ये कड़वा सत्य है. आज हमारे किसान भाइयो की हालत ठीक नहीं है। हिंदी के महान कवि प्रेमचंद जी के उपन्यास ‘गोदान ‘ में किसान की जो दशा है वो आज भी भारत के बहुत से गांव की है। जिन्हें इस बात पर यकीन नहीं है, उन्हें ‘ गोदान ‘ पढ़ना चाहिए. और अगर फिर भी यकीन न हो तो भारत के पिछड़े हुए गांवों में जाकर देखें।
एक समय भारत दुनिया के कृषि प्रधान देशों का सिरमौर हुआ करता था. यहां के किसान खाद्य व नकदी फसलों के बादशाह थे.किसानों की जो आज देश में स्थिति है वह किसी से छिपी नहीं है।आज इस देश के खेती और किसानों की बर्बादी हमको चारों तरफ दिखार्इ देती है । किसानों की इस हालत के लिए कौन जिम्मेदार है? और इसमें सुधार को लेकर सरकार कितनी गंभीर हैं ? क्या हो रहा इस देश में
किसान की फसल छः माह में तैयार होती है और उस फसल को तैयार करने के लिए आज भी किसान नंगे पांव जाड़ा, गर्मी, बरसात में खुले आकाश के नीचे रात-दिन परिश्रम करके फसल तैयार कर लेता है। खेतों में रात-दिन कार्य करते जब भी कृषि उत्पाद बाजार में आता है तो उसके मूल्य निरंतर गिरने लगते हैं और मध्यस्थ सस्ती दरों पर उसका माल क्रय कर लेते हैं जिससे कृषि घाटे का व्यवसाय बना हुआ है।। यह विडंबना ही है कि इस ओर ध्यान नहीं दिया गया। 1967 में यूरिया 45 रुपया बोरी (100 किलो), सीमेन्ट 10 रुपये बोरी, कुदाल की कीमत 6रुपये, हल का फाड़ 2 रुपया, धोती 13 रुपया जोड़ी मिलता था। अगर किसान एक मन चावल भी बेच देता था तब उसे 76 रुपये मिलते थे और इन पांच समानों को खरीदने के बाद भी 24 रुपये नकद बचा लेता था। लेकिन आज अगर कोई किसान एक मन चावल बेचे तो उसे 800 रुपया मिलेगा जिसमें इन पांच समानों की कीमत यूरिया 290 रुपया प्रति गटा 50 किलो x2= 580 , सीमेन्ट 270 प्रति बोरी, कुदाल 300 रुपया, हल का फाड़ा 60 रुपया, गरीब वाली धोती 250 रुपये कुल खर्च 1460 होता है और चावल की कीमत 800 तब स्वतः ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
किसानों को परंपरागत प्राकृतिक पद्धति को त्याग कर आधुनिक खेती करने मजबुर को कर रहे है हाइब्रिड बीज और रासायनिक खादों पर फसलों की उपज अनिर्धारित होती है. मशीनीकरण और पारंपरिक पद्धति से महंगा साबित हो रहीं है। किसानों को सोचने का मौका भी नहीं मिला. कॉरपोरेट घरानों के झांसे में आकर किसान कर्ज के तले दबने लगे। उन्हें मुनाफा कम और लागत ज्यादा लगने लगी। परिणामस्वरूप किसानों की स्थिति बदतर होने लगी। आज किसानों की आत्महत्या कृषि बन गयी है.
