षपूर्ण लंबी यात्रा की है। इस यात्रा के दौरान देश की जनसंख्या के साथ साथ कई पीढ़ियां भी बदल गई। संसार के हालात और समस्याओं में भी बदलाव आया है। अणुव्रत आंदोलन को लेकर जन मानस में एक नई जिज्ञासा उत्पन्न हो रही है। खासकर आज की युवा पीढी में कि वह अणुव्रत आंदोलन के बारे में संपूर्ण जानकारी चाहती है। इसलिए इस विषय पर चिंतन किया गया और इस निष्कर्ष पहुंचा गया कि अपने में संपूर्ण जानकारी समेटे एक बुक प्रकाशित की जाए।  
अणुव्रत का नाम सुनते ही कुछ लोगों में एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि आखिरकार अणुव्रत है क्याघ् अणुव्रत के मायने क्या हैंघ् जिज्ञासा का भाव उस वक्त और बढ़ जाता है जब श्अणुव्रत आंदोलनश् शब्द का इस्तेमाल किया जाता है।

सबसे पहले बात करते हैं अणुव्रत के अर्थ के बारे में
अणुव्रत का अर्थ है छोटे-छोटे संकल्प। अणुव्रत स्वस्थ समाज संरचना हेतु 11 सूत्रीय आचार संहिता है। अहिंसा, मानवीय एकता, सांप्रदायिक सौहार्द, प्रामाणिकता, साधन शुद्धि, व्यसन मुक्ति, चुनाव शुद्धि एवं पर्यावरण शुद्धि को केन्द्र में रखकर आचार्य तुलसी ने 11 सूत्रीय अणुव्रत आचार संहिता एवं वर्गीय अणुव्रत बनाये।
इस प्रकार स्पष्ट है कि अणुव्रत चरित्र प्रधान जीवन दर्शन, असाम्प्रदायिक धर्म एवं नैतिकता का राजमार्ग है, जो वर्तमान का मूल्यांकन कर समस्या-समाधान के सूत्र प्रस्तुत करता है। अणुव्रत इच्छाओं के अल्पीकरण और भोग के परिसीमन का संकल्प भी है।
अब प्रश्न यह उठता है कि अणुव्रत की नींव किन परिस्थतियों में और क्यों पड़ी। इसको समझने और जानने के लिए थोड़ा सा इतिहास में झांकना पड़ेगा।

