गणतंत्र दिवस गौरवशाली इतिहास की झलक
अजय शर्मा
गणतंत्र दिवस की परेड आज विश्व भर में भारत की पहचान बनकर उभरी है। गणतंत्र दिवस को भारत की शक्ति का असली परिचय मिलता है। सेना, सशस्त्र बलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से सुसज्जित यह परेड आज भारत का गौरव गान करती है। गणतंत्र दिवस की परेड की खूबसूरती और उसका अहमियत को शब्दों में लिख पाना बेहद मुश्किल है।
गणतंत्र दिवस हर भारतीय के लिए गौरव का दिन है। आज से 68 साल पहले 26 जनवरी के दिन ही हमारा संविधान भी लागू किया गया था। यही वह दिन था जब भारत के प्रथम राष्टपति राजेन्द्र प्रसाद ने राष्टपति पद की शपथ लेने के देश के नाम अपना पहला संदेश दिया और इसके बाद बग्घी में बैठकर पहले गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होने के लिए इरविन स्टेडियम (वर्तमान में मेजर ध्यान चंद नेशनल स्टेडियम), द किंग्सवे, लाल किले और रामलीला मैदान पहुंचे थे। यहीं पर परेड का भी आयोजन किया गया था, लेकिन राजपथ पर पहली परेड 1955 में हुई थी।
15 अगस्त और 26 जनवरी की महत्ता में बहुत अंतर है। 15 अगस्त को देश ब्रिटिश शासन से आजाद हुआ था और 26 जनवरी को देश ने अपनी शासन प्रणाली के लिए संविधान लागू किया था। सही मायने में देश 26 जनवरी को आजाद हुआ था। क्योंकि इस दिन से हमारे उपर संपूर्ण रूप से अंग्रेजों का शासन समाप्त हुआ और भारत में लोकतांत्रिक शासन लागू हुआ।
भारतीय इतिहास में गणतंत्र दिवस का बहुत महत्व है क्योंकि ये हमें भारतीय स्वतंत्रता से जुड़े हर-एक संघर्ष के बारे में बताता है। भारत की पूरी आजादी (पूर्णं स्वराज) की प्राप्ति के लिये लाहौर में रावी नदी के किनारे 1930 में इसी दिन भारत की आजादी के लिये लड़ने वाले लोगों ने प्रतिज्ञा की थी। जो 15 अगस्त 1947 को साकार हुआ।
26 जनवरी 1950 को, हमारा देश भारत संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, और लोकतांत्रिक, गणराज्य के रुप में घोषित हुआ अर्थात भारत पर खुद का राज था उस पर कोई बाहरी शक्ति शासन नहीं करेगी। इस घोषणा के साथ ही दिल्ली के राजपथ पर भारत के राष्ट्रपति के द्वारा झंडा फहराया गया साथ ही परेड तथा राष्ट्रगान से पूरे भारत में जश्न का माहौल शुरु हो गया।
हमारा मजबूत लोकतंत्र है। यह गर्व करने लायक उपलब्धि है। बहुत सारे विदेशी प्रेक्षकों का मानना था कि भारत एक देश के रूप में ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएगा या भाषायी समूह अपने अलग राष्ट्र की मांग करेगा
आज भी हमारे देश के सामने कई समस्याएं हैं। उनमें से बड़ी है बेरोजगारी की समस्या। बेरोजगारी के कारण देश के युवकों-युवतियों में भारी असंतोष और बेचैनी पाई जाती है। देश की आवश्यकताओं के अनुसार व्यव्स्थाओं में सुधार और विकास की जरूरत है। जिस पर काम किया जा रहा है। देश को टेक्नोलॉजी के मामले में उन्नत बनाने की कोशिश की जा रही है। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को डिजीटिल इंडिया के स्वपन के साथ वैश्विक स्तर पर आधुनिक बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन डिजीटिल इंडिया के साथ-साथ उन्हें और भी क्षेत्रों में विकास की कोशिशें करनी होगी।
दोस्तों, तो इस बार हम गणतंत्र दिवस से संबधित ऐसे ही कुछ अनछुए बिदुओं और समय के कालचक्र में धूमिल पड़ चुके महत्वपूर्ण तथ्यों पर से धूल झाड़ने का काम करेंगे। हम जानने की कोशिश करेंगे कि पिछले 68 साल में हमारे गणतंत्र दिवस और देश के हालातों में कितना बदलाव आया है। आइए सबसे पहले जानने की कोशिश करते हैं कि 68 साल पहले गणतंत्र दिवस कैसे मनाया गया था और मौजूदा समय में यानि की 2016 तक कैसे मनाया गया।