भूमि अधिग्रहण नीति
केन्द्र/राज्य सरकारों अथवा राज्यान्तर्गत गठित विभिन्न विकास प्राधिकरणों द्वारा भूमि अधिग्रहण की नीति में कृषि योग्य भूमि के मद्देनजर परिवर्तन किया जाना परमावश्यक है। औद्योगिक विकास, आधारभूत संरचना विकास व आवासीय योजनाओं हेतु ऐसी भूमि का अधिकरण किया जाना चाहिए जो कृषि योग्य नहीं है। ऊसर बंजर तथा जिसमें अत्यधिक कम फसल पैदावार होती है, ऐसी भूमि का अधिग्रहण हो। कृषि उपयोग में लाए जाने वाली भूमि का अधिग्रहण और उस पर निर्माण प्रतिबंधित कर देना चाहिए। आवासीय औद्योगिक एवं ढांचागत निर्माणों के लिए कृषि योग्य भूमि का अंधाधुंध अधिग्रहण किए जाने से कृषि योग्य भूमि अत्यधिक संकुचित होती चली जाएगी जो तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या के भरण हेतु कृषि उत्पादन के लिए अक्षम होगी। यह भी आवश्यक है कि जिन किसानों की भूमि अधिगृहित की जाती है मुआवजे के रूप में एकमुश्त भुगतान की जानी चाहिए। साथ ही परियोजनाओं में हो रहे लाभ से भी लाभांवित किए जाने हेतु अधिगृहित भूमि पर विकसित प्रोजेक्ट में एक अंशधारक के रूप में किसानों को रखा जाए जिससे उन्हें प्रोजेक्ट के लाभ में नियमित भागीदारी मिलती रहे
आयोग का गठन
किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए झा कमेटी की सिफारिश के आधार पर वर्ष 1965 में कृषि मूल्य व लागत आयोग का गठन किया गया था।आयोग समर्थन मूल्य की घोषणा जिन आधारों पर करता है वे कुछ इस तरह हैं- (क) उत्पादन की लागत, (ख) उत्पादन के आदान मूल्यों में परिवर्तन, (ग) बाजार में मूल्यों की स्थिति, (घ) उपज की मांग व आपूर्ति, (ड) उद्योगों पर होने वाले नकारात्मक/सकारात्मक प्रभाव, (च) सामान्य मूल्य स्थिति पर प्रभाव, (छ) किसान द्वारा चुकाए गए और प्राप्त किए गए मूल्यों का अनुपात, (ज) अंतरराष्ट्रीय मूल्य स्थिति, (झ) आम लोगों के जीवनयापन पर मूल्यों पर प्रभाव। सिफारिश के ये आधार परस्पर विरोधी, बिखरे हुए एवं अस्पष्ट हैं। आयोग इनमें से किन्हीं भी बिन्दुओं को अधिक महत्त्व देकर अपनी सिफारिश कर सकता है। इन कृषि मूल्यों को निश्चित करने के लिए कृषि उत्पादन हेतु किए जाने वाले श्रम के पारिश्रमिक, प्रयुक्त उपकरणों व उनकी घिसावट पर किए जाने वाले खर्च, कृषि में लगने वाली पूंजी तथा भू-पूंजी और इन दोनों के ब्याज की ओर ध्यान नहीं दिया गया। आयोग तब तक कृषि उपजों का सही आकलन कर ही नहीं सकता, जब तक प्राकृतिक प्रकोप जैसे सूखा, बाढ़, ओले, बीमारियां, बेमौसमी बरसात आदि जोखिमों के सम्बंध में विचार कर लागत का लेखा तैयार नहीं किया जाता। वास्तविकता तो यह है कि आयोग इन आपातकालिक आपदाओं को महत्त्व ही नहीं देता।