Friday, February 24, 2017

लोकतंत्र की रक्षा - मतदाता की बुद्धिमता से


अजय शर्मा  

लोकतंत्र में प्रभुसत्ता जनता में निहित होती है। प्रतिनिधिक लोकतंत्र में जनता इस बात का निर्णय करती है कि उस पर किस प्रकार से तथा किसके द्वारा शासन हो। जनता अपनी प्रभुसत्ता का सबसे पहला बुनियादी उपयोग मतदान द्वारा करती है।

डा. अम्बेडकर ने कहा था ‘‘मैं महसूस करता हूं, संविधान चाहे कितना ही अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाय, खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान खराब होगा।’’ संविधान केवल विधायका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे राज्य के अंगों का प्रावधान कर सकता हे। परन्तु राज्य के इन अंगों का संचालन लोगों पर तथा राजनीति दलों पर निर्भर करता हैं। राजनीतिक दल यदि अपने पंथ को देश के उपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता एक बार फिर खतरे में पड़ जायेगी।

डा. राजेन्द्र प्रसाद ने भी कहा था ‘‘यदि लोग जो चुनकर आयेंगे योग्य, चरित्रवान और ईमानदार हुए तो दोषपूर्ण संविधान को भी सर्वोत्तम बना देंगे। भारत को ऐसे लोगों की जरूरत हैं जो ईमानदार हों तथा जो देश के हित को सर्वोपरी समझें। हममें साम्प्रदायिक अंतर है, जातिगत अंतर है, भाषागत अंतर है, प्रान्तीय अंतर है।’’ ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो छोटे-छोटे समूहों व क्षेत्रों के लिए देश के व्यापक हितों का बलिदान दें।
पश्चिम के समुन्नत लोकतंत्र में मताधिकार धीरे-धीरे जनता को दिया गया था। संविधान निर्माताओं ने निष्ठापूर्वक कार्य करते हुए सार्वजनिक वयस्क मताधिकार की पद्धति को अपनाने का निर्णय किया जिसमें प्रत्येक वयस्क भारतीय को बिना किसी भेदभाव के मतदान का समान अधिकार तुरंत प्राप्त हुआ। जबकि अधिकांश भारतीय जनता गरीब और अनपढ़ थी। एक व्यक्ति का एक वोट, बंधुत्व तथा एक अखंड राष्ट्र का निर्माण व राजनैतिक न्याय का लक्ष्य रखा गया। राजनीतिक न्याय का अर्थ है जाति, मूलवंश, सम्प्रदाय, धर्म, जन्मस्थान के आधार पर विभेद के बिना सभी नागरिकों को राजनीति प्रक्रिया में भाग लेने के अधिकारों में बराबर का हिस्सा। स्वतंत्रता के बाद वयस्क मताधिकार पद्धति ने जाति प्रथा को जबरदस्त चुनौती दी। परन्तु वयस्क मताधिकार पर आधारित राजनैतिक प्रणाली में जाति की भूमिका महत्वपूर्ण बन गई और अब जातिवाद दूसरे रूप में उभरा है।