68 साल पहले गणतंत्र दिवस
हमारे पहले गणतंत्र दिवस समारोह का स्वरूप वर्तमान समारोह से काफी जुदा था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्रथम गणतंत्र दिवस समारोह के ठीक पहले राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। उनका शपथ ग्रहण समारोह राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में आयोजित किया गया था। इसके बाद तत्कालीन गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी ने भारत को गणतंत्र घोषित कर दिया। तब राष्ट्रपति को 31 सिपाहियों ने लाइन से खड़े होकर 31 बंदूकों की सलामी दी थी। राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद शाही घोड़ागाड़ी में एकदम महाराजा स्टाइल में बैठकर आए थे। ध्वजारोहण की परंपरा तब भी थी। जैसा कि आप लोग जानते हैं कि हमारे गणतंत्र दिवस पर कोई न कोई विदेशी हस्ती मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहती है। उस वक्त प्रथम समारोह में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किए गए थे। हालांकि, तब मुख्य अतिथि की सुरक्षा इतना बड़ा मुद्दा नहीं थी। पहली रिपब्लिक डे परेड इरविन स्टेडियम (अब नैशनल स्टेडियम) में हुई थी। इसे देखने के लिए करीब 15,000 लोग आए थे। आपको बताना चाहूंगा कि 1955 में पहली बार राजपथ पर गणतंत्र दिवस की परेड हुई थी, तब इसे किंग्सवे के नाम से जाना जाता था। उसके बाद से हर साल परेड यहीं होने लगी। उस साल पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मुहम्मद हमारे समारोह के मुख्य अतिथि थे।
झांकियां हमेशा से हमारी परेड का हिस्सा रही हैं, लेकिन तब की झांकियां बहुत ही साधारण हुआ करती थीं। इन झांकियों में टैक्टर और बैलगाडि़यों का भी इस्तेमाल होता था। तब हम टेक्नोलॉजी के मामले में इतने विकसित नहीं थे। देश तरक्की के रास्ते पर चल रहा था। आपको जानकर खुशी के साथ हैरानी भी हो सकती है कि कनॉट प्लेस जिसे आप दिल्ली का दिल कहते हैं इसी कनॉट प्लेस की सड़कों से होकर झांकियां गुजरती थीं, ताकि आम लोग भी इनका नजारा ले सकें। तब समारोह देखने आई भीड़ को नियंत्रित करना इतना मुश्किल नहीं था। लोग काफी अनुशासित थे। लेकिन फिर भी, 1995 के समारोह में अवाम की जनता गणतंत्र दिवस पर अनियंत्रित हो गई थी। जिसकी वजह पुलिस बल को काफी मशक्कत करनी पड़ी। इस अनुशासनहीनता की वजह से टूटी हुई कुर्सियों की तस्वीरें उस वक्त मीडिया ने लोगों को दिखाईं थी।
महापुरुष कथन
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति ने भारतीय गणतंत्र के जन्म के अवसर पर देश के नागरिकों का अपने विशेष संदेश में कहा-
हमें स्वयं को आज के दिन एक शांतिपूर्ण किंतु एक ऐसे सपने को साकार करने के प्रति पुन समर्पित करना चाहिए, जिसने हमारे राष्ट्रपिता और स्वतंत्रता संग्राम के अनेक नेताओं और सैनिकों को अपने देश में एक वर्गहीन, सहकारी, मुक्त और प्रसन्नचित्त समाज की स्थापना के सपने को साकार करने की प्रेरणा दी। हमें इस दिन यह याद रखना चाहिए कि आज का दिन आनन्द मनाने की तुलना में समर्पण का दिन है श्रमिकों और कामगारों परिश्रमियों और विचारकों को पूरी तरह से स्वतंत्र, प्रसन्न और सांस्कृतिक बनाने के भव्य कार्य के प्रति समर्पण करने का दिन है।