समर्थन मूल्य की सिफारिश करते समय किसान को लागत पर कितना प्रतिशत लाभ दिया जाए, इसके लिए भी कोई ठोस दिशा-निर्देश आयोग के पास नहीं है। सरकार आयोग की सिफारिश पर रबी और खरीफ की करीब 21 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है। FCI और CCI जैसी सरकारी एजेंसियां उन समर्थन मूल्यों पर खरीद करती हैं। पहली नजर में यह नीति किसानों के लिए लाभदायक लगती है, किन्तु हकीकत बिल्कुल उलट है। बाजरा, ज्वार, मक्का, जौ जैसे मोटे अनाजों में आजतक कुल उपज का 1 प्रतिशत भी कभी खरीदा नहीं गया। इसी तरह चना, मूंग, उड़द आदि दलहनी फसलों के लिए भी समर्थन मूल्य घोषित तो किए जाते हैं, किन्तु उनकी खरीद की कोई व्यवस्था नहीं की जाती। आश्चर्य तो तब होता है जब यही दालें विदेशों से आयात करली जाती हैं और किसान को बाज़ार के भरोसे छोड़ दिया जाता है।
स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट
‘नरेन्दर मोदी जी कहते थे भाजपा सत्ता में आने पर स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करेगी। रिपोर्ट में किसानों को फसल की उत्पादन लागत जमा 50 प्रतिशत मूल्य देने की संस्तुति की थी। प्राकृतिक आपदा में फसल बर्बाद होने पर किसानों को 10 हजार रुपये प्रति एकड़ मुआवजा दिया जाए। हैरत की बात है कि हमारे प्रधानमंत्री भाई नरेन्दर मोदी जी स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट का नाम लेना भूल गये
हक़ की लड़ाई
आजादी के 68 साल बाद भी किसानों के साथ-साथ देश को इस ‘क्यों का जवाब नहीं मिल रहा कि किसानों की तकदीर फिर भी बदलती क्यों नहीं बदली? क्यों हर साल किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ता है ? तो कारण साफ और सीधा यही माना जाएगा कि किसान ने आज तक किसान के रूप में अपनी ताकत कभी दिखाई ही नहीं। एक दल की सरकार से किसान नाराज हुआ तो दूसरे दल के पाले में जा खड़ा होता है और उससे नाराज हुआ तो फिर पहले वाले के साथ। काश हमारी सरकारें और राजनीतिक दल किसानों को किसान ही समझते, वोट बैंक नहीं। हर सरकार और राजनीतिक दल किसान हित की बात करते हैं लेकिन तभी तक जब तक विपक्ष में होते हैं। सत्ता में कोई भी राजनीतिक दल क्यों ना रहे, किसान को तो परेशान ही होना पड़ता है।
देश भर के किसानों को अब जाग जाना चाहिये और अपने हक़ की लड़ाई लड़नी चाहिए।
जय भारत, जय किसान।।।
एक समय भारत दुनिया के कृषि प्रधान देशों का सिरमौर हुआ करता था. यहां के किसान खाद्य व नकदी फसलों के बादशाह थे.किसानों की जो आज देश में स्थिति है वह किसी से छिपी नहीं है।आज इस देश के खेती और किसानों की बर्बादी हमको चारों तरफ दिखार्इ देती है । किसानों की इस हालत के लिए कौन जिम्मेदार है? और इसमें सुधार को लेकर सरकार कितनी गंभीर हैं ? क्या हो रहा इस देश में
किसान की फसल छः माह में तैयार होती है और उस फसल को तैयार करने के लिए आज भी किसान नंगे पांव जाड़ा, गर्मी, बरसात में खुले आकाश के नीचे रात-दिन परिश्रम करके फसल तैयार कर लेता है। खेतों में रात-दिन कार्य करते जब भी कृषि उत्पाद बाजार में आता है तो उसके मूल्य निरंतर गिरने लगते हैं और मध्यस्थ सस्ती दरों पर उसका माल क्रय कर लेते हैं जिससे कृषि घाटे का व्यवसाय बना हुआ है।। यह विडंबना ही है कि इस ओर ध्यान नहीं दिया गया। 