देश में चुनाव के समय लगभग 50 प्रतिशत मतदान होता है। यह भी पृथक-पृथक पार्टियों में विभाजित हो जाता है। उम्मीदवार या पार्टी विशेष धर्म, जाति, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक समुदायों का हितैषी बताकर वोट हासिल करते है। तदुपरान्त गठबन्धन का हिस्सा बन जाते है। ऐसी सरकार सिर्फ समुदाय, क्षेत्र या जाति हितैषी होती है, उनके विकास की सोचती है। इससे समाज में विषमता, वैमनष्यता व द्वैष उत्पन्न हो जाता है। इस विभाजनकारी वोट के तरीके से समाज में फूट पड़ती है। दंगा फसाद होते है। जाति व धर्म के आधार पर वोट देना देशहित के विपरीत हैं। मतदाता का कर्तव्य है कि लोकतंत्र को सुरक्षित, शुद्ध एवं कारगर बनाए रखने के लिए विभाजनकारी दलों व व्यक्तियों के पक्ष में मतदान नहीं करें। उम्मीदवार की योग्यता, निष्ठा, कर्तव्यपराणता तथा पार्टियों का चेहरा व चरित्र को ध्यान में रखकर मतदान करें। मतदाताओं का कर्तव्य है लोकतंत्र को धर्मतंत्र या जातितंत्र बनने से रोके। जाति, धर्म, समुदाय, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र के आधार पर वोट नहीं दें।
पढ़े लिखे षिक्षित मतदाता कम संख्या में वोट देते हैं। घर बैठकर अथवा बाजार, गली, नुक्कड पर उम्मीदवरों व पार्टियों के बारे में मात्र निन्दा, प्रशंसा करते है। अपना कर्तव्य ईमानदारी से पूरा नहीं करते। उम्मीदवार के बैकग्राउण्ड, प्रतिभा पर गौर नहीं करते। दागियों को वोट देते हैं। बाहुबल, धनबल से प्रभावित होते हें, तदुपरान्त इन्हीं बातों की बुराई करते हैं। वर्तमान राजनीति में नारों का भी बड़ा महत्व हो गया। अमीर और गरीब के बीच खाई पटने के नारे सुनते कान पक गये परन्तु खाई और चौड़ी होती जा रही है। अमीर अधिक धनवान होता जा रहा है। गरीब की जेब छोटी होती जा रही है। नारे चुनावी मुद्दा बनकर हार जीत की भूमिका बनाते है। बेरोजगारों को रोजगार के सपने, विकास के नये आयाम स्थापित करने के लम्बे चौड़ें वायदों से भ्रमित होकर मतदान होता है। कुछ जाति/वर्ग अपनी पहुंच का फायदा उठाकर तरक्की करते हैं तो दूसरा वर्ग जिन्दगी भी मुश्किल से गुजारता है। समस्या यह है, लोग अन्य व्यक्तियों को कैसे काम करना चाहिए इसमें अपनी पूरी विशेषता बतातें है। परन्तु स्वयं का कर्तव्य भूल जाते है। बढ़ती जनसंख्या से विकराल विभाजन और गहरा होता जा रहा है। हर तबका विकास में भागीदार बन सके, यह सोच नहीं रहा।

चुनाव आयोग दन्तहीन है। कहा बहुत कुछ जाता है परन्तु नतीजा वही ढाक के तीन पात। चुनाव व्यय की सीमा से सैकड़ों गुना खर्चा होता है, बूथ रिगिंग होती है, बूथ कैप्चरिंग होती है, फर्जी मतदान होता है। परन्तु मात्र कागजी खानापूर्ति के अलावा कुछ भी नहीं होता। प्रचार प्रसार में आयोग का करोड़ों रूपया व्यय होता है, उसका कोई असर या नतीजा नहीं। क्या आज तक फर्जी डिग्रियां, सम्पत्ति सम्बन्धी झूंठे आंकड़े, चरित्र व अपराध सम्बन्धी घोषणा पत्र पर कुछ हुआ। चुनाव याचिकाओं पर अगले चुनाव यानि पांच साल तक फैसले नहीं होते। लोगों की श्रृद्धा व विश्वास उठ चुका है। जनप्रतिनिधि कानून का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन करते है। ऐसे में मतदाता की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है।
चुनावों में आज भी सामंती असर मौजूद है। आजादी के पूर्व जनता का खून चूसने वाले सामन्ती उम्मीदवार आज भी वंश व परिवार के बल पर प्राथमिकता प्राप्त करते है। हमने प्रतिनिधि संसदीय लोकतंत्रात्मक प्रणाली व वयस्क मताधिकार को सोच समझकर अपनाया था तथा उत्तरदायित्व को तरजीह दी गई थी। तीन शब्द अर्थात प्रतिनिधिक, संसदीय एवं लोकतंत्र हमारी राजनीति व्यवस्था के मूलतत्व है। लोकतंत्र में लोग अपने स्वामी स्वयं होते हैं।

लोकतंत्र का अर्थ है आत्म निर्णय का लोगों का अधिकार और तर्कसंगतता में आस्था। सच्चे लोकतंत्र का मूल है ‘‘प्रत्येक व्यक्ति चाहे उसकी जाति, धर्म, रंग अथवा लिंग पैदाइश का स्थान कोई भी हो, शिक्षा का स्तर, आर्थिक अथवा व्यवसायक पृष्ठभूमि कुछ भी हो, स्वशासन व अपने कार्यो को करने योग्य है। उद्देशिका में कहा गया है ‘‘हम भारत के लोग दृढ़ संकल्प होकर संविधान को अंगीकृत करते है। इस प्रकार प्रभुसत्ता केवल जनता में निहित है। लोकतंत्र को उपयोगी बनाने, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से चुने गये लोगों द्वारा संभव है। चुने गये लोगों को प्रभुसत्ता की अभिव्यक्ति मिलती है और सर्वोच्च शक्ति जनता के प्रतिनिधियों के निकाय में निहित हो जाती है। ऐसा निकाय राजनैतिक व्यवस्था की नींव व धूरी है। जो मतदाता पर आश्रित है। हमारी व्यवस्था में सभी वयस्क लोग जिन्होंने 18 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है, मतदाता है। वे लोकसभा व विधानसभाओं के सदस्य चुनते है। संसद सभी लोगों के विचारों का प्रतिनिधित्व करती है।