सी. राजगोपालाचारी, महामहिम, महाराज्यपाल ने 26 जनवरी, 1950 को ऑल इंडिया रेडियो के दिल्ली स्टेशन से प्रसारित एक वार्ता में कहा अपने कार्यालय में जाने की संध्या पर गणतंत्र के उद्घाटन के साथ मैं भारत के पुरुषों और महिलाओं को अपनी शुभकामनाएं और बधाई देता हूँ जो अब से एक गणतंत्र के नागरिक है। मैं समाज के सभी वर्गों से मुझ पर बरसाए गए इस स्नेह के लिए हार्दिक धन्यवाद देता हूँ, जिससे मुझे कार्यालय में अपने कर्त्तव्यों और परम्पराओं का निर्वाह करने की क्षमता मिली है, अन्यथा मैं इससे सर्वथा अपरिचित था।
गणतंत्र दिवस कैसे मनाया जाता है
गणतंत्र दिवस की परेड के दौरान राष्ट्रपति को 21 तोपों की सलामी दिए जाने की प्रथा है। दरअसल, 21 तोपों की यह सलामी 21 बंदूकों से नहीं, बल्कि भारतीय सेना की 7 तोपों (जिन्हें श्25 पाउंडर्सश् कहा जाता है) से दी जाती है। जैसे ही राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड के सीओ राष्ट्रपति को सलामी देते हैं, उसी समय ये तोपें फायर की जाती हैं। राष्ट्रगान शुरू होते ही पहली सलामी दी जाती है और ठीक 52 सेकंड बाद आखिरी सलामी दी जाती है। ये तोपें 1941 में बनी थीं, और आर्मी के हर समारोह में इनका प्रयोग किया जाता है।
26 जनवरी को मार्च पास्ट करने वाली टुकडि़यों का दिन सुबह 2 बजे ही शुरू हो जाता है, और 3 बजते-बजते ये टुकडि़यां राजपथ पर होती हैं। इसकी तैयारी एक साल पहले जुलाई से ही शुरू हो जाती हैं। फाइनल इवेंट से पहले ये टुकडि़यां 600 घंटे की हार्ड ड्रिल प्रैक्टिस कर चुकी होती हैं।
गणतंत्र दिवस समारोह के पहले सेकंड से लेकर आखिरी सेकंड तक का कार्यक्रम काफी अनुशासित ढंग से तय होता है। मतलब, अगर समारोह 1 मिनट की देरी से शुरू हुआ तो 1 मिनट की देरी से ही खत्म होगा।
राजपथ पर हर झांकी 5 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है, ताकि अतिथि उन्हें अच्छी तरह देख सकें। झांकी के आगे-आगे चलने वाला सिपाही देखा है? वह संगीत की ताल पर मार्च करता है और झांकी का ड्राइवर छोटी सी खिड़की से उसे देखता रहता है। है न अच्छा तरीका ताल से ताल मिलाने का!
परेड का बेस्ट पार्ट है फ्लाईपास्ट, जिसका चार्ज वेस्टर्न एयर कमांड के पास है। इसमें 41 विमान हिस्सा लेंते हैं। आपको पता नहीं होगा, फ्लाईपास्ट के लिए मौसम की रियल टाइम मॉनिटरिंग की जाती है, और तभी यह तय किया जाता है कि हेलिकॉप्टर और विमान उड़ेंगे या नहीं।
पिछले साल 2016 में 26 साल बाद परेड में रिमाउंट ऐंड वेटेरनेरी कॉर्प्स के 36 कैनाइन, 24 लैब्रडॉर और 12 जर्मन शेफर्ड ने हिस्सा लिया। आपको जानकर हैरानी हो सकती है कि आर्मी हेडक्वॉर्टर में हर कुत्ते का अपना प्रोफाइल होता है! इन्हें अलग-अलग जगहों पर तैनात किया जाता है, और इनको भी सिपाही कहा जाता है। ये एंटी-टेररिस्ट ऑपरेशंस में हिस्सा लेते हैं।
सांस्कृतिक कार्यक्रम और आयोजन
गणतंत्र दिवस भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय त्योहार है, इस दिन राष्ट्रपति इंडिया गेट पर भारत के सब राज्यों से आए हुए प्रतिनिधियों तथा भारत की तीनों सेनाओं की सलामी लेते हैं। अनेक प्रकार की सुन्दरदृसुन्दर झाँकियाँ नाच-गाने, बैण्ड-बाजे, हाथी, ऊँट, घोड़ों की सवारियाँ, टैंक, तोप, समुद्री जहाज और हवाई जहाज के नमूने कृषि और उद्योग की झाँकियाँ, स्कूली बच्चों के नाच-गाने करते हुए ग्रुप राष्ट्रपति को सलामी देते हुए चलते हैं। जो कि विजय चौक से शुरू होकर लाल किले तक जाते हैं। इस उत्सव में किसी दूसरे देश का कोई मेहमान बुलाया जाता है। उस दिन दर्शकों की इतनी भीड़ होती है कि इंडिया गेट पर ऐसा मालूम होता है जैसे इन्सानों का समुद्र लहरा रहा हो। रात को इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन, सेंट्रल सेक्रेटेरियट, संसद भवन तथा मुख्य सरकारी इमारतों पर रोशनी की जाती है।