बात उस वक्त की है जब हिन्दुस्तान 15 अगस्त 1947 में अग्रेजों की हुकूमत से आजाद हुआ था। हिन्दुस्तान पाकिस्तान के साथ बंटवारे की आग में जल रहा था। दोनों तरफ नफरत, बर्बरता, हिंसा और कत्लेआम चल रहा था। जमीनें रक्तरंजित थी। महिलाओं का अपहरण और बलात्कार, अबोध बच्चों की हत्या, क्या जवान और क्या बुर्जुग सभी हिंसा की बलिवेदी पर चढ़ रहे थे। यह वह दौर था जब सही को गलत से अलग करने का फर्क मिट चुका था। भाई भाई से लड़ रहे थे, एकता और संघ की भावना कहीं नहीं थी। इस सब की वजह के रूप में भाषा, नस्ल और धर्म की विवधिता को देखा और समझा जा रहा था। लोगों में राजनीतिक और सामाजिक चेतना की पहचान का अभाव था। आजादी से पहले के संघर्ष के दौरान क्रांतिकारी नेताओं गोखले, तिलक और महात्मा गांधी जैसे सरीखे नेताओं ने विभिन्न भाषा भाषी समुदायों, धार्मिक समूहों और जातियों के बीच पुल बनाने पर ज्यादा ध्यान दिया। हालांकि ये कोशिशें कभी पूरी तरफ से कामयाब नहीं हो पाईं। इसीलिए जब 1947 में आजादी मिली तो वह दो देशों हिन्दुस्तान और पाकिस्तान को मिली न की सिर्फ हिन्दुस्तान को।
आजादी तो मिली थी लेकिन इसके साथ ही मुल्क का बंटवारा भी हो गया था। पिछले बारह महीनों से हिन्दुस्तान लगातार हिंदू और मुसलमानों के बीच दंगों का गवाह रहा था। जो हिेसा कलकत्ता में 16 अगस्त 1946 को शुरू हुई और पूरे बंगाल के अदरूनी हिस्सों में मारकाट मची रही। इस दंगे ने बिहार, संयुक्त प्रांत और पंजाब को अपनी चपेट में ले लिया। पंजाब में तो यह हिंसा और नर संहार इतना भीषण रहा कि इसने पुराने सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे। सन् 1946.47 के खून खराबे ने महात्मा गांधी को अंदर तक तोड़ दिया था। वह 77 साल का वृद्ध, कीचड़ और चट्टानों से भरे कठिन इलाकों में दंगा पीड़ितों को सांत्वना देता घूम रहा था। अपनी सात सप्ताह की यात्रा के दौरान गांधी जी ने 116 मील की यात्रा की, जिसमें ज्यादातर वे पैदल चले। उन्होंने करीब सौ जगह गांव वालो को संबोधित किया। इसके बाद उन्होंने बिहार और दिल्ली की यात्रा की। दस्तावेजों के मुताबिक 13 अगस्त 1947 को महात्मा जी कलकत्ता के मुस्लिम बाहुल्य इलाके बेलियाघाट में थे। सेना के दस्तावेजोें के मुताबिक कलकत्ता के दंगों का बदला नोआखली में लिया गया। नोआखली का बदला बिहार में, बिहार का बदला गढ़ मुक्तेश्वर में लिया गया और गढ़ मुक्तेश्वर का बदला

आंकड़ों के मुताबिक बंटवारे में एक करोड़ लोग इधर से उधर हुए। वे लोग कहीं बैलगाड़ी से, कभी टृेन से तो कभी पैदल ही अपना घरबार छोड़कर दूसरी जगह से जा रहे थे। कभी वे सेना की सुरक्षा में सफर करते तो कभी अपनी तकदीर या अपने ईश्वर पर यकीन करते। यह मानवीय इतिहास का सबसे बड़ा मानवीय विस्थापन था। ज्ञात इतिहास में इतने कम दिनों में किसी भी जगह इतने लोगों का शरणार्थियों के काफिलों के रूप में विस्थापन नहीं हुआ। एक प्रत्यक्षदर्शी पत्रकार के मुताबिक ..... उन्होंने गर्मी, बरसात, बाढ़ और पंजाब की कंपकपाने वाली ठंड की परवाह नहीं की। काफिले से उड़नेवाली धूल पूरे इलाके में छा गई और यह धूल लोगों के मन में व्याप्त भय और उनके शरीर से निकलने वाले पसीने से घुलमिल गई। वह धूल मानव मलमूत्र और सड़ती हुई लाशों के साथ मिल गई। जब नफरत का बादल छंटा और लाशों की गिनती की गई तो उसकी तादाद पांच लाख तक पहुंच गई थी, जो बंदूक की गोलियों से, तलवारों से, चाकूओं से, छुरियों से और अन्य महामारियों से मारे गए थे। सैकड़ों की संख्या में ऐसे लोग भी थे जो लूटे पिटे लोग थे जो अपने बर्बाद होते घरों और उजड़ते खेतों को देखकर सदमें में मर गए थे। ऐसी जिदंगी का क्या मतलब था जब जीने की तमाम वजहें खत्म हो जाए और इंसान जंगली बनने पर उतारू हो जाए। अपने सामने मार दिए गए छोटे छोटे बच्चों या कुएं में कूदकर जान दे चुके अपने प्रियजनों को देखने से बेहतर था कि वे खुद भी अपनी जिदंगी खत्म कर लें।