प्रारम्भिक काल में सार्वभौम मताधिकार से चुनी गई संसद में पक्ष विपक्ष दोनों में, गौरवशाली और प्रबुद्ध सांसद चुने जाने लगे थे। जो जाति/वर्ग, धर्म, क्षेत्र के आधार पर नहीं, गुणात्मक स्तर को देखकर चुने गये थे। सांसदों में कुशाग्र बुद्धि और विद्वता थी। विशिष्ट लोग थे, उच्च कोटि के वक्ता थे, नीतियों और कृत्यों की व्याख्या व आलोचना करते थे। धीरे-धीरे जातिवाद, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्रीय आधार पर चुने गये। पैसे व बाहुबल के आधार पर व्यवसायिक वर्ग, माफिया गिरोह के लोग, अपराधी प्रवृति के लोग चुने जाने लगे और विषम परिस्थितियां पैदा होने लगी है। शोरगुल, नारेबाजी, वाकआउट, सदन स्थगन, सब कुछ होने लगा। सदन की स्वस्थ व सशक्त क्रियाशीलता की बलि हो गई। 23-24 दलों की मिली जुली सरकार बनी। विभिन्न दल व सांसद अपनी राजनीतिक रोटिंया सेकने लगे। अव्यवस्था, अनुशासनहीनता, अवहेलना, चरित्र हनन होने लगा। गुणात्मकता समाप्त हो गई।
आज धर्मान्धता व साम्प्रदायिकता की भावना बलवती हो गई। मुस्लिम और हिन्दू समाज व्यवस्था का अस्तित्व निरंतर सामाजिक तनाव तथा संघर्ष का कारण बन रहा है। दो समानान्तर समाज व्यवस्थायें स्थापित हो गईं व्यवहार व दृष्टिकोण में सामाजिक प्रतिबंधों और जातिय नियमों की कठोरता को बहुत सीमा तक बढ़ाया। इस्लामीकरण का उद्भव हुआ। उदारवाद, सहिष्णुता, धर्म निरपेक्षता के उत्साहवर्धक विचार कमजोर पढ़ गये।
हिन्दु बहुसंख्यक जातिवाद से प्रभावित है। मुस्लिम समाज के कट्टरपंथी वर्ग ने पुनः अलगाववाद को बल दिया है। हिन्दु मुसलमानों में व्याप्त पृथकतावादी प्रवृतियों ने अनेक प्रकार के संगठनों को जन्म दिया। योग्यता व सामर्थ्य का ध्यान नहीं रहा। धन बल ने सामन्तवादी समाज को पूंजीवादी समाज में बदल दिया। दलितों में भी कठिनाईयों व अभावों से उनका विश्वास डिगा और यह धारणा बनी कि स्वयं उनके हाथों में राजनैतिक शक्ति तथा सत्ता आनी आवश्यक है।

भारत में राष्ट्रवाद एक नई परिभाषा के साथ उदय हो रहा है। उनमें सामाजिक, राजनैतिक सुधारक, सत्याग्रही, संत, शिक्षक, शिक्षार्थी नहीं है। सामाजिक गठबंधन के लोग हावी हो रहे है, जिनका कोई मौलिक विचार, आस्था व सिद्धान्त नहीं है। क्रान्तिकारी आन्दोलन लोकप्रिय नहीं बना। कुछ लोग व संगठन भारतीय राजनीति में पूर्णतः हिन्दु प्रभुत्व चाहने लगे। मुस्लिम उनकी प्रधानता से विचलित होने लगे है। स्वदेशी का सिद्धान्त समाप्त होता जा रहा है। धार्मिक उग्रता भी बढ़ रही है। सामाजिक नियतिवाद पनपने लगा है। गांधी ने एक सुसंगठित समाज की रचना के लिए जीवनभर काम किया परन्तु आगे की पीढ़ी भारतीय समाज की रक्त धारा में व्याप्त पृथकतावादी गांठों को समाप्त नहीं कर सकी। मुसलमानों तथा दलितों के विश्वास को प्राप्त करने के लिए अत्यधिक निष्ठावान प्रयत्नों का कोई फल नहीं मिला। उनको भी कौसने का प्रयत्न किया जा रहा है। समाजवाद का नारा भी कमजोर पढ़ गया।

