अजय शर्मा
आज भूख की समस्या बड़ी विकट है। पोषक खाद्य की बात दूर है, लाखों लोगों को अपोषक खाद्य भी बड़ी कठिनाई से मिल रहा है। पेट भरा हो तो आदमी और हजार कठिनाइयों को झेल लेता है पर जब वही खाली हो तो आदमी की सारी सहिष्णुता नष्ट हो जाती है। भूखा आदमी वह सब कुछ कर सकता है, जिसकी भरपेट भोजन मिलने पर कल्पना भी नहीं की जा सकती।
आज हिन्दुस्तान दो धाराओं के बीच में से गुजर रहा है। एक ओर वह जनतंत्रा को विकसित करने का प्रयत्न कर रहा है, दूसरी ओर खाद्य की समस्या उसे तानाशाही की ओर धकेल रही है। राज्य-अधिकारियों और व्यापारियों के लिए यह चुनाव का समय है। अब उन्हें साफ-साफ निर्णय करना है कि वे क्या चाहते हैं। जनतंत्र या तानाशाही? यदि वे जनतंत्र पसंद करते हैं तो उसे कमजोर बनाने का प्रयत्न न करें। रिश्वत लेने, अनाज को जमा रखने व अनुचित लाभ कमाने की प्रवृत्ति से जनतंत्रा कमजोर बनता है। भूखी जनता रिश्वत लेने व अनुचित लाभ कमाने वालों के प्रति क्रांति-बिगुल बजा देती है। फिर कानून का स्थान गोली ले लेती है।
क्या आप चाहते हैं कि आपकी पुण्य-भूमि में ऐसा हो? मैं सोचता हूँ कि आप ऐसा कभी नहीं चाहते। आपको अपनी हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति से प्यार है। आप अपने अवतारों और ऋषियों का सम्मान करते हैं। आप उनके ऊँचे-ऊँचे दार्शनिक विचारों और धार्मिक सिद्धांतों को शिरोधार्य करते हैं। त्याग-तपस्या की परंपरा के सामने अपना सिर झुकाते हैं। अहिंसा और अपरिग्रह को उत्कृष्ट धर्म मानते हैं। आप मानते हैं कि सब जीव समान हैं। आप मानते हैं कि सब जीव एक ही परमात्मा के अंश हैं। इतनी गहरी धर्म-निष्ठा, दार्शनिक आस्था, समानता या एकता की मान्यता को रखते हुए क्या पसंद करेंगे कि आपकी मातृभूमि केवल रोटी के दर्शन की प्रयोग-भूमि बन जाए? मैं अपनी आंतरिक आस्था के साथ कहता हूँ कि आप ऐसा नहीं चाहते। आप अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक व दार्शनिक परंपरा को सुरक्षित रखना चाहते हैं। आप असामाजिक कार्य इसलिए नहीं कर रहे हैं कि आपकी हजारों वर्ष पुरानी परम्पराएं खत्म हो जाएं। किंतु आप ये कार्य इसलिए कर रहे हैं कि आपका मन मोह से भर गया है। आपको अपनी सुविधाओं के लिए दूसरों की सुविधाओं को होम करने में कोई संकोच नहीं है। धन पाने के लिए कत्र्तव्य और अकत्र्तव्य का कोई प्रश्न नहीं है। उस मोह का परिणाम यह हो रहा है कि वे भूखें मर रहे हैं। क्या भूख और विलास का योग बहुत समय तक टिक सकेगा?
शासन-तंत्र के अधिकारियों और व्यापारियों की साझेदारी में आज लोकतंत्रा को खुली चुनौती दी जा रही है। राज्य का अधिकारी-वर्ग भ्रष्ट न हो तो व्यापारी भ्रष्ट हो ही नहीं सकता और यदि व्यापारी-वर्ग भ्रष्ट न हो तो अधिकारी-वर्ग भ्रष्ट नहीं हो सकता। दोनों वर्गों की दुर्बलता भ्रष्टाचार को प्रबल बना रही है। इस साझे के व्यापार में लोकतंत्रा की नींव हिलती जा रही है। जनता में रोष उफनता जा रहा है। इस परिस्थिति में उन दोनों वर्गों का लाभ इसी बात में है कि वे तात्कालिक लाभ के लिए दीर्घकालीन लाभ को और अल्प-लाभ के लिए प्रचुर लाभ को चुनौती न दें।
लोकतंत्र को थामने वाले हाथ?