1967 में यूरिया 45 रुपया बोरी (100 किलो), सीमेन्ट 10 रुपये बोरी, कुदाल की कीमत 6रुपये, हल का फाड़ 2 रुपया, धोती 13 रुपया जोड़ी मिलता था। अगर किसान एक मन चावल भी बेच देता था तब उसे 76 रुपये मिलते थे और इन पांच समानों को खरीदने के बाद भी 24 रुपये नकद बचा लेता था। लेकिन आज अगर कोई किसान एक मन चावल बेचे तो उसे 800 रुपया मिलेगा जिसमें इन पांच समानों की कीमत यूरिया 290 रुपया प्रति गटा 50 किलो x2= 580 , सीमेन्ट 270 प्रति बोरी, कुदाल 300 रुपया, हल का फाड़ा 60 रुपया, गरीब वाली धोती 250 रुपये कुल खर्च 1460 होता है और चावल की कीमत 800 तब स्वतः ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
किसानों को परंपरागत प्राकृतिक पद्धति को त्याग कर आधुनिक खेती करने मजबुर को कर रहे है हाइब्रिड बीज और रासायनिक खादों पर फसलों की उपज अनिर्धारित होती है. मशीनीकरण और पारंपरिक पद्धति से महंगा साबित हो रहीं है। किसानों को सोचने का मौका भी नहीं मिला. कॉरपोरेट घरानों के झांसे में आकर किसान कर्ज के तले दबने लगे। उन्हें मुनाफा कम और लागत ज्यादा लगने लगी। परिणामस्वरूप किसानों की स्थिति बदतर होने लगी। आज किसानों की आत्महत्या कृषि बन गयी है.
भूमि अधिग्रहण नीति
केन्द्र/राज्य सरकारों अथवा राज्यान्तर्गत गठित विभिन्न विकास प्राधिकरणों द्वारा भूमि अधिग्रहण की नीति में कृषि योग्य भूमि के मद्देनजर परिवर्तन किया जाना परमावश्यक है। औद्योगिक विकास, आधारभूत संरचना विकास व आवासीय योजनाओं हेतु ऐसी भूमि का अधिकरण किया जाना चाहिए जो कृषि योग्य नहीं है। ऊसर बंजर तथा जिसमें अत्यधिक कम फसल पैदावार होती है, ऐसी भूमि का अधिग्रहण हो। कृषि उपयोग में लाए जाने वाली भूमि का अधिग्रहण और उस पर निर्माण प्रतिबंधित कर देना चाहिए। आवासीय औद्योगिक एवं ढांचागत निर्माणों के लिए कृषि योग्य भूमि का अंधाधुंध अधिग्रहण किए जाने से कृषि योग्य भूमि अत्यधिक संकुचित होती चली जाएगी जो तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या के भरण हेतु कृषि उत्पादन के लिए अक्षम होगी। यह भी आवश्यक है कि जिन किसानों की भूमि अधिगृहित की जाती है मुआवजे के रूप में एकमुश्त भुगतान की जानी चाहिए। साथ ही परियोजनाओं में हो रहे लाभ से भी लाभांवित किए जाने हेतु अधिगृहित भूमि पर विकसित प्रोजेक्ट में एक अंशधारक के रूप में किसानों को रखा जाए जिससे उन्हें प्रोजेक्ट के लाभ में नियमित भागीदारी मिलती रहे
आयोग का गठन
किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए झा कमेटी की सिफारिश के आधार पर वर्ष 1965 में कृषि मूल्य व लागत आयोग का गठन किया गया था।आयोग समर्थन मूल्य की घोषणा जिन आधारों पर करता है वे कुछ इस तरह हैं- (क) उत्पादन की लागत, (ख) उत्पादन के आदान मूल्यों में परिवर्तन, (ग) बाजार में मूल्यों की स्थिति, (घ) उपज की मांग व आपूर्ति, (ड) उद्योगों पर होने वाले नकारात्मक/सकारात्मक प्रभाव, (च) सामान्य मूल्य स्थिति पर प्रभाव, (छ) किसान द्वारा चुकाए गए और प्राप्त किए गए मूल्यों का अनुपात, (ज) अंतरराष्ट्रीय मूल्य स्थिति, (झ) आम लोगों के जीवनयापन पर मूल्यों पर प्रभाव। सिफारिश के ये आधार परस्पर विरोधी, बिखरे हुए एवं अस्पष्ट हैं। आयोग इनमें से किन्हीं भी बिन्दुओं को