1 अगस्त को खत्री समाज के गौरव रत्न पुरुषोत्तम दास टंडन की जयंती है देशभर में खत्री समाज अपने अपने स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करेगा ऐसा ही एक कार्यक्रम अखिल भारतीय खत्री महासभा के राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष अरविंद अरोड़ा गाजियाबाद के साहिबाबाद में आयोजित कर रहे हैं उन्होंने मुझसे एक बातचीत के दौरान कहा कि इस कार्यक्रम में मंच का संचालन आप कीजिए यह मेरे लिए बहुत ही गर्व की बात है की पुरुषोत्तम दास टंडन की जयंती पर यह मौका मुझे मिल रहा है आइए एक नजर डालते हैं पुरुषोत्तम दास टंडन के जीवन यात्रा पर
पुरूषोत्तम दास टंडन (१ अगस्त १८८२ - १ जुलाई, १९६२) भारत के स्वतन्त्रता सेनानी थे। हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करवाने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुआ था। वे भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के अग्रणी पंक्ति के नेता तो थे ही, समर्पित राजनयिक, हिन्दी के अनन्य सेवक, कर्मठ पत्रकार, तेजस्वी वक्ता और समाज सुधारक भी थे। हिन्दी को भारत की राजभाषा का स्थान दिलवाने के लिए उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान किया। १९५० में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने। उन्हें भारत के राजनैतिक और सामाजिक जीवन में नयी चेतना, नयी लहर, नयी क्रान्ति पैदा करने वाला कर्मयोगी कहा गया।[क] वे जन सामान्य में राजर्षि (संधि विच्छेदः राजा+ऋषि= राजर्षि अर्थात ऐसा प्रशासक जो ऋषि के समान सत्कार्य में लगा हुआ हो।) के नाम से प्रसिद्ध हुए। कुछ विचारकों के अनुसार स्वतंत्रता प्राप्त करना उनका पहला साध्य था। वे हिन्दी को देश की आजादी के पहले आजादी प्राप्त करने का साधन मानते रहे और आजादी मिलने के बाद आजादी को बनाये रखने का। टण्डन जी का राजनीति में प्रवेश हिन्दी प्रेम के कारण ही हुआ। १७ फ़रवरी १९५१ को मुजफ्फरनगर 'सुहृद संघ` के १७ वें वार्षिकोत्सव के अवसर पर उन्होंने अपने भाषण में इस बात को स्वीकार भी किया था।
भारत रत्न राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन जी के जीवन से सम्बंधित कुछ तिथियाँ और घटनाएँ निम्नांकित हैं-
१८९० : सिटी एंग्लो वर्नाक्यूलर विद्यालय में प्रवेश।
१८९२ : राधास्वामी मत का उपदेश लिया।
१८९४ : मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण की।
१८९४ : अग्रजा तुलसा देवी का स्वर्गवास।
१८९७ : हाई स्कूल।
१८९७ : नरोत्तमदास खन्ना (मुरादाबाद नगर निवासी) की सुपुत्री चन्द्रमुखी देवी के साथ पाणिग्रहण संस्कार।
१८९९ : कांग्रेस के स्वयंसेवक बने।
१८९९ : इण्टरमीडिएट।
१९०० : प्रथम संतति (कन्या) की प्राप्ति।
१९०१ : म्योर सेण्ट्रल कॉलेज से निष्कासित।
१९०३ : पिता श्री सालिगराम जी का निधन।
१९०४ : बी०ए०
१९०५ : राजनीतिक जीवन का प्रारम्भ।
१९०५ : बंगभंग आन्दोलन से प्रभावित होकर स्वदेशी का व्रत धारण किया।
१९०५ : गोपाल कृष्ण गोखले के अंगरक्षक के रूप में कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया।
१९०५ : 'बन्दर सभा महाकाव्य' नामक व्यंग्य कविता 'हिन्दी प्रदीप' में प्रकाशित।
१९०५ : विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के रूप में चीनी खाना छोड़ दिया।
१९०६ : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि चुने गए।
१९०६ : एल.एल.बी.