इतिहास साक्षी है कि 31 अगस्त को नोआखली और बेलियाघाटा में दंगे की दोबारा भड़की आग ने गांधी को फिर से झकझोर दिया। इसने फिर से देश को अपनी चपेट में ले लिया। गांधी फिर से उपवास पर चले गए। एक प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक गांधी ने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि अगर में कलकत्ता में शांति बहाल करवा सकता हूं। तो मुझे विश्वास है कि मैं पंजाब में भी ऐसा कर सकता हूं। लेकिन अगर मैं यहां आत्मविश्वास खो देता हूं तो मुझे मालूम है कि हिंसा की यह आग बहुत तेजी से फैल जाएगी। और फिर दो तीन विदेशी शक्तियां हमारे सिर पर सवार हो जाएगी। और हम हाल ही में मिले आजादी के सपने को खो बैंठेगे। यदि इसमें मेरी जान भी चली जाती है तो कम से कम मैं उस दिन को देखने के लिए जिंदा तो नहीं रहूंगा। लेकिन मैं अपने प्रयास से पीछे नहीं हटूंगा।

गांधी ने 2 सिंतबंर को उपवास शुरू किया और कुछ ही दिनों के अंदर हिंदू और मुसलमान गुंडे और असामाजिक तत्वों ने उनके पास जाकर हथियार जमा कर दिए। शहर में फिर से अमन चैन बहाल होने लगा। लार्ड माउंटबेटन ने कहा कि पंजाब में काम कर रहे 50,000 फौज के जवानों की तुलना में बंगाल में एक निहत्था आदमी ज्यादा प्रभावशाली साबित हुआ।

लेकिन इसके बाद दिल्ली के शरणार्थियों को भयमुक्त करने के लिए गांधी अस्पतालों और शरणार्थी शिवरों का दौरा करते रहे और लोगों को सांत्वना देते रहे। उन्होंने लोगों से अपील की, वे अतीत को भूल जाएं और शांति बहाल करने की दिशा में कदम उठाएं। उन्होंने सभी से दिल्ली में शांति बहाले करने की भीख तक मांगी।
इतिहासज्ञाताओं के मुताबिक 26 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी ने एक प्रार्थना सभा में कहा कि बुरा दौर बीत चुका है और हिंन्दुस्तान के लोग साथ मिलकर सभी वर्गाें और मतों को मानने वालों की समानता के लिए काम करेंगे। उन्होंने यह उम्मीद भी जाहिर भी की कि देश में कभी भी बहुसंख्यक वर्ग का वर्चस्व अल्पसंख्यकों के उपर नहीं होने दिया जाएगा, चाहे वह संख्या और प्रभाव में कितने क्यों न हो। उन्होंने यह भी विश्वास जाहिर किया कि भौगोलिक और राजनीतिक रूप से भले ही हिन्दुस्तान का बंटवारा हो गया, लेकिन दिल से हम दोस्त और भाई ही बने रहेंगे। हम एक दूसरे की मदद और सम्मान करते रहेंगे। साथ ही हम बाहरी दुनिया के सामने हमेशा एक ही रहेंगे। एक आजाद और एकीकृत भारत के लिए उन्होंने ताजिदंगी संघर्ष किया। आखिर में उन्होंने धार्मिक दंगे फसाद, असहिष्णुता, कत्ले आम, नरसंहार और बंटवारा जैसी त्रासदी भी झेली।  लेकिन कुछ लोग इससे खासे नाराज थे। आखिरकार 30 जनवरी की एक शाम को एक प्रार्थना सभा में एक पूना के ब्राहमण युवक नाथूराम गोडसे ने उन्हंे तीन गोलियां मार दी। अहिंसा के अग्रदूत और मसीहा का अंत कर दिया गया। उस युवक पर मुकदमा चलाया गया लेकिन उसने अपने कृत्य को सही ठहराया। गांधी की मृत्यु से पूरा देश दुख के अथाह सागर में डूब गया।