आधुनिकता के असर के नीचे उदारवाद, उपभोक्तावाद, बाजारवाद भी आधुनिक प्रवृतियों को बल मिल रहा है। मानववादियों की पकड़ कमजोर होती जा रही है। दल विहिन जनतंत्र का मूल उद्देश्य, ग्रामराज व रामराज की अवधारणा समाप्त हो रही है। गांधी, नेहरू, अम्बेडकर के व्यापक परिवर्तन का ख्बाब व प्रयास समाप्त हो रहा है।
इस प्रकार लोकतंत्र भीड़तंत्र बनता जा रहा है। प्रत्येक मतदाता अपनी स्वयं की पसन्द व भीडतंत्र से प्रभावित होकर मतदान करता है। मतदान एक पवित्र कर्तव्य की तरह नहीं, प्रतिक्रियाओं, प्रलोभन, दबाब, निजी हित, वर्ग हित के आधार पर हो रहा है। इसीलिए धनबल, भुजबल, जातिबल, रिगिंग, बूथ कैप्चरिंग, हिंसा व गलत तरीके अपनाकर किया जा रहा है। राष्ट्र हित गौण हो गया है। हमारी सत्ता, हमारा स्वार्थ मात्र अपने प्रति जिम्मेदारी की भावना प्रमुख हो रही है। गालियां देकर, आलोचना करते हुए भी अपना कर्तव्य पूर नहीं करते। हिंसा भी होती है, अत्याचार भी होते हें, भाई भतीजावाद भी व्याप्त है। हमारा आत्मबल, हमारा आत्मविश्वास, देश के प्रति जिम्मेदारी की भावना कम होती जा रही है। आलोचनाओं के आगे राष्ट्र और उसके भविष्य का चिन्तन तो कभी आता ही नहीं।

चुनाव आयोग की विश्वसनीयता समाप्त हो चुकी है। भारत जब धर्म निरपेक्ष देश है तो धर्म, जाति, सम्प्रदाय के नाम पर वोट क्यों मांगे जा रहे है। सभी राजनीतिक दलों में वंशवाद का घुन लगा हुआ है। अपने बाद अथवा अपने रहते हर नेता अपने निर्वाचन क्षेत्र को पीढि़यों के लिए सुरक्षित करने लगा है। विशेषज्ञता प्राप्त लोगों को, प्रतिभाशाली लोगों को टिकट नहीं मिल पाते। आज संसद व विधानसभा में हत्या, अपहरण, बलात्कार, रिश्वतखोरी जैसे संगीन अपराधों में आरोपित लोग जनप्रतिनिधि चुने जा रहे है और कानून बना रहे हैं। राजनैतिक दल गन्दगी को साफ करने के ऐलान करते हैं परन्तु धनबल, बाहुबल, जातीय समीकरण में फिट बैठने वाला ही उम्मीदवार होता है। दल बदल कर आने वाले को टिकट देने में प्राथमिकता ही नहीं पूरा आश्वासन दिया जा रहा है।

आम चुनाव भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा स्रोत हे। आज चुनावी चन्दे व चुनाव खर्च, कालेधन से हो रहा है। आज पेड न्यूज व मतदाताओं को रिश्वत देने की प्रणाली खुले रूप से चल रही है। मतदान पूर्व विभिन्न सरकारी घोषणाओं से भी मतदाता को प्रभावित करने का घृणित प्रयास हो रहा है।

राजनैतिक दल व मतदाता जब तक देश को प्राथमिकता देने का साहस नहीं करेंगे, राजनीत को साफ करने की हिम्मत नहीं करेंगे, यह संभव नहीं होगा। राजनैतिक दलों को लोक मर्यादाओं में लाना मतदाता के हाथ में ही है।
अमेरीका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रेकलिन रूश्जलवेल्ट ने कहा था ‘‘लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक मतदाता बुद्धिमता से अपना प्रत्याशी नहीं चुनते। लोकतंत्र की रक्षा करने वाला कोई तत्व है तो शिक्षित व देश के प्रति सोच रखने वाला मतदाता ही है।

भारत के लोग गर्व करते हैं कि 70 वर्षो तक संसदीय लोकतंत्र सफलतापूर्वक चलता रहा है परन्तु हमारे जनप्रतिनिधियों के प्रतिनिधि होने पर ही प्रश्न चिन्ह लगने लगा है। संसदीय जीवन लाभकारी व्यवसाय बन गया हैं समाज को देने की अपेक्षा अधिकाधिक लेने वाला बना दिया। मतदाता यदि चेत जाय तो संसदीय संस्थाओं का गौरव सम्मान लौट सकता है। राजनीति साम्प्रदायिता, अपराधिकरण, भ्रष्टाचार से मुक्ति पायेगी और लोकतंत्र प्रशस्त होगा।



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