१९०७ : एम०ए० (इतिहास)
१९०७ : चमड़े का जूता पहनना छोड़ दिया।
१९०८ : हाईकोर्ट में सर तेजबहादुर सप्रू के जूनियर रहकर वकालत प्रारम्भ की।
१९०९ : 'अभ्युदय' साप्ताहिक पत्र के संपादक।
१९१० : १० अक्टूबर को हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना और मालवीय जी की अध्यक्षता में अधिवेशन, जिसमें टण्डन जी को सम्मेलन का प्रथम प्रधानमंत्री चुना गया।
१९१० : 'मर्यादा' मासिक पत्रिका के संपादक।
१९११ : इलाहाबाद में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का द्वितीय अधिवेशन करवाया।
१९१४ : लखनऊ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का द्वितीय अधिवेशन करवाया। पं॰ श्रीधर पाठक उस अधिवेशन के अध्यक्ष थे।
१९१४ : नाभा रियासत के विदेश मंत्री नियुक्त हुए।
१९१५ : इलाहाबाद में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का द्वितीय अधिवेशन करवाया।
१९१६ : जबलपुर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का द्वितीय अधिवेशन।
१९१८ : नाभा रियासत की नौकरी से त्याग पत्र दे दिया।
१९१८ : २२ दिसम्बर हिन्दी विद्यापीठ, प्रयाग की स्थापना की।
१९१८ : टण्डन जी के प्रयास से हिन्दी साहित्य सम्मेलन का इन्दौर में अधिवेशन हुआ जिसके अध्यक्ष महात्मा गाँधी थे।
१९१९ : इलाहाबाद म्युनिसिपैलिटी बोर्ड के चेयरमैन।
१९१९ : २४ अक्टूबर 'किसान सभा' स्थाई समिति की बैठक के सभापति।
१९१९ : 'किसान पुस्तक माला' का संकलन एवं प्रकाशन।
१९२० : पटना में अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का दसवाँ अधिवेशन करवाया।
१९२० : असहयोग आंदोलन में गाँधी जी के आह्वान पर हाईकोर्ट की वकालत छोड़ दी।
१९२१ : सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लेने के कारण १८ माह का कारावास। यह टण्डन जी की पहली जेल यात्रा थी।
१९२१ : 'कांग्रेस स्वयं सेवक दल' के प्रथम संयोजक बने।
१९२१ : इलाहाबाद की मेला तहसील के महावीर मेले में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई।
१९२१-२२ नमक का परित्याग।
१९२२ : एक राजाज्ञा द्वारा चेयरमैनशिप से हटाया गया।
१९२३ : पुन: म्युनिसिपिल बोर्ड के चेयरमैन नियुक्त हुए।
१९२३ : चेयरमैनशिप से त्यागपत्र दे दिया।
१९२३ : हिन्दी साहित्य सम्मेलन कानपुर में १३वें अधिवेशन के अध्यक्ष।
१९२३ : गोरखपुर में प्रांतीय कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गए।
१९२३ : उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष।
१९२३ : हिन्दी साहित्य सम्मेलन की खपरैल की इमारत बनाकर कार्यालय स्थापित किया।
१९२४ : दिल्ली में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन कराया।
१९२५ : पंजाब नेशनल बैंक के मैनेजर पद पर नियुक्त हुए।
१९२६ : लाला लाजपत राय के आग्रह से 'सर्वेण्ट्स ऑफ पीपुल्स सोसाइटी' में सम्मिलित हुए।
१९२८ : पंजाब नेशनल बैंक के मैनेजर पद से त्याग पत्र दे दिया।
१९२८ : बड़े दामाद की बस दुर्घटना से मृत्यु।
१९२९ : 'लोक सेवा मण्डल' के अध्यक्ष।
१९२९ : बैंक की नौकरी छोड़ दी।
१९३० : २६ जनवरी महात्मा गाँधी के नेतृत्व में प्रथम स्वतंत्रता दिवस मनाया।
१९३० : केन्द्रीय किसान संगठन की स्थापना की।
१९३० : हृदय रोग से ग्रस्त घोषित किये गए।
१९३० : बस्ती में बाबू शिवप्रसाद गुप्त और आचार्य नरेन्द्र देव के साथ पकड़े गये। १३ माह की सख्त कैद और जुर्माना हुआ।
१९३०-३२ टण्डन जी के नेतृत्व में किसानों ने सरकार को लगान देना बन्द कर दिया।
१९३१ : २९ दिसम्बर इलाहाबाद में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन हुआ, जिसमें टण्डन जी को गिरफ्तार कर नैनीजेल भेज दिया गया।
१९३१ : गोंडा जेल में किसान आंदोलन के सिलसिले में पुन: पकड़े गये।
१९३१ : नैनीताल में किसानों की दयनीय दशा पर एक वक्तव्य दिया।
१९३१ : दूसरी कन्या का विवाह।