इसके बाद फिर से धीरे धीरे हिंसा, सांप्रदायिक तनाव, अराजकता, अनैतिकता और असामाजिक प्रवृतियों ने फिर से सिर उठा लिए। राजनीतिक, सामाजिक, और आर्थिक अधिकारों की आवाज को लेकर विभिन्न संस्थाएं संगठित होने लगी। अधिकारों  की तीव्र लालसा में सेवा और त्याग की भावना की आधारशिला ही चरमरा गई। कर्तव्य का स्थान अधिकारों ने ले लिया। गांधी के बाद इस तरफ के वातावरण पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए थे जैन परंपरा के तेरापंथ संप्रदाय के नवमाधिपति आचार्य तुलसी। 1948, अक्टूबर माह की बात है जब कुछ प्रगतिशील युवकों को आचार्य तुलसी ने चर्चा करते हुए सुना कि आज के युग में कोई भी व्यक्ति प्रामाणिकता के सहारे नहीं जी सकता, धार्मिक उपदेश अपने स्थान पर हैं पर आज का उनका जीवन में कोई स्थान नहीं है। युवकों की इस विचारधारा ने आचार्य तुलसी को चिंतन करने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने विचारा कि व्यक्ति से ही समिष्ट का निर्माण होता है। बिना नागरिक विकास के कोई भी सामाजिक व्यवस्था टिक नहीं सकती। आज चारो ओर फैली हुई अधार्मिकता, शोषण, हिंसा, दुराचार, अनैतिकता और अशांति को मिटाने के लिए एक सबल क्र्रांति की आवश्यकता है। यह चुप बैठने का समय नहीं है। धर्म मात्र परंपरा निभाने और परिपाटियों का परिचालन करने के लिए नहीं है। वरन धर्म एक जीवंत शक्ति है। इसका ज्ञान कराना होगा। तब ही हम कुछ कर पाएगे। महात्मा गांधी के बलिदान से धर्म, संप्रदाय एवं धर्माचार्यों पर यह नैतिक जिम्मेदारी आई है। केवल संप्रदाय मात्र को चलाना ही धर्म नहीं है वरन धार्मिक आचार विचार के वास्तविक मूल्यों को जन जन में संचार करने के साथ मानवीय आदर्शों को मूर्त रूप् देना ही धर्म का मूल उददेश्य है। मात्र राजनेताओं के आधार पर सुराज्य की कामना करें, यह मृग मरीचका है। हमें नई दिशा लेनी और देनी होगी। तब ही हम जन जीवन में प्रवेश के अधिकारी होंगे।

किसी को कुछ कहूं उसके पूर्व मुझे ही कमर कसनी होगी। हमारे श्रावक प्रतिदिन धर्म स्थान पर आते हैं, साधुओं की उपासना करते हैं। धर्मचर्चा करते हैं। पर धार्मिक व्यक्ति के जीवन में जितना परिवर्तन होना चाहिए उनता दिखाई नहीं दे रहा है। धर्मोपसना की पृष्ठभूमि में जो नीति निष्ठा अपेक्षित है उसके अभाव में धार्मिकता फलवती नहीं हो सकती। नैतिकता की उधेड़बुन में चिंतन का क्रम आगे बढ़ा और इस सोच के साथ ही अणुव्रत विचार क्रांति का अभ्युदय हुआ। सन 1948 अक्टूबर के प्रात कालीन प्रवचन में आचार्य तुलसी ने सिंह घोषण की कि श्धर्म हमारे जीवन में उतरना चाहिए। हमारा जीवन नैतिक एवं प्रामाणिक बने। आज चहंुओर फैली हुई अधार्मिकता, शोषणवृत्ति, हिंसा, दुराचार एवं अशांति को मिटाने के लिए सबल नैतिक क्रांति की जरूरत है। इस सामाजिक क्राति के लिए प्रारंभ में मात्र ऐसे 25 संवाहकों की आवश्यकता है जो सदाचारपूर्ण जीवन जीने के साथ अपने आचार विचार की मशाल जागृत कर नैतिक क्रांति की ओर कूच करें।श्