15 अगस्त सन् 1947 को हम आजाद जरूर हो गए थे लेकिन हमारा कोई संविधान लागू नहीं हुआ था और न ही कोई गणराज्य का राष्ट्रपति था।
अंग्रेज भारत को छोड़कर चले गए और 26 जनवरी को जनता का राज्य हुआ, इसलिए 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाते हैं। जो जवान आजादी की लड़ाई में शहीद हुए उनकी याद में इंडिया गेट पर अमर ज्योति जलाई जाती है।
इसके शीघ्र बाद 21 तोपों की सलामी दी जाती है, राष्ट्रपति महोदय द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है और राष्ट्रगान होता है। इस प्रकार परेड आरंभ होती है। महामहिम राष्ट्रपति के साथ एक उल्लेखनीय विदेशी राष्ट्र प्रमुख आते हैं, जिन्हें आयोजन के मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता है।
राष्ट्रपति महोदय के सामने से खुली जीपों में वीर सैनिक गुजरते हैं। भारत के राष्ट्रपति, जो भारतीय सशस्त्र बल, के मुख्य कमांडर हैं, विशाल परेड की सलामी लेते हैं। भारतीय सेना द्वारा इसके नवीनतम हथियारों और बलों का प्रदर्शन किया जाता है जैसे टैंक, मिसाइल, राडार आदि। इसके शीघ्र बाद राष्ट्रपति द्वारा सशस्त्र सेना के सैनिकों को बहादुरी के पुरस्कार और मेडल दिए जाते हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र में अभूतपूर्व साहस दिखाया और ऐसे नागरिकों को भी सम्मानित किया जाता है जिन्होंने विभिन्न परिस्थितियों में वीरता के अलग-अलग कारनामे किए। इसके बाद सशस्त्र सेना के हेलिकॉप्टर दर्शकों पर गुलाब की पंखुडियों की बारिश करते हुए फ्लाई पास्ट करते हैं।
सांस्कृतिक परेड
सेना की परेड के बाद रंगारंग सांस्कृतिक परेड होती है। विभिन्न राज्यों से आई झांकियों के रूप में भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाया जाता है। प्रत्येक राज्य अपने अनोखे त्यौहारों, ऐतिहासिक स्थलों और कला का प्रदर्शन करते हैं। यह प्रदर्शनी भारत की संस्कृति की विविधता और समृद्धि को एक त्यौहार का रंग देती है। विभिन्न सरकारी विभागों और भारत सरकार के मंत्रालयों की झांकियां भी राष्ट्र की प्रगति में अपने योगदान प्रस्तुत करती है। इस परेड का सबसे खुशनुमा हिस्सा तब आता है जब बच्चे, जिन्हें राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार हाथियों पर बैठकर सामने आते हैं। पूरे देश के स्कूली बच्चे परेड में अलग-अलग लोक नृत्य और देश भक्ति की धुनों पर गीत प्रस्तुत करते हैं। परेड में कुशल मोटर साइकिल सवार, जो सशस्त्र सेना कार्मिक होते हैं, अपने प्रदर्शन करते हैं। परेड का सर्वाधिक प्रतीक्षित भाग फ्लाई पास्ट है जो भारतीय वायु सेना द्वारा किया जाता है। फ्लाई पास्ट परेड का अंतिम पड़ाव है, जब भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान राष्ट्रपति का अभिवादन करते हुए मंच पर से गुजरते हैं।
प्रधानमंत्री की रैली
गणतंत्र दिवस का आयोजन कुल मिलाकर तीन दिनों का होता है और 27 जनवरी को इंडिया गेट पर इस आयोजन के बाद प्रधानमंत्री की रैली में एन.सी.सी. केडेट्स द्वारा विभिन्न चौंका देने वाले प्रदर्शन और ड्रिल किए जाते हैं।
लोक तरंग
सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्रों के साथ मिलकर संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा हर वर्ष 24 से 29 जनवरी के बीच ‘’लोक तरंग दृ राष्ट्रीय लोक नृत्य समारोह’’ आयोजित किया जाता है। इस आयोजन में लोगों को देश के विभिन्न भागों से आए रंग बिरंगे और चमकदार और वास्तविक लोक नृत्य देखने का अनोखा अवसर मिलता है।