१९३२ : सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया।
१९३२ : गोरखपुर जेल में बन्द किये गए।
१९३३ : २ जुलाई को लाहौर जेल के 'फ्री प्रेस ऑफ इंडिया' के प्रतिनिधि को एक वक्तव्य दिया जो गणेश शंकर विद्यार्थीऔर कानपुर के दंगों से सम्बंधित था।
१९३५ : नागपुर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का २५वाँ अधिवेशन करवाया।
१९३५ : २८ दिसम्बर इलाहाबाद में कांग्रेस की स्वर्ण जयन्ती समारोह के अध्यक्ष।
१९३५ : २७ मार्च से लेकर ५ मार्च तक उड़ीसा में रहे।
१९३५ : जून से लेकर अप्रैल १९३६ तक इलाहाबाद और लखनऊ के बीच संचालन समिति की बैठक में भाग लेने के लिए आते-जाते रहे।
१९३६-३७ : नयी प्रान्तीय धारा सभाओं के चुनाव हुए। प्रयाग नगर से टण्डन जी निर्विरोध चुने गए। २९ जुलाई १९३७ को सदस्यता की शपथ ली।
१९३६ : ६ फरवरी इलाहाबाद में किसानों की दुर्दशा पर एक मार्मिक वक्तव्य दिया।
१९३६ : २० जून 'एडवांस' पत्र में किसानों की दयनीय अवस्था पर एक वक्तव्य प्रकाशित हुआ।
१९३६ : युक्त प्रान्तीय कमेटी बैठक में टण्डन जी उपाध्यक्ष चुने गए।
१९३६ : बनारस जिला राजनैतिक सम्मेलन की अध्यक्षता की।
१९३६ : हिन्दी साहित्य सम्मेलन के नागपुर अधिवेशन में 'राष्ट्रभाषा प्रचार समिति' की स्थापना, जिसके सदस्य टण्डन जी भी थे।
१९३६ : कलकत्ता की यात्रा की और एक विशाल जन समूह के समक्ष सार्वजनिक भाषण दिया।
१९३६ : ५ अप्रैल महात्मा गाँधी के द्वारा दिल्ली में हिन्दी साहित्य सम्मेलन में संग्रहालय की स्थापना करवायी, जिसका संकल्प १९२३ के हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में लिया गया था।
१९३६-३७ : हिन्दी साहित्य सम्मेलन के तत्वावधान में गठित 'व्याकरण समिति' के संयोजक।
१९३७ : ३० जुलाई सर्वसम्मत से विधान सभा के अध्यक्ष चुने गए।
१९३७ : २७ अप्रैल 'लोक सेवामण्डल' के धार्मिक अधिवेशन में एक हृदयग्राही भाषण।
१९३७ : २६ मार्च दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा मद्रास के छठवें उपाधि वितरण उत्सव के अवसर पर दीक्षान्त भाषण दिया।
१९३८ : हिन्दी साहित्य सम्मेलन का शिमला में अधिवेशन करवाया। सभापति थे पं॰ बाबूराव विष्णु पराड़कर।
१९३८ : २० अक्टूबर को कान्यकुब्ज कॉलेज, लखनऊ में 'हिन्दी की शक्ति' पर व्याख्यान दिया।
१९३९ : फरवरी में हृदय रोग का दौरा पड़ा।
१९३९ : १४ सितम्बर १९३९ को देश की समस्त विधान सभाओं के मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया। तब टण्डन जी भी विधान सभा की अध्यक्षता से पृथक हो गए।
१९३९ : ३ अक्टूबर को टण्डन जी ने एक सुनिश्चित वक्तव्य दिया जो जर्मनी-पोलैण्ड युद्ध से सम्बंधित था, जिसमें इंग्लैण्ड पोलैण्ड से संधिबद्ध होने के कारण उसके साथ था।
१९३९ : काशी में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन करवाया, जिसमें अम्बिका प्रसाद वाजपेई सभापति थे। इसमें आचार्य शुक्ल, श्यामसुन्दर दास, अयोध्या सिंह उपाध्याय, माखनलाल चतुर्वेदी, निराला, राहुल सांकृत्यायन, मैथिलीशरण गुप्त, आचार्य नरेन्द्र देव, राधाकृष्ण दास आदि ने भाग लिया।
१९४१ : २ अप्रैल को बन्दी बनाकर नैनी जेल में रखा गया। वहाँ से फतेहगढ़ सेन्ट्रल जेल ले जाये गए, जहाँ लगभग ८ माह जेल में नज़रबन्द रहने के बाद जेल से छूटे। यह उनकी चौथी जेल यात्रा थी।
१९४२ : 'राजनीतिक पीड़ित सहायता कोष' की स्थापना की और कानूनी सुरक्षा की व्यवस्था की। इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप सात नवयुवकों की जान बचायी, जिनको फाँसी की सजा मिली थी।
१९४४ : २२ अगस्त जेल से छोड़े गए।
१९४४ : १० अक्टूबर संयुक्त प्रान्तीय प्रतिनिधि एसेम्बली की स्थापना और बाबू जी उसके अध्यक्ष चुने गये।
१९४४ : 'सत्यार्थ प्रकाश' पर सिन्ध सरकार द्वारा लगाये गये प्रतिबंध का खुलकर विरोध किया।