इस तरह 25 संवाहकों की एक कार्यकत्र्ता वाहिनी का गठन हुआ। दिशा परिवर्तन के लिए एक नई आचार संहिता के निर्धारण की आवश्यकता महसूस हुई। भगवान महावीर द्वारा प्रदत्त श्रावक के व्रतों की आचार संहिता सामने थी। वर्तमान समस्याओं को ध्यान में रख कर एक नई आचार संहिता तैयार की गई। नाम एवं आचार विचारयुक्त एक एक नियम पर विचार करते हुए अणुव्रत नियमावली प्रस्फुटन हुआ। नामकरण, उददेश्य विधान एवं नियमावली पर विचार करने के लिए मुनि श्री नथमल वर्तमान में आचार्य महाप्रज्ञ, मुनि श्री बुद्धमल एवं मुनि श्री नगराज के सानिध्य में एक उपसमिति का गठन किया गया, उसमें श्री देवेन्द्र कुमार कर्णावट, श्री छोगमल चोपड़ा, श्री चंद रामपुरिया एवं श्री मोहन लाल कठौतिया मुख्य थे।
अब बारी थी नई आचार संहिता के नामकरण की, एक लंबे चिंतन के बाद कई सुझाव आए जैसे आदर्श श्रावक संघ, नैतिक मंच, नैतिक आंदोलन, अणुव्रती संघ। मुनि श्री नथमल आचार्य महाप्रज्ञ के सुझाव पर अणुव्रती संघ नाम निर्णीत किया गया।
फाल्गुन शुक्ला द्वितीया वि सं 2005 तदनुसार 1 मार्च 1949 का दिन सरदार शहर चुरू राजस्थान में नई संभावनाओं के साथ उदित हुआ। सूर्योदय के अन्नतर प्रात काल की पुण्यवेला में अणुव्रत आंदोलन का उदघाटन हुआ। अणुव्रत प्रवर्तक आचार्य तुलसी ने नैतिक क्रांति से प्रेरित अपने उदघाटन भाषण में कहा .... धार्मिक मूल्यों में मेरी गहरी आस्था है। मैं उस आस्था को क्रिया काण्ड या उपासना पद्धति में ही सीमित करना नहीं चाहता। मात्र उपासना के धरातल पर टिका हुआ धर्म जीवन को रूपान्तरण की स्थिति में नहीं ला सकता। जहां रूपान्तरण का अवकाश नहीं है। वहां जड़ता अपनी जड़ें जमा लेती है। धर्म का क्रांत और तेजस्वी स्वरूप धार्मिक की चर्या में प्रतिविबिंत हो सकता है। इसके लिए नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा अपेक्षित है। नैतिकता धर्म की पृष्ठभूमि भी है और नियति है।
नैतिकता का वियोग मूच्र्छावस्था का प्रतीक है। इस मूच्र्छा को तोड़कर धर्म के माध्यम से वैयक्तिक और सामाजिक लाभ की अनुभूति करना वर्तमान की सबसे बड़ी अपेक्षा है। जाति, भाषा, प्रांत, संप्रदाय आदि धर्म की व्यापकता में बाधा है। जब तक यह बाधा नहीं टूटती है, धर्म सार्वभौमिक, सार्वजनिक हितों का संवाहक नहीं हो सकता। जाति, भाषा, आदिगत भिन्नता धार्मिक मूल्यों के बीच में दीवार खड़ी न करे तो धर्म प्रसार के साधन विस्तृत हो सकते हैं। किसी भी धर्म के सिद्धांतों को अपनी सहमति देने से पहले मानव धर्म को सहमति देना अपेक्षित है। समाज के लिए भारभूत अर्थहीन रूढ़ परंपराओं को तोड़े बिना धर्म अपने सामाजिक लाभ को अभिव्यक्ति नहीं दे सकती। सादा और सात्विक, प्रामाणिक और निश्चिन्त तथा मानसिक द्वन्द्वों से निर्मुक्त स्वस्थ जीवन जीने के लिए एक नई किन्तु प्राचीन पद्धति का प्रादुर्भाव जन जीवन में नई स्फुरणाओं और संभावनाओं को जन्म देगा, यह मेरा दृढ़ विश्वास है। आचार्य तुलसी ने अपने अभिभाषण में अणुव्रत आंदोलन की भूमिका का महत्व बताते हुए जन जन से अपने कर्तव्य बोध का आह्वन किया। एक ही आह्वन में 73 लोगों ने अपने नाम दिए।
उदघाटन समारोह में घोषित अणुव्रत आचार संहिता के अनुसार अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह आदि के अनुसार सबकी व्याख्या करते हुए छोटे छोटे 75 नियम थे।
यह नैतिक क्रांति का प्रारंभ था। जिसका लोकव्यापी स्वागत हुआ। सरदारशहर अणुव्रत की संस्थापना का आधारभूत केंद्र बना और यहीं से संयम खलु जीवनम्, संयम ही जीवन है का घोष गूंजा। जो धीरे धीरे जनघोष बन गया और हिमालय से कन्याकुमारी तक चहुंओर फैल उठा।  

