Friday, February 24, 2017

नशे में आज की युवा पीढ़ी


नशे की समस्या ने कुछ वर्षों के अंदर एक विकराल बीमारी के रूप समूची दूनियां में अपनी जड़ें जमा लीं हैं। इस नशे की आग से अपना देश भी नहीं बच सका है। जम्मू कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक नशीले पदार्थों का कारोबार करने वालों का नेटवर्क फैला हुआ है। पूरा देश नशे में डूबा हुआ है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में नशे की लत है। क्या शहर और क्या गांव, हर जगह नशा ही नशा है। आपको हर 100 मीटर की दूरी पर एक शराब की दुकान मिल जाएगी। जिसके बाहर शौकीन से लेकर नशेडि़यों की भीड़ दिखाई देगी। छोटी छोटी चाय और पान की दुकानों, रेहड़ी पटरी वाले, छोटे-बड़े खान-पान के ठेले और ढाबों पर सिगरेट, तंबाकू, खैनी, जर्दा, गुटखा सरेआम बिकते देखे जा सकते हैं। वहीं जब आप बड़े शहरों या मेटों शहर के कल्चर को देखते हैं तो आपको डिस्को, पब और होटल में अफीम,चरस, गांजा, हेरोइन, डूडा पोस्त, इंजेक्शन, नशीली दवाओं जैसे मादक पदार्थों के नशेड़ी मिल जाएंगे। इसका अंदाजा ऐसे शहरों में होने वाली रेव पार्टियों से भी लगाया जा सकता है।
ऐसा नहीं है कि नशे की लत सिर्फ अमीरों या मध्यम वर्ग के लोगों में ही है। इसने गरीबों को भी नहीं छोड़ा है। आप को कूड़े के ढेर में बचपन खो चुके बच्चों से लेकर मजदूरों तक में यह नशा दिखाई दे जाएगा। ये लोग रेलवे स्टेशन, बस स्टेण्ड, पार्क और ऑटो या बस-टक में नशा करते हैं।

वहीं स्कूल कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों की बात करें तो कैंटीन से लेकर हॉस्टल तक नशे का जाल फैला हुआ है। छोटे छोटे बच्चे कोक, पेप्सी जैसे डिक्स में मिलाकर सरेआम पी रहे हैं और खुलेआम सिगरेट के धुएं का छल्ला बनाते देखे जा सकते हैं।
मुझे लगभग 10 साल बाद दिल्ली से अलीगढ़, सहारनपुर, मुरादाबाद की तरफ जाने वाली पैंसेजर टेनों में यात्रा करने का मौका मिला। मैंने दैनिक यात्रियों को टेन में खुलेआम शराब, सिगरेट और ताश खेलने के साथ-साथ और अन्य यात्रियों के साथ बदतमीजी, गाली गलौच और मारपीट करते हुए देखा। इनके लिए बच्चे और महिलाएं कुछ मायने नहीं रखते। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हो सकते हैं।

मैंने कुछ दिन पहले टीवी पर पंजाबी सिंगर गुरदास मान का पंजाब में नशे की स्थिति को बयां करता एक गाना देखा। जो पंजाब में नशे की विकरालता को बयां करने के लिए काफी है। जो पंजाब अपनी खेती और व्यापार में सफलता के लिए जाना जाता था वो आज नशे के लिए कुख्यात हो चुका है।

इस वक्त देश के पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव चल रहे हैं जिसकी वजह से नशे की खपत और तेजी से बढ़ी है। वहीं पंजाब में नशे को कुछ राजनीतिक पार्टियां चुनावी मुद्दा बना चुकी हैं। चुनाव आयोग भी नशे को लेकर चिंता जता चुका है और पुलिस प्रशासन को सख्ती बरतने के निर्देश दिए हैं। पुलिस की ओर से सख्ती बरतने के साथ ही इसका असर मोगा के गांव दौलेवाला में दबिश देने गई पुलिस टीम पर नशा तस्करों का हमला यही बताता है कि उनके के लिए यह कारोबार कितना फायदेमंद है।

मोगा का यह गांव तो नशा तस्करी के लिए बदनाम रहा है। पिछले साल जून 2016 में भी पुलिस टीम पर हमला हुआ था। गांव में लगभग पांच सौ लोगों पर नशा तस्करी के आरोप में मामला दर्ज होना यह बताने के लिए काफी है कि यहां के हालात ज्यादा खराब हो चुके हैं। मोगा के अलावा प्रदेश के अन्य जिलों से भी नशे के धंधे की खबरें आती रहती हैं। जनवरी 2017 में बठिंडा में जहां पुलिस ने 75 लाख का सिंथेटिक ड्रग्स बरामद किया, वहीं जालंधर में चुनावी नशा पकड़ने के लिए चौदह दिन में मारे गए तीस छापों में आठ लाख की ड्रग्स बरामद की गई। आयोग ने इस बार चुनाव में ड्रग्स पर सख्ती के लिए पुलिस, नारकोटिक्स डिपार्टमेंट व सेहत विभाग की ज्वाइंट एक्शन टीमें तैयार करवाई हैं।

इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि प्रदेश में नशा एक बड़ी समस्या बन चुका है। चुनावों में सिर्फ वायदे करने से यह समस्या खत्म होने वाली नहीं है। इसके लिए जमीनी स्तर पर गंभीरता से काम करना होगा। पुलिस ने कुछ माह पहले नशे के खिलाफ अभियान भी चलाया था। मुख्यमंत्री ने भी विशेष तौर पर प्रदेश के कई नशा छुड़ाओ केंद्रों का दौरा किया था और डिप्टी कमिश्नर्स को निर्देश दिए थे। सरकार को यह भी देखना होगा कि उसके निर्देश का कितना पालन हो रहा है। कई बार अधिकारियों की लापरवाही के कारण अपेक्षित नतीजा नहीं निकलता है। प्रदेश में ड्रग्स के बड़े रैकेट का पर्दाफाश होने के बाद इसकी जांच ईडी को सौंपी गई थी। साढ़े पांच हजार करोड़ रुपये के ड्रग्स रैकेट की जांच शुरू किए ईडी को साल से ज्यादा हो गया है लेकिन अभी तक इसका कोई नतीजा नहीं निकला है। कार्रवाई में देरी से नशा तस्करों के हौसले बुलंद हो जाते हैं। यदि समय रहते सख्त कार्रवाई की जाए तो निश्चित रूप में नशे पर नकले कसने में सफलता मिलेगी।



देश में नोटबंदी के बाद मादक पदार्थों की तस्करी में एकाएक बढ़ोतरी होना गहन चिंताजनक है। जम्मू रेलवे स्टेशन पर पूर्व सूचना मिलने पर भी ड्रग्स तस्करों का नशे की भारी खेप को छोड़ कर भाग जाना तथा ठीक एक दिन बाद जम्मू के गंग्याल इलाके से पांच सौ के करीब दस लाख पुराने नोट व हेरोइन की खेप सहित पांच तस्करों को गिरफ्तार किया। यह तस्कर हेरोइन की खेप को घाटी में बेचकर यहां पहुंचे थे। उनका मकसद किसी तरह पुराने नोटों को खपाने का था। इससे पहले कि वे इन नोटों को खपा पाते कि पुलिस नाके पर चेकिंग के दौरान वे पकड़े गए। विडंबना यह है कि मादक पदार्थों की तस्करी में संलिप्त नेटवर्क को ध्वस्त नहीं किया जाता तब तक युवा वर्ग को इस लत से छुटकारा नहीं मिल सकता। दुखद पहलू यह है कि शहरों में हेरोइन का प्रचलन बड़ा है। इसमें समाज के समृद्ध वर्ग के युवा इस नशे का शिकार हो रहे हैं। यह हेरोइन थोड़ी-थोड़ी मात्रा में शहर के पाश इलाकों में छात्रों को बेची जा रही है। पुलिस कभी कभी कुछ लोगों को गिरफतार भी कर लेती है। लेकिन हो कुछ नहीं पाता। पुलिस को चाहिए कि ऐसे अभियानों को लगातार जारी रखें जिससे कि आरोपियों पर दबाव बने। अगर इस नशे के खिलाफ व्यापक अभियान नहीं चलाया गया तो युवा वर्ग नशे की लत में अपना भविष्य बर्बाद कर देगें। यह नशा छूटे नहीं छूटता। ड्रग्स के नशे में समाज का मध्य वर्गीय युवा फंस कर रह गया है। देश में संगठित गिरोह सक्रिय हैं। जो कोरियर की मदद से थोड़ी थोड़ी मात्रा में हेरोइन, कोकीन, गांजा को युवाओं तक पहुंचाते है। इसकी तस्करी में पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध रही है क्योंकि कुछ माह पहले हेरोइन की तस्करी में जम्मू पुलिस कंट्रोल रूम में तैनात कांस्टेबल ही शामिल था। मादक पदार्थों की तस्करी में करोड़ों रुपये दाव पर लगा होता है। ऐसे में कुछ पुलिस वाले भी स्वार्थ की खातिर तस्करों का साथ देते है। इसलिए आला अधिकारियों को चाहिए कि वे समय समय पर नाकों व थानों में तैनात पुलिसकर्मियों का थोड़े थोड़े समय पर तबादला नीति बनाए। पंजाब के रास्ते आने वाले इस मीठे जहर के लिए सीमा की ओर जाने वाले रास्तों पर भी निगरानी बढ़ानी होगी। अभिभावकों भी चाहिए कि अपने बच्चों की दोस्ती पर नजर रखे कि उसका किन लोगों से उठना बैठना है। सबसे ज्यादा नशे की गिरफ्त में आने वो सोलह से चौबीस वर्ष की उम्र के होते है। यह उम्र ऐसी होती है जहां युवा अच्छा और बुरे की पहचान नहीं कर पाता। अगर कोई बच्चा इस नशे की गिरफ्त में है तो उसकी काउंसलिंग के साथ नशामुक्ति केंद्रों में इलाज करवाया जा सकता है। इसमें माता पिता का सहयोग बच्चों को नई जिंदगी दे सकता है।

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