अधिक महत्त्व देकर अपनी सिफारिश कर सकता है। इन कृषि मूल्यों को निश्चित करने के लिए कृषि उत्पादन हेतु किए जाने वाले श्रम के पारिश्रमिक, प्रयुक्त उपकरणों व उनकी घिसावट पर किए जाने वाले खर्च, कृषि में लगने वाली पूंजी तथा भू-पूंजी और इन दोनों के ब्याज की ओर ध्यान नहीं दिया गया। आयोग तब तक कृषि उपजों का सही आकलन कर ही नहीं सकता, जब तक प्राकृतिक प्रकोप जैसे सूखा, बाढ़, ओले, बीमारियां, बेमौसमी बरसात आदि जोखिमों के सम्बंध में विचार कर लागत का लेखा तैयार नहीं किया जाता। वास्तविकता तो यह है कि आयोग इन आपातकालिक आपदाओं को महत्त्व ही नहीं देता।समर्थन मूल्य की सिफारिश करते समय किसान को लागत पर कितना प्रतिशत लाभ दिया जाए, इसके लिए भी कोई ठोस दिशा-निर्देश आयोग के पास नहीं है। सरकार आयोग की सिफारिश पर रबी और खरीफ की करीब 21 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है। FCI और CCI जैसी सरकारी एजेंसियां उन समर्थन मूल्यों पर खरीद करती हैं। पहली नजर में यह नीति किसानों के लिए लाभदायक लगती है, किन्तु हकीकत बिल्कुल उलट है। बाजरा, ज्वार, मक्का, जौ जैसे मोटे अनाजों में आजतक कुल उपज का 1 प्रतिशत भी कभी खरीदा नहीं गया। इसी तरह चना, मूंग, उड़द आदि दलहनी फसलों के लिए भी समर्थन मूल्य घोषित तो किए जाते हैं, किन्तु उनकी खरीद की कोई व्यवस्था नहीं की जाती। आश्चर्य तो तब होता है जब यही दालें विदेशों से आयात करली जाती हैं और किसान को बाज़ार के भरोसे छोड़ दिया जाता है।
स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट
‘नरेन्दर मोदी जी कहते थे भाजपा सत्ता में आने पर स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करेगी। रिपोर्ट में किसानों को फसल की उत्पादन लागत जमा 50 प्रतिशत मूल्य देने की संस्तुति की थी। प्राकृतिक आपदा में फसल बर्बाद होने पर किसानों को 10 हजार रुपये प्रति एकड़ मुआवजा दिया जाए। हैरत की बात है कि हमारे प्रधानमंत्री भाई नरेन्दर मोदी जी स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट का नाम लेना भूल गये
हक़ की लड़ाई
आजादी के 68 साल बाद भी किसानों के साथ-साथ देश को इस ‘क्यों का जवाब नहीं मिल रहा कि किसानों की तकदीर फिर भी बदलती क्यों नहीं बदली? क्यों हर साल किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ता है ? तो कारण साफ और सीधा यही माना जाएगा कि किसान ने आज तक किसान के रूप में अपनी ताकत कभी दिखाई ही नहीं। एक दल की सरकार से किसान नाराज हुआ तो दूसरे दल के पाले में जा खड़ा होता है और उससे नाराज हुआ तो फिर पहले वाले के साथ। काश हमारी सरकारें और राजनीतिक दल किसानों को किसान ही समझते, वोट बैंक नहीं। हर सरकार और राजनीतिक दल किसान हित की बात करते हैं लेकिन तभी तक जब तक विपक्ष में होते हैं। सत्ता में कोई भी राजनीतिक दल क्यों ना रहे, किसान को तो परेशान ही होना पड़ता है।
देश भर के किसानों को अब जाग जाना चाहिये और अपने हक़ की लड़ाई लड़नी चाहिए।
जय भारत, जय किसान।।।


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