वर्तमान अणुव्रत अनुशास्ता और अहिंसा यात्रा
विश्व क्षितिज को अध्यात्मिक आलोक प्रदाता लोक महर्षि आचार्यश्री महाश्रमण इक्कीसवीं सदी के महान समाज सुधारक है। ‘संयम ही जीवन है’ उद्घोष को मुखरित करने वाले अणुव्रत आंदोलन को आप अणुव्रत अनुशास्ता के रूप में कुशल नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं।

आपका जन्म 13 मई 1962 को राजस्थान के सरदारशहर कस्बे में हुआ एवं 5 मई 1974 को दीक्षित हुए। एक धर्म संप्रदाय के आचार्य होते हुए भी आपके विचार असम्प्रदायातीत है। अहिंसा और नैतिकता की प्रतिष्ठापना के लिए आप सतत् संलग्न है। मानवीय मूल्यों के पुर्नस्थापना एवं कल्याण के फौलादी संकल्प के साथ 30,000 किलोमीटर की आप द्वारा की गई पद्यात्राएं आपके परम पुरुषार्थ की परिचायक है।

अणुव्रत अनुशास्ता वर्तमान युग के ऐसे अध्यात्मिक अशुं माली है जिनकी अध्यात्म रश्मियां से समग्र विश्व अहिंसा का आलोक पाता है। 9 नवम्बर 2014 को दिल्ली के लालकिले से सद्भावना, नैतिकता एवं नशामुक्ति के विशद् प्रचार-प्रसार के उद्देश्यों के साथ अहिंसा-यात्रा का शंखनाद आपका अद्भुत उपक्रम है। जनमानस को लाभान्वित करने वाली इस ऐतिहासिक अहिंसा-यात्रा के लिए राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी, पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री श्री सुशील कोईराला एवं कांग्रेस कमेटी की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी आदि ने शुभ कामना संदेश प्रेषित किये। विभिन्न विभूतियों के साथ-साथ नेपाल के पूर्व उपराष्ट्रपति        श्री परमानंद झा भी अहिंसा यात्रा के शुभारंभ में पैदल दिल्ली की सड़कों पर पूज्यप्रवर के साथ प्रस्थित हुए।

लगभग 10,000 किलोमीटर की प्रस्तावित अहिंसा यात्रा भारत के पड़ौसी देश नेपाल, भूटान आदि के साथ-साथ हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, आसाम, मेघालय, सिक्किम, उड़ीसा, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, तेलांगाना, कर्नाटक आदि भारतीय राज्यों को भी अहिंसा के अमृत से आप्लावित कर रही हैं। अणुव्रत महासमिति भी अहिंसा यात्रा में सहभागी होकर गौरवान्वित है।

अणुव्रत अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण के आध्यात्मिक मार्गदर्शन में अणुव्रत महासमिति और उसकी देश-विदेश में फैली 133 समितियां, अणुव्रत विश्व भारती, अखिल भारतीय अणुव्रत न्यास एवं अणुव्रत शिक्षक संसद संस्थान विभिन्न उपक्रमों द्वारा पूरे विश्व में नैतिकता के संदेश को संप्रसारित करने हेतु प्रयासरत है।
।। जय अणुव्रत।।

 












मनुष्य का धर्म क्या है ?