बीटिंग द रिट्रीट
बीटिंग द रिट्रीट गणतंत्र दिवस आयोजनों का आधिकारिक रूप से समापन घोषित करता है। सभी महत्वपूर्ण सरकारी भवनों को 26 जनवरी से 29 जनवरी के बीच रोशनी से सुंदरता पूर्वक सजाया जाता है। हर वर्ष 29 जनवरी की शाम को अर्थात गणतंत्र दिवस के बाद अर्थात गणतंत्र की तीसरे दिन बीटिंग द रिट्रीट आयोजन किया जाता है। यह आयोजन तीन सेनाओं के एक साथ मिलकर सामूहिक बैंड वादन से आरंभ होता है जो लोकप्रिय मार्चिंग धुनें बजाते हैं। ड्रमर भी एकल प्रदर्शन (जिसे ड्रमर्स कॉल कहते हैं) करते हैं। ड्रमर्स द्वारा एबाइडिड विद मी (यह महात्मा गाँधी की प्रिय धुनों में से एक कहीं जाती है) बजाई जाती है और ट्युबुलर घंटियों द्वारा चाइम्स बजाई जाती हैं, जो काफी दूरी पर रखी होती हैं और इससे एक मनमोहक दृश्य बनता है। इसके बाद रिट्रीट का बिगुल वादन होता है, जब बैंड मास्टर राष्ट्रपति के समीप जाते हैं और बैंड वापिस ले जाने की अनुमति मांगते हैं। तब सूचित किया जाता है कि समापन समारोह पूरा हो गया है। बैंड मार्च वापस जाते समय लोकप्रिय धुन सारे जहाँ से अच्छा बजाते हैं। ठीक शाम 6 बजे बगलर्स रिट्रीट की धुन बजाते हैं और राष्ट्रीय ध्वज को उतार लिया जाता हैं तथा राष्ट्रगान गाया जाता है और इस प्रकार गणतंत्र दिवस के आयोजन का औपचारिक समापन होता हैं।
पिछले 6 दशकों में कितना बदला है यह समारोह
अब बग्घी का स्थान बुलेटप्रूफ कार ले चुकी है। इस फैंसी कार के साथ घुड़सवार और दूसरे सुरक्षाकर्मी चलते हैं। तब हमारे पास फ्लाईपास्ट के लिए जेट फाइटर नहीं थे, लेकिन जो भी था, हमें उसी पर बेइंतहा गर्व था। आज हमारे पास जेट फाइटर हैं, और आज भी हर परेड पर हम अपनी सैन्य ताकत के प्रदर्शन पर गर्व से फूले नहीं समाते।
हमारा मार्च पास्ट तब भी सधा हुआ था और समय के साथ यह और बड़ा और बेहतर ही हो रहा है।
भारत के प्रारम्भ से लेकर आजतक के सारे राष्ट्रपति के काल क्रमानुसार नाम है
डा. राजेन्द्र प्रसाद (1884-1963)कार्यकाल 26 जन्वरी 1950 से 13 मई 1962
राजेंद्र प्रसाद, जो कि बिहार से थे, भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने। वे स्वतंत्रता सेनानी भी थे। वे एकमात्र राष्ट्रपति थे जो कि दो बार रष्ट्रपति बने।
डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888-1975)कार्यकाल 13 मई 1962 से 13 मई 1967
राधाकृष्णन मुख्यतः दर्शनशास्त्री और लेखक थे। वे आन्ध्र विश्वविद्यालय और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे।
डा. जाकिर हुसैन (1897-1969)कार्यकालरू 13 मई 1967 से 3 मई 1969
जाकिर हुसैन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति और पद्म विभूषण और भारत रत्न के भी प्राप्तकर्ता थे।
वराहगिरि वेंकट गिरि ३ मई १९६९ २० जुलाई १९६९
वी.वी. गिरि पदस्थ राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद कार्यवाहक राष्ट्रपति बने.
मुहम्मद हिदायतुल्लाह
(१९०५दृ१९९२) २० जुलाई १९६९ २४ अगस्त १९६९
हिदायतुल्लाह भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और आर्डर ऑफ ब्रिटिश इंडिया के प्राप्तकर्ता थे
वराहगिरि वेंकट गिरि
(१८९४दृ१९८०) २४ अगस्त १९६९ २४ अगस्त १९७४
गिरि एकमात्र व्यक्ति थे जो कार्यवाहक राष्ट्रपति और राष्ट्रपति दोनों बने. वे भारत रत्न से सम्मानित हो चुके थे।
डा. फख़रुद्दीन अली अहमद (1905-1977)कार्यकालरू 24 अगस्त 1974 से 11 फरवरी 1977
फख़रुद्दीन अली अहमद राष्ट्रपति बनने से पूर्व मंत्री थे। उनकी पदस्थ रहते हुए मृत्यु हो गयी। वे दूसरे राष्ट्रपति थे जो अपना कार्यकाल पूरा कर सके.