१९४४ : जयपुर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन करवाया।
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पुरुषोत्तमदास टण्डन के बहु आयामी और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व को देखकर उन्हें 'राजर्षि` की उपाधि से विभूषित किया गया। १५ अप्रैल सन् १९४८ की संध्यावेला में सरयू तट पर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ महन्त देवरहा बाबा ने आपको 'राजर्षि` की उपाधि से अलंकृत किया। कुछ लोगों ने इसे अनुचित ठहराया, पर ज्योतिर्मठ के श्री शंकराचार्य महाराज ने इसे शास्त्रसम्मत माना और काशी की पंडित सभा ने १९४८ के अखिल भारतीय सांस्कृतिक सम्मेलन के उपाधि वितरण समारोह में इसकी पुष्टि की। तब से यह उपाधि उनके नाम के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई स्वयं अलंकृत हो रही है।
भारतीय संस्कृति के परम हिमायती और पक्षधर होने पर भी राजर्षि रूढ़ियों और अंधविश्वासों के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों एवं कुप्रथाओं पर भी अपने दो टूक विचार व्यक्त किये। उनमें एक अद्भुत आत्मबल था, जिससे वे कठिन से कठिन कार्य को आसानी से सम्पन्न कर लेते थे। बालविवाह और विधवा विवाह के सम्बंध में उनका मानना था कि "विधवा विवाह का प्रचार हमारी सभ्यता, हमारे साहित्य और हमारे समाज संगठन के मुख्य आधार पतिव्रत धर्म के प्रतिकूल हैं" उन्होंने स्पष्ट किया कि विधवा-विवाह की माँग इसलिए जोर पकड़ रही है, क्योंकि हमारे समाज में बाल-विवाह की शास्त्र विरुद्ध प्रणाली चल पड़ी है और बाल विधवाओं का प्रश्न ही भारतीय समाज की मुख्य समस्या है। अत: "बाल-विवाह की प्रथा को रोकना ही विधवा विवाह करने की अपेक्षा अधिक महत्व का कर्तव्य सिद्ध होता है।"
उनके व्यक्तित्व के इस पहलू के एक-दो उदाहरण पर्याप्त होंगे- प्राय: लोग समझते हैं कि पका हुआ भोजन सुपाच्य होता है, पर राजर्षि ने इसे एक रूढ़ि माना और उन्होंने वर्षों तक आग से पके हुए भोजन को नहीं ग्रहण किया। चीनीखाना एक बार छोड़ दिया। एक ओर उन्हें गाय के दूध से परहेज था तो दूसरी ओर चमड़े के जूते से। इस प्रकार वे एक अद्भुत व्यक्तित्व के धारक थे।
भारतवर्ष में स्वतंत्रता के पूर्व से ही साम्प्रदायिकता की समस्या अपने विकट रूप में विद्यमान रही। कुछ नेता टण्डन जी पर भी सांप्रदायिक होने का आरोप लगाते रहे हैं। यह सच है कि राजर्षि अपनी संस्कृति के परम भक्त और पोषक थे। वे यह कहने में भी हिचक का अनुभव नहीं करते थे कि भारत में दो संस्कृतियों को जीवित रखना देश के साथ विश्वासघात करना होगा, पर इसका मतलब यह नहीं था कि टण्डन जी साम्प्रदायिक थे, मुसलिम विरोधी थे। इस सम्बंध में कुलकुसुम के विचार कितने सार्थक हैं-
- यदि किसी धर्म या संस्कृति में कोई व्यक्ति विशेष आस्था रखता है, तो उसके विरोधी प्राय: यह समझने की भूल कर बैठते हैं कि वह आदमी अन्य धर्मों तथा संस्कृतियों का शत्रु है। यही बात राजर्षि टण्डन के साथ हुई। उनके अनन्य हिन्दी प्रेम, भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं की एकनिष्ठा, आस्था और साधुओं के से वेष-विन्यास को देखकर उनके विरोधियों ने जान बूझकर या अनजाने ही यह प्रचार करने की भूल कर दी कि टण्डन जी मुसलमानों के शत्रु हैं।
स्वयं टण्डन जी ने भी लिखा है-
- मेरे हिन्दी के काम के कारण लोगों ने मुझे मुसलमान भाइयों का मुखालिफ समझ लिया। इन लोगों को यह नहीं मालूम कि बहुत से मुसलमान मेरे कितने अच्छे दोस्त हैं। मेरे सामने यदि कोई मुसलमान के साथ अन्याय करे, तो मैं उसके पक्ष में जान की बाजी लगा दूँगा।
वास्तव में टण्डन जी का व्यक्तित्व मानववादी था। उनके घर पर जो बालक उनका सहयोग करता था, वह मुसलमान था, पर कैसी विडम्बना है कि लोग कहते हैं कि टण्डन जी साम्प्रदायिक थे।
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