Friday, February 24, 2017

तेरापंथ है मर्यादा और अनुशासन का बेजोड़ संगम


अजय शर्मा  
जब भी मर्यादा और अनुशासन का जिक्र होता है। तो एक प्रबुद्धजीवियों के बीच एक अंतहीन चर्चा शुरू हो जाती है। सभी के नजरों में इसके मायने अलग अलग हैं। यदि यही चर्चा धर्म संघ को लेकर हो तो चर्चा और भी ज्यादा संवेदनशील और गंभीर हो जाती है। किसी भी धर्म संघ में मर्यादा और अनुशासन का पालन सर्वोपरि माना गया है। जब बात इसकी चली है तो आपको बताना चाहूंगा कि जैन श्वेतांबर में तेरापंथ ऐसा धर्मसंघ है जिसमें मर्यादा और अनुशासन को सर्वोच्च मान्यता प्राप्त है और इसके साथ साथ यह अपने आप में ऐसा पहला धर्मसंघ है जो मर्यादा महोत्सव मनाता है।
आपको बताना चाहूंगा कि मर्यादा महोत्सव विश्व का विलक्षण पर्व है। संभवत किसी भी धर्मसंघ में मर्यादा का उत्सव मनाने की परम्परा नहीं है। तेरापंथ के चतुर्थ आचार्य जयचार्य के द्वारा बालोतरा की पावन धरा पर इस महोत्सव का शुभारंभ हुआ था। मर्यादा श्रद्धा,समर्पण और अनुशासन का गुलदस्ता है। जीवन के विकास में मर्यादा का सर्वोपरि स्थान है। संगठन का मूल आचार मर्यादा है। एक आचार, एक विचार एवं एक आचार्य की त्रिवेणी का संगम है मर्यादा।
मर्यादा से संघ परिवार संगठित रहता है। तेरापंथ धर्म संघ के चौथे आचार्य जयाचार्य ने मौलिक मर्यादा बनाई उसी पर आज यह संघ टिका हुआ है। जिस संघ में, जिस घर में मर्यादा हो वहां सुख, शान्ति होती है। एक घर में विनय की नींव हो, अनुशासन की खिड़की हो, प्रेम की छत हो संगठन का दरवाजा हो। उस घर मे शांति ही शांति होती है।
मैं मानता हूं कि संविधान, संघ, संस्था या राष्ट्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्राण तत्व होता है विधान। विधान या मर्यादा का अर्थ होता है अनुशासन। अनुशासित मर्यादित जीवन विकास के शिखरों को छूता है। तेरापंथ के सर्वोन्मुखी विकास की वजह अनुशासन और मर्यादा है। संघीय मर्यादाएं लक्ष्मण रेखा की तरह संयमित जीवन की रक्षा करती हैं।
तेरापंथ धर्म को जितना मैंने समझा और जाना है उसके आधार पर कह सकता हूं कि तेरापंथ शासन में आज्ञा का सर्वोच्च स्थान है। जैन धर्म भगवान महावीर से जुड़ा है। इनका एक संप्रदाय तेरापंथ धर्म भी है। जैन समाज में सबसे छोटा संप्रदाय है तेरापंथ। पर यह सबसे ज्यादा मर्यादित संगठन है। एक गुरु, एक आचार्य, एक विचार के आधार पर तेरापंथ कार्य करता है। देश में बहुत सी अव्यवस्थाएं हैं जो नियमों के उल्लंघन से उपजी हैं। नियमों का पालन डंडे के जोर पर नहीं, हृदय परिवर्तन व समर्पण से हो सकता है। तेरापंथ समाज मर्यादाओं का निर्वाह करता है इसलिए हर साल मर्यादा महोत्सव मनाया जाता है। मर्यादा महोत्सव तेरापंथ धर्मसंघ का
महत्वपूर्ण पर्व है। यह विश्व का एकमात्र ऐसा संघ है, जिसमें मर्यादा का उत्सव मनाया जाता है।
मर्यादा महोत्सव सारणा वारणा का प्रतीक है। मर्यादा और अनुशासन की जो व्यवस्था आचार्य भिक्षु ने दी आज वह तेरापंथ का प्राण है। उनके विराट, भव्य विशाल व्यक्तित्व को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता है। मैं अब तक जितने भी मुनियों से मिला हूं उसके आधार पर यह समझ पाया कि आचार्य भिक्षु का श्रद्धाबल, आगम ज्ञान बल एवं समता सहिष्णुता बल बेजोड़ था। संघ कभी नहीं बदलता, संघपति बदलते रहते हैं। हमारी निष्ठा संघ के प्रति होनी चाहिए। उसके बाद संघपति के प्रति निष्ठा रखें। मर्यादा का महोत्सव क्यों मनाया जाता हैं? इसका जवाब है यदि मर्यादा नहीं होगी तो साधु-श्रावक भटक जाएगा। मर्यादा महोत्सव से मर्यादाओं का निरंतर स्मरण होता रहेगा और उसकी अच्छी तरह पालना हो सकेगी। जिस तरह ओजोन परत के कारण पर्यावरण सुरक्षित है, ठीक उसी तरह मर्यादा के कारण ही जीवन सुरक्षित है।

