Thursday, September 12, 2019

साक्षरता के मामले में हम कहां खड़े हैं

व्यक्ति, समाज और समुदाय की दृष्टि से साक्षरता के महत्व को रेखांकित करने के लिए विश्व भर में साक्षरता दिवस मनाना शुरु किया गया था. संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन ‘यूनेस्को’ ने 7 नवंबर 1965 को यह फैसला किया कि हर साल 8 सितंबर को यह दिवस मनाया जाएगा. सन 1966 से यह मनाना शुरु हुआ. शिक्षा पर वैश्विक निगरानी रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हर पाँच में से एक पुरुष और दो-तिहाई महिलाएँ अनपढ़ है. उनमें से कुछ के पास कम साक्षरता कौशल है. केवल वयस्क शिक्षा की बात ही नहीं है, बड़ी संख्या में बच्चों की पहुँच आज भी स्कूलों से बाहर है. कुछ बच्चे स्कूलों में अनियमित रहते हैं.

गरीबी को मिटाना, बाल मृत्यु दर को कम करना, जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना, लैंगिक समानता के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरक्षरता को समाप्त करना बहुत जरूरी है. साक्षरता में वह ताकत है जो व्यक्ति, परिवार और पूरे समाज की प्रतिष्ठा को बढ़ा सकती है. इसीलिए संयुक्त राष्ट्र के सहस्राब्दी लक्ष्यों और अब संधारणीय विकास के 2030 के एजेंडा में साक्षरता की महत्वपूर्ण भूमिका है. यह साक्षरता केवल पढ़ने और लिखने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य गुणात्मक शिक्षा तक जाती है. वह शिक्षा जो व्यक्ति का पूरा विकास कर सके.

इतने सुंदर घोषित लक्ष्यों को देखने और समझने के बाद हमें अपनी शिक्षा की तरफ नजर डालनी चाहिए. धारणा है कि भारत में शिक्षा का स्तर बहुत ऊँचा है. सीबीएसई और आईसीएसई परीक्षाओं में 100 फीसद नम्बर लाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. यह भ्रम सन 2009 के पीसा टेस्ट में बुरी तरह टूटा था. आज उसकी याद दिलाने की जरूरत भी है. विकसित देशों की संस्था ओईसीडी हर साल प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट (पीसा) के नाम से एक परीक्षण करती है. हर तीन साल में होने वाले दो घंटे की इस परीक्षा में दुनियाभर के देशों के तकरीबन पाँच लाख बच्चे शामिल होते हैं.

सन 2009 में पहली बार भारत और चीन के शंघाई प्रांत के बच्चे इस परीक्षा में पहली बार शामिल हुए. चीनी बच्चे पढ़ाई, गणित और साइंस तीनों परीक्षणों में नम्बर एक पर रहे और भारत के बच्चे 72 वें स्थान पर रहे, जबकि कुल 74 देश ही उसमें शामिल हुए थे. उस वक्त भारत सरकार ने पीसा टेस्ट की आलोचना की थी और कहा था कि वह टेस्ट भारत की सांस्कृतिक परिस्थितियों से मेल नहीं खाता है.

अब देश का मानव संसाधन विभाग मानता है कि यदि चीन और वियतनाम जैसे 80 देशों के बच्चे इस परीक्षा में शामिल हो सकते हैं, तो हमें भी पीछे नहीं रहना चाहिए. इस साल जनवरी में खबर थी कि भारत के बच्चे सन 2021 में फिर से पीसा टेस्ट में बैठेंगे. भारत सरकार और ओईसीडी के बीच हुए समझौते के तहत इस टेस्ट में केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और चंडीगढ़ के सरकारी स्कूलों के बच्चे बैठेंगे.

करीब एक दशक से ज्यादा समय बाद यह देखने का मौका मिलेगा कि हमारी शिक्षा प्रणाली में कोई बदलाव आया भी है या नहीं. पर हमें दूसरी बातों की तरफ भी ध्यान देना होगा. हमारी शिक्षा में बच्चे बहुत ज्यादा रटने और ऐसे विषयों के चुनने पर ध्यान देते हैं, जिनमें रोजगार के बेहतर अवसर हों. बच्चों की दिलचस्पी किन विषयों में है, इसपर उनके माता-पिता कम ध्यान देते हैं. शिक्षा को हम बच्चे के व्यक्तित्व के विकास और उसकी रचनात्मक प्रतिभा और मौलिकता बढ़ाने का माध्यम नहीं मानते.

Pramod joshi
Ex Editor Hindustan news paper

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