अजय शर्मा
आजकल देश में सामाजिक स्तर पर हालात बेहद चिंताजनक हैं। इसे सामाजिक और इंसानियत में संक्रमण का दौर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। पिछले कुछ समय से देशवासियों के अंदर सांप्रदायिक उग्रता और हिंसात्मक प्रदर्शन देखने सुनने में कुछ ज्यादा ही आ रहे हैं। इन घटनाओं के दौरान पूरे दिन टीवी चैनल पर ऐसी घटनाओं की खबरें और बेबुनियादी बहस प्रसारित की जाती रहती हैं। इन प्रसारणों ने लोगों को जागरूक करने की बजाय उन्माद और कट्टरता को बढ़ावा ही दिया है। देशवासियों में आपसी सौहार्द और भाईचारे की भावना दम तोड़ती साफ देखी जा सकती है। छोटी-छोटी बातों और अफवाहों पर जाति और धर्म संप्रदाय विशेष के अनुयायी सड़कों पर लाठी, पत्थर और हथियार लेकर निकल रहे हैं। विगत कुछ महीनों में कुछ घटनाएं ऐसी हैं जिनका यहां पर जिक्र करना जरूरी है। जिससे आप समझ सकते हैं कि लोगों में धार्मिक उन्माद किस कदर बढ़ा है। चाहे वह नोएडा के पास गौ मांस की अफवाह पर अखलाक की निर्मम हत्या हो, चलती टेन में गौ मांस खाने की संभावना पर साथी यात्री को नीेचे फेंकने की घटना हो, बिहार में भी धार्मिक बवाल देखने के लिए मिला और अभी हाल ही में बंगाल के मालदा की घटना। इसके अलावा पंजाब और गुजरात में गौ रक्षक दलों के द्वारा गो कशी के लिए ले जा रहे पशुओं का जीवन बचाने हेतू ड्ाइवर और उसके सहयोगियों की निर्ममता से सरेआम पिटाई। पशुओं के जीवन बचाने की इस मुहिम में हिंसा इतनी बढ़ गई कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने भाषण में कहना पड़ा कि उन्हें मत मारो, मारना है तो मुझे गोली मार दो। प्रधानमंत्री की पीड़ा को समझा जा सकता है।
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ये उग्रता तथा हिंसात्मक अभिव्यक्ति समाज और देश के लिए खतरे की घंटी है। लोग अपने ही भाई बधुंओं के विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी सहन नहीं कर पा रहे हैं। एक दूसरे पर अमर्यादित और अभद्र भाषा की कीचड़ उछाल रहें हैं। यह समाज के लिए बहुत ही गंभीर हालात हैं।
अणुव्रत भी किसी भी प्रकार की हिंसा और हत्या, असहिष्णुता का विरोध करती है। आचार्य श्री तुलसी द्वारा प्रवर्तित अणुव्रत आचार संहिता अपने 11 सूत्रिय नियमों में मानव को इंसानियत को लेकर जागृत करती है। वह उसके नैतिक उत्थान की बात करती है।

यदि इसके संभावित कारणों पर गौर करें कि ऐसा क्यों हो रहा है। तो कुछ बातें समझ में आती हैं। लोगों में राष्टीयता की भावना शून्य हो गई है। वे जाति, प्रांत और संप्रदाय में बंट गए हंै। लोग हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी और इसके बाद संप्रदाय जैसे सनातन, जैन, वैष्णव इत्यादि में बंट गए हैं। यहां पर संप्रदाय मुख्य हो गए हैं और राष्टीयता गौण हो गई है। ये कौन कर रहा है? क्यों कर रहा है? मैं यहां पर किसी समुदाय या व्यक्ति विशेष का नाम नहीं लेना चाहता हूं। लेकिन ऐसे लोग अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक फायदों के लिए देश की जनता की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहें हैं। एक तरह से ये लोग मानवता के हत्यारे हैं। मनुष्य की धार्मिक भावनाओं को भड़का कर खूनी खेल खेला जा रहा है। ये लोग देश को आर्थिक और सामाजिक आघात पहंुचा रहे हैं।