आचार्य की आज्ञा के अनुरूप श्रावक-श्राविकाएं चलते हैं। गुटबाजी, दलबंदी से दूर रहते हैं। इतने बरसों बाद भी संघ अखण्ड इसीलिए है कि मर्यादाएं हैं। श्रद्धा, समर्पण, विवेक, संघ और संघपति के प्रति अटूट भावना रखने वाला ही सुश्रावक होता है।

आज तेरापंथ जितना आगे है, उसके अतीत में कई संत-मुनियों की मेहनत है। आचार्य भिक्षु की लकीरों पर चलते हुए आज तेरापंथ धर्मसंघ यहां पहुंचा हैं। अगर जीवन में मर्यादा नहीं हो तो सब बेकार है। मर्यादा सिर्फ शक्ति संपन्न के लिए नहीं बल्कि सभी के लिए होती है। मर्यादा पत्र सभी मनुष्यों  का प्राण है। सर्वविदित है कि कोई भी काम होता है तो उसमें मर्यादा अपेक्षित होती है। तेरापंथ धर्मसंघ में ५ मर्यादाएं बनाई गई थीं जिनमें काल, समय और परिस्थिति के कारण परिवर्तन आया है। गुरु आज्ञा में चलना आदि मर्यादाएं ही हैं। इसमें संस्था को नहीं गुण को महत्व दिया जाता है।

मुझे यह कहने में बिल्कुल भी संकोच नहीं है कि मर्यादा के कारण ही तेरापंथ धर्मसंघ ने सिर्फ हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि देश-विदेशों तक अपनी पहचान बनाई है। तेरापंथ धर्म संघ का अनुशासन बेजोड़ है। एक गुरु के आदेशानुसार साधक सधे कदमों में लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। व्यवस्था से सुसज्जित इस धर्म संघ में आत्मा की पूजा प्रति पल की जाती है। गलतियों का प्रायश्चित कर शुद्ध चेतना में निवास करना इस धर्म संघ की नीति है। तेरापंथ धर्म संघ के प्रथम प्रणेता आचार्य भिक्षु ने ऐसी मर्यादाओं का सूत्रपात किया जो तेरापंथ धर्म संघ के कणकण को आलोकित कर रही है। आत्म साधकों का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। इस धर्म संघी की विचारधारा मानव मात्र के हित में प्रवाहित होती है। पूरे विश्व का पथ प्रदर्शक तेरापंथ धर्म संघ एक गुरु के इंगित पर वर्तमान समस्या को समाहित करने के लिए संकल्पबद्ध है। अणुव्रत, प्रेक्षाध्यान और जीवन विज्ञान जैसे सामाजिक अभियान समाज की दिशा और दशा को बदलने के लिए कटिबद्ध हैं। ज्ञान शालाओं एवं व्रत चेतना की संयोजना अच्छे राष्ट्र के निर्माण के ही उपक्रम हैं। अत मैं कह सकता हूं कि तेरापंथ धर्मसंघ मार्यादा और अनुशासन का बेजोड़ संगम है।





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