उफनते हुए असंतोष ने लोकतंत्रा को चुनौती दी है, ठीक वैसे ही जैसे उफनता हुआ दूध अग्नि को चुनौती देता है। इस उफान का शमन किया जा सके तो दूध भी उबर सकता है और अग्नि भी, अन्यथा दोनों का भला नहीं है।
इस उफान के नीचे एक ताप है। विषमता का ईंधन अब इतना प्रज्ज्वलित हो उठा है कि केवल दूध में जल की दो-चार बूंदें डालना पर्याप्त नहीं है। ईंधन पर जल डालना भी आवश्यक हो गया है।
एक जमाना था, जब कुछेक लोग शिक्षित होते थे। शिक्षित लोग अशिक्षित जनता पर शासन किया करते थे। आज का जमाना उससे भिन्न है। आज हर व्यक्ति को शिक्षित होने की सुविधा है। शिक्षित जनता अशिक्षित जनता की भांति शासन या जीवन-पद्धति को स्वीकार नहीं कर सकती। विषमता प्राचीन काल में थी पर वह असह्य नहीं थी। उस समय का अभिजात वर्ग ऐश्वर्य को अपने कर्म का फल मानता था तो निम्न वर्ग गरीबी को अपने कर्म का फल मानता था। दोनों के अपने-अपने मूल्य थे। इसलिए असंतोष नहीं था। वर्तमान में भी वर्ग हैं पर उनके सामने अपना-अपना निश्चित मूल्य नहीं है। इस मूल्यहीनता की स्थिति में से ही असंतोष उफन रहा है। लोकतंत्रा की आत्मा धूमिल हो रही है।
जिस दिन लोकतंत्रा के मूल्य स्थापित और स्थिर हो जाएंगे, उसी दिन वास्तविक लोकतंत्रा का उदय होगा। अभी हिन्दुस्तान विकल्पसिद्ध (पूर्व- मान्यतासिद्ध) लोकतंत्रा की स्थिति में चल रहा है। केवल हिंदुस्तान ही नहीं, दुनिया के सभी लोकतंत्रा इसी स्थिति में चल रहे हैं। वास्तविक लोकतंत्रा वह हो सकता है, जहां लोकतंत्रा का मूल्य व्यक्ति, व्यक्ति का मूल्य स्वतंत्राता और स्वतंत्राता का मूल्य समानता हो।
अंतर्विरोध
आधुनिक युग का चिंतन लोकतंत्र की दिशा में प्रवाहित नहीं हो रहा है। परिस्थिति के परिवर्तन पर अतिरिक्त बल दिया जा रहा है। व्यक्ति-परिवर्तन का विचार उसके सामने अकिंचन-सा हो गया है। लोकतंत्रा की दिशा यह है कि व्यक्ति के पीछे परिस्थिति बदले, परिस्थिति के पीछे व्यक्ति बदले, यह परतंत्राता अर्थात् अधिनायकतंत्रा की दिशा है। वर्तमान युग इसी दिशा-बोध से प्रवाहित है, इसीलिए आज आदमी उतना नहीं बदला, जितनी परिस्थितियां बदली हैं। आधुनिक मनुष्य जा रहा है अधिनायकतंत्रा की ओर तथा जाने की बात कर रहा है लोकतंत्रा की ओर। यह अंतर्विरोध इस युग की सबसे बड़ी दुर्घटना है।
केन्द्र है व्यक्ति
मतदान की पद्धति, मतदान और बहुमत प्राप्त दल का सत्तारूढ़ होना। यदि यही लोकतंत्र हो तो इसका अभिनय कहीं भी किया जा सकता है। यह मात्रा उसकी परिधि है। इसका केंद्र है व्यक्ति, जिसे परिस्थिति-परिवर्तन में स्रष्टा की भूमिका प्राप्त है। आज आदमी-आदमी में कितना भेदभाव है। नीग्रो लोगों के प्रति अमेरिकनों के मन में, अफ्रीकियों के प्रति गोरों के मन में तथा हरिजनों के प्रति सवर्ण हिन्दुओं के मन में समानता का भाव नहीं है। अभिजात वर्ग के मन में गरीबों के प्रति सहानुभूति का भाव नहीं है। मानवीय एकता बाहरी आवरणों से आवृत है और उसकी पहचान भी सुलभ नहीं है। इस स्थिति में चुनाव की प्रक्रिया समारोपित प्रक्रिया है। इसे व्यक्ति की स्वतंत्रा चेतना द्वारा स्वीकृत प्रक्रिया नहीं कहा जा सकता।
बुझते दीप में प्राण कौन भरेगा?
जिस व्यक्ति के मन में लोकतंत्रा की पहली किरण फूटी, वह बंधन के परिणामों को भुगतकर मुक्ति पाना चाहता था। जिस व्यक्ति के मन में लोकतंत्रा की पहली धारा बही, वह हिंसा के परिणामों को अनुभव कर अहिंसा की प्रतिष्ठापना करना चाहता था। मुक्ति और अहिंसा इन दो रासायनिक द्रव्यों के घोल का नाम ही लोकतंत्रा है, इसलिए वह स्वतंत्राता और समानता के दर्पण में अपने आपको प्रतिबिम्बित करना चाहता है। इस सच्चाई को हम आज समझें या अगली पीढ़ी के लिए छोड़ दें, कि बंधनों का जाल बिछाकर और विषमता का व्यूह रचकर लोकतंत्रा की स्थापना नहीं की जा सकती और बहुत वर्षों तक चुनाव में सींच-सींचकर उसकी पौध को जीवित नहीं रखा जा सकता।
केवल वे ही हाथ लोकतंत्र के बुझते दीप में प्राण भर सकते हैं, जो अपनी पतंग की डोर अपने-आप थामे हुए हैं और जो स्वतंत्राता की पवित्रा वेदी पर समानता की प्रतिष्ठा करने को प्राणपण से जुटे हुए हैं। क्या चुनाव में बहुमत से विजय की याचना करने वाले हाथ इस शंख-ध्वनि को अपनी पवित्रा अंगुलियों में थामेंगे?
Ajay
Sharma ( Former Sr Journalist Hindustan News Paper and Doordarshan, New
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