बासप्पा दनप्पा जत्ती ११ फरवरी १९७७ २५ जुलाई १९७७
बी.डी. जत्ती, फख़रुद्दीन अली अहमद की मृत्यु के बाद भारत के कार्यवाहक राष्ट्रपति बने . इससे पहले वह मैसूर राज्य के मुख्यमंत्री थे।
श्री नीलम संजीव रेड्डी (1913-1996)कार्यकाल 25 जुलाइ 1977 से 25 जुलाई 1982
नीलम संजीव रेड्डी आन्ध्र प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री थे। रेड्डी आन्ध्र प्रदेश से चुने गए एकमात्र सांसद थे। वे २६ मार्च १९७७ को लोक सभा के अध्यक्ष चुने गए और १३ जुलाई १९७७ को यह पद छोड़ दिया और भारत के छठे राष्ट्रपति बने.
गेया जेल सिंह (1916-1994)कार्यकाल 25 जुलाइ 1982 से 25 जुलाइ 1987
ज्ञानी जैल सिंह २५ जुलाई १९८२ २५ जुलाई १९८७
जैल सिंह मार्च १९७२ में पंजाब राज्य के मुख्यमंत्री बने और १९८० में गृहमंत्री बने .
८ रामास्वामी वेंकटरमण २५ जुलाई १९८७ २५ जुलाई १९९२
वेंकटरमण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन में जेल भी गए। जेल से छुटने के बाद वे कांग्रेस पार्टी के सांसद रहे. इसके अलावा वे भारत के वित्त एवं औद्योगिक मंत्री और रक्षा मंत्री भी रहे.
९ शंकरदयाल शर्मा २५ जुलाई १९९२ २५ जुलाई १९९७
शर्मा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और भारत के संचार मंत्री रह चुके थे। इसके अलावा वे आन्ध्र प्रदेश, पंजाब और महाराष्ट्र के राज्यपाल भी थे।
१० के. आर. नारायणन
२५ जुलाई १९९७ २५ जुलाई २००२
नारायणन चीन,तुर्की,थाईलैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका में भारत के राजदूत रह चुके थे। उन्हें विज्ञान और कानून में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त थी। वे जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके हैं .
११ ऐ. पी. जे. अब्दुल कलाम २५ जुलाई २००२ २५ जुलाई २००७
कलाम मुख्यतः वैज्ञानिक थे जिन्होंने मिसाइल और परमाणु हथियार बनाने मुख्य योगदान दिया. इस कारण उन्हें भारत रत्न भी मिला. उन्हें भारत का मिसाइल मैन भी कहा जाता है।
१२ प्रतिभा पाटिल २५ जुलाई २००७ २५ जुलाई २०१२
प्रतिभा पाटिल भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति बनी. वह राजस्थान की भी प्रथम महिला राज्यपाल थी।
१३ प्रणब मुखर्जी
२५ जुलाई २०१२ पदस्थ
प्रणब मुखर्जी भारत सरकार में वित्त मंत्री, विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके है।
अलग बॉक्स में
गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि
भारत के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि
वर्ष मुख्य अतिथि देश और पद
26 जनवरी 2016, 67वाँ गणतंत्र दिवस फ्रांस्वा ओलांद फ्रांस के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2015, 66वाँ गणतंत्र दिवस बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2014, 65वाँ गणतंत्र दिवस, शिंजो अबे जापान के प्रधानमन्त्री
26 जनवरी 2013, 64वाँ गणतंत्र दिवस जिग्मे खेसर नामग्यल वांग्चुक भूटान नरेश
26 जनवरी 2012, 63वाँ गणतंत्र दिवस, यींगलक शिनावात्रा थाइलैण्ड की प्रथम महिला प्रधानमन्त्री
26 जनवरी 2011, 62वाँ गणतंत्र दिवस सुसिलो बाम्बांग युधोयोनो इंडोनेशिया के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2010, 61वाँ गणतंत्र दिवस ली म्यूंग बाक कोरिया गणराज्य (दक्षिण कोरिया) के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2009, 60वाँ गणतंत्र दिवस नूर सुल्तान नजरबायेब कजाख़िस्तान के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2008, 59वाँ गणतंत्र दिवस निकोलस सर्कोजी फ्रांस के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2007, 58वाँ गणतंत्र दिवस व्लादिमीर पुतिन रूस के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2006, 57वाँ गणतंत्र दिवस अब्दुल्ला बिन अब्दुल अजीज अल-सऊद सउदी अरब के शाह