मैं इन लोगों के बहकावे में आकर इंसान को इंसान ना समझने वाले भोले भाले मनुष्यों से जानना चाहता हूं कि जब आपका कोई भाई बंधु दूसरे देश में जाता है और उससे पूछा जाता है कि आप किस देश के नागरिक हो, तो वह बताता है कि मैं हिन्दुस्तान का नागरिक हूं। तो उस वक्त उसे वहां पर हिन्दुस्तानी कहा जाता है ना हिन्दु, मुस्लिम या सिख ईसाई। तो फिर ये संप्रदाय प्रधान कैसे हो गए। धर्म सिर्फ इंसान की ईश्वर में आस्था का प्रतीक है। संप्रदाय इंसान की पहचान नहीं हो सकता, इंसान की पहचान उसके व्यवहार और चरित्र से होती है। मनुष्य के इस पतन के लिए देश की राजनीति में कुछ स्वार्थी लोग जिम्मेदार हैं। जो राजनीति करने के बजाय मानवता के हत्यारे बने हुए हैं। अपनी राजनीतिक पिपासा के लिए किसी भी हद तक गिरने के लिए तैयार हैं क्योंकि वे जानते हैं भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इन्हें राजनीति में बने रहने के लिए जन समर्थन आवश्यक है। इसलिए इन लोगों ने मनुष्य को संप्रदाय के आधार पर बांटना शुरू कर दिया। जिसके परिणाम दंगों और हत्याओं के रूप में सामने आ रहे हैं। मुझे तो लगता है इस तरह के लोगों को संसद में पहुंचने का अधिकार ही नहीं चाहिए। संसद में दिखने वाले चेहरों को पहले प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। जिससे वह व्यक्तिगत स्वार्थ से उपर उठ कर देश हित में सोचें।

अब सवाल यह उठता है कि ऐसे हालातों और असहिष्णुता को पनपने से कैसे रोका जाए। कैसे लोगों में संप्रदाय से उपर उठकर आपसी सौहार्द और भाई चारे के साथ साथ राष्टीयता की भावना का विकास किया जाए। जिससे प्राणियों में सदभावना हो। इसके लिए मनुष्य को इन जाति, संप्रदाय और प्रांतवाद के छोटे-छोटे समूहों में वर्गीकृत होना छोड़ कर इंसान ही बने रहने का प्रयास करना होगा। जो मानव समाज के लिए बेहतर है।

मैं सभी मानव समाज के साथ साथ जनता द्वारा चुने गए जन प्रतिनिधियों से भी अनुरोध करता हूं कि वे सिर्फ राजनीति करें। मनुष्य की धार्मिक भावनाओं की रक्षा करें। हमारे संविधान के मुताबिक धर्म निरपेक्षता का अर्थ है कि सभी देशवासी अपनी धार्मिक भावनाओं के अनुसार कहीं भी पूजा पाठ कर सकते हैं और दूसरे धर्म का आदर करें। तो ऐसे में सरकार भी राजनीति धर्म का पालन करे। जिससे प्राणियों में सद्भावना हो। धर्म निरपेक्ष राज्य का दायित्व है कि वह धर्म की चिंता करे। मानवीय गुणों के विकास का जो धर्म है उसकी चिंता करे। जिस धर्म का पक्ष केवल नैतिक और चारित्रिक है वही राज्य को मान्य होना चाहिए। इसका तात्पर्य है कि वैदिक, जैन, बौद्ध, ईसाई और इस्लाम आदि राज्य के धर्म नहीं हो सकते।