26 जनवरी 2005, 56वाँ गणतंत्र दिवस वांगचुक भूटान नरेश
26 जनवरी 2004, 55वाँ गणतंत्र दिवस लुईज इनासियो लूला द सिल्वा ब्राजील के राष्ट्रपति
26 जनवरी 2003, 54वाँ गणतंत्र दिवस मोहम्मद ख़ातमी ईरान के राष्ट्रपति
26 जनवरी 1950, प्रथम गणतंत्र दिवस सुकर्णो इंडोनेशियाई राष्ट्रपति
गणतंत्र दिवस इतिहास के आइने में
गणतंत्र दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है। क्यों यह वैश्विक स्तर पर प्रत्येक भारतीय के लिए गौरव का विषय है। इस दिन के समारोह पर समूचे विश्व की निगाह होती है। 26 जनवरी की महत्ता को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। आइए जानने की कोशिश करते हैं
जब अंग्रेज सरकार की मंशा भारत को एक स्वतंत्र उपनिवेश बनाने की नजर नही आ रही थी, तभी 26 जनवरी 1929 के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरु की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पूर्णस्वराज्य की शपथ ली। पूर्ण स्वराज के अभियान को पूरा करने के लिये सभी आंदोलन तेज कर दिये गये थे। सभी देशभक्तों ने अपने-अपने तरीके से आजादी के लिये कमर कस ली। एकता में बल है, की भावना को चरितार्थ करती विचारधारा में अंग्रेजों को पीछे हटना पङा। अंतोगत्वा 1947 को भारत आजाद हुआ, तभी यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1929 की निर्णनायक तिथी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनायेंगे।
हम अपने घर में चैन से इसीलिए रह पाते हैं क्यूंकि हमारे घर में हमारी मर्जी चलती है. हम जो चाहते हैं अपने घर में कर पाते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि हमारे घर में हमारे अपने कानून और नियम होते हैं. इसी तरह एक देश की आजादी उसका संविधान नियंत्रित करता है. देश तभी जाकर पूर्ण आजाद माना जाता है जब वह गणतांत्रिक होता है. आज भारत की संप्रभुता, गर्व, नागरिक उन्नयन व लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण दिवस मनाया जा रहा है. 26 जनवरी, 1950 को ही देश के संविधान को लागू किया गया था. तब से आज तक इस दिन को देश गणतंत्र दिवस के तौर पर मनाता है.
26 जनवरी आजादी से पहले भी देश के लिए एक अहम दिन था. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1930 के लाहौर अधिवेशन में पहली बार तिरंगे झंडे को फहराया गया था परंतु साथ-साथ एक और महत्वपूर्ण फैसला इस अधिवेशन के दौरान लिया गया. इस दिन सर्वसम्मति से यह फैसला लिया गया था कि प्रतिवर्ष 26 जनवरी का दिन “पूर्ण स्वराज दिवस” के रूप में मनाया जाएगा. इस दिन सभी स्वतंत्रता सेनानी पूर्ण स्वराज का प्रचार करेंगे. इस तरह 26 जनवरी अघोषित रूप से भारत का स्वतंत्रता दिवस बन गया था.
डा. भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में बनाया गया भारतीय संविधान 395 अनुच्छेदों और 8 अनुसूचियों के साथ दुनिया में सबसे बड़ा लिखित संविधान था जो और भी विस्तृत हो चुका है. 26 जनवरी, 1950 को संविधान के लागू होने के साथ सबसे पहले डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने गवर्नमेंट हाउस के दरबार हाल में भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली और इसके बाद राष्ट्रपति का काफिला 5 मील की दूरी पर स्थित इर्विन स्टेडियम पहुंचा जहां उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज फहराया. और तब से ही इस दिन को राष्ट्रीय पर्व की तरह मनाया जाता है. किसी भी देश के नागरिक के लिए उसका संविधान उसे जीने और समाज में रहने की आजादी देता है. इस तरह गणतंत्र दिवस और संविधान की उपलब्धता काफी अधिक है.
26 जनवरी एक ऐसा दिन है जब प्रत्येक भारतीय के मन में देश भक्ति की लहर और मातृभूमि के प्रति अपार स्नेह भर उठता है। ऐसी अनेक महत्त्वपूर्ण स्मृतियां हैं जो इस दिन के साथ जुड़ी हुई है। 26 जनवरी, 1950 को देश का संविधान लागू हुआ और इस प्रकार यह सरकार के संसदीय रूप के साथ एक संप्रभुताशाली समाजवादी लोकतांत्रिक गणतंत्र के रूप में भारत देश सामने आया। भारतीय संविधान, जिसे देश की सरकार की रूपरेखा का प्रतिनिधित्व करने वाले पर्याप्त विचार विमर्श के बाद विधान मंडल द्वारा अपनाया गया, तब से 26 जनवरी को भारत के गणतंत्र दिवस के रूप में भारी उत्साह के साथ मनाया जाता है और इसे राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया जाता है। यह आयोजन हमें देश के सभी शहीदों के निरूस्वार्थ बलिदान की याद दिलाता है, जिन्होंने आजादी के संघर्ष में अपने जीवन बलिदान कर दिए और विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध अनेक लड़ाइयाँ जीती।
भारतीय संविधान सभा
उसी समय भारतीय संविधान सभा की बैठकें होती रहीं, जिसकी पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को हुई, जिसमें भारतीय नेताओं और अंग्रेज कैबिनेट मिशन ने भाग लिया। भारत को एक संविधान देने के विषय में कई चर्चाएँ, सिफारिशें और वाद - विवाद किया गया। कई बार संशोधन करने के पश्चात भारतीय संविधान को अंतिम रूप दिया गया जो 3 वर्ष बाद यानी 26 नवंबर, 1949 को आधिकारिक रूप से अपनाया गया। 15 अगस्त, 1947 में अंग्रेजों ने भारत की सत्ता की बागडोर जवाहरलाल नेहरू के हाथों में दे दी, लेकिन भारत का ब्रिटेन के साथ नाता या अंग्रेजों का अधिपत्य समाप्त नहीं हुआ। भारत अभी भी एक ब्रिटिश कॉलोनी की तरह था, जहाँ की मुद्रा पर जॉर्ज 6 की तस्वीरें थी। आजादी मिलने के बाद तत्कालीन सरकार ने देश के संविधान को फिर से परिभाषित करने की जरूरत महसूस की और संविधान सभा का गठन किया जिसकी अध्यक्षता डॉ. भीमराव अम्बेडकर को मिली, 25 नवम्बर, 1949 को 211 विद्वानों द्वारा 2 महीने और 11 दिन में तैयार देश के संविधान को मंजूरी मिली।
सन 1950, प्रथम गणतंत्र दिवस में जवाहरलाल नेहरू
24 जनवरी, 1950 को सभी सांसदों और विधायकों ने इस पर हस्ताक्षर किए। और इसके दो दिन बाद यानी 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू कर दिया गया। इस अवसर पर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली तथा 21 तोपों की सलामी के बाद श्इर्विन स्टेडियमश् में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज श्तिरंगाश् को फहराकर भारतीय गणतंत्र के ऐतिहासिक जन्म की घोषणा की थी। 26 जनवरी का महत्त्व बनाए रखने के लिए विधान निर्मात्री सभा (कांस्टीट्यूएंट असेंबली) द्वारा स्वीकृत संविधान में भारत के गणतंत्र स्वरूप को मान्यता प्रदान की गई। इस तरह से 26 जनवरी एक बार फिर सुर्खियों में आ गया। यह एक संयोग ही था कि श्कभी भारत का पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाया जाने वाला दिन अब भारत का गणतंत्र दिवसश् बन गया था। अंग्रेजों के शासनकाल से छुटकारा पाने के 894 दिन बाद हमारा देश स्वतंत्र राष्ट्र बना। तब से आज तक हर वर्ष राष्ट्रभर में बड़े गर्व और हर्षोल्लास के साथ गणतंत्र दिवस मनाया जाता है। तदनंतर स्वतंत्रता प्राप्ति के वास्तविक दिन 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। यही वह दिन था जब 1965 में हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किया गया।
संविधान पारित
इस प्रकार संसद भारत की मुकम्मल प्रतिनिधि सभा बन गई। 29 अगस्त सन् 1947 के प्रस्ताव के अनुसार एक प्रारूप समिति कायम की गई, जिसके सात सदस्य थे और डॉ. बी. आर. अम्बेडकर उसके अध्यक्ष थे। इस समिति ने 21 फरवरी सन् 1948 को अपना निर्णय प्रस्तुत कर दिया, जो 4 नवम्बर, सन् 1948 को संसद के सामने रखा गया। इस पर 9 नवम्बर सन् 1948 से 17 अक्टूबर सन् 1949 तक दूसरी खुवांदगी (वाचन) चलती रही जिसमें 7635 धाराएँ पेश की गईं। 14 नवम्बर सन् 1949 से 26 नवम्बर सन् 1949 तक तीसरी खुवांदगी हुई और 26 नवम्बर, 1949 को संविधान पर संविधान सभा हस्ताक्षर होकर संविधान पारित हो गया। 24 जनवरी सन् 1950 को संविधान सभा का अन्तिम अधिवेशन हुआ और इसमें नये संविधान के अनुसार डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को भारतीय गणराज्य का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया। 26 जनवरी सन् 1950 से नया संविधान लागू किया गया। उसी दिन से हर साल 26 जनवरी को भारत में गणतंत्रता दिवस मनाया जाता है।

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